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Magazine - Year 1956 - Version 2

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वासनाओं को जीतिए

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(श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज)

स्त्री की प्रतिमूर्ति अथवा स्मरण मन को क्षुब्ध करता है। कामवासना शक्तिशाली होती है। यह एक कुसुम-धनुष साथ लेकर चलती है जिसमें मोहन, स्तम्भन, उन्मादन, शोषण और तपन रूपी पाँच बाण सजे होते हैं। विवेक, विचार, भक्ति और ध्यान इस घोर राग का मूलोच्छेद करते हैं। यदि काम पर विजय प्राप्त हुई तो क्रोध, लोभ आदि जो उसके शस्त्र हैं,आप ही कुंठित हो जायेंगे। राग का प्रधान अस्त्र रमणी है। यदि इसे मन से नष्ट किया गया तो इसके अनुवर्ती और परिजन बड़ी आसानी से जीते जायेंगे। यदि सेनापति मारा गया तो सैनिकों को मार डालना आसान हो जायेगा। वासना पर विजय प्राप्त करो। फिर क्रोध को जीत लेना आसान हो जायगा, केवल क्रोध ही वासना का अनुवर्ता है।

सैनिक जैसे ही दुर्ग से बाहर निकलें, उन्हें एक-एक करके मार डालो। अन्त में तुम्हारा दुर्ग पर आधिपत्य हो जायगा। इसी प्रकार प्रत्येक संकल्प को जो मन में उठे, एक-एक करके नष्ट कर दो। अन्त में तुम्हारा मन पर अधिकार हो जायगा।

विचार, शाँति, ध्यान और क्षमा के द्वारा क्रोध पर विजय प्राप्त करो। जो मनुष्य तुम्हारी हानि करता हो उसके ऊपर दया करो और उसे क्षमा कर दो। उलाहने को प्रसाद समझो, उसे आभूषण जानो तथा अमृततुल्य मानो। भर्त्सना को सह लो। सेवा, दया और ब्रह्मभावना के द्वारा विश्वप्रेम का विकास करो। जब क्रोध पर विजय प्राप्त हो जायगी तो धृष्टता, अहंकार और द्वेष स्वयं ही नष्ट हो जायेंगे। प्रार्थना और भजन से भी क्रोध दूर हो जाता है।

सन्तोष, अभेद, विराग तथा दान के द्वारा लोभ का शमन करो। अभिलाषाओं को मत बढ़ाओ। तुम्हें कभी निराश न होना पड़ेगा। सन्तोष मोक्ष के राज्य के चार सन्तरियों में से एक है। इन चार सन्तरियों की सहायता से तुम ब्रह्म ज्ञान, जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हो।

अनुराग के पीछे-पीछे शोक और दुःख भी लगे रहते हैं। अनुराग शोक से मिश्रित होता है। सुख के पीछे दुःख चलता है; जहाँ सुख है वहाँ दुःख भी है। अनुराग के नाम पर मनुष्य दुःख का विषमय बीज वपन करता है, जिससे शीघ्र ही स्नेह के अंकुर निकल जाते हैं, जिसमें बिजली के समान भयानक दाहकता होती है और इन अंकुरों से अनेक शाखाओं से युक्त दुःख का वृक्ष उत्पन्न होता है, जो ढके हुए घास के ढेर के समान जलते हुए, धीरे-धीरे शरीर को दग्धकर डालता है। बराबर इस संसार की असारता पर विचार करो। राग से मोह उत्पन्न होता है। यह सभी जानते हैं कि जब किसी मनुष्य की पालतू चिड़िया को बिल्ली खा जाती है तो उसे दुःख होता है, परन्तु यदि बिल्ली किसी दूसरे गौरैया या चूहे को खाती है, जिससे उसे कुछ सम्बन्ध नहीं होता, तो वह कुछ भी दुःख नहीं प्रकट करता। अतः तुमको उस अनुराग का मूलोच्छेद करना चाहिए जो व्यर्थ की आसक्ति का कारण होता है। शरीर असंख्यों कीटाणुओं को उत्पन्न करता है, जिसे दूर करने के लिये लोग आतुर होते हैं। परन्तु एक को वह बच्चे के नाम से पुकारते हैं जिसके लिये उनका जीवन क्षीण होता है साँसारिक मोह इस प्रकार का होता है। अनुराग की गाँठ उस महामोह से दृढ़ होती है जो मनुष्य के हृदय को चारों ओर से सूत्र के समान ग्रथित किये हुए हैं। अनुराग से छुटकारा पाने का प्रधान उपाय है यह चिन्तन करना कि यह संसार एक असार वस्तु है। इस महान् जगत् में असंख्य पिता, माता, पति, स्त्री, बच्चे तथा पितामह चले गये हैं। तुम्हें अपनी मित्र-मण्डली का विद्युत की क्षणिक छटा के समान समझना चाहिए और इसका अपने मन में पुनः पुनः चिन्तन करते हुए शान्ति प्राप्त करनी चाहिए।

मन को शून्य कर दो। शोक के महान् आघातों से बचने का यह एकमात्र उपाय है। संकल्प को दबा देना कठिन है। और जब वह एक बार दबा दिया जाता है तो संकल्पों की एक नवीन शृंखला उत्पन्न होती है जो मन को आक्राँत कर देती है। किसी स्थिर वस्तु के ऊपर चित्त को जमाओ। तुम मन को रोकने में सफल होगे। आत्मा में संकल्पों को एकत्र करो, जिस प्रकार ग्रीष्म में मनुष्य पोखरे के शीतल जल में जाकर अपने शरीर को ठण्डा करता है। हरि का सतत् ध्यान करो, जो श्याम रंग के हैं तथा जो गले में बहुमूल्य हार धारण करते हैं, एवं भुजाओं, कानों और सिर को आभूषणों से अलंकृत किये हुए हैं।

जब विषय तुम्हें व्यथित करें, सम्मोहित करें, तब विचार विवेक और सात्विक बुद्धि का सदा प्रयोग करो इन्द्रियों को भ्रमित करने वाला अहंकार जो मन को आच्छादित करता है, जब विवेक द्वारा नष्ट हो जाता है तो मृगमरीचिका के जल के समान वह अन्य भ्रान्ति जनक पदार्थों में आ जाता है। बारम्बार विवेक का आश्रय लो जब तक ज्ञान में तुम्हारी स्थिति न हो जाय वस्तुतः अविद्या की शक्ति महान् है।

जब तुम्हारे संकल्प जो बिखरे हुए हैं, एकत्रित किये जायेंगे और तुम शाँत अवस्था में आओगे तो शाश्वत आनन्दमय आत्मा चमक उठेगा, जैसे सूर्य स्वच्छ जल के ऊपर चमकता है दीख पड़ता है। शान्ति धन, दार या भोग में नहीं रहती। जब मन संकल्पहीन और कामनाहीन हो जाता है तो आत्मा चमक उठती है और शाश्वत आनन्द और शान्ति की वर्षा करता है। फिर तुम बाहरी विषयों में व्यर्थ ही सुख के लिये क्यों भटक रहे हो? अन्दर खोजो, अपने आनन्द के लिये अपने भीतर सत् चित्-आनन्द में अमृत आत्मा में ढूंढ़ो।

जब तुम्हारी दाहिनी बाँह पर एक चींटी चलती रहती है तब तुम्हारी बायीं बाँह अनायास ही उस ओर चींटी के हटाने के लिए मुड़ जाती है। मन उसमें तक नहीं करता। जब कभी तुम अपने पैरों के सामने बिच्छू को देखते हो तो अनायास ही अपने पैरों को हटा लेते हो। इसे स्वाभाविक क्रिया के नाम से पुकारते हैं सड़क पार करते समय किस प्रकार स्वभावतः मोटर से बचने के लिये तुम अपने शरीर को घुमाते हो।

ज्ञान के चार स्रोत होते हैं- स्वाभाविक ज्ञान, अन्तर्ज्ञान और ब्रह्मज्ञान स्वाभाविक ज्ञान पशु-पक्षियों में पाया जाता है पक्षियों में अहंकार स्वतन्त्र दैवी प्रवाह तथा दैवी क्रीड़ा में बाधक नहीं होता। अतः स्वभावतः जो काम पक्षियों द्वारा होता है वह मानव-जीवन की अपेक्षा कहीं अधिक पूर्ण होता है। क्या तुम अद्भुत घोंसले की रचना में पक्षियों के कौशल का नमूना नहीं पाते हो? तार्किक ज्ञान स्वाभाविक ज्ञान से श्रेष्ठ है और वह मनुष्यों में पाया जाता है। यह तथ्य संकल्प करता है, उसका विशदीकरण करता है कारण से कार्य और कार्य से कारण की तर्कना करता है। अनुमापक वाक्यों से परिणाम निकलता है और साध्य से प्रमाण की ओर अग्रसर होता है। यह परिणाम निकलता है, निर्णय करता है और परामर्श प्रदान करता है। यह तुम्हें सावधानी से अन्तःकरण के समीप पहुँचाता है। अन्तर्ज्ञान में तर्क की कुछ आवश्यकता नहीं होती। वहाँ तो वस्तु का प्रयत्न होता है। एक चमक में तुम्हें वस्तु ज्ञान हो जाता है। अन्तर्ज्ञान तर्क से बढ़कर है परन्तु उसकी अपेक्षा नहीं करता। कारण-शरीर की क्रियाओं के द्वारा जो ज्ञान होता है वह आत्मज्ञान है। आत्मज्ञान अंतर्ज्ञान के परे है। यह कारण शरीर का अतिक्रमण करता है। यह ज्ञान की परमावस्था है। यही केवल सत्य है।

ज्ञान के सात क्षेत्र हैं—प्रभाव, प्रत्यक्ष, अंतर्दृष्टि, अंतर्ज्ञान, तप, दिव्य, ज्ञान और परमानन्द-अवस्था।

मन संकल्पात्मक चित्रों के द्वारा सूक्ष्मता को ग्रहण करने की चेष्टा करता है। मन के शुद्ध होने पर शुद्ध मन में उपनिषदों के श्रवण और मनन के द्वारा एक सूक्ष्म चित्र निर्मित होता है। यह सूक्ष्म चित्र गम्भीर निदिध्यासन में पीछे घुल-मिल जाता है। जो कुछ तब रह जाता है वह है चिन्मात्रा अथवा केवल अस्ति।

मनुष्य-समाज में अधिकाँश कुछ मूर्त पदार्थ अपने अवलंब के लिये चाहते हैं, वे कुछ ऐसा पदार्थ चाहते हैं जिसके चतुर्दिक् अपनी भावनाओं को रख सकें, जो उसके मन में सारे संकल्पात्मक चित्रों का केन्द्र बन सके। मन के अवलम्ब के लिए एक मूर्त वस्तु की आवश्यकता है, यह उसका स्वभाव है। अतः मन को जमाने के लिये संकल्प को एक पृष्ठभूमि की आवश्यकता है।

बाह्य वस्तुओं से उत्पन्न सुख क्षणिक, परिवर्तनशील और निःसार है, वह केवल तन्तुओं को उत्तेजित करने वाला और मानसिक सुख है। शरीर शोक और रोग का निवास-स्थान है। धन की प्राप्ति और उसकी रक्षा में भाँति-भाँति की विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। प्रत्येक संपर्क से दुःख उद्भूत होता है। स्त्री दुःख का एक नियत कारण है। शोक है कि मनुष्य इस प्रकार के कष्टों को उस कष्ट की अपेक्षा जो आत्मिक सुख प्रदान करता है विशेष रूप से ग्रहण करते हैं। आत्मज्ञान सम्बन्धी पुस्तकों का अवलोकन करो। सदा सत्संग करो। भावपूर्ण होकर ‘ओम्’ का प्रतिदिन 21600 जाप करो इसमें बहुत थोड़ा समय लगेगा। आत्मा या श्री कृष्ण का ध्यान करो, ब्रह्मानुभव करो। केवल इसी से तुम्हें सारे सांसारिक दुःखों से छुटकारा मिलेगा और तुम्हें शाश्वत शाँति ज्ञान और आनन्द की प्राप्ति होगी।

तुम्हारे मन में भाँति-भाँति के दूषित निश्चय, भद्दे अन्धविश्वास जड़ जमाये हुये हैं, वे हानिकारक हैं। तुम्हें उनकी उन्नत विचार शुद्ध निश्चयों-संकल्पों के द्वारा नष्ट करना होगा। ‘मैं शरीर हूँ’ ‘मैं अमुक पुरुष हूँ’ ‘मैं ब्राह्मण हूँ’ ‘मैं धनी हूँ’ यह सब निश्चय, संस्कार दूषित हैं। अपने मन में साहसपूर्वक निश्चय करले। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ‘अहं ब्रह्मास्मि’। सतत् प्रयत्न के द्वारा ‘मैं शरीर हूँ’ इसी प्रकार के दूषित निश्चय और संस्कार धीरे-धीरे नष्ट हो जायेंगे।

बीज में सारा वृक्ष अपनी शाखाओं पत्तियों और फलों के साथ सूक्ष्म रूप में अवस्थित रहता है। इनके प्रकट होने में समय लगता है। इसी प्रकार कामवासना बचपन से ही मन में लुका-छिपा करती है, अठारह वर्ष की उम्र में प्रकट होती है, पच्चीस वर्ष की अवस्था में सारे शरीर में व्याप्त हो जाती है, पच्चीस से पैंतालीस वर्ष की अवस्था तक बनी रहती है और तब गिरने लगती है। इस बीच में भाँति-भाँति के दुष्कर्म और पाप मनुष्य जीवन में होते हैं। लड़के और लड़की के आचार में कोई विशेष भेद नहीं पाया जाता है, जब तक वह यौवन में रहते हैं। युवावस्था को प्राप्त होने पर वे अपने आचारानुकूल कर्मों को करने लगते हैं।

तृष्णा ही जन्म लेने का प्रधान कारण है, इसी तृष्णा से संकल्प और कर्म उत्पन्न होते हैं। तृष्णा के द्वारा ही संसार चक्र गतिशील रखा जाता है। प्रारम्भ में ही उसे नष्ट कर दो तभी तुम्हारा कुशल है, तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। ब्रह्मभावना, ब्रह्मचिन्तन, ॐ का ध्यान और भक्ति तृष्णा की जमी हुई जड़ को उखाड़ फेंकेगी। तुम्हें उनको जड़ मूल से उखाड़ कर दग्ध कर देना होगा जिससे उनका पुनरुज्जीवन न हो सके। तभी तुम्हें अपने प्रयत्न से निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति होगी।

सुख और दुःख के कारण धर्म और अधर्म है। वे दोष कर के भाव हैं जो केवल मन से सम्बन्ध रखते हैं। आत्मा का वास्तविक स्वभाव है मन और शरीर से छुटकारा पाना। और जहाँ धर्म और अधर्म की सम्भावना नहीं होती वहाँ इनका प्रभाव भी कुछ नहीं पड़ता। अतः सुख और दुःख आत्मा को स्पर्श नहीं करते हैं। आत्मा असंग असक्त और निर्लिप्त है। वह मन में उत्पन्न होने वाले दोनों प्रकार के गुणों का धर्म और अधर्म का साक्षी है। मन सुख भोगता है, मन दुःख उठाता है। सुख और दुःख उपाधि धर्म हैं, चिन्दूर्सडडडड हैं आत्मा चुपचाप देखता है; सुख-दुःख से इसे कोई बस्तडडडड नहीं।

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