गायत्री-मंत्र का मूल स्वरूप
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(श्री विष्णुदेव साँकणेश्वर पंडित)
गायत्री महामंत्र का आरंभ ॐ से होता है और उसके अन्त में भी ॐ का उच्चारण किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि गायत्री मंत्र ॐ कार स्वरूप है। वह ॐकार में से ही प्रकट होता है और ॐकार में ही समा जाता है। इस लिये ॐकार ही उसका कारण है, ॐकार ही उसकी शोभा है, ॐकार के उच्चारण से उसको बल मिलता है।
भूर, भुवः और स्वः ये तीन महा व्याहृतियाँ हैं। ॐकार पुरुष का प्रतीक है और महा व्याहृतियाँ प्रकृति की प्रतीक हैं। भू से तमोगुण, भुवः से रजोगुण और स्वः से सतोगुण का बोध होता है।
पुरुष ॐकार की तीन मात्रायें हैं, अ, उ, म्। प्रकृति-व्याहृति के तीन गुण हैं। गायत्री मंत्र के तीन चरण हैं। पुरुष और प्रकृति के सम्मिश्रण से गायत्री के 24 अक्षर प्रकट हुये हैं जो चौबीस तत्वों के सूचक हैं। गायत्री के 24 अक्षर वर्णमाला के सर्वोत्तम अक्षर हैं। उनमें से एक-एक के उच्चारण से सरस्वती देवी प्रसन्न होती है। ये चौबीस अक्षर सरस्वती के ही स्वरूप हैं। उनका ध्यान करने से महाविद्या सिद्ध होती है।
इस महामंत्र में सविता नारायण का ध्यान किया गया है। उसके अर्थ का ज्ञान होते ही सविता नारायण की महाशक्ति सावित्री प्रकट होती है। मंत्र के पदों में सरस्वती का निवास है, तो उसके पदार्थ और भावार्थ में सावित्री महामाया का निवास है। उसका ध्यान करने से महामाया के सब तत्व सिद्ध होते हैं। ऐसे साधक के वश में जगत के सर्व तत्व होते हैं।
इस मंत्र में तीन चरण हैं, हर एक चरण में आठ-आठ अक्षर हैं। इस छन्द का नाम गायत्री है। गायत्री छन्द का गान करने से महाशक्ति गायत्री प्रसन्न होती हैं। महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिये गायत्री मंत्र का विधिपूर्वक गान करना चाहिये। स्वर के आलाप के साथ गायत्री मंत्र का गान करने से साधक को महाशक्ति के दर्शन होते हैं। गायत्री महाशक्ति उसकी सब कामनाओं को सिद्ध करती है। इस मंत्र की व्याख्या करते हुए शास्त्र में कहा गया है-
मूलाधारात् हुतवहकला मिश्रितं भूर्भुवः स्वः।
ब्रह्मस्थानात् परम गहनात् तत्सवितुर्वरेण्यम्॥
भर्गो देवस्य शशिकलनं धीमहि दिव्य रुपम्।
धियोयोनः प्रणवममृतं प्रेरयेत् तत्परं यत्॥
अर्थात्-’सबका मूल आधार, अत्यन्त गहन ब्रह्म स्थान से भूर, भुवः स्वः (तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण) वाली त्रिविध प्रकृति में गति और स्फूर्ति आती है। इन त्रिगुण परमाणुओं में संघर्ष होने से अग्नि प्रकट होती है, उससे परमाणुओं का स्वाहाकार होकर द्रव पदार्थ बनता है। उसमें से प्रकाशवान रेखाओं जैसी कला प्रकट होती और उससे प्रणव (ॐकार) प्रकट होता है। यह सृष्टि के आदि में उत्पन्न होने वाला ॐकार ईश्वर की सर्वोत्तम प्रतिमा है।
उस आदि प्रतिमा ॐकार से जिस प्रकार और बहुत से आकार उत्पन्न हुये हैं उसी प्रकार गायत्री महामंत्र भी उसी से प्रकट हुआ है। यही कारण है कि गायत्री में आया हुआ ‘तत्’ शब्द इस ॐकार की तरफ ही संकेत करता है। वह ॐकार ही सविता नारायण देव का परम दिव्य, सर्वश्रेष्ठ और परम अमृत स्वरूप, सर्वोत्तम भर्ग (तेज) है। उसी ॐकार के तेज का हम ध्यान करते हैं कि वह हमारी बुद्धि को सद्प्रेरणा प्रदान करे।
जिस प्रकार गायत्री वेदमाता है उसी प्रकार षट् दर्शन, शास्त्र और पुराणों का ज्ञान भी गायत्री में समाविष्ट है। इस प्रकार सृष्टि के विकास को ही ब्रह्म विद्या कहते हैं। उसको जानने के लिये गायत्री मंत्र का निरन्तर मनन करना और उसके रहस्यों को हृदयंगम करना परम आवश्यक है।

