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Magazine - Year 1956 - Version 2

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मनः शक्तियों की चमत्कारी गति विधि

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(पं. श्रीलालजीरामजी शुक्ल, एम. ए.)

हम अपने मन की शक्तियों से भली भाँति परिचित नहीं हैं। हम अपने मन को शरीर के भीतर एक अचेतन पदार्थ मानते हैं। इसलिए हम उसकी शक्ति को भी सीमित मानते हैं। आधुनिक जड़वादी मनोविज्ञान ने हमारे मन को शरीर से सीमित मानने की प्रवृत्ति को और भी प्रबल कर दिया है। जड़वादी मनोविज्ञान मन को जड़ पदार्थ का एक विशेष प्रकार का परिणाम मानता है। हमारे मस्तिष्क में चलने वाली क्रियाओं में ही किसी प्रकार चेतनता उत्पन्न हो जाती है, यही मन है। मनोविश्लेषण-विज्ञान ने मन के स्वरूप के विषय में हमारा ज्ञान बहुत कुछ बढ़ाया किंतु उसने हमारे शरीर से पृथक् चेतन पदार्थ की कल्पना को अवैज्ञानिक माना है। मनोविश्लेषण-विज्ञान ने इतना तो अवश्य किया कि शरीर की दशा को मन की दशा पर निर्भर सिद्ध किया है। जहाँ पहले मनोवैज्ञानिक मन को शरीर पर निर्भर मानते थे वहाँ अब मानसिक व्यापारों तथा रोगों का कारण मन की स्थिति में ढूँढ़ा जाता है। मनोविश्लेषण कर्ता का कथन है कि मन के स्वस्थ रहने पर शरीर स्वस्थ रहता है।

हमारे पूर्वजों ने मन के ऊपर इससे भी अधिक विचार किया है। योग वाशिष्ठ में मन को ही सृष्टि का कारण माना है। मन एक और शरीर का निर्माण करता है और दूसरी ओर उस परिस्थिति का निर्माण करता है जिसमें कि किसी व्यक्ति को रहना है। हमारी मानसिक भावनाओं और बाह्य जगत् में आन्तरिक एकता है। भविष्य में होने वाली घटनाओं की रूपरेखा पहले से ही हमारे मन में वर्तमान रहती है। अपनी मानसिक भावनाओं के बदल देने से होनहार घटनाएं भी बदल जाती हैं। जिस मनुष्य का अपने मन पर अधिकार है वह परिस्थितियों से नहीं डरता। प्रतिकूल परिस्थितियाँ अन्त में अनुकूल हो जाती हैं। जिस व्यक्ति में जितनी ही अधिक मन को एकाग्र करने की शक्ति होती है, वह उतना ही अधिक बाह्य परिस्थितियों का दास न रह कर उनका स्वामी हो जाता है। विचारों की स्थिरता में ही मनुष्य की सफलता का रहस्य है।

हमारा मन शरीर के एक स्थान पर रहने पर भी जहाँ चाहे जा सकता है। देश और काल की सीमा शरीर के लिए है, मन के लिए नहीं है, इस तथ्य पर प्रत्येक मनुष्य को बार-बार भली प्रकार से मनन करना चाहिये। मन की शक्ति अपने निश्चय के अनुसार घटती और बढ़ती है। मनुष्य अपने मन में वैसी ही शक्ति का उदय होते हुए पायेगा जैसी शक्ति का वह निश्चय कर लेगा। अपने साधारण व्यावहारिक जीवन में हम अपनी अद्भुत मानसिक शक्तियों का परिचय पाते हैं। पर विचार न करने के कारण हम उन शक्तियों का भली प्रकार से साक्षात्कार नहीं कर पाते। इसलिए वे शक्तियाँ अपनी थोड़ी सी ही झलक दिखाकर अदृश्य हो जाती हैं। यदि हम अपनी मानसिक शक्तियों के विषय में सदा सचेत रहें, तो हम देखेंगे कि वे दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती हैं।

हम अपने विचारों को साधारणतः बोल कर व्यक्त करते हैं। जब हम किसी दूर रहने वाले व्यक्ति को अपने विचार जताना चाहते हैं तो हम उसे पत्र अथवा तार द्वारा अपने विचार जताते हैं। बिना भौतिक साधन के विचार किसी दूर रहने वाले व्यक्ति तक पहुँच सकते हैं—इस बात पर हमारा कदापि विश्वास नहीं होता, किन्तु हम यदि अपने व्यावहारिक जीवन को सूक्ष्मता से देखें तो हम भौतिक साधनों के बिना ही विचारों को अपने मित्रों तक पहुँचाने के बहुत कुछ प्रमाण पायेंगे। हाल ही की बात है, लेखक अपने एक मित्र के बारे में एक दूसरे व्यक्ति से कुछ बात चीत कर रहा था और उसके प्रेम सम्बन्ध के विषयों में कुछ कह रहा था। उस मित्र से कई दिनों से पत्र-व्यवहार बन्द हो गया था। ठीक उसी समय उस मित्र ने भी लेखक के विषय में सोचा और उसने लेखक को पत्र लिखा। इसी प्रकार जब लेखक एक दूसरे मित्र के विषय में चिन्ता कर रहा था। लेखक का वह मित्र भी उनके विषय में चिन्ता करने लगा। लेखक उसके घर गया और उसने इस अनुभव की सत्यता को जाना।

हमारे विचार उनके न प्रकाशित करने पर भी जिस व्यक्ति के विषय में जैसे होते हैं वे उसको ज्ञात हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने मन को एकाग्र करके किसी व्यक्ति की अपने प्रति धारणा के विषय में जानना चाहे तो वह जान सकता है। यदि वह अपने सामने है तो उसकी धारणाएं जानना सरल ही है, पर दूर रहने पर भी उसकी मुखाकृति को अपनी कल्पना में लाकर उसके विषय में चिन्तन करे और जो विचार उसके मन में उस समय उठें उन्हें ध्यान में रक्खे। वह देखेगा कि वे विचार उस व्यक्ति की भावनाओं को व्यक्त करते हैं। जो व्यक्ति हमसे वास्तविक प्रेम करता है उसके विषय में चिन्तन करते ही हमारे हृदय में प्रेमोदगार उदय होता है और जो व्यक्ति हमसे द्वेष करता है उसके विषय में सोचते ही मन में क्षोभ उत्पन्न होता है। इस प्रेमोदगार और क्षोभ को भली प्रकार से समझने से दूसरे व्यक्ति के हृदय की स्थिति तथा उसकी अपने प्रति धारणा का पता चल सकता है।

हम अपने स्थान में रहकर भी दूर रहने वाले व्यक्ति के विचारों को बदल सकते हैं। दूसरे व्यक्ति के विचारों का बदलना अपने चित्त की एकाग्रता पर निर्भर करता है। अपने सामने रहने वाले व्यक्ति के विचारों पर भी जो प्रभाव पड़ता है वह भी चित्त की एकाग्रता पर निर्भर करता है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को यदि कोरे तर्क के द्वारा प्रभावित करना चाहे तो वह देखेगा कि उसका प्रयत्न व्यर्थ गया जब तक तर्क करने वाले व्यक्ति के प्रति किसी व्यक्ति की श्रद्धा नहीं रहती उसकी युक्तियों का सुनने वाले के मन पर कोई भी अनुकूल असर नहीं होता तर्क करने से कभी-कभी प्रतिकूल परिणाम होता है। मनुष्य की बुद्धि उसके हृदय की दासी है। जब तक हम मनुष्य के हृदय पर अधिकार नहीं करते, उसकी बुद्धि को कभी प्रभावित नहीं कर सकते। दूसरे व्यक्ति के हृदय पर अधिकार मन की साधना अर्थात् एकाग्रता से होता है। हृदय के प्रभावित हो जाने से बौद्धिक परिवर्तन सरलता से हो जाते हैं। हृदय का परिवर्तन अपनी सच्ची सद्भावना को दर्शाने से होता है। इसके लिये अधिक बकवाद करने की भी आवश्यकता नहीं। हम किसी व्यक्ति को दो-चार शब्द कह कर भी उसके हृदय का परिवर्तन कर सकते हैं। आवश्यक यह है कि हम उसके प्रति वास्तविक सद्भावना रक्खें। सद्भावना के लिये अपने ही स्थान में रहकर उसके प्रति शुभ चिन्तन करना आवश्यक है।

शारीरिक और मानसिक रोगों के उपचार में सद्भावना के महत्व को भली प्रकार से देखा जा सकता है। रोगी के प्रति सद्भावना प्रकट करने से रोग नष्ट होता है। शारीरिक रोगों के उपचार में जितनी भौतिक औषधि काम करती है उससे कहीं अधिक डॉक्टर की रोगी के प्रति सद्भावना काम करती है। देखा गया है कि पैसे की दृष्टि से वैद्यक का रोजगार करने वाले व्यक्ति की योग्य चिकित्सा करने में असमर्थ रहते हैं। जो वैद्य जितना ही अधिक पैसे का लोभी होता है, वह रोगियों की चिकित्सा में उतना ही अयोग्य सिद्ध होता है। लोभी वैद्य रोगी को स्वस्थ नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे उसकी आमदनी का जरिया चला जाता है। वह आन्तरिक मन से रोगी को रोगी ही बनाये रखना चाहता है ताकि वह वैद्य को बार-बार बुलावे और उसे इस प्रकार अपनी दवाइयों के दाम और फीस मिले। अस्तु, उसकी आन्तरिक भावना उसकी दवाइयों की अपेक्षा कहीं अधिक काम करती है और रोगी बीमार ही बना रहता है। देखा गया है कि कुछ वैद्य पहले-पहल सफल चिकित्सक रहकर भी पीछे अपने रोगियों को आरोग्य प्रदान करने की शक्ति को खो देते हैं। इस प्रकार के परिवर्तन का कारण उनके विचारों में दोष उत्पन्न हो जाना ही होता है।

चिकित्सक अपने घर पर रहकर भी रोगी को आरोग्य लाभ करने में सहायता कर सकता है। यदि चिकित्सक सम्पूर्ण निःस्वार्थ होकर किसी रोगी के आरोग्य लाभ करने की भावना एकाग्र मन से सदा करता रहे तो उस रोगी को आरोग्य लाभ करने में अवश्य ही बड़ी भारी सहायता मिलेगी। यहाँ चित्त की एकाग्रता और चिकित्सक की सद्भावना काम करती है। हम चित्त की एकाग्रता करके दूर से ही किसी व्यक्ति के विचारों को बदल सकते हैं। जब किसी रोगी के हृदय की तन्त्री किसी आरोग्यवान् व्यक्ति के हृदय से जुड़ जाती है तो उसे सरलता से आरोग्य लाभ हो जाता है। रोगी के विचार आरोग्यवान् व्यक्ति के विषय में चिन्तन करने से बदल जाते हैं। उसमें आत्मभर्त्सना के भाव नष्ट हो जाते हैं और आशा का संचार हो जाता है। मन के आशातीत होने पर रोग का नष्ट होना अनिवार्य है।

रोगी के विचारों को आशातीत बनाने में चिकित्सक बड़ा काम करता है। स्वयं रोगी के विचारों में किसी प्रकार की स्थिरता नहीं रहती। वह निराशायुक्त रहता है। वह रोग से मुक्त होना चाहता है, पर उसे मुक्त हो सकने में विश्वास नहीं रहता। स्वयं चिकित्सक को ऐसी अवस्था में प्रयत्न करना पड़ता है। उसे मानो एक दलदल के गढ्ढे से हाथ पकड़कर निकालना पड़ता है। इस कार्य में चिकित्सक को रोगी से बातचीत करना उतना लाभदायक नहीं होता, जितना कि उसके विषय में चिन्तन करना और उसकी सेवा करना लाभदायक होता है। निःस्वार्थ सेवा करने से रोगी के हृदय पर चिकित्सक का अधिकार हो जाता है और फिर उसके विचारों को बदल देना सरल हो जाता है।

हम जितनी एकाग्रता के साथ दूसरे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं, वह उतना ही अधिक हमारे विषय में चिन्तित होता है। मरते समय मनुष्य दूर रहने वाले अपने प्रियजन को बड़ी एकाग्रता से स्मरण करता है कि जिस व्यक्ति के बारे में ऐसा व्यक्ति सोचता है, वह उद्विग्न-मन हो जाता है। या तो उसे जाग्रत अवस्था में ही उसका स्मरण आने लगता है, अथवा वह उसके विषय में स्वप्न देखने लगता है। इस प्रकार के कितने ही स्वप्न सत्य होते हुए पाये गये हैं। लेखक के एक छात्र ने एक बार अपने पिता की मृत्यु का रात को स्वप्न देखा और दूसरे दिन उनकी मृत्यु का तार पाया। सत्य होने वाले और साधारण ऐसे स्वप्नों में भेद यह होता है कि स्वप्नावस्था के पूर्व ही मनुष्य उद्विग्न मन रहता है। यदि मनुष्य अपने मन को एकाग्र करके इस उद्विग्नता का कारण जानना चाहें तो वह होने वाली घटना का पता चला सके।

जो मनुष्य अपने भीतर जितना ही अधिक अपने मन को ले जाता है, वह दूर की घटनाएं जानने की उतनी ही अधिक शक्ति प्राप्त कर लेता है। दूसरे मनुष्यों के विचारों को प्रभावित करने की शक्ति तथा अपने संकल्प को सफल बनाने की शक्ति भी अपने भीतर ले जाने से आती है। कई दिनों के सात्विक व्रतोपवासों से इस प्रकार की शक्ति का उदय हो जाता है। संसार के सभी महात्माओं ने अपने विचारों को प्रभावशाली बनाने के लिये अनेक प्रकार की तपस्यायें की हैं। जो व्यक्ति जितनी तपस्या करता है, उसके विचार उतने ही प्रभावशाली होते हैं। सत्य और शक्ति दोनों को ही प्राप्त करने के लिये तपस्या की आवश्यकता है। हमारा आन्तरिक मन कल्पनातीत शक्तियों का केन्द्र है। हम जिस प्रकार की शक्ति का साक्षात्कार करना चाहते हैं, मन की एकाग्रता के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। अपने स्वार्थ का त्याग करने से शक्ति की असीम वृद्धि हो जाती है। जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति को अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये काम में नहीं लगाता, वह उतना ही अधिक उस शक्ति को बलवान् बना लेता है। इस तरह हम देखते हैं कि तप और निःस्वार्थ भाव से काम करना मनुष्य को असीम शक्ति देने वाला होता है।

हमारी मानसिक शक्ति हमारे विश्वास पर निर्भर करती है। अपनी शक्ति के विषय में मनुष्य का जैसा दृढ़ निश्चय होता है; उसके मन में उसी प्रकार की शक्ति का उदय होने लगता है। यह निश्चय की दृढ़ता तप का परिणाम है। तप और योग में मौलिक भेद नहीं। दोनों में ही मन को रोकना पड़ता है। मन की एकाग्रता से ही निश्चय की दृढ़ता अर्थात् आत्म विश्वास आता है। आत्म विश्वास सिद्धि का कारण होता है। मनुष्य जितनी ही अधिक तपस्या करता है, अपनी मानसिक शक्ति को भी वह उतना ही बढ़ा लेता है। पर यह बढ़ी मानसिक शक्ति अपने ही काम में लाने से- स्वार्थ में इसका प्रयोग करने से- नष्ट हो जाती है। इस शक्ति को निष्काम भाव से विशुद्ध लोकोपकार में लगाने पर यह चिरस्थायी होती है और बढ़ती रहती है। शक्ति का उदय तप अर्थात् चित्त की एकाग्रता से होता है और उसका स्थायी रहना तथा बढ़ना उसके सदुपयोग पर निर्भर करता है।

हमारे वैयक्तिक मन के परे समष्टि मन है। यही मन शक्ति और प्रतिभा का केन्द्र है। चित्त की एकाग्रता से मनुष्य अपने आपको समष्टि मन के संपर्क में लाता है। तपस्या का यही परिणाम है। इससे मनुष्य का वैयक्तिक मन शक्तिशाली हो जाता है। जब तक मनुष्य के वैयक्तिक और समष्टि मन में एकता रहती है, मनुष्य शक्तिशाली बना रहता है। जब मनुष्य अपने आप को समष्टि मन से अलग कर लेता है तो उसकी शक्ति का भी ह्रास हो जाता है। शक्ति समष्टि मन अर्थात् विराट् पुरुष से, जो कि हमारा अन्तर्यामी तथा परम आधार है, आती है, जब हम विराट् पुरुष से प्राप्त उस शक्ति को उसी के काम में लगाते हैं तो वह नष्ट नहीं होती। जितना ही अधिक हम लोकोपकार में अपनी शक्ति को खर्च करते हैं, उतनी ही वह बढ़ती जाती है। अपनी स्वार्थ सिद्धि में अथवा उसका बिल्कुल ही उपयोग न करने से भी शक्ति का विनाश हो जाता है।

मानसिक शक्ति का सम्बन्ध मनुष्य की शारीरिक शक्ति से साधारणतः किया जाता है। कहा जाता है कि जैसी मनुष्य की शारीरिक शक्ति भी होती है। वैसी ही उसकी मानसिक शक्ति भी होती है। पर हमारी इस प्रकार की धारणा भ्रमात्मक है। देखा गया है कि मोटे-ताजे व्यक्ति का मानसिक बल प्रायः नहीं के बराबर होता है और दुर्बलकाय व्यक्ति के मानसिक बल से सारा संसार डरा करता है। अनपढ़ और पढ़े-लिखे व्यक्तियों के भी मानसिक बल को देखें तो सुशिक्षित मनुष्य का मानसिक बल अशिक्षित व्यक्ति से सदा अधिक होता है। जितना आत्म-विश्वास शिक्षित व्यक्तियों में पाया जाता है, जितनी उनमें मानसिक दृढ़ता होती है, अशिक्षित व्यक्तियों में न तो उतना मानसिक बल होता है और न उतनी मानसिक दृढ़ता ही; परन्तु यह भी देखा गया है कि अशिक्षितों में भी जहाँ मानसिक श्रद्धा अधिक होती है, वहाँ उनकी दृढ़ता, मानस बल और आत्म विश्वास शिक्षितों से भी बढ़कर होता है। इसका कारण भी चित्त की एकाग्रता ही है। जो व्यक्ति किसी विषय को लेकर चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करता है, उसमें उतनी ही अधिक मानसिक दृढ़ता और आत्म विश्वास उत्पन्न होता है।

ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विंरक्षति 19, 5.17

ब्रह्मचर्य के तेज से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है।

ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् 11.5.18

ब्रह्मचर्य से ही कन्या युवा पति को पाती है।

ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाष्नत 11,5,18

ब्रह्मचर्य के तेज से देवों ने मृत्यु को जीता है।

त्वं ना मेधे प्रथमा 6,108 1

हे बुद्धि! तू हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ वस्तु है।

ऋषियों भद्रां मेधां यां विदुस्तों मय्यावेशयामषि 6. 108.3

बड़े-2 ऋषियों ने जिस बुद्धि को श्रेष्ठ माना है उसे मैं अपने अन्दर प्रविष्ट करता हूँ।

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