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Magazine - Year 1953 - Version 2

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व्यापक गायत्री महायज्ञ आयोजन

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यज्ञ की महत्ता असाधारण है। उसके अनेक लाभ हैं। (1) वायु की शुद्धता से आनन्दमय वातावरण विनिर्मित होना, (2) वर्षा, अन्त और वनस्पतियों की प्रचुरता, (3) अनेक रोग कीटाणुओं का नाश, (4) अनेक कामनाओं की मनोवांछित पूर्ति, (5) देव और पितरों का पोषण तथा पूजन, (6) पापों का परिमार्जन (7) आध्यात्मिक प्राण चेतना का स्पन्दन, (8) स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्ति, (9) परम कल्याण और ब्रह्म निर्माण आदि अनेकों लाभ यज्ञ के हैं। इन विषयों पर विस्तृत प्रकाश डालने के लिए आगामी महीने से प्रति मास एक लेख अखण्ड-ज्योति में छपता रहेगा। जिससे पाठक यह सही प्रकार जान सकेंगे कि हमारे धर्म में यज्ञ को इतना महत्व क्यों दिया गया है।भारतीय धर्म में प्रत्येक शुभ वर्ष यज्ञ के साथ आरम्भ होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, अंत्येष्टि आदि सोलह संस्कारों का विधान है, इनमें एक भी संस्कार ऐसा नहीं है जो, बिना यज्ञ किये होता हो। आप सभी शुभ कर्म, व्रत-उपासना, कला, उत्सव आदि में किसी न किसी रूप में यज्ञ का समावेश अवश्य रहता है। विशेष अवसरों के लिये ही नहीं ऋषियों ने नित्य के लिए यज्ञ को आवश्यक बताया है। पंच महायज्ञों को नित्यकर्म बताया गया है। आज यज्ञ की शास्त्रोक्त प्रणाली घूमिल हो गई है फिर भी देखा जाता है कि किसी न किसी रूप में प्रत्येक आस्तिक परिवार में उसकी चिन्ह पूजा होती रहती है। ‘अग्यारी’ या ऐसे ही किसी नाम से अग्नि को घी में प्रज्वलित करके उस पर पूड़ी-पकवान के लघु ग्रास लौंग, धूप आदि चढ़ाये जाते हैं। ऐसी ‘अग्यारी’ होली, दीवाली पर तथा पर्व दुर्गाओं में प्रायः सभी जगह होती देखी जाती है। कितनी ही धर्मात्मा स्त्रियाँ भोजन का प्रथम ग्रास पहले चूल्हे की अग्नि में चढ़ाती हैं तब किसी को भोजन देती हैं। उनकी दृष्टि में अग्नि देव का भोग लगाकर उसका प्रसाद रूप भोजन करना एक उचित धार्मिक कृत्य होता है। इस प्रकार अग्निहोत्र की टूटी-फूटी पद्धतियाँ यत्र-तत्र अब भी दिखाई देती हैं जिनसे यह अनुमान सहज ही हो जाता है कि यहाँ किसी समय यज्ञ में स्त्रियों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

आज बिजली की शक्ति का उपयोग करके वैज्ञानिक लोग अनेक-अनेक यन्त्रों तथा प्रक्रियाओं का संचालन करते हैं। बिजली ‘महान अग्नि तत्व’ की एक छोटी सी शाखा है। इस शाखा की मर्यादा भी छोटी सी है। आधुनिक विज्ञान वेत्ता इस छोटी सी सीमा का कुछ भाग जान लेने पर बहुत गर्व अनुभव करते हैं। प्राचीन काल में ऋषियों ने महान अग्नि तत्व को असंख्य शाखा-प्रशाखाओं का पता लगाया था और आज के वैज्ञानिकों की तरह स्थूल लाभों तक ही सीमित न रह कर ‘अग्नि विद्या’ द्वारा प्रकृति की सभी शक्तियों पर आधिक्य प्राप्त किया था, इतना ही नहीं अग्नि के अत्यन्त सूक्ष्म ‘कारण’ भाग तक पहुँचाकर सूक्ष्म शरीर के पाँचों आचरणों को नष्ट करते हुए ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करने तक की विद्या जानती थी, सभी महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए वहाँ ‘यज्ञ’ होते थे। सत् और असत् कार्यों के लिए विभिन्न प्रकार के यज्ञों का प्रचलन था। वाल्मीकीय रामायण, महाभारत एवं अन्यान्य पुराण इतिहासों से इस प्रकार के अनेक यज्ञों का वर्णन है। रावण आदि असुरों ने भी बड़े-बड़े यज्ञ करके अद्भुत शक्तियाँ एवं सिद्धियाँ पाई थीं। यज्ञ विध्वंस करने में भी असुरों का प्रयोजन यही रहता था कि ऋषियों की शक्ति न बढ़ने पावे।

यज्ञ की महत्ता असाधारण है। उस पर क्रमशः अगले अंकों में प्रकाश डालेंगे। इस समय तो हमें उस कार्यक्रम का उल्लेख करना है तो पिछले अंक में ‘सामूहिक गायत्री यज्ञ आयोजन’ के सम्बन्ध में बताया गया था। गायत्री उपासना का एक आवश्यक भाग हवन है। प्राचीनकाल में तो जप के दशांश हवन होते थे। अर्थात् जो दस वाला यज्ञ करता था वह एक माला (108 मन्त्रों) का हवन भी करता था। साधन सामग्री की असुविधा तथा समय को देखते हुए यह विधान शसाँश का रहा। अर्थात् जो 10000 मंत्र जपे वह 100 आहुतियों का हवन भी करें। पीछे इतना भी कठिन रहने पर सहस्रांशु हवन का निर्धारण हुआ। 24 हजार का अनुष्ठान करने पर प्रायः 240 आहुतियों का हवन किया जाता है। सवालक्ष अनुष्ठान वाले यदि सवालक्ष आहुतियों का हवन नहीं कर पाते तो वे भी 240 आहुतियों से ही काम चलाते हैं। सुविधा असुविधा की दृष्टि से उसे न्यूनाधिक भले ही करनी पड़े पर इतना निश्चित है कि अग्निहोत्र गायत्री उपासना का एक आवश्यक अंग है।

गायत्री परिवार ने पिछले यज्ञों में एक महत्वपूर्ण साधना की है। आप सब लोगों ने मिल कर गत सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ को पूर्ण करने में 125 करोड़ जप 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास तथा लगभग 40 करोड़ का लेखन किया है। गायत्री तपोभूमि जैसे महान तीर्थ का निर्माण, 2400 तीर्थों का जल-रज संग्रह व्यापक गायत्री प्रचार तथा पूर्णाहुति यज्ञ का आयोजन किया है। 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरण 24 दिन का केवल गंगाजल उपवास यह सब भी आपके ही परिवार के एक व्यक्ति ने किया है। यह आगे के भी कार्यक्रम पूर्ण तत्परता पूर्वक चलने वाले हैं और आगे उनका विशेष विकास होने वाला है। इस पिछले कार्य की उचित सफलता और उनके आयोजनों की तैयारी के लिए आवश्यक बल प्राप्त करना हम सभी को अभीष्ट है। इसके लिये 125 करोड़ गायत्री मन्त्रों की आहुतियों का हवन करने का निश्चय किया गया है। जैसे पिछले दिनों अपने परिवार के सभी सामूहिक संकल्प पूरे होते रहे हैं। इसी प्रकार आशा है। कि दो वर्ष से पूर्व ही यह यज्ञ आयोजन भी पूर्ण होकर रहेगा। पिछले दिनों जो तैयारियाँ गायत्री परिवार द्वारा की गई हैं उनसे आशाजनक परिणाम अनेक क्षेत्रों में उत्पन्न हुए हैं। इस वर्तमान आयोजन का भी वैसा ही परिणाम होगा।

यों यज्ञ के विधि विधान बहुत विस्तृत हैं। उनकी बहुत बारीकियाँ, विधि व्यवस्थाएं, प्रक्रियाएं, सामग्रियां एवं कण्डिकाएं उपलब्ध हैं। अनेक प्रक्रियाओं के लिए सूत्र ग्रन्थों ने अनेक प्रकार के विधान हैं तथा आहुतियों के लिए अनेक मंत्र भी हैं। इस विधि व्यवस्था को पूरा करना हर किसी के लिए आसान नहीं है। अनुभवी, कर्मकाण्डी, एवं सदाचारी, विद्वान, वेदपाठी पण्डितों की सहायता से ही वह सब हो सकना सम्भव है। इस प्रकार के यज्ञों का स्वापक आयोजन हो सकना न तो सम्भव है और न आवश्यक। हम सब साधारण रीति से ऐसे अग्निहोत्र करेंगे जिनके लिये जैसे पण्डितों का सहयोग आवश्यक नहीं है। जो रीति इन हवनों के लिए निर्धारित की गई है वह बहुत सरल है उसे गायत्री उपासक आसानी से बिना किसी कठिनाई के पूरा कर सकते हैं। जिस प्रकार “गायत्री सन्ध्या” अकेले एक गायत्री मन्त्र से हो सकती है उसी प्रकार “गायत्री यज्ञ” भी केवल अकेले एक गायत्री मन्त्र से हो सकता है। सभी मन्त्र गायत्री मन्त्र से उत्पन्न हैं। जिस प्रकार किसी बात पर राजा की आज्ञा होने पर उसके सब अफसरों की आज्ञा आवश्यक नहीं होती उस प्रकार गायत्री मन्त्र, अन्य सभी मन्त्रों की आवश्यकता पूरी कर सकता है।

हवन के लिए कहाँ, किस प्रकार, कौन व्यक्ति, तथा आयोजन पूरे यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर है। परिस्थितियों के अनुसार हवन करने वालों के कई विभाग किये जा सकते हैं।

(1) जो एकाकी साधना पसन्द करते हैं वे अकेले बैठकर हवन कर सकते हैं। हवन सामग्री तथा घी मिला कर रखलें । ताँबे के छोटे हवन कुण्ड में या निर्धारित वेदी पर स्वयं हवन कर लिया करें।

(2) अपने परिवार के लोगों को इकट्ठे करके सबको हवन के आस-पास बिठा लें। एक घी चढ़ावें। कुछ व्यक्ति सामग्री की आहुतियाँ चढ़ावें। एक व्यक्ति माला लेकर गिनती करता रहे। आरम्भ में तीन-तीन समिधाएँ घी में डुबोकर सब लोग चढ़ावें और अन्त में तीन आहुतियाँ हवन सामग्री की चढ़ावें।

(3) अपने परिवार वालों, पड़ौसियों तथा मित्रों को आमन्त्रित करके यज्ञ भगवान के पूजन में सबको सम्मिलित करें। प्रार्थना, भजन, कीर्तन, उपदेश आदि का भी इस अवसर पर प्रबन्ध करें।

(4) सामूहिक हवन-किसी ऐसे स्थान पर होने चाहिए जहाँ अधिक से अधिक लोग भाग ले सकें। इनमें खर्च कुछ अधिक हो जाता है इसलिए उसे एक व्यक्ति के लिए करना कठिन होने पर कई व्यक्ति मिलकर करें तो भी ठीक है। एक-एक बार एक-एक व्यक्ति की ओर से भी हो सकता है। बारी-बारी अपने-अपने घर पर यज्ञ कराने की प्रेमी लोग व्यवस्था करें तो भी उत्तम है।

(5) किसी विशेष पर्व या हर्ष उत्सव के समय पर बड़े यज्ञों की भी व्यवस्था करनी चाहिए जिसमें सुयोग्य विद्वानों को भी बुलाया जा सके और ब्रह्मयोग आदि का भी प्रबन्ध हो सके।

साधारण व्यय वाले छोटे हवन भी नित्य हो सकते हैं। क्योंकि इनमें अधिक खर्च, समय और प्रबन्ध की आवश्यकता नहीं पड़ती। एकाकी हवन सन्ध्या पूजा के साथ ही हो जाता है। पारिवारिक हवन में समय और खर्च कुछ बढ़ जाता है। पारिवारिक हवन नित्य करना सरल नहीं हो तो रविवार को, पन्द्रह दिन में करना हो तो अमावस्या को और पूर्णमासी को, महीने में एक बार करना हो दो पूर्णमासी को करना ठीक होता है। किन्तु अमावस्या पूर्णमासी को उचित न हो वे छुट्टी का कोई और दिन निर्धारित कर सकते हैं। सामूहिक हवनों की व्यवस्था साधारणतया एक मास से पूर्व होना कठिन है। क्योंकि समय और धन की जल्दी जल्दी पर्याप्त व्यवस्था लोगों से बन नहीं पड़ती, इसलिए कुछ समय पश्चात करते रहते रहने में सुविधा रहती है। दक्षिणा का बहुत भार न पड़ता हो और कृपा पूर्वक किन्हीं विज्ञ विद्वान पण्डित का सहयोग मिल जाय तो उसे प्राप्त करने का भी प्रयत्न करना चाहिये। जहाँ वैसी व्यवस्था न हो वहाँ गायत्री उपासक पारिवारिक सहयोग से भी इन हवनों की व्यवस्था आसानी से कर सकते हैं।

हवन संबंधी साधारण जानकारी इस प्रकार है।

(1) हवन में शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिये। जो लोग सम्मिलित हों, स्नान अवश्य कर लें। वस्त्र भी धुले हुए पहनें। हवन में प्रयोग होने वाली सभी वस्तुओं की शुद्धता का ध्यान रखना चाहिये।

(2)यों हवन सामग्री की विस्तृत जानकारी हमारी पुस्तकों में दी हुई है। पर साधारणतः 1-गूगल 2-चन्दन चूरा, 3-जायफल, 4-लौंग, 5-नागरमोथा 6-जावित्री 7-बच, 8-इन्द्र जौ, 9-मुलहैठी, 10-बड़ी इलायची, 11-खस, 12-दाल, 13-गोक्षा, 14-छुहारे, 15-बादाम यह 15 चीजें लेने से काम चल सकता है। इनमें लौंग, जवित्री इलायची आदि वस्तुएँ जो अधिक महंगी हों कुछ कम मात्रा में और शेष समान मात्रा में लेना चाहिए। वह वस्तुएँ तो कूट कर लेनी चाहिए।

(3) उपरोक्त हवन सामग्री के बराबर यव चावल, तिल मिलाने चाहिये। इनका अनुपात इस प्रकार होना चाहिए जो एक भाग, चावल दो भाग, तिल तीन भाग, शक्कर चार भाग, काले तिल मिल सकें तो अधिक उत्तम है।

(4) जौकुट औषधियाँ, जौ तिल, चावल, शक्कर इन सबको एकत्रित करके उनमें थोड़ा घी मिला लेना चाहिये।

(5) जहाँ औषधियों वाली हवन सामग्री न मिल सके वहाँ तिल, जौ, चावल, घी, शकर तथा जो सेवाएँ मिल सकें उन्हें मिलाकर काम चलाया जा सकता है।

(6) समिधाएं सड़ी घुनी न हों, पीपल, गुजरि शमी, बरगद, धाम, बेल, ढाक आदि उत्तम वृक्षों की लेनी चाहिये।

(7) यज्ञ के अन्त में मिष्ठान, फल या पंचामृत आदि का प्रसाद उपस्थित लोगों में वितरण करना चाहिए।

(8) 24 आहुतियों के लिए छोटा तांबे का हवन कुण्ड अथवा 12 अंगुला चौड़ी, 12 अंगुल लम्बी, 2 अंगुल ऊँची मिट्टी की वेदी बना लेनी चाहिये। 108 से लेकर 500 आहुतियों तक के लिए 24 अंगुल लम्बी 24 अंगुल चौड़ी 4 अंगुल ऊँची वेदी पर्याप्त है। यहाँ कुण्ड बनाने की व्यवस्था हो सके वहाँ और भी उत्तम है। साधारण हवन के लिए 24 अंगुल चौड़ा, 24 अंगुल लम्बा तथा 24 अंगुल गहरा होना चाहिए। कुण्ड को इस प्रकार तिरछा देखें कि नीचे का भाग चौथाई (6 अंगुल लम्बा 6 अंगुल चौड़ा) रह जाये। ऐसे ठीक लम्बाई-चौड़ाई के बने कुण्ड मिल जावें तो भी ठीक है।

(9) कुण्ड या वेदी को आकर्षक रंगों में चौक पूर कर अथवा पुष्पों आदि से सजाकर शोभादान करने का प्रयत्न करना चाहिये।

(10) कुण्ड या वेदी के ईशानकोण में कलश स्थापना करना चाहिये। मिट्टी या ताँबे का कलश ही उत्तम है, कलश नीचे थोड़ा अन्न बिछाना चाहिये। कलश के मुख पर पीपल, गूलर, पलाश, आम, बरगद इनमें से एक के या मिल सकें तो सबके पत्ते एकत्रित करके पंचवल्लव बनाकर रखना चाहिये। ऊपर से चावल भरा सकोरा रख देना चाहिये। कलश के निकट भाऊ पर घृत का दीपक जलता रहे।

(11) हवन होने के बाद, भस्म तथा पुनः उपचार की अन्य सामग्री को किसी पवित्र जलाशय या वेदालय के समीप विसर्जन कर देना चाहिये।

(12) आर्य समाजी ‘हवन पद्धति’ जिन्हें पसन्द हो वे उसके अनुसार प्रारम्भिक कृत्य एवं आहुतियाँ करते हुए शेष हवन गायत्री मंत्र से कर सकते हैं। दूसरी पद्धति जो गायत्री परिवार के लिये विशेष उपयुक्त होगी नीचे दी जाती है।

हवन की विधि इस प्रकार है :-

(1) यज्ञ में सम्मिलित होने वाले सब लोग शुद्ध होकर, आसन बिछाकर बैठें।

(2) यज्ञ की विधि व्यवस्था संचालन करने वाले प्रधान व्यक्ति सबके मस्तक पर चन्दन लगावें और परस्पर अभिवादन करें।

(3) सब लोग दाहिने हाथ की हथेली पर जल रखकर गायत्री मंत्र पड़ें और उस जल को सिर पर छिड़कते हुए ऐसी भावना करें कि हम इस मंत्र पूजा पाठ के मार्जन से पवित्र बने रहे हैं।

(4) इसके उपरान्त सब लोग ब्रह्म सन्ध्या करें। आचमन, शिखाबन्धन, प्राणायाम, अर्घ्यपण, न्यास यह ब्रह्म संध्या के पाँच अंग हैं। केवल गायत्री मंत्र से ही यह पाँचों कृत्य हो सकते हैं। इनका विस्तृत विधान अन्य पुस्तकों में लिखा जा चुका है।

(5) ईशान दिशा में कलश तथा घृतदीप की स्थापना करें। कलश में सब देव शक्तियों की स्थापना मानकर उसको धूप, दीप, नैवेध, अक्षत, सुपारी, दूर्वा पुष्प, फल चन्दन, कलश आदि माँगलिक द्रव्यों से पूजन करें। तथा संकल्प स्वस्तिवाचन आदि यथास्थिति पढ़ें।

(6) वेदी या कुण्ड की शुद्धि के लिये निम्न क्रियाएं करें। 1-कुशाओं से वेदी या कुण्ड को झाड़ना 2-कहीं कोई अनावश्यक वस्तु ढंकी दिखाई दे वहाँ कुश मूल से कुरेदना, 3-जो कूड़ा कचरा हो उसे उठाकर फेंकना, 4-घी होमने के स्रुवा की जड़ से पश्चिम से पूर्व की ओर-तीन बार उत्तर को हटते हुए तीन लकीर खींचे, 5-कुशा की जड़ से जल सिंचन करें। इसे पंच भू-संस्कार कहते हैं।

(7) सब लोग मिलकर कोई संस्कृत की या हिन्दी की स्तुति गावें।

(8) उपले के अँगार की अग्नि दो मिट्टी के पात्रों (सकोरा) के बीच में ढक कर लावें। उस अग्नि का माँगलिक द्रव्यों से पूजन करें।

(9) संपूजित अग्नि को व्यवस्थापूर्वक समिधाएँ लगे हुए कुण्ड या वेदी के मध्य में अग्नि स्थापित करे। और पंखे से हवा करके अग्नि प्रज्ज्वलित करे। कपूर जलाकर भी अग्नि प्रज्ज्वलित करने की क्रिया कराई जाती है।

(10) जब अग्नि प्रज्ज्वलित होने लगे तब आठ आठ अंगुल की तीन समिधाएं घी में डुबोकर क्रमशः एक-एक समिधा आहुति दें।

(11) अंजलि में जल भरकर क्रमशः पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं वेदी के चारों ओर जल छिड़के तथा थोड़ी-थोड़ी कुशा वेदी या कुण्ड के चारों ओर रखें।

(12) गायत्री मंत्र के अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द बोलते हुए आहुति दें।

(13) थोड़े व्यक्ति जो अग्नि से वेदी के आस पास बैठ सकते हों वे ही हवन करें। शेष उनके पीछे बैठकर गायत्री मंत्र तथा स्वाहा का उच्चारण करते रहें। एक व्यक्ति घी चढ़ाये शेष हवन सामग्री चढ़ाएं। यज्ञ संचालन (ब्रह्मा) माला पर संख्या गिनते रहें और आहुति डालने का आदेश देते रहें।

(14) पास में जल भर कर रख लें। आहुति के बाद घी के स्रुवा में बची हुई एक बूँद उस पात्र में डलवा दिया करें। “इदं गायत्र्यै इयं नमम्” ऐसा उच्चारण करें।

(15) नियत संख्या में जप पूर्ण हो जाने पर कोई पूड़ी, पकवान, हलुवा, खाद आदि पदार्थ बना हो तो उसकी पाँच आहुति दें।

(16) आहुतियों से बचे हुए शेष हवन सामग्री तथा घृत को हाथ में लेकर खड़े होकर उसका पूर्णाहुति चढ़ावें, पूर्णाहुति में घी भरा हुआ नारियल पानी चढ़ाते हैं।

(17) सब सज्जन यज्ञ की एक या चार परिक्रमा करें।

(18) घी चढ़ाने के चम्मच की पीठ से यज्ञ भस्म लगाकर उसे क्रमशः मस्तक, ग्रीवा, दाहिनी भुजा की जड़ तथा हृदय पर सब लोग लगावें।

(19) जल के कटोरे में जो घृत की बूंदें टपकाई गई थी उन्हें हथेलियों पर मलकर हाथों को अग्नि के सम्मुख तपायें फिर उस घृत सिक्त हाथ को मुख, आँख, कान, नाक, मस्तिष्क तथा कण्ठ में लगावें।

(20) कलश में भरें हुए जल में कुश दूब या आम के पत्ते डुबाकर वहाँ सब उपस्थित व्यक्तियों पर जल छिड़कें और सबके कल्याण की कामना करें।

(21) कपूर जलाकर या घी के दीपक से यज्ञ की आरती करें ।

(22) यज्ञ में भूलों के लिए प्रभु से क्षमा प्रार्थना, शान्ति पाठ तथा देवताओं का विसर्जन करें। हो सके तो भजन, संगीत, कीर्तन, प्रवचन, आदि का आयोजन करें।

(23) पंचामृत आदि जो प्रसाद हो उसे सब लोगों को वितरण करके कार्य समाप्त करें ।

यों यज्ञों के विधि विधान बहुत विस्तृत है और उनकी अनेकों शक्तियाँ है उन सबके लम्बे फेर में न पड़कर उपरोक्त विधान ऐसा निर्धारित किया गया है जो बहुत सरल होते हुए भी, प्रायः सभी प्रमुख बातों से संयुक्त है। इनमें से सभी विधानों के लिये अनेकों श्रोत एवं स्मार्त मंत्र ग्रन्थों में लिखे हुए हैं। उन मन्त्रों को तथा यज्ञ सम्बन्धी अनेक बारीकियों को बताने के लिए शीघ्र ही इस विषय की पुस्तक प्रकाशित करेंगे। पर वह सब ठीक प्रकार जानना और याद करना सभी गायत्री प्रेमियों के लिए सरल नहीं है। इसलिए उपरोक्त विधान से या देश, काल, पात्र के अनुसार उचित हेर फेर करते हुए अपने यहाँ हवन करना चाहिये। कभी विद्वानों में गायत्री मन्त्र के उच्चारण से काम चल सकता है। हाँ, कार्य के अनुसार भावनाओं का उद्भव अपने मन में करते जाना चाहिये।

विधि विधान बड़ा देखकर किसी को परेशान नहीं होना चाहिये, एक बार जो कार्य को करने लगें वे दूसरों को सिखाने का प्रयत्न करें, यज्ञ रूप भगवान को प्रसन्न करके हम सब सुख शान्ति के भागी बनें।

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