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Magazine - Year 1953 - Version 2

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(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

मेरे मित्र बोले, “बम्बई में खाने का खर्च तो अधिक नहीं पर प्रो. साहब चाय दिन में चार बार और एक पैकिट सिगरेट अवश्य चाहिए। अपने से तो इन जरूरी चीजों के बिना तो नहीं रहा जाता। हमें पान न दीजिए, सोडा लैमन या आइसक्रीम के बिना काम चला लेंगे किन्तु सिगरेट और चाय तो नितान्त आवश्यक समझिए।’

एक दूसरे महोदय प्रायः कहा करते हैं, “घर में चाहे बिना साग तरकारी के काम चला लें, पर कपड़ा सलीके का ही चाहिए। धुला हुआ, इस्तरी से सही क्रीज के। इसके बिना हमें बड़ी कमजोरी मालूम होती है। भाई साहब, आपके पेट के अन्दर क्या जा रहा है? आप क्या खाते पीते हैं? घर में कैसे रहते हैं? ये बातें कौन देखता हैं। आदमी अपने कपड़ों से ही जाना जाता है।”

ऊपर मैंने दो दृष्टिकोण उद्धृत किये हैं। ये ऐसे उदाहरण हैं जो अपनी आवश्यकताओं की वजह से परेशान हैं। हमारे समाज में आपको इस प्रकार के अनेक व्यक्ति मिलेंगे जो किसी न किसी अपव्यय में फँसे हैं। कोई सिनेमा के जंजाल में है तो कोई, अच्छे वस्त्र आभूषण इत्यादि पहिन कर मिथ्या अभिनय में फँसे हुए अपनी आय को कोस रहे हैं। कहीं औरतें आभूषणों या नये फैशन के कपड़ों के लिए फरमाइश कर रहीं हैं, तो कही पतिदेव क्लब में होने वाले मनोरंजनों के माया जाल में व्यस्त हैं। झूठा कृत्रिम आवश्यकताओं के माया जाल में ये लोग परेशान हैं।

आवश्यकताएँ हमारे स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार घटती बढ़ती रहती हैं। रबर की तरह उन्हें जब चाहे बढ़ा लीजिए, जब चाहे स्वभाव पर कठोर नियंत्रण कर उन्हें कम कर लीजिए। जितनी अधिक आवश्यकताएं, उनकी पूर्ति के लिए उतना की कठिन श्रम, भाग दौड़ जीवन संघर्ष। अपूर्ण रहने पर उसी अनुपात में मानसिक कष्ट और वेदना।

प्रत्येक आवश्यकता के साथ आपका आन्तरिक आनन्द संयुक्त है। सावधान रहिए कि जिन आवश्यकताओं के लिए आप सर खप कर एड़ी चोटी एक कर रहे हैं, वे वास्तविक हैं या विलास विषयक।

मेरे रूप से आपकी आवश्यकताएं तीन प्रकार की हैं- 1. जीवन यापन के लिए जरूरी 2. सुख विषयक 3. विलास विषयक। प्रथम वर्ग की आवश्यकताएं पूर्ण कर अधिक से अधिक सन्तोष हो सकता है। वर्ग 2. और वर्ग 3 की अन्तिम सीमा का कोई ठिकाना नहीं।

प्राचीन भारतीय ऋषि मुनियों ने आवश्यकताओं में भेद नैतिक आधार पर किया था। उन्होंने मानव के लिए उन्हीं आवश्यकताओं की योजनाओं रची थी, जो सरल सादा जीवन और उच्च विचारों की पोषक थीं। सुख और विलास को उन्होंने मानव की शक्तियों को कुण्ठित करने वाला माना था।

भौतिक सभ्यताओं के युगों में मनुष्य ने सुख और विलास की आवश्यकताओं को बढ़ाया, अपूर्ण होने पर मन में विक्षोभ एवं मानसिक कष्टों, अभावों की भट्टी में जलते रहें।

जीवन विषयक आवश्यकताएँ क्या हैं? हम आवश्यक, सुख, विषयक, एवं विलास की आवश्यकताओं में विवेक किस प्रकार करें? आइये, इस प्रश्न पर विचार करें।

जीवन-रक्षक आवश्यकताएँ वे हैं, जिनके बिना मनुष्य जीवित नहीं हर सकता। पौष्टिक भोजन, वायुमय मकान, साधारण वस्त्र, रोगोपचार की सुविधाएँ तथा शिक्षा- ये ऐसी मौलिक आवश्यकताएँ हैं, जो जीवधारण के अतिरिक्त मनुष्य की शारीरिक, मानसिक तथा शैल्पिक शक्तियों का विकास करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इनकी पूर्ति का प्रथम प्रयत्न करना चाहिए।

इनके पश्चात् उन आवश्यकताओं को पूर्ण कीजिए जो आपके सामाजिक यश प्रतिष्ठा के लिए जरूरी हैं और जिसके लिए आपको कभी-2 अपनी जीवन विषयक आवश्यकताओं से विमुख होना पड़ता है।

यहाँ तक आप अपने आपसे उदारता का व्यवहार कर सकते हैं किन्तु आगे का मार्ग बड़ी जागरुकता एवं सावधानी का है। आनन्द एवं विलास के क्षेत्र अनन्त हैं। आज के मानव की चिन्ता का कारण ये ही वर्ग है।

विलास एवं आनन्द का वर्ग बड़ा लम्बा हैं। इसमें बढ़िया-बढ़िया वस्त्र, आलीशान मकान, गहने मनोरंजन के कीमती साधन, मिष्ठान्न और ऊँचे प्रकार के भोजन, मोटर, सिनेमा, क्लब का जीवन, मादक पदार्थों का सेवन, दान दहेज की अधिकता, बहुमूल्य वाहन, कलात्मक वस्तुओं का खरीदना सम्मिलित है।

अपने पेशे, स्तर और वातावरण को देखिए और फिर उपरोक्त आवश्यकताओं को कम करते जाइये। अपने सामाजिक जीवन, आर्थिक शक्ति, परिवार के सदस्यों की संख्या, स्थान एवं समय को देखिये।

जिस वस्तु को रखने की आप में क्षमता नहीं हैं और जो आपकी किसी स्थायी माँग की पूर्ति न कर केवल मिथ्या प्रदर्शन मात्र के लिए है, उसे त्याग दीजिए। जिन भोजनों से आपकी कार्य क्षमता नहीं बढ़ती, केवल व्यसन के रूप में साथ बँधे हुए हैं, उनसे तुरन्त दूर रहने लगिए। पान, सिगरेट, शराब, भाँग, चरस, बीड़ी, और इसी प्रकार के दूसरे व्यसन आपकी अज्ञानता के सूचक हैं। इनके पंजे में बँधे रहना महा मूर्खता है।

मानव को शान्ति तब प्राप्त होती है, जब वह कम से कम आवश्यकताओं का बोझ सर पर रखता है जिसे तनिक-तनिक सी वस्तुओं का मोह होता है, वह उनकी आपूर्ति पर निरन्तर विक्षुब्ध रहता है।

कम आवश्यकता वाला व्यक्ति अपनी शक्ति क्षुद्र कार्यों से बचाकर उच्चतर कार्यों में व्यय कर अपनी आत्मिक उन्नति कर सकता है। देह में वासना है, वासना से असंख्य इच्छायें और इच्छाओं से कष्ट उत्पन्न होता है। जैसे हाथी के बाहर निकले हुए दाँत फिर अन्दर नहीं जाते, वैसे ही एक बार बढ़ी हुई आवश्यकताएँ कम नहीं हो पाती। प्रत्येक आवश्यकता एक ऐसा महसूल है, जो चुकाना ही पड़ता है।

आज के जीवन में जो समस्याएं अत्यन्त पेचीदा हो रही हैं, जिनसे अन्तः करण में क्षोभ उत्पन्न होता है, वे बढ़ी हुई झूठी कृत्रिम आवश्यकताओं से ही उत्पन्न हुई हैं। हम स्वयं ही इनके जनक हैं।

देखिए, आपकी प्रवृत्ति किस ओर चल रही है-क्या आप निरन्तर एक के पश्चात दूसरी अन्धाधुन्ध आवश्यकताएं बढ़ाते चले जा रहे हैं? अनाप-सनाप व्यय कर, दूसरों से ऋण ले लेकर क्यों व्यर्थ ही बन्धनों में डाल रहे हैं? कहीं आप को मिथ्या प्रदर्शन, झूठी शान, जगत को अपना अतिरंजित स्वरूप दिखाने की तो आदत नहीं पड़ गई है? विलास, भोग, व्यभिचार अभक्ष्य वस्तुओं का पान करने की कुत्सित आदत में पड़ कर आपका चित्त चंचल तो नहीं रहता है? यदि आप इन शत्रुओं से मुक्त रहना चाहते हैं, तो अपनी आवश्यकताओं को एक-एक करके कम करते जाइये, आप सुखी रहेंगे।

हमारा सुख हमारी आवश्यकताओं के अनुपात में रहता है। अधिक आवश्यकताओं वाला व्यक्ति बड़ी कठिनता से सुख-समृद्धि प्राप्त करता है। कारण उसकी अंतिम आवश्यकता की पूर्ति होते-होते, सुख भोगने की शक्ति क्षीण हो जाती है प्रत्येक आवश्यकता एक मानसिक बन्धन है। जो इन बन्धनों में अधिक से अधिक बँधा है, उसके सुख में उतनी ही बाधाएं हैं।

अधिक आवश्यकता वाला व्यक्ति जिस मानसिक रोग से पीड़ित रहता है, वह है मन का वश में न रहना, अति चंचलता, अति स्वच्छन्दता और चित्त को वश में न कर सकना। यदि ये व्यक्ति कुछ चित्त-वृत्ति निरोध करें, तो बढ़ी हुई आवश्यकताओं से मुक्ति पा सकते हैं। मनुष्य मन की वृत्तियों को ढीली छोड़ कर चंचल, उन्मत्त और प्रचण्ड बना लेता है। कालान्तर में आदत बन जाने पर इनसे मुक्ति असंभव हो जाती है। व्यसन, फैशन, व्यभिचार आदि कुत्सित आदतों का प्रारम्भ बड़ा साधारण होता है, धीरे-धीरे व्यसन बढ़ते हैं अन्त में मनुष्य इन्हीं इन्द्रियों का दास हो जाता है।

इसी प्रकार यदि मनुष्य मन में दृढ़ता से यह प्रण कर ले कि मुझे मन की चंचलता, व्यर्थ के प्रलोभन इत्यादि से मुक्त रहना है तो वह मन की प्रलोभन वृत्ति निमन्त्रित कर सकता है।

जैसे अपने व्यसन का मायाजाल क्षीण आरंभ से किया था, वैसे ही शुभ भावना का प्रारम्भ कीजिए। शुभ का चिन्तन कीजिए, सद्विचार में लगे रहिए, व्यर्थ की कृत्रिम आवश्यकताओं को काटते जाइये, आप देखेंगे, आपका अंतर्द्वंद्व कम हो गया है, मन में अब दुःख की लहरे कम उठती हैं। अपनी पूर्णता की भावना, आत्म शक्ति की भावना अन्तर्मुखी निश्चयात्मा की भावना में दृढ़ता पूर्वक रमण करने से चित्तवृत्ति का निरोध होता है। मन में यह भावना जमाइये :-

आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं है। एक आवश्यकता पूर्ण होती है, तो चार और आकर खड़ी हो जाती हैं। इसकी पूर्ति पर बीस-पच्चीस नई जरूरतें मुँह फैला देती हैं। इस माया जाल में फँसने पर आवश्यकताओं का अन्त नहीं। अतः मैं व्यर्थ इन्हें कदापि न बढ़ने दूँगा।

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