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Magazine - Year 1956 - Version 2

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उन्नति पुरुषार्थ पर अवलम्बित है।

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(श्री ल. ना. बृहस्पति )

पौरुधेणा दुरन्तेभ्यः संकटभ्यः सुबुध्यः। समुत्तरन्त्यत्नेन नतु मोथतयाऽनया।।

पुरुषार्थ के प्रताप से ही बुद्धिमान् लोग बड़े-बड़े संकटों में से शीघ्र छूटकर निकल गये हैं, परन्तु हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वालों को कुछ भी नहीं मिलता।

पुरुषार्थी सबसे पहले अपने अन्तःकरण के चार प्रधान दोषों को निकाल बाहर करता है-

1— मन में सत्य अथवा स्थिर तत्व का योग कर दुर्बलता के कारणभूत चञ्चलता रूपी दोष को निकाल बाहर करता है।

2— चित्त में सत् सम्बन्ध तथा सत् चिन्तन करते हुए मलिनता-खिन्नता रूपी दोष को भगा देता है।

3— ज्ञानी, सन्त-पुरुष, सद्गुण का संग कर बुद्धि के अज्ञान रूपी-मूढ़ता रूपी दोष को दूर कर देता है।

4— श्रद्धा, शरणागति व सर्वस्व अर्पण की भावना रूपी गंगा में स्नान कर अपने अहं में रहने वाले देहादिक-पदार्थों का ममता रूपी दोष जो अशक्ति और जड़ता का कारण है, वह निकाल बाहर करता है।

इस प्रकार वह अपने दोषों को दूर कर दुःखों का अन्त कर देता है। तब उसका अपनी आत्मा के साथ समागम होता है—

सर्वशक्तिमयो ह्यात्मा यद्यथाभाव यत्यलम्। तत्तथा पश्यति तदा स्वसंकल्पविजम्भितम्॥

(योगवा.)

आत्मा सर्वशक्तियों से युक्त है, वह जिस शक्ति की जहाँ भावना करता है, वहीं पर उसे अपने संकल्प द्वारा प्रकट देखता है।

तब उसके लिए असम्भव नाम की कोई वस्तु शेष नहीं रह जाती। सफलता-महारानी सर्वत्र उसका स्वागत करने के लिए सदा तत्पर रहती है।

ये शूरा ये च विक्रान्ता ये प्राज्ञा ये च पण्डिताः। तैस्तैः किमिव लोकेऽस्मिन वद दैवं प्रतोक्ष्यते॥ तस्मात्पौरुषमाश्रित्य सूच्छास्रेः सत्समागमैः॥ प्रज्ञाममलताँ नीत्वा ससार जलधिं तरेत्॥

जो लोग शूर हैं, उन्नति करने वाले हैं, ज्ञानी हैं, पण्डित हैं, बताइये! उनमें से कौन इस संसार में भाग्य की प्रतीक्षा करता है? इसलिए शास्त्रों और सद्गुरु के सत्संग से युक्त पुरुषर्थ का आश्रय लेकर बुद्धि का निर्मल करके संसार-सागर को पार कीजिये।

यह स्पष्टतया समझ लीजिए कि यह समय ही आपका है, इसलिए इसे कभी निरर्थक खोने की भूल न कीजिए! इस समय रूपी जीवन के द्वारा ही ऐसी स्थिति प्राप्त कीजिए जहाँ अभाव न हो, अज्ञान न हो तथा अशक्ति न हो! जहाँ किसी प्रकार का भय न हो, जहाँ अनन्त-शक्ति और प्रेम के सौंदर्य में परमानन्द स्वरूप का नित्य-योग हो!

पुरुषार्थ का वास्तविक अर्थ भी—पुरुष का अर्थ अथवा पुरुष का ज्ञान है तथा जो उस पुरुष के अर्थ का चिन्तन करते हुए उसकी प्राप्ति की दिशा में प्रयत्न करता है वही सच्चा-पुरुषार्थी है।

ऐसे कल्याण-मार्ग के पथिक परमानन्द-स्वरूप परम पुरुषार्थी धन्य हैं! पृथ्वी ऐसे परम-पुरुषार्थी पुरुषों के चरण-कमलों का स्पर्श पाकर धन्य हो जाती है! किन्तु, परोपकार की भावना से ओत-प्रोत सामान्य पुरुषार्थियों का भी कुछ कम महत्व नहीं है साथ ही परोपकारी-पथ को भूले हुए, कल्याण-मार्ग से भटके हुए, स्वार्थ-रत पुरुषार्थी-जन भी कुछ बहुत बुरे नहीं कहे जा सकते।

जो लोग स्वयं कुछ न करे, संसार के लिये बोझ बने फिरते हैं– वास्तव में वे दया के पात्र हैं ऐसे ही व्यक्तियों का प्रदर्शन करने की आज अत्यधिक आवश्यकता है।

जब तक हमारे पड़ोस में एक भी व्यक्ति आलस्य, प्रमाद में पड़ा हुआ अपने भाग्य को कोस रहा है, अज्ञानांधकार में अपना अस्तित्व खो बैठा है, अभावों से जकड़ा हुआ है और अशक्ति से व्याकुल है- तड़फड़ा रहा है- मैं पूछता हूँ क्या आप सुख और शान्ति की नींद सो सकते हैं?

कदापि नहीं, कदापि नहीं। आप जाग्रत हैं; उठिये आगे बढ़िये और सबसे पहले अपने पड़ोसियों को आगे बढ़ने में सहायक हूजिए। सार्वभौम-सेवा का प्रारम्भ अपने अन्तर से, अपने पड़ोसियों से कीजिये। समय आपका स्वागत करने के लिए व्याकुल हो रहा है।

अपनी प्रत्येक क्रिया के द्वारा-दुर्भावों को सद्भावों में, दुर्गुणों को सद्गुणों में बदलते हुए अज्ञान-अन्धकार को सद्गुरु-कृपा रूपी ज्ञान-सूर्य से मिटा दीजिए!

पुरुषार्थ-पथ के पथिक बन कर क्रमशः उन्नति कीजिए तथा अनन्तः सार्वभौम-सेवा के सर्वोपरि परम-पद पर प्रतिष्ठित होकर परमानन्द-धन परात्पर परमेश्वर की प्राप्ति कर वेदमाता के कर-कमलों द्वारा अमृत-पान कर अपने जीवन को सफल करने का सौभाग्य प्राप्त कीजिए।

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