वशीकरण के छह उपाय
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(श्री लक्ष्मीनारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम. ए. लखनऊ)
कौन नहीं चाहता कि उसे सब चाहें, उसे सब पसन्द करें, किन्तु कितने ऐसे सौभाग्यशाली हैं, जिनसे प्रायः सभी प्रसन्न रहते हों! यों तो एक कहावत है कि संसार में सभी को खुश रखना असम्भव है और यह बात एक सीमा तक सत्य भी है। किन्तु साधारणतया हमसे लोग खुश रह सकते हैं, बशर्ते हम स्वयं ही सच्चे हृदय से यह बात चाहें। आप कहेंगे कि भला कौन यह नहीं चाहता? किन्तु जहाँ सच्ची चाहना होती है, वहाँ उसके लिए सच्चा प्रयत्न होता है। बिना प्रयत्न किए, बिना उपाय किए, बिना कुछ कष्ट उठाए ही यदि हम कोई फल प्राप्त करना चाहेंगे, तो हमें असफलता अवश्यम्भावी है, जैसी प्रायः 99 प्रतिशत लोगों को मिलती है। अपनी अज्ञानता तथा स्वभाव की कमजोरी या बुराई के कारण ही लोग हमसे असन्तुष्ट रहते हैं। लोग कहते तो अवश्य हैं कि ‘भाई! हम तो दूसरे के लिए चाहे अपना सर भी काट कर रख देंगे, पर हमें यश नहीं मिलेगा, हमसे कोई सन्तुष्ट नहीं होगा। हमारा भाग्य ही ऐसा है।’ ऐसे लोग भाग्य पर दोष डालना तो जानते हैं, पर शान्ति तथा गंभीरता से उन कारणों को खोजने का प्रयत्न नहीं करते, जिनके कारण लोग असन्तुष्ट या नाखुश रहते हैं और न उन उपायों को सोचने-समझने का प्रयत्न करते हैं, जिनके अपनाने से हम अभीष्ट की सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। अमरीका के प्रसिद्ध लेखक डेल कारनीगी ने छह उन उपायों को बताया है, जिनको अपनाने से लोग आपको पसन्द करने लगेंगे।
प्रथम बात तो उन्होंने यह कही है कि आप दूसरों की परिस्थितियों, उनकी समस्याओं, उनकी परेशानियों में सच्चे हृदय से अपनी रुचि दिखावें। देखिए इस संसार में प्रत्येक के सर पर अपनी निजी ही इतनी कठिनाइयाँ, परेशानियाँ तथा आवश्यकतायें है कि वह उन्हीं से उबर नहीं पाता, तब उसे दूसरे की परेशानियों को सुनने और दूर करने का कहाँ से अवकाश मिलेगा तथा रुचि होगी आप यदि अपना रोना किसी के सामने रोने न बैठ जायं, वरन् उसकी राम कहानी को ध्यान से सुनें, उसके प्रति अपनी सहानुभूति का प्रदर्शन करें, तो वह आपके प्रति आकर्षित होगा, आपका मित्र हो जायगा और तब वह केवल आपको पसन्द ही न करेगा वरन् कल फिर बड़ी प्रसन्नता से आपकी राम-कहानी सुनने को तैयार हो जायगा। पर हम तो पहले ‘अपने’ ही को सोचते हैं, अपने ‘स्वार्थ’ को ही सर्वोपरि रखते हैं। इससे न हमारा ही स्वार्थ पूरा होता है और न परमार्थ ही हो पाता है।
दूसरी बात उन्होंने यह बताई है कि सदा मुस्कुराते रहो। मोरहमी चेहरे से सभी घबराते हैं। नीरस, कर्कश तथा मुर्दनी सूरत और स्वभाव वाले के पास कोई नहीं फटकता। हँसमुख मनुष्य, दुखियों के भी आँसू सुखाने में समर्थ होता है। वह जहाँ बैठेगा, एक नया जीवन, स्फूर्ति तथा ताजगी वातावरण में आ जायगी। जो रोते हुए को भी हँसाने का गुण रखता है वह सबका प्रिय होता है।
तीसरी बात उन्होंने यह बताई है कि मनुष्य को सबसे अधिक प्रिय और मीठा अपना नाम लगता है। आप सम्मान सूचक शब्दों को किसी के पहले लगाकर उच्चारित कीजिए। अपने नाम से आत्मीयता होती है, अतः अपना नाम बार बार सुनने से प्रसन्नता होती है। कुछ लोगों में यह गुण होता है कि वे दूसरों का नाम नहीं भूलते, भले ही बरसों के बाद मिलें। अब मान लीजिये किसी से बरसों बाद आपकी भेंट हुई और आपका नाम वह भूला नहीं है। आपके हृदय में तुरंत यह विचार उठेगा कि यह मनुष्य अपने हृदय में मेरा स्थान रखता है, तभी तो मेरा नाम इतने दिनों के बाद भी इसे याद है। फल यह होगा कि आप ऐसे आदमी को बहुत पसन्द करेंगे।
चौथी बात उन्होंने यह बतायी है कि आप बहुत अच्छे श्रोता हो। यहाँ पर तो ‘अपनी अपनी सब कहते हैं, सुनता कौन बिरानी!’ और जब आप शाँत, धैर्य और प्रेम के साथ ‘बिरानी’ सुनने को तैयार हो जायेंगे तो आप वक्ता के हृदय को जीत लेंगे। आप किसी को यह कहने का अवसर न दें कि यह शख्स अपनी ही गाये चला जाता है दूसरे को नहीं सुनता।’ भला ऐसे आदमी को लोग क्यों पसन्द करने लगे।
पाँचवी और अत्यन्त महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह बताई है कि दूसरों की रुचि के बारे में ही बातचीत करो। मान लीजिये आपको घोड़ों से बहुत शौक है, प्रेम है। आप हर समय घोड़ों के बारे में ही दूसरों से बात करना चाहते हैं। यह सत्य है कि वैसा करने से आपको अवश्य मानसिक सुख तथा शान्ति मिलेगी, पर वह श्रोता जिसे घोड़ा सम्बन्धी विषय में न रुचि है न विशेष जानकारी, वह तो आपकी बात सुनकर ऊब जायगा। मान लीजिये उसे डाक के टिकट जमा करने का शौक है और आप उसकी रुचि को जानते हैं, तो आप बस टिकटों की ही बात कीजिये। वह आपका गुलाम हो जायगा। वह आपको बहुत पसन्द करेगा। मन में वह कहेगा, ‘बस मैं ऐसा ही आदमी चाहता था’ और जैसा मैं ऊपर कह चुका हूँ एक बार वह आपकी ओर आकर्षित हो भर जाय, अर्थात् आप पहले उसकी रुचि को बस करलें और फिर तो बदले में वह प्रसन्नता से आपकी रुचि की बात सुनेगा।
छठवीं बात उन्होंने यह बताई है कि तुम जिससे मिलो उसे महत्ता दो। प्रत्येक मनुष्य में अहंभाव होता है और वह इस अहंभाव की पूर्ति करना चाहता है और करता है। आप प्रायः लोगों को यह कहते हुए सुनेंगे कि ‘मुझे ऐसा-वैसा न समझ लेना, मैं यह हूँ।’ अस्तु जब मनुष्य अपनी महत्ता का प्रदर्शन चाहता ही है तो आप अवश्य ही प्रथम उसकी महत्ता का वर्णन करें, बस वह आपको चाहने लगेगा। डिसरैले ने सत्य कहा है कि किसी मनुष्य से तुम उसके ही बारे में बातचीत करो और तुम देखोगे कि वह घंटों तुम्हारी बात सुनेगा।
अतः यदि हम ऊपर कहे हुए छह नियमों पर मनन करेंगे और उन्हें अपनायेंगे तो सतत् अभ्यास के बाद वह हमारे स्वभाव का अंग बन जायेंगे और हम वशीकरण मंत्र के ज्ञाता हो जायेंगे। तब हम देखेंगे कि हमें सभी पसन्द करते हैं, सभी हमसे संतुष्ट हैं।

