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Magazine - Year 1956 - Version 2

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सुखी वैवाहिक जीवन

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(श्री ज्वालाप्रसाद गुहा, एम. ए. एल. टी.)

सफल विवाहित जीवन मनुष्य के सुख की एक आधार शिला है। यदि सच्चा दाम्पत्य प्रेम हुआ तो वह दोनों की अन्तरात्मा का केवल विकास ही नहीं करता, वरन् उसमें निहित उस अमूल्य भावना की सिद्धि का कारण होता है जो पुरुष नारी के प्रति तथा नारी, पुरुष के प्रति अनुभव करती है। वास्तव में सच्चे दाम्पत्य प्रेम का आधार ही सुखी वैवाहिक जीवन है। अब हमें देखना है कि इस सुखी वैवाहिक जीवन के मूल तत्व क्या हैं। सच तो यह है कि वैवाहिक आनन्द का कोई निश्चित मापदण्ड नहीं है और न कोई ऐसा निरपेक्ष नियम ही है जिसके अनुसार इस अत्यन्त कलापूर्ण क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों का नियन्त्रण होता हो। अनेक स्त्री और पुरुष ऐसे ही जीवन में सुखी हैं जो अन्य स्त्री पुरुषों के दुःख और निरुत्साह का कारण बन जाता है। कई दंपत्ति सन्तान के अभाव में दुःखी हैं, तो कई बिना सन्तान के ही पूर्ण सुखी हैं। कई अपनी गरीबी में सुखी हैं तो कइयों की आर्थिक अवस्था ही उनके दुःख की जड़ है। शारीरिक प्रतिकूलता जहाँ एक दंपत्ति के दुःख का कारण है, वहीं दूसरे के सुन्दर सहयोग का आधार है। अनेक ऐसी बातें हैं, जिनको वैवाहिक जीवन के आरम्भ में कोई महत्व नहीं दिया जाता, परन्तु समय बीतने पर वे सुख या दुःख का कारण बन जाती हैं। अनेक दंपत्ति जो आरंभ में सब प्रकार से सुखी होते हैं, बाद को दुःखी रहने लगते हैं, क्योंकि मनुष्यों का मानसिक और आध्यात्मिक विकास विभिन्न गतियों से होता है।

उपरोक्त बातों के होते हुये भी सुखी वैवाहिक जीवन की कुछ मौलिक आवश्यकताएँ हैं और वे इस प्रकार हैं—वैवाहिक बन्धन में बँधने वाले दोनों साथियों में एक दूसरे के आत्म सम्मान की ठोस बुद्धि, मानसिक परिपक्वता, शारीरिक स्वास्थ्य, दृष्टिकोण में मनोवैज्ञानिक स्वतन्त्रता, प्रेमकला तथा लैंगिक ज्ञान, पारिवारिक उत्तरदायित्व की परिपक्व भावना, वस्तु स्थिति के अनुकूल आचरण करने की योग्यता, काल्पनिक आदर्श से मुक्ति, विस्तृत एवं उदार मानवीय प्रवृत्ति तथा सहयोग के आधार पर आगे बढ़ने, कष्ट उठाने और जीवन के सुख-दुःख में भाग लेने की क्षमता आदि। ये ही दिन-प्रतिदिन की वैवाहिक समस्याओं को सफलतापूर्वक सुलझाने के मूल मन्त्र हैं। अपने वैवाहिक साथी की परिस्थिति से पूर्ण आत्मीयता तथा उसे निरन्तर उत्साहित करते रहने की तत्परता, दाम्पत्य जीवन की साधारण बाधाओं को सहज ही में दूर कर देती है। साथ ही यदि दोनों समान रूप से शिक्षित हुए और दोनों की समाज के लिये उपयोगी काम धन्धों में भी समानता हुई, तो सोने में सुगन्ध आ जाती है। अन्त में थोड़ी बहुत आर्थिक स्वतन्त्रता और धार्मिक तथा सामाजिक साम्यता यदि उपलब्ध हो, तो वह वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने में बड़े ही सहायक होते हैं।

परन्तु बहुत कम ऐसे व्यक्ति हैं, जो उपरोक्त आदर्श साधनों के साथ विवाह सम्बन्ध में प्रवेश करते हैं। यही कारण है कि जीवन में हमें अनेक बेजोड़ गठबन्धन जैसे किसी निर्दयी पुरुष और अबला स्त्री में, किसी जबरदस्त मर्दानी औरत और स्त्रैणा पुरुष में, किसी स्वतन्त्र एवं साहसी पुरुष तथा कायर एवं मूर्ख स्त्री में, किसी स्वस्थ और मोटी स्त्री और सूखे हुये किताबी कीड़े पुरुष में किसी बालिका और वृद्ध में, किसी अशिक्षित तथा गंवार स्त्री और शिक्षित पुरुष में, किसी सुन्दर युवक और कुरूप स्त्री या सुन्दर स्त्री और कुरूप पुरुष में देखने को मिलते हैं।

अब यदि हम वैवाहिक असफलता के कारणों पर किंचित दृष्टिपात करें तो देखेंगे कि बेजोड़ विवाह न होने पर भी लैंगिक विज्ञान और प्रेमकला की अनभिज्ञता वैवाहिक असफलता का एक प्रधान कारण है। जीवन के आरम्भ से ही हमें चलने, बोलने, अभिवादन करने तथा कायदे से कपड़े पहनने आदि की शिक्षा दी जाती है हमारी पढ़ाई-लिखाई के साथ साथ हमें खेलने-कूदने, लोगों से मिलने-जुलने तथा अन्य सामाजिक शिष्टाचारों की शिक्षा दी जाती है। जीविकोपार्जन करके हम अपना निर्वाह कर सकें, इसके लिये कुछ उद्योगों की भी शिक्षा हमें दी जाती है, परन्तु शायद ही कोई ऐसा पुरुष या स्त्री हो, जिसे किसी कुशल शिक्षक द्वारा इस बात की शिक्षा दी गई हो कि एक सफल प्रेमी, आदर्श पति अथवा पत्नी कैसे बना जा सकता है।

हमारे आधुनिक जीवन का अभिशाप यह है कि अश्लील आख्यानों से भरे हुए उपन्यासों, कामोद्दीपक चित्रों और लेखों से पूर्ण समाचार पत्रों, तथा लम्पटतापूर्ण दृश्यों से भरे हुए नाटकों और चलचित्रों की प्रबल धारा में बहाकर हम अपने नौजवानों का दिमाग अनेक गलत धारणाओं से भर ही नहीं देते, वरन् उनकी स्वाभाविक एवं सामान्य काम-वृत्ति को बुरी तरह उत्तेजित और विकृत भी बना देते हैं। जहाँ एक तरफ हम अपने ही हाथों इतने विक्त वातावरण की सृष्टि करते हैं, वहाँ दूसरी तरफ लैंगिक-ज्ञान (सैक्स) के ऊपर एक गुप्त और अपवित्रता का झूठा पर्दा डालकर अपने बच्चों को जीवन की इस अमूल्य जानकारी से वंचित रखते हैं। जिस समय लड़की को यह विश्वास कराया जाता है कि उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य विवाह को सफल बनाना तथा एक सुन्दर घर बसाना है, कामवृत्ति और गर्भाधान आदि सम्बन्धी अत्यन्त उपयोगी जानकारी उससे छिपा कर रखी जाती है। वैवाहिक जीवन को सफल बनाने के लिए इस अज्ञान को दूर करना आवश्यक है। कुशल शिक्षक तथा डाक्टर और लेडी डाक्टर भावी दाम्पत्य के इस विषय की शिक्षा के लिए उपयुक्त व्यक्ति होंगे।

वैवाहिक नैराश्य का दूसरा प्रधान कारण स्त्री और पुरुष के बीच प्रभुता और शान के लिए प्रतिद्वन्द्विता है। इस प्रतिद्वन्द्विता को आज हम बड़े स्पष्ट रूप में विशेषकर शिक्षित दाम्पत्यों में देख सकते हैं। कुछ अंशों में हम इसे उस आन्दोलन की ही एक शाखा कह सकते हैं जो आधुनिक शिक्षित नारी आज के शक्तिशाली पुरुष की निरंकुशता के विरुद्ध चला रही है। व्यक्तिवादी समाज के व्यापारिक कार्यों में एक जीवनदायिनी शक्ति के रूप में प्रतिद्वन्द्विता को चाहे हम जो भी महत्त्व दें, परन्तु प्रेम और वैवाहिक जीवन के लिए तो प्रतिद्वन्द्विता मृत्यु के समान है अथवा वह छिपी हुई चट्टान है, जिससे टकराकर अनेक विवाह विचूर्ण हो चुके हैं।

लोग इसे एक मनोवैज्ञानिक आदेश की भाँति ग्रहण करें कि जिस भी व्यक्ति ने अपने स्त्री या पुरुष साथी पर प्रभुत्व जमाना चाहा या उसकी निन्दा की तथा उसके आत्म सम्मान को ठोस पहुँचाई, उसने सदा के लिए अपने वैवाहिक आनन्द पर कुठाराघात कर लिया।

वैवाहिक नैराश्य का तीसरा प्रधान कारण काल्पनिक आदर्शवाद है। वह लड़की जो अपने को स्वर्ग की परी समझकर आशा करती है कि सारी दुनिया उसके ऊपर निछावर होगी तथा वह लड़का जो अपने को एक विशिष्ट व्यक्ति और सुन्दर सलोना युवक मानकर प्रत्येक नारी की आराधना को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है और जिसे जीवन संगिनी बनाने के लिए जल्दी कोई लड़की ही पसन्द नहीं आती, शायद ही कल्पना के इस माया जाल से निकल कर धरती पर पाँव रख सको, इनका उपचार तो तभी हो सकता है, जब एक नये सिरे से इनका मनोवैज्ञानिक कायाकल्प किया जाय, अन्यथा ऐसे लोगों का वैवाहिक जीवन बड़ा ही दुःखद होता है।

वास्तव में लोगों का वैवाहिक जीवन अधिक सफल होता यदि दाम्पत्य बाह्य आकर्षण और सुन्दरता पर आधारित प्रेम की बात कम सोचते तथा अपनी आर्थिक परिस्थिति, सन्तान पालन के सिद्धान्त, खाली समय का पारस्परिक सदुपयोग, एक दूसरे की भावनाओं का समुचित ध्यान, साथ मिलकर जिम्मेदारी उठाने की योग्यता आदि आवश्यक विषयों पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर अपनी जीवन नौका को कुशलता के साथ खेते। कितनी विचित्र बात है कि यदि कोई आदमी किसी व्यापार या साझेदारी में केवल इसलिए शामिल होने को लालायित हो उठता है कि उस व्यवसाय विशेष के दफ्तर की कुर्सी और मेज उसे बहुत पसंद है तो लोग उसे बेवकूफ बनाते हैं, परन्तु यदि वही आदमी एक लड़की से केवल इसलिये शादी करले कि वह देखने में सुन्दर है, नाच अच्छा करती है तथा पार्टियों में जाने की शौकीन है तो उसके मित्र उसे बधाई देते नहीं थकते। ऐसे गुणों तथा बाह्य सुंदरता और आकर्षण पर आधारित प्रेम बिल्कुल अस्थाई रहता है। अवस्था के साथ-2 यौवन ढलने पर ऐसा प्रेम प्रायः हवा हो जाता है। प्रेम का सच्चा बंधन ता आन्तरिक सुन्दरता पर अवलम्बित है। प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई गुण अवश्य होता है। दाम्पत्य को एक दूसरे की आन्तरिक सुन्दरता और विशिष्ट गुणों की खोज कर प्रेम पूर्वक जीवन निर्वाह करना चाहिए। हाँ विवाह बंधन में फंसने के पूर्व इस बात का ध्यान रहे कि स्त्री और पुरुष दोनों में प्रत्येक दृष्टिकोण से अधिक से अधिक साम्य रहे। शुरू की जरा-सी भी जल्दबाजी और असावधानी सारे वैवाहिक जीवन को दुःखद बना सकती है।

अन्त में यह बात ध्यान रखना आवश्यक है कि विवाहित जीवन को सुखमय बनाने का सबसे सुन्दर नियम वास्तव में यह है कि विवाह करने के पहले अपने साथी को भली भाँति समझ लीजिये तथा विवाह के बाद उसे वही समझिये जो वह वास्तव में है और आदर्श कल्पना को त्याग कर उसी का सन्तोष पूर्वक प्रसन्नता के साथ उत्तम से उत्तम उपयोग कीजिये।

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