आप तम्बाकू पीना क्यों नहीं छोड़ते
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
(श्री गणेशदत्त शर्मा गौड़)
तम्बाकू एक बहुत ही बुरी वस्तु है, किन्तु इसका साम्राज्य इतना बढ़ गया है, कि उसे हटाने में बड़े ही परिश्रम और समय की आवश्यकता है। राजा रंक, छोटे, बड़े, मूर्ख विद्वान, सभी इसके चक्कर में आ गये हैं। आजकल इसने इतना आदर पाया है कि आगन्तुक मेहमानों के आतिथ्य सत्कार में भी यह काम आने लगा है। इसके प्रचार में कमी नहीं होकर नित्यप्रति वृद्धि ही हो रही है। मामूली बुद्धि के लोग या यों कहिये कि अधिकाँश लोग जानते भी नहीं हैं कि बीड़ी, सिगरेट बनाने वाले व्यापारी उसकी बनावट में सैकड़ों युक्तियाँ करते हैं, जिससे कि लोग तम्बाकू के व्यसन में फँसते ही रहें और उनका माल धड़ाधड़ खपता रहे। बीड़ी सिगरेट वाले जर्दे में अनेक प्रकार के सुगन्धित तेजाब छिड़कते हैं, संखिया और अफीम का पानी डालते हैं। इस प्रकार से तैयार किये हुए जर्दे की बनी चुरुट, बीड़ी, सिगरेट हम पर अपना अधिक प्रभाव जमाते हैं। कई कम्पनियों के सिगरेटों में पारा मिलाया हुआ पाया गया है और कितनों ही में और भी कई दूसरे पदार्थ! तात्पर्य यह, कि तम्बाकू सेवन करने योग्य वस्तु नहीं है।
हिन्दुओं के पुराणों में तो इसकी उत्पत्ति गोरक्त से मानी है! इतने पर भी अफसोस और शर्म की बात है कि सनातनधर्म, नामधारी, और शिखाधारी हिंदू इसको ग्रहण करके अपने को पवित्र ही समझते हैं!! विदेशों में इसकी रोक का प्रबन्ध हो रहा है परन्तु भारत में अभी तक लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित ही नहीं हुआ है। यदि कोई तम्बाकू का विरोध करने के लिये उठता है तो बदमाशों का एक बड़ा दल उसका सामना करने के लिये तैयार हो जाता है। ऐसा मौका इस पुस्तक के लेखक के साथ कई बार आया है। धर्म के लिहाज से ही नहीं, बल्कि धन के लिहाज से भी, इस व्यसन ने देश का इतना धन फूँक दिया कि जिसका आँकड़ा बाँधा जाना भी असम्भव है। तम्बाकू के सेवक दुराचारी भी हो जाते हैं-बच्चे अपने घर से या किसी दूसरे के पैसे चुरा कर तम्बाकू पीते हैं। कैदी लोग जेल में बड़ी जोखिम उठाकर भी चुराई हुई बीड़ी को छुपाकर रखते हैं। किसी व्यक्ति से पीने के लिए बीड़ी माँगने में किसी प्रकार की लज्जा नहीं होती-इसके लिए भीख माँगनी पड़ती है। तम्बाकू पीने वाले इतने ज्ञान शून्य होते हैं कि हर कहीं, दूसरे के घरों में, देवालयों में, पवित्र स्थानों में भी बिना इज्जत के ही चुरुट जलाने लगते हैं और दिल में जरा भी नहीं शर्माते। नाटक घरों में, सभा भवनों में, बड़े-बड़े कारखानों में बीड़ी सिगरेट पीने की मनाही होती है लेकिन लोग नियमों की कुछ भी परवाह नहीं करते। हम उदाहरणार्थ यहाँ यह दिखलाते हैं कि रेल में तम्बाकू पीना जुर्म है। देखिये-
यद्यपि रेल के डिब्बे में बिना साथियों की आज्ञा के तम्बाकू पीने वाले पर 20 रु. जुर्माने का विधान रेलवे ऐक्ट में है, तथापि हम देखते हैं कि यह ऐक्ट पुस्तक में ही है, कोई भी इसकी परवाह नहीं करता। तात्पर्य यह है कि इसके पीने वाले ज्ञान शून्य हो जाते हैं, उन्हें इसकी धुन में भला-बुरा कुछ भी नहीं सूझता!! बीड़ी चुरुट पीने वाले को यदि कुछ समय के लिये बीड़ी तम्बाकू न मिले तो वे किसी काम के नहीं रहते। स्वर्गीय टॉलस्टाय ने लिखा है-
“एक मनुष्य ने अपनी स्त्री का खून करने का इरादा किया। उसने छुरी निकाल ली, मारने को तैयार हुआ, अन्त में पछताकर पीछे हट गया। फिर चुरुट पीने बैठ गया, उसके विष से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई उसने उठकर अपनी स्त्री को छुरा मारकर मार डाला।”
उक्त महाशय तो यहाँ तक लिखते हैं- “तम्बाकू एक ऐसा सूक्ष्म नशा है कि वह कितने ही अंश में शराब से भी बुरा माना जाना चाहिये।” डॉक्टर आर. टी. ट्राल एम. टी. लिखते हैं- “मेरी सम्मति में वह मनुष्य जो तम्बाकू सेवन करता है कदापि पति या पिता बनने योग्य नहीं है। अपनी स्त्री के सामने इस प्रकार बेहया और निर्लज्ज होने का उसे कुछ भी अधिकार नहीं है, और अपने बच्चों को निर्बल, तथा चिररोगी बनाने का भी उसे कोई हक नहीं है। शराब से भी अधिक भयानक और नवयुवकों में अधिक प्रचलित तम्बाकू सेवन की आदत है। तम्बाकू सेवन से जो चुस्ती मालूम होती है, अन्त में वह सेवन करने वाले को मिट्टी में मिला देती है।”
डॉक्टर अलनस साहब का कहना है- “तम्बाकू सेवन करने वालों को पांडु रोग हो जाय और उनका रुधिर सूख जावे तो कोई आश्चर्य नहीं। तम्बाकू से अजीर्ण होता है, रक्त सूख जाता है और शरीर काँटा सा होता है। रुधिर ही जीवन का कारण है, जिसके कम होने से निर्बल होकर यदि क्षय बन बैठे तो आश्चर्य ही क्या?
डॉक्टर एडवर्ड साहब लिखते हैं- तम्बाकू से मृगी, स्वरभंग, जीर्णज्वर, छाती और सिर में दर्द, कम्पवात, शिरोविभ्रम, अजीर्ण, नाड़ीब्रण, उन्माद आदि कई रोग हो जाते हैं।”
डॉक्टर ब्राउन साहब कहते हैं- “तम्बाकू पीने या सूँघने से मन्द-दृष्टि, शिरःशूल, मूर्छा, अफरा, निर्बलता, गला पड़ना, कम्पवायु, भूतोन्माद तथा कई ऐसे ही रोग होने का भय है।”
डॉक्टर कार्न एम. डी. लिखते हैं--”तम्बाकू के साथ शराब का ऐसा सम्बन्ध है, जैसा कि दिन के साथ रात का।”
डॉक्टर काविन साहब लिखते हैं- “रोगों को पैदा करने वाली बहुत सी आदतों में से शराब और तम्बाकू की ऐब मुख्य हैं। तो शराब और तम्बाकू पीते हैं, उनसे कदापि विवाह मत करो यह मेरा, मेरी बहिनों को उपदेश है। सुस्ती, रोगों का होना, बुरी हालत रहना, शोक, अचानक मृत्यु, जिगर और फेफड़ों के रोग, तम्बाकू और शराब पीने वालों के साथ छाया की तरह रहते हैं। बहिनों! यदि आमरण अविवाहित रहने का मौका आवे तो सहर्ष रहो, लेकिन तम्बाकू और शराब पीने वाले के साथ कदापि अपना विवाह सम्बन्ध मत होने दो।
”न्यूयार्क (अमेरिका) की तम्बाकू विरोधिनी सभा ने प्रकाशित किया है- “तम्बाकू खाने-पीने से थूक की वे थैलियाँ सूख जाती हैं जिनमें कि थूक बन कर तैयार होता है। इस कारण तम्बाकू सेवन के बाद अन्य किसी मादक द्रव्य के पान करने की इच्छा होती है।”
डॉक्टर अलसन ने लिखा है- “तम्बाकू मुख के थूक को सूखा देती है ओर जब प्यास लगती है तब किसी नशेदार पेय को पीकर तृष्णा शान्त करने की इच्छा होती है।”
आयुर्वेद महामहोपाध्याय श्री शंकरदास जी शास्त्री ने अपनी “आर्याभिषक” पुस्तक में लिखा है कि- “तम्बाकू सेवन से मनुष्य को बहुत हानि होती है लेकिन वह समझ में नहीं आती। तम्बाकू खाने से मुख में बदबू उत्पन्न हो जाती है और दाँतों को हानि पहुँचाती है। बलगम उत्पन्न होता है, आँखों को हानि होती है और पित्त भड़कता है। छाती में कफ पैदा होता है और कलेजा जल जाता है।”
धार्मिक दृष्टि से मादक पदार्थों का सेवन प्रत्येक धर्म में मना है। पुराणों में इसे गोरक्त से उत्पन्न बताकर पौराणिकों के लिये निषेध बताया है। जैनियों के धर्मग्रन्थों में तम्बाकू सेवन पाप है। आठवें पोप सावर्त और नवें पोप अनफेण्ट ने तम्बाकू के विरुद्ध कठोर नियम बनाये हैं अतएव ईसाई धर्म में तम्बाकू सेवन धर्म नहीं है। तुर्किस्तान और बर्लिन में तम्बाकू सेवन एक बड़ा भारी पाप है। पारसी धर्म में इसका सेवन पाप माना गया है। सिक्खों में तो तम्बाकू छूना भी बड़ा भारी पाप माना है। लिखने का तात्पर्य यह है, कि तम्बाकू जिसका कि पृथ्वी पर इतना प्रचार है, अत्यन्त बुरा तथा आर्थिक, धार्मिक और आयुर्वेदिक दृष्टि से अस्पृश्य एवं त्याज्य वस्तु है।

