• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • हृदयोद्गार (kavita)
    • सुख-प्राप्ति का मूल मंत्र-गायत्री
    • गायत्री-उपासना द्वारा विश्व-कल्याण
    • गायत्री के ‘ॐ’ की महिमा
    • गायत्री-उपासना से जीवन रक्षा
    • गायत्री जप का वैज्ञानिक रूप
    • गायत्री-मंत्र का मूल स्वरूप
    • गायत्री-मंत्र का महान सन्देश
    • वैदिक गायत्री और उसका रहस्य
    • गायत्री-मन्त्र का अद्भुत प्रभाव
    • गुरु और गुरु-मंत्र का रहस्य
    • गायत्री के चौबीस अक्षर और मस्तिष्क की चौबीस शक्तियाँ
    • गायत्री से दिव्य प्रकाश
    • गायत्री स्तुति
    • आत्मानुशासन द्वारा आत्म-विकास
    • जीवन का उद्देश्य
    • गायत्री के दैनिक जप का महत्व
    • गायत्री साधना की सफलता
    • सद्विचार प्रसार के लिए एक महत्वपूर्ण कदम
    • अब प्रत्येक गायत्री परिवार यह करे
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1959 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


गायत्री-मन्त्र का अद्भुत प्रभाव

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 10 12 Last
(श्री मोक्षाकर)

गायत्री मंत्र के अद्भुत प्रभाव और आश्चर्यजनक चमत्कारों के विषय में प्राचीन ऋषि, मुनियों और साधु-संतों ने तो स्थान-स्थान पर महत्वपूर्ण उद्गार प्रकट किये ही हैं, पर वर्तमान समय के ज्ञानी व्यक्ति भी जिन्होंने उच्चकोटि की पश्चिमीय शिक्षा प्राप्त की हैं मुक्त कंठ से उसकी प्रशंसा करते रहते हैं। थियोसोफिकल सोसाइटी के एक प्रमुख नेता श्रीकृष्णमूर्ति ने गायत्री उपासना के अनुभवों का वर्णन करते हुए लिखा था-

‘विशेष रूप से गायत्री-मंत्र के प्रयोग करके अवलोकन किया गया और उसका परिणाम अद्भुत जान पड़ा। इस मंत्र का उपयोग स्वार्थ के लिये न करके परमार्थ के लिये करना चाहिये। देवता भी जहाँ गायत्री का मंत्रोच्चारण होता हो वहाँ सहायता देते हैं।’

‘गायत्री सूर्य भगवान के आवाहन का मंत्र है और जब उसका उच्चारण किया जाता है तभी जप करने वाले पर प्रकाश की एक बड़ी लपक स्थूल सूर्य में से पड़ती है। प्रार्थना के समय चाहे सूर्य उदय हो रहा हो, चाहे मध्याह्न का समय हो, चाहे संध्या समय अस्त हो रहा हो, चाहे मध्य रात्रि का समय हो, सूर्य की लपक सूक्ष्म रूप से जप करने वाले पर अवश्य पड़ती है। रात्रि के समय तो वह लपक पृथ्वी को भेदकर आती है। यह प्रकाश श्वेतवर्ण का सुनहरापन लिये होता है। जब उसके द्वारा जप करने वाले का हृदय भर उठता है तब उसमें से इन्द्र कैसे सात रंग बाहर निकलते है’ और जो कोई करने वाले के सम्मुख होता है उस पर शुभ प्रभाव डालते हैं। यह प्रभाव जप करने वाले के हृदय से ही बाहर नहीं निकलता, वरन् उसकी प्रभा (ओरा) में से भी अर्द्ध चन्द्राकार में प्रकट होता है। किरण के सामने कोई मनुष्य बैठा हो या आता हो तो वह उसके मस्तक और हृदय को स्पर्श करती है और इन अंगों के दोनों चक्रों को जागृत करती प्रत्येक किरण एक ही नहीं वरन् अनेक मनुष्य प्रभाव डालती है।

अगर साधारण मनुष्य की प्रभा उसके शरीर के बाहर 18 इंच तक निकलती हो तो उसके नीचे के भाग 9 फीट लम्बे और 5 फीट चौड़े क्षेत्र में फैल जाता है। जिस व्यक्ति का साधन द्वारा विशेष विकास हो जाता है उसके शरीर की प्रभा चारों तरफ 50 गज तक फैल सकती है और जब तक उसका आधा भाग वृत्ताकार बनता है तो बहुत दूर-दूर के व्यक्तियों पर उसका शुभ प्रभाव पड़ता है।

मनुष्य की इस प्रकार की प्रभा उसकी वासना और मानसिक प्रकृति की बनी होती है और उसकी समस्त देह में ओत-प्रोत रहती है। यह प्रभा मस्तक से जितनी दूर ऊपर की तरफ जाती है उतनी ही दूर पैरों के नीचे पृथ्वी के भीतर भी पहुँचती है। गायत्री मंत्र का जप करने वाले की प्रभा जितनी विस्तृत होती है उतनी ही प्रभाव डालने वाली भी होती है। अगर एक बड़ा जन समुदाय सामूहिक रूप से मंत्र का उच्चारण करता है तो उसके प्रभाव से प्रकाश की उतनी ही बड़ी लपक उत्पन्न होती है। इससे समस्त मंत्र उच्चारण करने वाले एक रूप बन जाते हैं और उन सबमें से जो सात-सात किरणें निकलती हैं उनका प्रभाव कितने बड़े भू-भाग पर पड़ता होगा इसका अनुमान सहज में किया जा सकता है कितने ही देशों के अध्यात्म विद्या विशारदों ने प्रयोग करके इसकी सत्यता को स्वयं अनुभव करके देखा है।

इन प्रयोगों द्वारा यह भी मालूम पड़ा है कि मंत्रों का प्रभाव किस प्रकार पड़ता है मंत्र का आशय यह है कि उसमें शब्दों को एक विशेष योजना के अनुसार, एक विशेष ध्वनि में उच्चारण किया जाय। उसके प्रत्येक अक्षर में एक विशेष कंपन उत्पन्न करने की शक्ति पाई जाती है अर्थात् मंत्र का प्रत्येक पद स्वर के एक कंपन के सदृश्य होता है। मंत्रों में जिस नियम के अनुसार स्वरों की रचना की जाती है, उसे ठीक प्रकार से उच्चारण करने पर अवश्य ही कंपन एक विशेष गति से उत्पन्न होते हैं और वे कंपन धीरे-धीरे हमारे शरीर के भिन्न-भिन्न कोषों को जागृत करते हैं और उनको शुद्ध बनाते हैं। इन शुद्ध हुये कोषों के उपासक मन्त्रोच्चार करके अपने इष्टदेव को अपनी तरफ आकर्षित करने में समर्थ होता है। इसी क्रिया को देवता का आवाह्न कहते हैं। इस प्रकार मंत्र का उच्चारण जप करने वाले के ऊपर असर करता है और उसकी प्रभावशीलता को बढ़ाता है।’

इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वरों से एक विशेष प्रकार के कंपन या आन्दोलन वातावरण में उत्पन्न होते हैं और उनसे सूक्ष्म सृष्टि में एक खास तरह के आकार बनते हैं। इस प्रकार स्वरों के विभिन्न प्रकार के कंपन अलग-अलग तरह की अनेक आकृतियों को उत्पन्न करते हैं। स्वर विद्या के जानकार, कुछ वैज्ञानिकों ने विशेष यंत्रों द्वारा इस बात को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करके भी दिखला दिया है। इससे यह भी विदित होता है कि मंत्र विद्या में स्वर का महत्व बहुत अधिक है। प्रत्येक स्वर का उच्चारण अपना अलग आकार उत्पन्न करता है और उससे वैसा ही प्रभाव उत्पन्न होता है। केवल साधारण ढंग से मंत्र बोल देने या पढ़ देने से कोई खास परिणाम प्रकट नहीं होता। मन्त्रोच्चारण पूर्ण रूप से शुद्ध होना चाहिये, उसके स्वरों में किसी प्रकार की विकृति नहीं होनी चाहिये।

‘ध्वनि’ के लिये संस्कृत में ‘वर्ण’ शब्द का प्रयोग किया जाता है और ‘वर्ण’ का अर्थ रंग भी होता है। सूक्ष्म सृष्टि में प्रत्येक शब्द के साथ रंग भी उत्पन्न होता है और उससे अलग-अलग रंग के आकार बनते हैं। जिसमें सब रंगों का एकीकरण होता है उसे संस्कृत में ‘रवि’ (सूर्य) कहते हैं। ‘र व’ शब्द का अर्थ ‘ध्वनि’ भी होता है। इसी आधार पर भिन्न-भिन्न देवों के आवाह्न के लिये भिन्न-भिन्न मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। जिस देव की प्रार्थना हम करना चाहते हैं उसके मंत्र का बार-बार शुद्ध रीति से उच्चारण (जप) करने से उच्च भूमिका अर्थात् सूक्ष्म मानसिक सृष्टि के ऊपर उसका आकार पैदा हो जाता है और उस देवता की शुभ शक्तियों को आकर्षित करने का वह केन्द्र बन जाता है। यही कारण है कि आर्ष ग्रंथों में कहा गया है कि मंत्र बिना देवता के हैं ही नहीं!

गायत्री मंत्र के विधि विधान और उच्चारण आदि के विषय में अब भी अनेक व्यक्तियों को पर्याप्त ज्ञान है, इसलिये अगर हम प्रयत्न करें तो उससे अनेक प्रकार के लाभ उठा सकते हैं। पर यह तभी संभव है जब उपासक में आन्तरिक श्रद्धा के साथ संकल्प बल भी हो। तीसरा गुण एकाग्रता का भी है। डगमगाती स्थिति में करने से तो साधारण काम भी पूरे नहीं होते, तब सूक्ष्म सृष्टि में रहने वाले देवताओं को आकर्षित करना उससे कैसे संभव हो सकता है? अंत में सबसे आवश्यक बात है देवता में उपासक का भक्ति-भाव अथवा स्वार्पण का भाव। जब इन सब बातों के साथ मंत्र का प्रयोग किया जाता है तो उससे अवश्य ही हमारा और दूसरों का भी कल्याण हो सकता है। इसके विपरीत जो लोग मंत्र को जादू की तरह समझ कर चाहे जैसा अपवित्र जीवन बिताते हुए केवल किसी मंत्र का उच्चारण कर देने से देवताओं को बुलाने या उनसे भले-बुरे सब कार्य सिद्ध कराने की आशा करते हैं वे मंत्र-विद्या से अनजान हैं और ऐसे ही व्यक्ति उसकी बदनामी के कारण होते हैं। मंत्र-विद्या शुभ और कल्याण के कार्यों के लिये ही है और सच्ची श्रद्धा, भक्ति और उपयुक्त विधि से उसमें सफलता मिलती है।

First 10 12 Last


Other Version of this book



Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • हृदयोद्गार (kavita)
  • सुख-प्राप्ति का मूल मंत्र-गायत्री
  • गायत्री-उपासना द्वारा विश्व-कल्याण
  • गायत्री के ‘ॐ’ की महिमा
  • गायत्री-उपासना से जीवन रक्षा
  • गायत्री जप का वैज्ञानिक रूप
  • गायत्री-मंत्र का मूल स्वरूप
  • गायत्री-मंत्र का महान सन्देश
  • वैदिक गायत्री और उसका रहस्य
  • गायत्री-मन्त्र का अद्भुत प्रभाव
  • गुरु और गुरु-मंत्र का रहस्य
  • गायत्री के चौबीस अक्षर और मस्तिष्क की चौबीस शक्तियाँ
  • गायत्री से दिव्य प्रकाश
  • गायत्री स्तुति
  • आत्मानुशासन द्वारा आत्म-विकास
  • जीवन का उद्देश्य
  • गायत्री के दैनिक जप का महत्व
  • गायत्री साधना की सफलता
  • सद्विचार प्रसार के लिए एक महत्वपूर्ण कदम
  • अब प्रत्येक गायत्री परिवार यह करे
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj