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Magazine - Year 1953 - Version 2

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धर्म और अर्थ भाई-भाई हैं

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(श्री गोपाल दामोदर तामसकर)

आज कल के सभ्य कहलाये जाने वाले लोग आंखें बन्द करके भौतिक उन्नति में लगे हुए हैं, यहां तक कि उन लोगों को ख्याल नहीं कि उन्हें मरना भी होगा। इन्द्रिय-सुखों में वे इतने लिप्त हैं कि इन्हीं को जीवन-सर्वस्व समझ बैठे हैं। उनके लिए न आत्मा है न परमात्मा है। उनका अखिल देव द्रवयदेव है। इसके विपरीत हिन्दुस्तान की स्थिति को देखिये। ‘शरीर और इस जगत के इतर सब वस्तुएँ नश्वर हैं, केवल धर्म शाश्वत है।’ यहां तक तो ठीक रहा, पर आगे भारतवासी कहते हैं- इसलिए धन, दारा, पुत्र इत्यादि के झगड़े में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं।’ हमारे कहने का यह मतलब नहीं कि हमारे हिन्दूधर्म के मुख्य तत्व ये ही हैं, और इन्हीं के अनुसार हमें आचरण करने को हमारे सच्चे हिन्दूधर्म ने बतलाया है। किसी कारण से हमारे धर्म के कुछ तत्वों का इतिहास में दुरुपयोग हुआ सा दीख पड़ता है। भौतिक वस्तुएँ नश्वर अवश्य हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम उनको बिल्कुल छोड़ दें और रात-दिन केवल ईश्वर भजन में लगे रहें। हमारे धर्म के तत्व इतने एकदेशीय नहीं हैं।

धार्मिक उन्नति प्रधान तो अवश्य है, पर यह भौतिक उन्नति के बिना सिद्ध नहीं हो सकती। हमारे यहां के जीविकारों ने इस बात को पहचाना था कि धार्मिक उन्नति के लिए भौतिक उन्नति की भी आवश्यकता है। यह बात हमारे यहां के लोग जानते थे और तद्नुसार आचरण भी करते थे। पर किसी कारण से नश्वरता के सिद्धान्त को ही प्रधानता मिल गई। यह बात लोगों की दृष्टि से उठ गई कि भौतिक उन्नति का धार्मिक उन्नति से क्या सम्बन्ध है। और फिर भौतिक उन्नति की ओर लक्ष्य बहुत कम रहा। उसके परिणाम अब तक दिखाई देते हैं। और फिर पाश्चात्य सभ्यता की ओर जब भारतवासी ध्यान देते हैं, जब ये देखते हैं कि रात-दिन इन्द्रिय सुख को सामग्री मिलने के प्रयत्न करने पर भी उन्हें सन्तोष और आराम नहीं है, तब तो इनकी कल्पना और भी दृढ़ हो जाती है और दुनिया में इन लोगों का बर्ताव ऊटपटांग होने लगता है। शरीरधारी होने के कारण भौतिक वस्तुओं से बिल्कुल दूर कभी हो ही नहीं सकते, इसके उलटा इन्द्रिय-सुख लेने की लालसा तो उन्हें बनी ही रहती है, परन्तु वास्तव में क्या करना चाहिये, यह उन्हें मालूम नहीं रहता। वे उचित मार्ग से भटके रहते हैं। इसके दुष्परिणाम न होने पावें, इसलिए धार्मिक और भौतिक उन्नति के पारस्परिक सम्बन्ध को अच्छी तरह पहचान लेना अत्यन्त आवश्यक है।

मनुष्य मांस-पिण्ड का बना है। उसे भूख लगना स्वाभाविक है। भोजन पर ही उसका जीवन निर्भर है। बिना भोजन के वह जिन्दा नहीं रह सकता। उसे वस्त्र भी चाहिये। फिर अन्य प्राणियों के बिल्कुल विपरीत उसे बहुत काल तक पत्नी को ही नहीं, किन्तु बाल-बच्चों को भी झेलना पड़ता है। उन्हें भोजन-वस्त्र के सिवा शिक्षा भी देनी पड़ती है और स्वाभाविक प्रेम के कारण उनके लिए कुछ छोड़ जाने की प्रवृत्ति भी होती है।

यूनान देश में अरस्तू नामक बड़ा विद्वान तत्ववेत्ता हो गया है। उसने राज्य-विज्ञान पर एक बड़ा उत्तम ग्रन्थ लिखा है। उसमें उसने उपर्युक्त विषय पर भी विचार किया है। वह कहता है कि उत्तमोत्तम जीवन के लिए तीन प्रकार की सम्पत्ति की आवश्यकता है। वे हैं (१) भौतिक सम्पत्ति, (२) शारीरिक सम्पत्ति और (३) आध्यात्मिक सम्पत्ति। सुखी होने के लिए इन तीनों प्रकार की सम्पत्ति की आवश्यकता हो जाती है। जिस मनुष्य में वीरता, सौम्यत्व, न्याय अथवा चतुरता का अणु भी न हो, जोकि सूक्ष्म कीट-पतंगों को भी देखकर डर जावे, इच्छा होने पर जो महान से महान दुष्ट कृत्य करने को आनाकानी न करे, जो एक छदाम के लिए भी मित्रों का नाश करने को तत्पर हो, जो बालक अथवा पागल के समान बिल्कुल बुद्धिहीन हो, वह कदापि सुखी नहीं हो सकता।

यदि कोई कहे कि अत्यन्त थोड़े से भौतिक पदार्थों के द्वारा जिस प्रकार जीवन बिता सकें, वह जीवन बिताकर केवल धार्मिक कार्य में लगे रहें, केवल धार्मिक उन्नति करते रहें, तो वह मनुष्य अत्यन्त भूला हुआ है, वह वैयक्तिक दृष्टि से विचार कर रहा है, राष्ट्रीय दृष्टि से नहीं। स्मरण रहे कि व्यक्ति की भलाई-बुराई राष्ट्र की भलाई-बुराई पर अवलंबित है। तप, योग इत्यादि कार्य निर्भय करते रहे, इसके लिये पुराने काल में भी सेना रखनी पड़ती थी और चौकी पहरे का प्रबन्ध करना पड़ता था। जब भौतिक श्रेष्ठता की शंका का उदय भी नहीं हुआ था, जबकि लोग बहुत सच्चे और न्यायी थे, तब लोग साधारणतया धार्मिक कार्यों में स्वभावतः ही लगे रहते थे, तब इन बातों की आवश्यकता थी, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इसकी आवश्यकता आज विशेष बढ़ गई है। आज हम जीवन-संग्राम में पड़े हुये हैं। इस बात को ख्याल में रखना चाहिये कि जब तक हम थोड़े श्रम से अधिक सम्पत्ति न उत्पन्न करेंगे तब तक हम जीवन संग्राम में न टिकेंगे। इसके साथ ही साथ हमें धार्मिक उन्नति करना है। इसके लिये हमें समय चाहिये। यदि हम रात-दिन केवल भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति में लगे रहें तो हम धार्मिक उन्नति न कर पावेंगे। बहुत समय से हमारी जो धार्मिक और सामाजिक उन्नति हो रही है, उसका मुख्य कारण हमारी समझ में यही है कि थोड़े से पदार्थों के लिये हमें दिनोंदिन अधिक परिश्रम करना पड़ता है सारा समय उसी में जाता है, उससे हमें छुटकारा मिलना ही कठिन हो गया है। विद्या के नये प्रकाश का उतना दोष नहीं कि जितना इस बुरी परिस्थिति का है। इसी नयी स्थिति के कारण हमारी साम्पत्तिक स्थिति बिगड़ गई है, और इस कारण हमारी सामाजिक और धार्मिक अधोगति होती चली जा रही है। आजकल बड़ी कठिनता से जन-समाज अपनी काया को सजीव रख सकता है। रात-दिन किसी प्रकार सम्पत्ति की प्राप्ति करने की चिन्ता में हमें पड़े रहना पड़ता है।

राष्ट्र की अच्छी स्थिति के बिना व्यक्ति की स्थिति अच्छी रह नहीं सकती। हमारे यहाँ के इतिहास में यही भारी दोष दिखाई पड़ता है। हमारे यहाँ के इतिहास में धर्म ने अथवा (और यही सच बात है) धर्म की भूली कल्पना की फैलाई हुई ग्लानि ने इस ओर अत्यन्त उदासीनता उत्पन्न कर दी। परिणाम यह हुआ कि व्यक्ति किसी भी प्रकार अपना जीवन बिताने लगे और राष्ट्रीय विचार नष्ट होने लगे। इस कारण राष्ट्र की अधोगति होने लगी। राष्ट्र की अधोगति का परिणाम शीघ्र ही व्यक्तियों पर होने लगा, फलतः जीवन-संग्राम तीव्रतर होने लगा। इससे वैयक्तिक अधोगति पूर्ण सीमा को पहुँच गई। लोग स्वार्थी हो गये, झूठ बोलने लगे और असत्याचरण तथा दुराचार करने लगें। इसी के परिणाम आज भी दिख रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि विदेशियों के सामने ये न टिक सके और पराधीन होना पड़ा । अब तो दिनोंदिन ये दुर्गुण और भी बढ़ते चले जा रहे हैं। साराँश, धार्मिक उन्नति प्रधान अवश्य है, परन्तु भौतिक उन्नति के बिना उसका उदय होना असम्भव है। हम फिर भी कहते हैं कि हिन्दू राष्ट्र के लिए भौतिक सम्पत्ति से डरने का उतना कारण नहीं जितना कि पाश्चात्य देशों में है। हमारे यहाँ के धर्म के तत्व जब तक बने हैं, तब तक हम भौतिक पदार्थों के सुख को ही परमसुख कभी न समझेंगे परन्तु जब तक हम भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के पारस्परिक सम्बन्ध को नहीं समझ लेते, तब तक हमारी धार्मिक उन्नति होना सम्भव नहीं। वर्तमान स्थिति का विचार रख कर हमें कार्य करना चाहिये, उसको हम भूल नहीं सकते। उसको यदि भूल जावें और अपने मन में अपने को बड़ा समझते रहे है तो उसे भी खो बैठेंगे। यह बात अच्छी तरह विचार में रखनी चाहिये। माना कि शरीर और संसार के समस्त भौतिक पदार्थ केवल साधन मात्र हैं, परन्तु यह भी स्मरण रखना चाहिये कि उनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। इस समय उनकी अत्यन्त आवश्यकता है। अपनी उदासीनता के कारण ही हम इस स्थिति को प्राप्त हुए हैं। भौतिक ऐश्वर्य तो खो बैठे ही हैं, परन्तु उदर और शरीर के प्रश्न बहुत कठिन होने के कारण धीरे-धीरे धार्मिक ऐश्वर्य भी खोते चले जा रहे हैं। धार्मिक सम्पत्ति के लिए भौतिक और शारीरिक सम्पत्ति अत्यन्त आवश्यक साधन हैं।जब तक हम जानते रहेंगे कि भौतिक पदार्थ केवल साधन मात्र हैं तब तक धार्मिक उन्नति को भय नहीं, इसका उलटा उसके लिए अवकाश भौतिक उन्नति करने पर ही मिलेगा। नहीं तो लोग अपना जीवन रखने का प्रयत्न उचित-अनुचित सभी उपायों से करेंगे। फिर क्या-क्या अनर्थ होंगे, इसका ठिकाना नहीं। “वुभुक्षितः कि न करोति पाप।”

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