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Magazine - Year 1953 - Version 2

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इतिहास से भी कुछ सीखिए।

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(श्री नादेव जी शास्त्री, वेदतीर्थ)

अंग्रेजी में एक कहावत है-इतिहासों की पुनरावृत्ति होती रहती है अर्थात् इतिहासों के दृष्टान्त पुनः पुनः समय-समय पर जगत के सम्मुख किसी न किसी रूप में आकर जनसमुदाय, जनपद, राष्ट्र, देश संसार को कुछ स्मरण दिला जाते हैं, कुछ सचेत कर जाते हैं, कुछ सिखा जाते हैं। इसी दृष्टि से संसार के इतिहासों का महत्व है, फिर चाहे ऐसे इतिहास वंश-परम्परा से, राष्ट्र-परम्परा से, कर्णोपकर्णिका से आये हों, अथवा इतिहास के पन्नों में श्वेत पत्रों पर कृष्णाक्षरों में लिखे गये हों। यद्यपि सब इतिहास भिन्न-भिन्न वर्णों वाले कागजों पर कृष्णमसी से ही लिखे गये हैं, मुद्रित हुए हैं, पर उन कृष्णाक्षरों में लिखे गये वाक्य स्वर्णाक्षरों का मूल्य रखते हैं। किसी-किसी इतिहास में लिखे गये वाक्यों का तो मूल्य लगाना ही कठिन है। समस्त पृथ्वी भी मूल्य में दी जाय तो भी उन वाक्यों का, उन वाक्यों में उपवर्णित गम्भीर सत्य तत्वों का संसार में क्या कोई मूल्य दे सकता है। इसी दृष्टि से इतिहासों का महत्व है।

आजकल के लोग कहते हैं कि पुराने लोग इतिहास के महत्व को जानते न थे, पर यह उनकी भूल है। छान्दोग्य उपनिषद् में इतिहास को एक विशेष विद्या में माना गया है और हमारे ऋषि−मुनि जब कभी दृष्टि का समय आता है तब ‘इति-ह-आस’ (ऐसा निश्चय से था) ‘इति-ह-ऊचुः-वृद्धाः’ (ऐसे बड़े बूढ़े कह गए) ऐसे वाक्यों से ही प्रारम्भ करते देखे गए। किसी घटना का स्थान, तारीख, सन्, उस घटना से सम्बद्ध महापुरुष अथवा विशिष्ट पुरुषों का नाम-धाम, उनके जीवन का विशेष बातें इत्यादि का उल्लेख इतिहास में आना ठीक है, पर असली तत्व देखना चाहिये, ये तो ऊपर-ऊपर के छिलके हैं। असली तत्व तो वह सत्य है, जो उन बातों से प्रकाशित होता है और संसार में मार्गदर्शक का काम देता है। आजकल स्कूलों-कालेजों में जो इतिहास रटाया जाता है, वह तो छात्रों के विनाश मात्र का कारण है, वह सुसंस्कृति के विनाश का कारण है। हमारे इतिहास-पुराण जैसे भी हैं, जिस रूप में भी मिले रहे हैं, चाहे उनमें कथा-गाथा की भले ही भरमार हो, पर सब में एक बात पर जोर है। वह यह कि ‘यतो धर्मः ततो जयः’-जिधर धर्म रहा है, रहेगा, उधर ही जय होगी, ‘सत्यमेव जयते नानृतम’-जिधर सत्य होगा, अधिक सत्य होगा, रहा है, उधर ही जय रही है और रहेगी। यदि इतिहास इस बात को नहीं दिखाता तो फिर उस इतिहास का लाभ ही क्या? फिर वह इतिहास ही क्या? हमारा इतना बड़ा महाभारत किन्तु चार श्लोकों में उसका सुन्दर तत्व आ जाता है। वे चार श्लोक ये हैं-

माता पितृ सहस्त्राणि पुत्रदार शतानि च। संसारेष्वभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे॥

संसार में सैंकड़ों बार आये गये, सैकड़ों बार पुत्र-स्त्री, इष्ट-मित्र, बन्धु-बान्धवों का संपर्क हुआ, ऐसे ने जाने कितनी बार हुआ और कितनी बार होगा, कोई ठिकाना नहीं है।

शोकस्थानसहसत्राणि दुःखस्थानशतानि च। दिवसेदिवसे मूढ़म् आविशन्ति न पण्डितम्॥

संसार में शोक के अवसर सहस्रों बार आते और जाते हैं, दुःख के प्रसंग सैकड़ों बार आते और जाते हैं, पर तत्वदर्शी पण्डित संसार के तत्व पर दृष्टि रखकर घबराता नहीं, मूर्ख ही घबराते रहते हैं।

न जातु कामान्न ययान्न लोभाद् धर्म त्यजेज्जी वितस्यापि हेतोः। धर्मो नित्यो हेतुरष्य त्वनित्यः जीवो नित्यो सुखदुखे त्वनित्ये॥

किसी इच्छा, लोभ, भय से मनुष्य को कभी धर्म नहीं छोड़ बैठना चाहिये, कभी कर्त्तव्य से परामुख नहीं होना चाहिये। धर्म नित्य है, सदैव साथ देने वाला है, पर वह जिससे बनता है वह साधन-सामग्री अनित्य वस्तु है। जीव नित्य है, पर उसके साथ समय-समय पर चिपटते रहने वाले सुख-दुःख अनित्य हैं, इसलिये घबराते क्यों हो, कर्त्तव्य-पथ पर अड़े रहो-इतना कह कर अन्त में सौति ऋषि कहते हैं-

ऊर्ध्व बाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते॥

कैसा उलटा जमाना आया, मैं ऊपर हाथ उठा उठाकर चिल्ला रहा हूँ, कोई सुनता ही नहीं! लोगों! धर्म से ही तुम्हें अर्थ मिलेगा, राज्य मिलेगा, साँसारिक ऐश्वर्य मिलेगा। तुम धर्म पर ही क्यों नहीं आरुढ़ रहते?

बस महाभारत, इतिहास, पुराण में इसी सत्य पर बल देने के लिये इतना विस्तार किया गया है और यह सत्य त्रिकालावाधित सत्य है। प्राचीन समय के समस्त इतिहासों का यही सार है, जो अब भी संसार के राष्ट्रों की दशा पर चरितार्थ हो रहा है। अर्वाचीन राष्ट्रों के इतिहास भी हमको कई तत्व सिखलाते हैं। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’- इसी तत्व को छान्दोग्य उपनिषद् में लिखा है।

‘शत ज्ञानिनामेको वली कम्पयते’

इन शब्दों में कहा है अर्थात् एक डण्डे वाला सौ कोरे ज्ञानियों को कँपा देता है। यह सत्य है, पर तात्कालिक सत्य है, पारमार्थिक सत्य नहीं। केवल भौतिक बल पर भरोसा रखने वाले और देवों को समय-समय पर परास्त करने वाले असुर आखिर देवों से हारे ही। प्राचीन इतिहास पुराणों में उपवर्णित देवासुर-संग्रामों के अन्त में देवों की, सात्विक वृत्ति वालों की विजय हुई है। अब भी संसार में देवासुर-संग्राम बराबर चल रहे हैं। दीखने को दीख रहा है कि असुर देवों को नचा रहे हैं, दबोचे जा रहे हैं, खाये जा रहे हैं, पर पारमार्थिक सत्य की फिर भी जय होगी। फिर यह भी बात ध्यान रखने की है कि देवों में जब स्वार्थ आने लगता है, तभी वे हारने लगते हैं, नहीं तो वे त्रिकाल में भी हार नहीं सकते। असुर सदा देवों के छिद्र देखते रहते हैं और उसी स्थान में हरा देते हैं। आजकल संसार के राष्ट्रों व महा राष्ट्रों में वही आसुरी प्रकृति घुसी हुई है और केवल भौतिक बल पर समझ बैठे हैं कि वे सदा संसार को मनमाना नाच नचाते रहेंगे, पर अन्त में देवों की ही विजय होती है और होगी। पारमार्थिक सत्य ही फिर उभरेगा और आसुरी वृत्ति वालों को पाठ पढ़ाएगा। आज संसार में यत्र-तत्र-सर्वत्र देव नीचा देख रहे हैं, दब रहे हैं, मानो अन्धकार प्रकाश को खाये जा रहा है, पर यदि संसार के देव स्वार्थरहित होकर एक साथ जुट कर आसुरी वृत्ति वालों पर आक्रमण करेंगे तो पुनः संसार सुख-शान्ति, ऋद्धि-सिद्धि-समृद्धि समानता के नाते बरतने लगेगा और संसार एक रहने का स्वर्गमय स्थान बनेगा। अब तो संसार, सब कुछ होते हुये कोरा नरक है-इतिहास यही कह रहा है।

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