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Magazine - Year 1959 - Version 2

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गायत्री स्तुति

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First 14 16 Last
(श्री विक्राल बेंकटाचार्य, प्रधानोपाध्यायः वेदान्त संस्कृत पाठशाला, श्री रंगापुरम्)

नमस्तेस्तु मातस्स्मस्तेश्वरेशे,

स्वमस्ते सुमस्तोमवत्तेऽड्घिमूहे।

श्रमस्तान्न में त्वज्जपारौ कृपालो,

भ्रमोपि प्रमा स्यात् प्रमेये दृशाते॥1॥

‘समस्त ईश्वरों की अधीश्वरी हे माता, तुम्हें प्रणाम। मेरे मस्तक पर मैंने आपके पादारविन्द पुष्प के समान धारण किये हैं। हे दयालु, तेरे जपादि स्मरण करते समय मुझे श्रम न जान पड़ना चाहिये। तेरे कृपा कटाक्ष द्वारा मुझसे हुए भूल भी सत्य हो।’

श्रुत्यन्तसंचारि विनोदकारि विसारि धीरे क्षणसद्विलासैः। श्रुत्यम्ब लीला न्तनुषे त्वमेका अमोघ मंत्रा सकल स्वतंत्रा॥ 2॥

‘हे वेदमाता! तू वेदान्त में संचार करने वाली विनोदकारी, व्यापनशील, गंभीर दृष्टि विलासों से, अमोघ मंत्रों से युक्त, सकल स्वातंत्र्य शालिनी आप अकेली ही लीलाएं कर रही हैं।’

यदि भय मभविष्यं दत्र मातः सपदिशिवेट शमयिष्य एवतन्मे।

सुमहसि हृदि मेत्वयि प्रदीप्ते मभवति किन्नु तम स्समीप मेतुम्॥ 3॥

‘हे माता यहाँ मुझे भय यदि प्राप्त हो तो हे मंगलकारिणी तू उससे अवश्य ही हर सकती है। आप मेरे हृदय में रत्नदीप सम जगमगा रही हों फिर अंधकार को सम्मुख आने का क्या साहस होगा?’

याव त्पश्चिमद्ग्विधूः स्ववदने शोणं रवे मण्डिलम् धत्तेचारु विशेषकं व विपुलं काश्मीरजं वर्तुयम्॥ तावत्तेऽम्ब ददेऽर्ध्य मञ्चलि भृतैः स्वच्छैर्मनोहारिभिःस्वर्णाऽम्भोज मरन्द सौरभ युतै स्त्रित्स्वर्धुनीकारिभिः॥4॥

‘जब तक पश्चिम दिशा सुन्दरी रक्तवर्ण सूर्य बिंब को अपने भाल पर सुन्दर, वर्तुलाकार गोल और विशाल कुँकुम तिलक धारण करती है तब हे माता अंजिल में भरे हुए स्वर्गंगा के संबंधित निर्मल मनोहर, स्वर्ण पद्म के मकरंद से सुगंध से युक्त नीर से तीन बार अर्घ्य प्रदान करता हूँ।’

निशा नटय्या पुष्पाञ्जलि रिव विकीर्णो हरिपदे चकास त्तारौधो न विलय मयं याव दयते त्रिरर्घ्यं तावत्तेऽण्जलिभृतमनून्मन्त्रित जलैरर ददेऽम्बाऽऽर्के बिम्बे कृत वसतये सिद्धकृतते॥5॥

‘यह रात एक नर्तकी है। वह अंजिल में धारण किये हुए और विष्णुपाद पर अर्थात् गगन में अर्पित किए हुए पुष्प अर्थात् नक्षत्रों का अस्तमान समय जब तक नहीं होता उस समय सूर्य मण्डल में निवास करने वाली, संकल्पित कार्यों को पूर्ण करने वाली ऐसे तुझको अंजलि में भरे हुए अभिमंत्रित जल से तीन बार अर्घ्य प्रदान करता हूँ॥ 5॥

अम्बाऽर्कबिम्बान्तरुपेयुषि त्वाँ बिम्बोष्ठि कम्बुप्रतिबिंब कंठि। स्तम्बे रमास्यादि सुराभि बन्द्म जाम्बून दालंकरणेऽवलम्बे। 6।

सूर्य बिम्ब में रहने वाली, बिम्ब फल के समान ओष्ठ वाली, शंख के समान कंठ से युक्त, गणेशादि देवताओं से पूजनीय और सुवर्णमय आभूषण धारण करने वाली हे माता, ऐसे तुझको मैं शरणागत हूं॥”

वन्दारुवृन्दारकवृन्दकोटि किरीट माणिक्यमरीचिवीचिः। नीराजयत्यम्ब तवाऽघ्रिपद्मे स्वाराज्य भाग्यश्रियूर्जयन्ती।7।

‘हे माता तेरे पादपद्म जी त्रैलोक्य राज्य लक्ष्मी को अभिवृद्धि करने वाले ऐसे हैं, उसे कोटि देवता जो तुझे नमस्कार करते हैं, उनके किरीटों में लगे हुये माणिक्य कांति परंपरा द्वारा मंगल आरती किए जैसे हैं।’

उपेयिवाँसि सेवार्थं हृन्दी वाऽद्धगनि भेजुषाम्।

पुरो विसृत्वरा भान्ति ययो र्नखमरीचयः॥8॥

‘हे माता! तेरे पादपद्म की नखकान्ति इतनी तेजस्वी है कि जान पड़ता है। सर्व भक्तों के मन तेरे पाद सेवा करने को उसके अग्रभाग में आकर स्थित हैं।’

कान्त्ये वाऽधः कृतं पद्मं हेमपीठ मधिष्ठितम्। अलंकरिष्णू श्रीमत्याः पादौ ते देवि संश्रये॥9॥

हे माता, तेरे चरणों के नीचे रखा सुवर्णापीठ ऐसा जान पड़ता है जैसे कि आपके पादपद्म काँती द्वारा प्रपंच के सर्व पद्मपुष्प हार कर तेरी शरण में आकर, तेरी पाद सेवा करने आकर पादपीठ रूप धारण किए हुए हैं। उसे अलंकृत करने वाले तेरे चरण को मैं नमस्कार करता हूँ।’

सायं प्रातर्जगद्वन्दो चक्षुषो र्विषयोऽसि मे। त्वदंग सुषमा शोणा महती य त्तदेक्ष्यते॥ 10॥

‘प्रतिदिन सायं और प्रातः समय में जगद्वंदनीय ऐसी तू हमें दर्शन देती है। वह कैसे? प्रातः और सायं प्रतिदिन जो आपकी रक्तवर्ण शरीर छाया हमें गोचर होती है वही

तेजः पुञ्जान्तरे भाति दिव्या ते मूर्ति रद्भता। मनोऽनुसंहितं मंत्र मनुद्यन्ती मनोहरा॥11॥

उस तेजः पुँज जैसे काँती के मध्य में आश्चर्यकारी और दिव्य जैसा आपका स्वरूप मुझे आपका मंत्रोच्चार दिल में करते ही हृगोचर होता है।

उपाहिताग्नि सूर्येन्दु मंडले प्रणवासने। सुखासीनाँ सुप्रसन्नाँ त्वाँ मातः सुमुखीं भजे॥ 12॥

‘प्रणव पीठ पर अग्नि मंडल, उस पर सूर्यमंडल और उस पर चन्द्रमंडल जैसे उस पर तू अनुग्रह युक्त, संतोष से, प्रसन्नता से विराजमान है, ऐसे तुझको मैं शरणगत हूँ।

यद्रुपा परिचिन्त्यथेऽम्ब भवती तद्रुपिणी दृश्यते। ने दृक ते निजरुप मेतदिति के प्यावेदितुँ शक्नुयुः॥ तादृकत्व त्करुणा विशेष कलित प्रजाऽऽत्मविद्भिर्यथा। निध्याताकृति रात्मनाऽञ्च्सि तथा लीलाविहारोत्सुका॥ 13॥

‘हे माता! भक्तगण जो जिस रूप को मानकर तुझे भजते हैं वैसे ही तू उन्हें दर्शन, देती है। इससे तेरा स्वरूप यही है, इस प्रकार का है ऐसा कहने के लिये कोई भी समर्थ नहीं है। कोई भी तेरे निज स्वरूप को जानने में समर्थ नहीं है। तेरे कृपा दृष्टि को प्राप्त होकर आत्मज्ञान संपादित करके जो पंडित तुझे भजते हैं और उन्हें तू जिस स्वरूप में दिखाई दी है उसी स्वरूप से तू संसार में बिहार कर रही है।

करैष्य वंद्य निजतत्व रहस्य रूपाँ-नियाद्भुता मृत चिदात्मसुख स्वरूपाम्। दिग्व्यापि निर्मल निराकुल चित्प्रकाशाँ त्वाँ पूर्णिमेन्दुमिवदेवि भेजे सुपूर्णाम्॥ 14॥

‘तेरे निज रूप का कोई भी रहस्य नहीं जान सकता। तेरा स्वरूप नित्य, अद्भुत, अमृत-सा, ज्ञान, रूप, आत्मरूप और सुखरूप है। आपकी काँति चाँदनी जैसी दिग्व्यापि, निर्मल, निराकुल, ज्ञानरूप है ऐसी तुझको मैं सेवा करता हूँ।’

वेदमात रविद्याँमे निवर्तय मनोवृतिम्। येन विद्या समग्रस्सन् विद्यासमखिलं जगत्।15।

‘हे वेदमाता गायत्री तुझे मेरे मन को आच्छादन करने वाली अविद्या को निवारण करना चाहिए जिससे मैं विद्या से परिपूर्ण होकर सब संसार को जान लूँ।’

पुरस्सरीमे पुरुषार्थदात्री, मित्री भवित्री भजता मवित्री। पवित्रयन्ती सुपदक्रमैर्गां सवित्रि वेलार्चिंत् ॐ नमस्ते॥ 16॥

‘मेरे सम्मुख चलने वाली, पुरुषार्थ देने वाली, मित्र होने वाली भक्तों को रक्षण करने वाली, सुन्दर चरणों के विन्यास से भूतल को और सुन्दर वचनों की रचनाओं से वाणी को पवित्र करने वाली, याज्ञिकों से त्रिकाल पूजित हे माता प्रणव स्वरूप तुझको नमस्कार।

ओजश्शक्ति बल प्रभाव सुषमा लेजस्सु वीर्यप्रभा। ज्ञानैर्श्वय महस्सहो जययशस्स्थैर्य प्रतिष्ठा श्रियः विज्ञान प्रतिभा मतिस्मृतिधृति प्रज्ञाप्रथास्सुज्वलाः वर्णेस्त्वन्मानुगै स्त्रिरष्टभि रहो वर्ध्यन्त एवात्र मे॥

‘ओज, शक्ति, बल महिमा, काँति, तेज, पराक्रम, प्रकाश, ज्ञान, ऐश्वर्य, विकास, सहन शक्ति, जय, कीर्ति, स्थिरता, प्रतिष्ठा, लक्ष्मी, विज्ञान, प्रतिभा, मति, स्मृति, तृप्ति, प्रज्ञा, ख्याति, यह चौबीस गुण हे माता तुम्हारी मंत्र में रहने वाले चौबीस वर्णों द्वारा मुझ में अभिवृद्धि पा रहे हैं।’

रत्नस्तम्भ सहस्र केसर परिश्रेणी विराजत्सभा नूत्नाव्जोन्नत कर्णिकायित महासिंहासनाध्यासिनी देवित्वं शरदिनदु सुन्दरमुखी स्मेरेक्षण ज्योत्स्नया भिन्दाना सकलस्य सन्तमससन्तापान् स्वयं राजसे॥

‘हे माता! सभा जो कि पद्म समान है और सभा स्तम्भ रत्नों के हैं। इस सभा में वे हमारों की पंक्ति में हैं यही उस पद्म के केसर है और सभा में सिंहासन अर्थात् पद्म की कर्णिका पर तुम विराजमान हो। शरत्काल पूर्णिमा के चन्द्रमा समान सुन्दर वदन वाली, मंद हासयुक्त प्रसन्न, चाँदनी जैसी दृष्टि से सब लोगों के अज्ञान, कष्ट निवारण करने वाली जैसी तू स्वयं प्रकाशित हो रही है।’

नाना नाम तनु प्रभेद बहुधा विस्तारि लोकाकृतिः माणिक्य प्रतिमेव मंगल तरैः, क्षेमंददाना करैः साक्षाद देवगवी व संश्रित जनस्यो च्चैर्दुहानेप्सिता न्यक्षय्याऽसि शुभश्रियाँनिधि रहो गायत्रि तेजोनिधे॥

हे माता! विविध नामों से, शरीरों से और अभेदों से बहुत विस्तारशाली यह लोक ही तेरी आकृति है, स्वरूप है। माणिक्य प्रतिमा के दिव्य काँती जैसे सुखदायक होती है उसी प्रकार तेरे आश्रितों को तू इष्टार्थ, कामना पूर्ण करती हो। हे गायत्री देवी तुम शुभ संपदा के लिए एक अक्षय तेजोन्धी हो।’

पादौ ते कलयामि तौ कमलभौ कम्रौ कणन्नूपुरौ। देवेन्द्रादि किरीटरत्न रुचिभि नींराजितौ पूजितौ॥ लोकेशीकृत वन्दमान जनता प्रार्थ्यांर्हसेवा क्षणौ। याभ्या मध्युषिताऽब्जरागमयवत् स्फाटिक्यभूत् पीठिका॥ 20॥

हे माता तुम्हारे पाद! कमल के काँती के भाँति सुन्दर ध्वनियुक्त नूपुरों द्वारा सुशोभित और देवेन्द्रादि देवताओं के द्वारा पूजित होते समय उनके किरीट रत्न काँती द्वारा आरती पाने वाले और तेरी कृपा द्वारा लोक प्रभु बने हुए तेरी चरण सेवा करने झुँड बनकर आये हुए हैं। किन्तु उन्हें उचित समय प्राप्त न होने के कारण तेरे पाद सेवाभिलाषी चरण सेवा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे तेरे चरणों को और स्फटिक पादपीठ जिस पर तुम्हारे चरण काँती पड़ने से वह पीठ पद्मराग समान दिखाई देता है ऐसे उन चरणों को मैं वंदना करता हूँ।’

यथैव में त्वं जनयित्री वाञ्छेस्तथा कृषाीष्ठा मुदमेमी तेन।ममाऽविदो वाँछिततोप्यभिज्ञे प्रेयो महीयस्तव वाञ्छितंहि॥ 21॥

हे माता तू जिस प्रकार चाहे उस प्रकार मुझे वरदान दे। उसी से मैं संतुष्ट हो जाऊंगा। क्योंकि मेरे जैसे ना समझ और लोप युक्त वरदान के पक्ष में तू ही समस्त जानने वाली हो। तेरा स्वयं तक दिया हुआ वरदान ही श्रेयस्कर होता है। उसी से मुझे संतोष है।

ज्ञानध्यानजपार्चनास्तुतिमतिप्रीतिप्रपत्यादिभिर्। बाह्यान्तः करण प्रवृत्तविविधोपास्यानुकूलक्रमैः॥ भूयोनामवषुः प्रकल्पित जगाद्विख्यात दिव्याद्भुत। व्यापाराँ भवती भजे भगवतीं गायत्रि ओजोमर्याम्॥

हे माता मैं ज्ञान, ध्यान, जप, पूजा स्रोत, पढ़कर स्मरण मनन करके, प्रेम द्वारा और सर्व भी तेरे लिए त्याग करके इस प्रकार बाह्यन्तःकरण के अनेक उपासना पद्धति द्वारा मैं तुझे पूजता हूँ और तू अनेक नाम धारण कर अनेक शरीर धारण कर प्रपंच में प्रसिद्ध और दिव्य और आश्चर्य कारक अनेक कार्य किये हुए ऐसी चरित्र वाली हे भगवती ओजमयी गायत्री तुझे नमस्कार है।

विश्वस्य भजतोमेऽद्य विश्वश्रेयः प्रदायिनी। आश्वासयान्तरात्मान माश्वाविर्भूयभूयसि॥23॥

हे गायत्री माता मैं तुझ पर विश्वास रखता हुआ तेरा मनन कर रहा हूँ और हे माता सब को सफल सुख प्रदान करने वाली तू मुझे शीघ्र ही प्रत्यक्ष होकर संतृप्ति कर।

सहायोमेऽत्र भूयात्ते सुमहन्मञ्जुलंमहः। वेदमातः प्रमातीतं सर्व कार्य धुरन्धरम्॥24॥

हे माता तेरा अभाव इतना उतना ही नहीं है किन्तु सर्व कार्य को आगे आकर करने वाली ऐसी तेरी शक्ति है। ऐसी तेज शक्ति मुझे इस संसार में हर प्रकार से सहायकारी हो।’

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