भगवान महावीर के अमृत वचन
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(उत्तराध्ययन सूत्र से)
-आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, गुरुजनों के हृदय से दूर रहने वाले शत्रु समान (विरोधी) तथा विवेकहीन साधक को ‘अविनीत’ कहते हैं।
-जिस तरह सड़ी कुतिया सब जगह दुत्कारी जाती है उसी तरह शत्रु समान, वाचाल (बहुत बोलने वाला) तथा दुराचारी (स्वच्छन्दी) शिष्य सर्वत्र अपमानित होता है।
-महापुरुषों की शिक्षा से क्रुद्ध होना मूर्ख मनुष्य का काम है। चतुर होकर सहनशीलता रखो। नीच वृत्ति के मनुष्यों की संगति न करो। हँसी-मजाक और खेलकूद भी छोड़ देने चाहिये।
-कोप करना यह चाण्डाल कर्म है, यह न करना चाहिये। व्यर्थ बकवाद मत करो। समय की अनुकूलता के अनुसार उपदेश श्रवण कर फिर उसका एकान्त में चिन्तन मनन करना चाहिये।
-भूल में यदि कदाचित चाण्डाल (बुरा) कर्म हो जाय तो उसे कभी मत छिपाओ। जो दोष हो जाय उसे गुरुजनों के समक्ष स्वीकार करो। यदि अपना दोष न हो तो विनय पूर्वक उसका खुलासा कर देना चाहिये।
-जैसे अड़ियल टट्टू (अथवा गरियार बैलों को हमेशा चाबुक लगाने की जरूरत होती है उसी तरह मुमुक्षु पुरुष को महापुरुषों द्वारा ताड़ना की अपेक्षा न करनी चाहिये। चालाक घोड़ा जिस तरह चाबुक देखते ही ठीक मार्ग पर आ जाता है, वैसे ही मुमुक्षु साधक को अपने पाप कर्म का भान होते ही उसे छोड़ देना चाहिये।
-पूछे बिना उत्तर न दे। पूछने पर असत्य उत्तर न दे, क्रोध को शान्त करे, अप्रिय बात को भी प्रिय बना कर बोलो।
-तप और संयम द्वारा अपनी आत्मा का दमन करना यही उत्तम है! अन्यथा (कर्म जन्य) मार अथवा दूसरे बन्धन मुझे दमन करेंगे ही?
-वाणी अथवा कर्म से, गुप्त अथवा प्रकट रूप में गुरुजनों से कभी बैर नहीं करना चाहिये।
-भिक्षु कभी असत्य भाषण न करे। कभी भी निश्चयात्मक (अमुक बात ऐसी ही है अथवा अन्य रूप में हो ही नहीं सकती इत्यादि प्रकार के ) वचन नहीं कहने चाहिये। भाषा के दोष (द्विअर्थी शब्द प्रयोग, जिससे दूसरे को भ्रम या धोखा हो) से बचें और न मन में कपट भाव ही रखें।
-पूछने पर सावद्य (दूषित) कहे। अपने स्वार्थ के लिये अथवा अन्य किसी भी कारण से ऐसे वचन न बोलो जो निरर्थक (अर्थशून्य) हों अथवा जो सुनने वाले के हृदय में चुभें।
-(यह मेरा परम सौभाग्य है कि) महापुरुष मुझे मीठा उपोलम्भ अथवा कठोर शब्दों में भर्त्सना करते हैं। इससे मेरा परम कल्याण होगा। ऐसा मान कर उसका विवेकपूर्ण पालन करें।
-गुरुजन की शिक्षा (दण्ड) कठोर तथा कठिन होने पर भी दुष्कृत की नाशक होती है इसलिए चतुर साधक उसको अपना हितकारी मानता है किन्तु असाधु जन उसको द्वेषजनक तथा क्रोधकारी मानता है।
-कर्म के हेतु (कारण) को ढूंढ़ो। क्षमा से कीर्ति प्राप्त करो ऐसा करने से पार्थिव (स्थूल) शरीर को छोड़कर तू ऊंची दिशा में जायगा।
-कुबुद्धि बशात् (अज्ञान वशात्) पाप कृत्य करके जो मनुष्य धन प्राप्त करते हैं वे कर्म बन्ध में बँधे हुये और वैर (की साँकलों) में फँसे हुए (मृत्यु समय) धन को यहीं छोड़ कर (परलोक में) नरक गति में जाते हैं।

