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Magazine - Year 1956 - Version 2

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बालकों के साथ बड़े कैसा व्यवहार करें

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[आचार्य हरभाई त्रिवेदी]

मनुष्य-मात्र आनन्द प्राप्त करना चाहता है। हर एक मनुष्य की भरसक यह कोशिश होती है कि उसे आनन्द प्राप्त हो। मनुष्य के अनेक-विधि आनन्दों में उसका बालक भी उसके अपने परम आनन्द का साधन होता है। जिसके घर में बालक नहीं, उसके घर में आनन्द नहीं। आनन्द का ऐसा यथेच्छ उपयोग करने के लिए मनुष्य आकाश-पाताल एक रहता है। हमारे समाज में भी बाँझपन अपशकुन और अभाग्य का कारण माना जाता है। बाँझपन का कलंक टालने के लिए स्त्री-पुरुष अपने बस भर कोई बात उठा नहीं रखते। घर में पालना बँध जाने से जो आनन्द प्राप्त हो सकता है, उसकी तुलना दूसरे किसी आनन्द से नहीं की जा सकती है। यह आनन्द देह और देही दोनों का है। इस परम आनन्द ने ही संसार की सततता को बनाये रक्खा है और मनुष्य की शुभ वृत्तियों को हमेशा ऊपर चढ़ाया हैं—ऊर्ध्वगामी बनाया है। बालक मनुष्य के आनन्द का जनक है।

जब ऐसे आध्यात्मिक आनन्द का देने वाला कोई पात्र परिवार में जन्म लेता है तो वह न केवल अपने माता-पिता के, बल्कि सब किसी के आनन्द का साधन बन जाता है। उसे देखकर सब आनन्द मग्न हो जाते हैं, उसे गोद में लेकर सब कोई तृप्ति का अनुभव करते हैं। उसके कारण सारा परिवार आनन्द से परिप्लावित रहता है। बालक के आनन्द में माता-पिता का सच्चा आनन्द समाया हुआ है। जब बालक का आनन्द लुप्त होता है, तो माता-पिता का आनन्द भी बिला जाता है। बालक समूचे कुटुम्ब के आनन्द का केन्द्र बन जाता है। कुटुम्ब के परिचित लोग भी बालक को देखकर खुश होते हैं और एक प्रकार के गहरे आनन्द का अनुभव करते हैं।

किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वैसे-वैसे इस आनन्द की कक्षा और इसका प्रवाह बदलता रहता है। सब किसी के आनन्द का कारण बनने वाला बालक धीरे-धीरे सबके आनन्द का स्थूल और स्वार्थी साधन बनने लगता है। माता-पिता और बड़े-बूढ़े समझते नहीं कि बालक का भी अपना आनन्द होता है। जन्म के बाद तुरंत ही जो बालक अपनी रक्षा और अपने पोषण की अपेक्षा रखता है और अपने ढंग से अपना विकास करने लगता है, वह धीरे-धीरे समझदार और सशक्त भी बनता जाता है। बालक के अपने कामों से माता-पिता को जो आनन्द मिलता है उससे बालक को भी खुशी होती है, घर के बड़े-बूढ़ों द्वारा जो काम या आयोजन बच्चों के लिए, बच्चों के आनन्द का पोषण करने की दृष्टि से किए जाते हैं, उनसे उन्हें हमेशा आनन्द मिलता ही है, यह सोचना ठीक नहीं। जब बालक अपने आनन्द में लीन होते हैं, तब माता-पिता और घर के बड़े उनसे यह अपेक्षा रखते हैं कि वे अपने किसी व्यवहार या कार्य द्वारा उन्हें आनंद पहुंचाये। बालक के आनन्द से आनन्दित होने वाले बड़े-बूढ़े अब दूसरी दृष्टि से सोचने लगते हैं। उनके मन में यह विचार प्रमुख बनने लगता है कि बालक भी उन्हें आनन्द पहुँचाने का यत्न करे। जब कोई छोटा बालक अपने खेल में डूबा और उसमें पूरा रस ले रहा होता है, तभी माता-पिता और बड़े-बूढ़े यह चाहते है कि बालक अपना खेल छोड़कर उनके पास आये और उनका मनोरंजन करे। जो माता-पिता और बड़े-बूढ़े बच्चे के साथ खेलकर और उसे अपने मन-बहलाव का साधन बनाकर खुश होना चाहते हैं, वे बच्चे के भय और उसकी अरुचि या उकताहट की परवाह नहीं करते और जब बालक माता-पिता के ऐसे किसी व्यवहार का विरोध करता है तो उन्हें यह पसन्द नहीं आता और बालक की खीझ या चिढ़ की परवाह किये बिना वे अपने आनन्द-उत्सव में मग्न रहते हैं। एक समय था जब बच्चों का और बड़ों का आनन्द अभिन्न था। धीरे-धीरे ऐसा समय भी आता है, जब कभी तो उनका आनन्द अभिन्न होता है और कभी भिन्न भी। यदि ऐसी परिस्थिति में ध्यानपूर्वक और ज्ञानपूर्वक बालक को समझाने की कोशिश न की जाय तो फिर भी एक समय आ जाता है, जब बालक के और बड़ों के आनन्द-क्षेम और आनन्द-कार्य बिलकुल ही भिन्न बन जाते हैं और आनंद-विषयक दोनों की व्याख्याएं बदल जाती है।

हममें से हर एक को यह समझना चाहिये कि छोटा बच्चा एक प्राणवान प्राणी है और उसका अपना एक स्वतन्त्र व्यक्तित्व भी है। ज्यों−ज्यों व्यक्तित्व का विकास होता जाता है, त्यों-त्यों वह अपनी प्रतिभा अनेक प्रकार से प्रकट करता जाता है। ऐसे बालक को उच्च कोटि का आनंद रुचता है और ऐसे आनंद की प्राप्ति के लिए वह उच्च कोटि के कार्य भी पसंद करता है। चूँकि समाज को बालक के चित्त की धाराओं का कोई व्यवस्थित ज्ञान नहीं होता, इसलिए बालक से बड़े प्रायः सभी उसके बारे में गलत ख्याल बना लेते हैं, और यों बालक के साथ अन्याय करते हैं। जिस तरह बड़ी उम्र के लोगों को आनंद रुचता है, और अपनी रुचि का आनंददायी काम अच्छा लगता है, उसी प्रकार बालक भी आनंद-प्रिय है, और उसे भी रुचिकर व आनन्द प्रेरित काम अच्छे लगते हैं। चूँकि हम इस सचाई की तरफ ध्यान नहीं देते, इसलिए अक्सर बच्चों के आनंद-विनोद में और उनकी रुचि के कामों में बड़ेपन के बल पर बाधा डाला करते। जब बालक खेलना-कूदना चाहता है, तो हम उसे चुपचाप बैठने को कहते हैं। जब बालक कुछ करना धरना चाहता है, तो हम उसके उत्साह पर ठण्डा पानी डाल देते हैं। इस प्रकार हम बड़े-बूढ़े, बालकों को रुचिकर लगने वाले हर तरह के आनंददायक कार्यों का जाने-अनजाने विरोध करने लगते हैं। बालक समझ नहीं पाते कि क्यों घर के बड़े-बूढ़े उनके आनंद में बाधक बनते हैं। फलतः वे अपनी शक्ति के अनुसार अपना विरोध प्रदर्शित करते रहते हैं। दुर्भाग्यवश घर के बड़े इस विरोध का उल्टा अर्थ लेते हैं और अपने ढंग से जीने की कोशिश करने वाले को शरारती और जिद्दी समझकर उसके साथ दूसरी तरह का बर्ताव करने लगते हैं। यों, बच्चों और बड़ों के बीच इस तरह की गलतफहमियाँ जिस प्रमाण में बढ़ती हैं, उसी प्रमाण में बालक का आनंद लुटता जाता है और परिवार के आनंद में कमी होती जाती है। फलतः माता-पिता को समूचे परिवार को आनंद प्रदान करने वाला बालक अप्रिय बनने लगता है और सबका आपसी आनंद दुःख और कलह में बदल जाता है। यह सब इसलिए होता है कि माँ-बाप और घर के बड़े-बूढ़ों का बालक के बारे में सही ज्ञान नहीं होता। यदि हम यह समझ जायं कि बालक के आनन्द में सारी दुनिया का आनन्द है और यह समझ कर बालक को आनन्द मग्न रहने दें, तथा उसके आनन्द से स्वयं आनन्दी बने, तो आज की दुखी दुनिया का काया-पलट हो जाय, और वह सुखी बन जाय।

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