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Magazine - Year 1956 - Version 2

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अन्तर की अखण्ड ज्योति

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(श्री महावीरजी ‘सन्त सेवी’)

आधुनिक वैज्ञानिकों ने वर्तमान युग में भाँति-भाँति के प्रकाशों का आविष्कार कर जगत के समक्ष रखा है। साधारणतया सभी जन नित्य प्रति दीपक, तारे, विद्युत तथा चन्द्र-सूर्यादि की विविध ज्योतियों का अवलोकन भी करते ही हैं। किन्तु इन्हें अखंड-ज्योति कदापि नहीं कह सकते, ये सभी खण्ड ज्योतियाँ हैं, क्योंकि यह प्रत्यक्ष प्रदर्शित हैं। तेलबत्ती के जल जाने से प्रदीप बुझ जाता है और उसका प्रकाश भी मिट जाता है। तारे की टिमटिमी और विद्युत की चापल्यता से कौन अनभिज्ञ है? शशि और सूर्य नित्य प्रति उदय और अस्त होते हैं, इनकी ज्योति को भी लोग अखण्ड रूप में नहीं देखते। सहज यह प्रश्न उदय होता है कि अखण्ड ज्योति क्या है, कहाँ है और इसकी अनुभूति कैसे हो सकती है?

अखण्ड ज्योति उस महान ज्योति या प्रकाश पुञ्ज को कहते हैं जो सतत् अव्याहत, अप्रतिहत, अविच्छिन्न, एक सर और स्थिर हो। वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत प्रकाश या परमात्मा प्रदत्त प्राकृतिक किसी भी नक्षत्र, रवि या शशि प्रभृति के प्रकाश में ये गुण प्रदर्शित नहीं होते। वर्णित गुणमय अखण्ड ज्योति बाह्य जगत के स्थूलाकाश में नहीं, अपितु अंतर्जगत के सुक्ष्माकाश में अवश्य अवस्थित है।

हृदाकाशे चिदादित्यः सदा भासति भासति। नास्तमेतिन चोदेति कथं सन्ध्या मुपास्महे’।

मैवेय्युपनिषद्।

अतएव वाह्य जगत में इसकी खोज सर्वथा भ्रम परिपूर्ण है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने हनुमान जी को इस अखण्ड ज्योति की शिक्षा देते समय स्पष्ट कहा था कि-व्यर्थ ही बहुत से शास्त्रों की कथाओं के मन्थन से क्या फल? हो वायु सुत! अत्यन्त यत्नवान् होकर अपने अन्तर की ज्योति का अन्वेषण कर।

‘बहु शास्त्र कथा कन्थारों मन्थेन वृथैवकिम्! अन्वष्टव्यं प्रयत्नेन मारुते ज्योतिरान्तरम्॥

मुक्ति को पनिषद् डडडड

द्वापर युग के अन्त में—’महायोगेश्वरो हरि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता अ. 8 श्लोक 9 में—

कविपुराणमनुशासितारमणोरणोरणीयाँसमनुस्मरेःद्यसर्वस्ट धातारज चिन्त्य रुपमा दित्य वर्ण तमसः परस्तात्’।

कहकर ‘अन्धकार के पार में सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति है, इसकी शिक्षा दी थी वणित सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति की उपमा के भ्रमवश वाह्य जगत के स्थूलाकाश स्थित सूर्य-प्रकाश के समान ही उस अखण्ड ज्योति को नहीं समझना चाहिये। उस अखण्ड ज्योति का पटतर बाह्य संसार के करोड़ों सूर्य से भी नहीं दिया जा सकता। इस उपमा को तो जिमि कोटिशत खद्योत सम रवि कहत अति लघुता लहैं, की भाँति ही जानना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया तो उसका वर्णन करते हुए संजय ने धृतराष्ट्र से कहा था—

‘दिवि सूर्य सहस्रस्यभवेद्यु गपदुत्थिता। यदि भाः सदृशीसास्या द्भासस्तस्य महात्यनः’॥

गीता अ. 11 श्लोक 12॥

अर्थात्- आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश हो सकता है, वह भी उस महान तेज के सदृश कदाचित ही होगा।

अन्तः प्रकाश का वर्णन कलियुग के आदि संत भगवान बुद्ध ने ‘धम्म पद’ में इस भाँति किया—‘अन्धकारेन ओनद्धा पदीपंन गबेस्सथ”। अर्थात्- अन्धकार से घिरे तुम प्रदीप की खोज क्यों नहीं करते।

जिस प्रदीप की चर्चा यहाँ की गई है, वह लौकिक नहीं, अलौकिक है। साधक दृष्टियोग क्रिया द्वारा अन्धकार का भेदन करके ज्योति स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करता है। इसी के लिये ऋषियों ने ईश्वर से प्रार्थना की था। ‘असतोमा सद्गमय। तमसोमाज्योतिर्गमय। मृत्योमाऽमृतंगमयेति’। अर्थात्—असत् से सत् की ओर अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर ले चल। अन्धकार में रहना असत् और मृत्यु की ओर रहना है तथा प्रकाश की ओर जाना सत्य और अमृतत्व को प्राप्त करना है।

योगाभ्यासी साधक बहिर्मुख से उलटकर जब अन्तर्मुख होता है, तब उसे इस प्रदीप-शिखा की ज्योति-प्रदर्शित होती है। एक बंगाली साधक ने भी कहा है—‘निवात निष्कम दीपेरमतन योगीगनध्याऐं करे दरशन’। और जब साधक की वृति वहाँ से और अग्रसर होती है तब उसे उस प्रकाशपुञ्ज—अखण्ड ज्योति की भी प्रत्यक्षानुभूति होती है। संत गुलाल साहब ने कहा है—

‘उलटि देखो घट में ज्योति पसार’। ‘नैंनहु आगे देखिये, आतम अन्तर सोय। तेजपुञ्ज सब भरि रह्या, झिलमिल झिलमिल होय’।

॥ संत दाऊदयाल जी ॥

और संत कबीर साहब ने भी कहा है—

उलटि समाना आप में, प्रगटि ज्योति अनन्त।

यही अनन्त ज्योति ‘अखण्ड ज्योति है’। किन्तु स्मरण रहे कि इसका दर्शन गुरु कृपापात्र जन ही करने में समर्थ हो सकते हैं। जिसका सर्वस्व धन ‘गुरु कृपा हि केवलम्’ है। उपनिषद् में भी आया है—

‘दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्व दर्शनम्। दुर्लभा सहजावस्थाः सद्गुरोः करुणां बिना॥

॥ महोपनिषद् ॥

उक्त बंगाली साधक ने भी कहा है—

‘ज्ञानचक्षु उन्मिलने गुरु जे दिन कृपा करे सेदिन ताँरे नयन हेरेभासे शान्ति सुख नीरे’॥

जिनको इसकी अनुभूति होती है उन्हें अन्य किन्हीं की साक्षी या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती और न किसी बात की आशंका ही रहती है। वे गुरु नानक देव की भाँति ही निःशंक और स्पष्टवादी हो जाते हैं- ‘अन्तरि ज्योतिभई गुरु साखी चीने रामकरंमा’। यही अन्तर ज्योति अखण्ड ज्योति है।

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