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Magazine - Year 1953 - Version 2

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हमारी शक्ति का केन्द्र

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(प्रो. लालजीराम शुक्ल)

हमारी शक्ति का केन्द्र हमारे मन में ही है। मन जिस पदार्थ का चिन्तन करता है वह उसकी रचना करने लगता है। रचना के इस कार्य में मानसिक शक्ति खर्च हो जाती है। इस प्रकार मनुष्य तब अपनी शक्ति को खो देता है तो दुःखी हो जाता है। संसार के पदार्थों के विषय में अधिक चिंतन करने से हम अपने आपको ही भूल जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप तब किसी प्रकार का कुचिंतन मन में आ जाता है तो हम उसे रोक नहीं सकते। फिर जैसा हमारा चिंतन होता है घटनाएँ भी उसी प्रकार होती हैं। शक्ति की उपस्थिति की अवस्था में मनुष्य के विचार उसके काबू के बाहर हो जाते हैं।

धन, परिवार और यश की वृद्धि में मनुष्य का मन फँसा रहता है। जब तक मनुष्य अपनी सब प्रकार की बाहरी वृद्धि देखता है तब तक आध्यात्मिक चिंतन की उसको इच्छा ही नहीं होती। आध्यात्मिक चिंतन ऐसी अवस्था में नीरस प्रतीत होता है। बहुत से लोगों को तो सांसारिक कामों से फुरसत ही नहीं मिलती कि वे अपने आपके विषय में सोचें। कितने ही मनुष्य अकेले नहीं रह सकते। यदि उन्हें किसी काल के लिए अकेले छोड़ दिया जाय तो वे काल कवलित बन जायें। इसका प्रधान कारण उनका कुरूप आला ही है। अधिक देर तक सांसारिक बातों में मन को विचरण करने देने से अनेक प्रकार के राग द्वेष के विचार मन में घर कर लेते हैं। इन विचारों को नैतिक बुद्धि स्वीकार नहीं करती अतएव इनका वसन होता है। पर दमन से किसी भी प्रकार को भावना का बल चढ़ता है, वह भावना नष्ट नहीं होती। जिन व्यक्तियों का आचरण जितना अधिक नैतिक होता है वे अपनी अप्रिय वीभत्स भावनाओं का दमन उतना ही अधिक करते हैं। और इसलिए उनके मन में उतनी ही अधिक अशान्ति रहती है। इस अशांति के कारण उन्हें बिना काम के रहना असंभव हो जाता है। पर तब हम अपनी दलित मानसिक भावनाओं को स्वीकार नहीं करते तो वे दूसरे लोगों पर आरोपित हो जाती हैं। ऐसी अवस्था से मनुष्य अपने ही दुर्गुणों को दूसरों में देखता है। तब उनमें सुधार होते हुए नहीं देखता है तो दुःखी होता है। इस दुःख का कारण आत्म विस्तृति ही है। तब हम में मानसिक शक्ति नहीं रहती तो हमारी बातें कोई नहीं मानता। जिस व्यक्ति में जितनी कम दूसरे का सुधार करने की शक्ति रहती है उसमें दूसरे का सुधार करने का उतना ही उतावलापन रहता है।

सभी काम आत्मोन्मुख होकर करने से सफलता को अंजाम देते हैं। जब किसी कार्य को चिंता से और उद्विग्न मन होकर किया जाता है तो उसमें विफलता मिलती है। साम्यावस्था में सहज भाव शक्ति वर्धक है। जब हम अपने कार्य में कोई त्रुटि देखें अथवा किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता देखें तो हमें अपने भीतर ही सिमट जाना चाहिये। जब मन की उद्विग्नता मिट जाती है तो नया साहस और उत्साह प्राप्त होता है। शान्त भाव में ही शक्ति है। अशांत भाव में शक्ति का विनाश है। किसी भी पदार्थ के विषय में बार-बार सोचने से हमारी शक्ति का विनाश होता है। अतएव जब कभी कोई ऐसा विचार मन में आ जायं जो अप्रिय हो तो मन में गहरा संस्कार पैदा करने से पूर्व ही मन से निकाल कर बाहर कर देना आवश्यक है। अप्रिय घटनाओं को या तो प्रिय रूप जाना जाय अथवा उनके विषय में अधिक सोचा ही न जाय। सभी अप्रिय घटनाओं का सुन्दर अंग भी होता है। इस सुन्दर अंग के ऊपर बार-बार विचार करना चाहिये।

धार्मिक लोग शक्ति का केन्द्र ईश्वर अथवा किसी अदृश्य सत्ता को मानते हैं। यह बात सत्य है कि मनुष्य के अहंकार रूपी मन में कोई अद्भुत शक्ति नहीं। इतना ही नहीं जिस मनुष्य में जितना अधिक अहंकार होता है उसकी मानसिक शक्ति उतनी ही कम होती है। अहंकार एक प्रकार की मानसिक बीमारी है। यह बीमारी मनुष्य को अनेक प्रकार के दुःखों में डाल देती है। जब किसी प्रकार मनुष्य में अहंकार की कमी होती है तो मनुष्य में स्वास्थ्य सुधरता है। ऐसी अवस्था में ही मनुष्य को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। ईश्वर के ध्यान से जहाँ तक अहंकार की कमी होती है वहां तक इस प्रकार का ध्यान अच्छा है।

परमशक्ति का वास्तविक केन्द्र तो मनुष्य का स्वत्व ही है। इसका आरोपण किसी बाहरी पदार्थ पर करना एक प्रकार का अज्ञान है। अपने भीतर ही अपनी शक्ति और आनन्द का केन्द्र है। बाहरी ओर भटकने से क्या लाभ?

नाभी विच कस्तुरी बसे, मूरख मृग नहिं सूझ। तेरा साहब तुझ में, बूझ सके तो बूझ।।

अपने आपको भूलने से मनुष्य से मनुष्य को शक्ति कैसे मिल सकती है? प्रत्येक मनुष्य एक आध्यात्मिक अणु (चैतन्य अणु) है। हम हाल में ही ऐटमबम से जड़ अणु शक्ति से परिचित हुए हैं। फिर चेतन अणु में कितनी शक्ति हो सकती है इसका पता कौन लगा सकता है? यह चैतन्य अणु हमारा विचार ही है। विचार देश और काल की सीमा से बद्ध नहीं है। कई हजार वर्ष पूर्व का विचार भी आज हमें शक्ति दे रहा है। उसमें हमारे विचारों को बदलने की शक्ति है। जब हम उत्साहहीन हो जाते हैं तो किसी महर्षि के भले विचार पर चिंतन करने से फिर नव जीवन को प्राप्त कर लेते हैं। काल विचार की शक्ति को नष्ट करने में समर्थ नहीं। इसी प्रकार देश की सीमाएँ भी विचार को नहीं बांधती। एक ही विचार सारे जगत में फैल जाता है। विचार द्वारा मनुष्य संसार के समस्त प्राणियों के हृदयों पर अधिकार कर लेता है। विचार द्वारा समाज में महान विस्फोट होते हैं और विचार द्वारा ही शान्ति की स्थापना होती है। जो विचार जितना पक्का होता है उसकी शक्ति उतनी ही अधिक होती है।

विचार की शक्ति जगत के कल्याण करने की भावना पर निर्भर रहती है। संसार की ध्वंसात्मक शक्ति इतनी प्रबल नहीं होती जितनी रचनात्मक प्रबल होती है। कहा जाता है शैतान ही ईश्वर के नाम से मनुष्य के समक्ष आता है और पूजता है। यदि किसी मनुष्य का विचार सबको कल्याण करने की भावना से पैदा हुआ है तो कुछ काल तक वह भले ही अवहेलना की स्थिति में रहे पर धीरे-धीरे प्रबल हो जाता है। जब हमें अपने ही सिद्धांतों में विश्वास नहीं होता तभी हमें असफलता मिलती है। हमारा विचार चाहे जितनी ही उच्च कोटि का क्यों न हो यदि हमें उसमें विश्वास नहीं तो वह अधिक काल तक जीवित नहीं रहता।।

जब हमारी बाहरी और भीतरी भावनाओं में ऐक्य रहता है तो जैसा हम संकल्प करते हैं उसी प्रकार की सिद्धि हमें मिलती है। इस ऐक्य की अनुपस्थिति में सिद्धि नहीं मिलती। विचारों की स्थिरता मनुष्य को सफलता प्रदान करती है। विचारों की अस्थिरता अविश्वास के कारण होती है और इसका परिणाम भला नहीं होता। अस्थिर विचारों से आत्म-विश्वास की और भी कमी हो जाती है।

बीमारी की अवस्था में मनुष्य के विचार उसके काबू के बाहर हो जाते हैं। वे बीमारी की ही कल्पना में लग जाते हैं। इसी प्रकार किसी प्रकार की असफलता की अवस्था में भी मनुष्य के विचार नकारात्मक विचार हो जाते हैं। वह सफलता के होने में विश्वास ही नहीं करता। जब तक मनुष्य के विचार नहीं सुधरते न उसका स्वास्थ्य सुधरता है और न उसकी परिस्थिति सुधरती है। जब नकारात्मक विचारों की वृद्धि होने लगे तो किसी प्रकार चिंतन को शान्त कर देने से भारी लाभ होता है। कितने रोगियों का जटिल रोग अपने विचारों को श्वांस-प्रश्वांस पर केन्द्रित करने से नष्ट हो जाता है। रोगों के विनाश में आत्मनिर्देश का भारी कार्य होता है। पर चित्त की बिगड़ी हुई अवस्था में मनुष्य का आत्म-निर्देश उसका कल्याण नहीं करता। प्रत्येक शुभ-निर्देश प्रति-निर्देश में परिणत हो जाता है। यदि हम अपने आत्म-निर्देश से कोई लाभ उठाना चाहते हैं तो पहले हमें अपने तन और अचेतन मन में एकता स्थापित करनी होगी। जब तक हमारा संपूर्ण मन किसी बात में नहीं लग जाता हमें किसी प्रकार का लाभ नहीं होता। बीमार मनुष्य को पुराना अभ्यास बीमारी के विषय में चिंतन करने का होता है। किसी प्रकार का शुभ निर्देश सफल होने के पूर्व यह आवश्यक है कि बीमार मनुष्य अपनी बीमारी के विषय में सोचना बन्द करे इसलिए किसी प्रकार मन को स्थिर करना आवश्यक होता है। जब मनुष्य अपनी बीमारी के विषय में भूल जाता है तो फिर उसे जैसा निर्देश दिया जाता है उसका वैसा ही फल होता है। इमील कूदे महाशय रोगी को शुभ निर्देश देने के पूर्व अचेतन अवस्था में ले जाते थे अथवा किसी न किसी प्रकार चेतना के कार्य को स्थगित करने की चेष्टा करते थे।

पर जिस मनुष्य को विचार की शक्ति में पूर्ण विश्वास है उसे अचेतन अवस्था की शरण लेने की आवश्यकता नहीं। अपनी चेतन अवस्था में ही हम अपनी मानसिक शक्तियों का ध्यान कर सकते हैं। प्रतिदिन के ध्यान से वे शक्तियां दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती हैं। जैसे-जैसे नयी शक्तियों का उदय होता है हमारा आत्म-विश्वास भी बढ़ता जाता है। मानसिक शक्ति की विकसित अवस्था में मनुष्य शुभ मात्र से दूसरे लोगों का कल्याण कर देता है। कितने ही रोगी शुद्ध मन के व्यक्ति की सद्भावना मात्र से अच्छे हो जाते हैं। जब चिकित्सक को अपनी मानसिक शक्ति और उसके उपयोग के सिद्धान्त में विश्वास होता है तो इसका भला प्रभाव रोगी के मन पर भी पड़ता है। जिस चिकित्सक को आत्मविश्वास नहीं रहता वह रोगी का भी कल्याण करने में असमर्थ रहता है।

मानसिक शक्ति का केन्द्र देहाभिमान करने वाला मन नहीं, उसका केन्द्र वह मन है जो हम में और दूसरे प्राणियों में एक है। वह एक ओर अपना आप ही है और वह सर्वात्मा है। वह बाहर दौड़ने से नहीं मिलता भीतरी ओर दृष्टि करने से मिलता है। इसे पहचानना कठिन है और यह अपना आप ही है। जो मनुष्य जितना ही उदार अपने विचारों को बनाता है वह उतना ही चैतन्य अणु की शक्ति का अधिकारी होता है। चैतन्य अणु की शक्ति स्वार्थमय काम के लिए नहीं मिलती, वह परमार्थ के काम में ही उदय होती है। मक्खी को मारने के लिए तोप की आवश्यकता नहीं रहती। इसी तरह तुच्छ स्वार्थ साधन के लिये चैतन्य अणु की शक्ति का विस्फोट नहीं होता। जो मनुष्य जितना ही अपने स्वार्थ की आहुति करता है उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ती है।

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