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Magazine - Year 1956 - Version 2

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आप प्रसन्न रहा कीजिए

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(श्री चन्द्रभानु गुप्ता)

स्वास्थ्य के साथ हास्य अथवा मनोरंजन का वही सम्बन्ध है जो फल के साथ पुष्प का। यदि हम मन से प्रफुल्लित न रहें तो चाहे जैसा अच्छा भोजन क्यों न करें, प्रतिदिन शरद् काल के दिनों की तरह सिकुड़ते ही जायेंगे। इसके विपरीत मन में यदि प्रफुल्लता भरी होगी तो भले ही एक-दो समय खाने को न मिला हो तो भी चेहरे से कोई पहचान न सकेगा कि यह दो समय का भूखा है। यह उदाहरण हमने इसलिये दिया है कि बहुधा लोगों को यह ध्यान है कि स्वास्थ्य के लिये सबसे अधिक आवश्यक अच्छा भोजन है। हम इसका खण्डन तो नहीं करते, किंतु यह अनुभव करते हैं कि स्वास्थ्य के लिए भोजन से भी अधिक आवश्यक प्रफुल्ल रहना है। इस लेख में प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों के वचनों से अपने अनुभव को पुष्ट करके पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हैं। हमारा अनुभव है कि चिन्ता, शोक, ग्लानि और इनसे मिलते-जुलते मनोभावों से मनुष्य का स्वास्थ्य विकसित नहीं होता। हमारी दृष्टि सबसे पहले ऋग्वेद के एक मन्त्र की ओर आकृष्ट होती है—

हहैवस्तं मावियौष्टं विश्वमायुव्यश्नुतम्। कीलन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिः।

अर्थात् ‘तुम दोनों इसी लोक में रहो, तुम्हारा कभी वियोग न हो, तुम दोनों पुत्र-पौत्रों से खेलते-कूदते हुए पूर्ण आयु प्राप्त करो।’ इस मन्त्र के अर्थ पर विचार करने से प्रतीत होगा कि पूर्ण आयु प्राप्त करने के लिए प्रसन्न रहने के लिए खेलना-कूदना आवश्यक है।

उपनिषद् की एक अन्य श्रुति इससे भी अधिक महत्व की है। वह श्रुति बताती है कि आनन्द ही प्राणियों के जन्म का उपादान कारण है। इससे तो यह सिद्ध होता है कि आनन्द और जीवन सर्वथा एक ही चीज हैं। श्रुति के शब्दों पर दृष्टि दीजिए—

आनन्दादेव खल्विमानि भूतानि जायते। आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दमभिप्रयन्त्य-भिसंविशन्ति।

अर्थात्—‘आनन्द से ही सारे प्राणी उत्पन्न होते हैं। आनन्द से ही जीवित रहते हैं। आनन्द की तरफ ही सब दौड़ते हैं, और आनन्द ही में समा जाते हैं।’ यह श्रुति साफ कहती है कि जीवन आनन्द पर ही निर्भर करता है। एक और श्रुति-वाक्य भी इसी अर्थ का समर्थक है—

कोऽन्यात् कः प्राण्यात् यद्येप आकाश आनन्दो नस्वात्।

अर्थात्—‘यदि यह आकाश आनन्द-रूप न होता तो कौन जीवित रह सकता था? यह आनन्द ही का महत्व है जिससे प्राणी जीवित रहता है।’

आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कुतश्चन।

‘जो मनुष्य ब्रह्म आनन्द-रूप है, यह समझ लेता है उसे फिर किससे डर?’ वह किसी से नहीं डरता। उसके भय, शोक आदि अस्वास्थ्य के सभी कारण निवृत्त हो जाते हैं। वह एकमात्र आनन्द में विचरता है। यही तो स्वास्थ्य का सबसे अच्छा लक्षण है। सदा प्रसन्न रहने वाले को स्वस्थ और सदा दुखी रहने वाले को ही बीमार कहते हैं।

यह तो हुई वेद और उपनिषद् की बात। अब आयुर्वेद को देखिए, उसका उक्त विषय में क्या मत है। आयुर्वेद भी उत्पत्ति के विषय में वही बात कहता है जो वेद की श्रुति ने कही है। आयुर्वेद बताता है कि उत्पत्ति का मूल कारण आनन्द है। इसका अर्थ यह है कि गर्भ धारण के समय स्त्री और पुरुष दोनों आनन्द-मग्न होकर यदि गर्भाधान में प्रवृत्त होते हैं तो पुरुष के शुक्र में और स्त्री के शोणित में सजीवता आती है, अन्यथा नहीं। यदि पुरुष किसी कारणवश, गर्भाधान के समय प्रसन्न-मन न होगा तो उसका शुक्र ही प्रवृत्त न होगा। हुआ भी तो उसमें शुक्र-क्रीट, जो गर्भ के कारण होते हैं, न होंगे। इससे यह अनायास सिद्ध हो जाता कि प्राणियों की उत्पत्ति आनन्द अर्थात् प्रसन्नता के ही कारण है।

उधर ऋतुकाल में स्त्री का मुखमण्डल भरा हुआ और प्रसन्न रहता है। उसमें हर्ष और औत्सुक्य की मात्रा खूब बढ़ी रहती है। ऐसी पूर्ण प्रसन्न स्थिति होने पर ही शोणित में सजीवता आती है और शुक्र विकृत न हो तो गर्भ-धारण निश्चित होता है। गर्भ-धारण के अनन्तर गर्भ की पुष्टि ओर पूर्णता के लिए की गर्भिणी की प्रसन्नता परम आवश्यक है। गर्भिणी की प्रसन्नता उसकी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आयुर्वेद में बहुत ही सख्त आदेश मिलता है—सुश्रुत की आज्ञा है—

इन्द्रियार्थास्तु यान् यान् सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी। गर्भाबाधमपात्ताँस्तान् भिषगा हृत्य दापयेत्॥ सा प्राप्तदौर्हृदा पुत्रं जनयेत गुणान्वितम्। अलब्ध दौर्हृदा गर्भे लभेतात्मनिव भथम्॥

अर्थात्—‘खाने-पीने में, देखने-भालने में, सुनने-सुनाने में, घूमने-फिरने में और इनके अतिरिक्त जिस-जिस वस्तु में गर्भिणी की जैसी-जैसी इच्छाऐं उत्पन्न हों, उन सब इच्छाओं की चाहे उचित हो या अनुचित—तृप्ति से गर्भिणी का प्रसन्न रहना अत्यन्त आवश्यक है।’ गर्भिणी की कोई भी इच्छा पूर्ण होने में कसर बाकी रही तो जिन अंगों की वस्तुओं में कमी रहेगी; गर्भ के वे ही अंग नदारद रहेंगे। देखने की इच्छा पूर्ण न होने से गर्भ अन्धा पैदा होगा। चलने की इच्छा अधूरी रहने से लंगड़ा, बोलने की अभिलाषा पूर्ण न होने से गूँगा, ग्रहण करने इच्छा अपूर्ण रहने से लुंजा, इस प्रकार जिस-जिस इन्द्रिय का विषय गर्भिणी को प्राप्त न होगा, गर्भ की उस-उस इन्द्रिय की हानि होकर गर्भ तो विकृत होगा ही साथ ही गर्भिणी के जीवन को खतरा होगा। आशय यह कि गर्भिणी सर्वदा और सर्वथा पूर्ण मनोरथ अर्थात् प्रसन्न रहनी चाहिए।

चरक में जहाँ यक्ष्मा की चिकित्सा लिखी है उस प्रकरण को देखने से तो जीवन में हास्य को बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है। चरक ने लिखा है कि यक्ष्मा के रोगी को प्रसन्न रखना ही उस रोग की चिकित्सा है।

यक्ष्मा के रोगी को प्रसन्न रखने के लिए चरक ने कुछ तरकीबें लिखी हैं। उसे सुगन्धित, स्निग्ध उबटन मलकर सुखदायक जल में स्नान और क्रीड़ा करने देना चाहिए। मित्र मण्डली में हास्य, राग-रंग, गाना बजाना, खाना-पीना आदि करके उसे खूब आनन्दित रखना चाहिए। उसे मन-भावने वस्त्राभरणों से अलंकृत रखना चाहिये। चरकाचार्य कहते हैं कि इससे यक्ष्मा का नाश होता है।

इस प्रकार प्रसन्न रहने से जब यक्ष्मा रोग का नाश होकर मनुष्य स्वस्थ होता है, तब यह बात समझ में आ जाती है कि सदा प्रसन्न रहेंगे तो यक्ष्मा होगा ही क्यों?

प्रसन्न मनुष्य को सत्यवादी और अहिंसक होने की परम आवश्यकता है; झूठा और हिंसक कभी प्रसन्न नहीं रह सकता। ईश्वर-परायण होना भी अत्यंत आवश्यक है। महात्मा गाँधी के अति प्रिय में ये तीन महाव्रत थे, जिनके प्रताप से वह सदाव्रतों प्रसन्न और अंत समय में भी प्रसन्न रहे।

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