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Magazine - Year 1956 - Version 2

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अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये

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(श्रीमती डा. विमला माथुर)

आप कितनी भी कठिन परिस्थितियों में क्यों न हों, आप अपनी खिन्नता, अपनी मानसिक दशा परिवर्तित करके दूर कर सकते हैं। मस्तिष्क के एक भाग (Cerebrum) से, जहाँ विचार उत्पन्न होते हैं, मस्तिष्क के दूसरे भाग (Thalamus) में जहाँ प्रसन्नता अथवा अप्रसन्नता का अनुभव करते हैं, दूसरे प्रकार के विचार भेज कर खिन्नता तथा उदासीनता दूर की जा सकती है।

निम्नलिखित नाना प्रकार की मानसिक दशाओं में भिन्न-भिन्न विचारों को अपनाइये—

(1) आप अपनी त्रुटियों एवं अवगुणों के विषय में मनन करना बन्द कर दीजिये। अन्य मनुष्यों के अवगुणों की सूची बना लीजिए और उनमें से किसी मुख्य पर ध्यान दीजिए और मनन कीजिए। अपने गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न करिए। देखिए कि आप किन-किन बातों में दूसरे मनुष्यों से बढ़कर हैं और उन बातों पर विचार कीजिए। अपने विषय में सोचने के स्थान में दूसरों के विषय में सोचिए। किसी भी काली लड़की का अत्यन्त सुन्दर महिलाओं की संगति में अपने आपको हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझना चाहिए। उसे संगीतज्ञ और शिक्षित हो जाने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। अपने गुणों को बढ़ाने के विषय में सोचते रहना चाहिए और दूसरी महिलाओं से अपनी समानता करनी छोड़ देनी चाहिए। अन्य क्षेत्रों में भी जहाँ आपने समानता करने में अपने को दूसरों से कम पाया है, इसी प्रकार अपने विचारों को बदल देना चाहिए।

(2) अन्य मनुष्यों के कार्य और क्रियाओं को उनके दृष्टिकोण से भी देखिए। किसी भी विषय पर केवल अपने ही दृष्टिकोण से विचार करने और दूसरों के विचारों की प्रशंसा न कर सकने के कारण ही क्रोध उत्पन्न होता है। दूसरे मनुष्यों को सुधारने अथवा बदलने की चेष्टा मत करिए।

उपस्थित परिस्थितियों के अनुसार अपने कार्यों और योजनाओं को बदलने का संकल्प कर लीजिए। दूसरे मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार बदलने की अपेक्षा स्वयं प्रस्तुत परिस्थिति के अनुसार अपनी योजनायें बदल दीजिए।

क्रोध से बचे रहने का मन में दृढ़ संकल्प कर लीजिए। शान्ति और प्रसन्नता अमूल्य वस्तुयें हैं। आप यदि एक बार भूखे भी रह जायं तो उसकी परवाह मत करिये और शान्त रहिए, किन्तु परेशान, एवं दुखी मत होइए।

(3) अपनी बुराई-भलाई के विषय में मत सोचा करिए। मनुष्य यदि अपने ही कष्टों और कठिनाइयों पर सोचता रहे तो वह उदासी से किसी प्रकार भी नहीं बच सकता। अन्य मनुष्यों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं पर सोचिए।

परिचित मनुष्यों के स्वभाव के विषय में लिख लीजिए। उनके अद्भुत आचरण और अवगुणों पर ध्यान दीजिए। यह मन बहलाने का बड़ा ही मनोरंजक ढंग है। यदि आप सच्चे मन से ऐसा करेंगे, तो आप अवश्य प्रफुल्लित दिखाई देंगे।

घर पर अथवा आफिस में अकेले मत बैठिए। दूसरे मनुष्यों से मेल बढ़ाइए और अपने विचार बदलिए। बातें अधिक करिए, और सोचिए कम।

आप पर जैसी भी बीते, उसी को सहर्ष स्वीकार कर लीजिये। अपनी असफलता, पराजय, एवं दुर्भाग्य पर अपना ध्यान मत जमाइये।

मनुष्य जैसा कार्य करता है, वैसे ही उसके मन में भाव उठते हैं। अतः कार्य करते समय अत्यन्त प्रसन्न चित्त दिखाई दीजिये, मुस्कुराइये और प्रफुलित रहिये। यदि आप ऐसा करेंगे तो शीघ्र ही प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। इसके विपरीत आप यदि झुककर, लड़खड़ाते हुए, नीचे की ओर आँखें किये, त्यौरियाँ चढ़ाए, उदास भाव से चलेंगे तो आप अवश्य उदास हो जाएंगे। इधर-उधर की छोटी-छोटी सी बातों से असन्तुष्ट होने की अपेक्षा अपने भाग्य को सराहिए और अपने आपको धन्य समझिए। इस सिद्धान्त पर सोचिए कि ‘इससे भी बुरा हो सकता था।’ जो कुछ आपके पास नहीं है, उस पर ध्यान देने की अपेक्षा जो कुछ आपके पास है, उस पर ध्यान दीजिए। आपको अधिकतर यही सोचना चाहिए कि ‘जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान को अनेकों बार धन्यवाद है।’

(4) चिन्ता दूर करने के उपाय हैं—विश्लेषण द्वारा निर्णय कर लेना, संकल्प, मन की शान्ति, जिस विषय से आप चिन्तित हों, उसका भली-भाँति विश्लेषण कीजिए। चिन्ता, भय का ही दूसरा बढ़ा-चढ़ा रूप है। भयभीत मन की दशाएं ही नारकीय पीड़ायें हैं। चिंतित और भयभीत गरीब अत्यन्त दुख का अनुभव करता है। चिन्तित, दुखित और भयभीत होकर कष्ट सहन करने की अपेक्षा कष्टों का सामना कर लेने का दृढ़ संकल्प कर लीजिये। आप को यदि अपने कार्य के छूट जाने का भय है और चिन्ता है तो उस परिस्थिति का कम से कम चिंतित होकर सामना कीजिए। भयभीत रहने और अप्रयत्न-शील बनने की अपेक्षा अपनी योजनाऐं बदल कर नई योजनाऐं बना लीजिये।

मानसिक शान्ति प्राप्त करने के लिये आराम से बिस्तर पर लेट जाइये और सोचिये कि आपका शरीर पूर्णतया स्वस्थ है। स्फूर्ति लाने के लिए कोई शारीरिक कार्य अथवा कोई खेल खेलिये। आप यदि किसी वस्तु को पाने के लिये अथवा अन्य किसी छोटी सी बात पर चिन्तित हैं, तो निद्रा अथवा स्थान परिवर्तन ही उपयुक्त है। यदि यह असंभव है, तो आप आत्मशक्ति द्वारा बुरे विचारों को मन में मत आने दीजिये।

(5) अधिक आशाऐं मत बाँधिये। किसी कार्य को करने के लिए भरसक प्रयत्न करिये किन्तु फल ईश्वर पर छोड़ दीजिये। असफल होने पर हतोत्साह मत होइए। याद रखिये असफलता ही सफलता की नींव है। वे पुरुष, जिन्होंने संसार में महान् कार्य किये हैं, उन्हें भी बार-बार असफल होते रहने के बाद ही सफलतायें मिली हैं।

(6) अन्य मनुष्यों से किसी वस्तु के मिलने की आशा मत रखिये। आप यदि दूसरों से कुछ मिलने की आशा करेंगे, तो वह वस्तु न मिलने पर अवश्य ही आप दुखी होंगे अतः दिल से भी किसी की वस्तु मत माँगिये! दूसरों के स्वभाव को परिवर्तित करने की व्यर्थ चेष्टा मत करिये। जो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दीजिये। जो मनुष्य ऐसा नहीं करते वे पिता-पुत्र, पति-पत्नी, सम्बन्धी एवं कोई भी हों, स्वभाव के कारण एक दूसरे के व्यवहार से अत्यन्त दुखी रहते हैं।

उपर्युक्त ढंग से बुरे विचारों से पूर्ण मानसिक दशा को परिवर्तित करिए, इस प्रकार आप दुखी होने से बच सकेंगे। बातों पर विचार करिए और प्रसन्नता एवं आनन्द का अनुभव करिए—

(7) किसी भी परिचित मनुष्य की, जिससे आपको कुछ कार्य भी सिद्ध करना है, इच्छाओं, और कठिनाइयों, जिनके कारण वह दुखी है लिख लीजिए। उसकी सहायता करने और उसे प्रसन्न करने की चेष्टा करिये। दूसरे मनुष्यों को सुखी एवं प्रसन्न करने का सच्चा प्रयत्न स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करने का मूल मन्त्र है जो वर्णन नहीं, केवल अनुभव ही किया जा सकता है! उस मनुष्य का, जिसे आपने प्रसन्न करने की चेष्टा की है, सन्तोष, हर्ष, उल्लास एवं आनन्द से प्रसन्न मुख देखकर आप स्वयं हर्ष से फूल उठेंगे।

कल के विषय में न सोचने का दृढ़ संकल्प कर लीजिये। उमर खय्याम की भाँति जीवन के प्रति क्षण में आनन्द और सुख का अनुभव कीजिये। न बीते हुए पर दुखी होइए और न भविष्य से डरिए।

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