अब प्रत्येक गायत्री परिवार यह करे
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गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा सक्रिय रहे। अपने कार्य में शिथिलता एवं उपेक्षा न आने दें। साप्ताहिक सत्संग बराबर चलते रहें। जो सदस्य साप्ताहिक सत्संगों में अपने आप नहीं आते उन्हें घरों से बुलाकर लाने, एक दिन पूर्व सूचना देने का कार्यक्रम रखा जाय। इन सत्संगों में सामूहिक जप, हवन के अतिरिक्त प्रदर्शनों की व्यवस्था संस्था की पत्रिकाओं तथा गायत्री साहित्य की पुस्तकों में से कोई उपयोगी अंश पढ़ें जाने चाहिये। यह सत्संग कार्यक्रम चलते रहना किसी गायत्री परिवार शाखा के सजीव सक्रिय होने का चिन्ह है।
गायत्री परिवार के नए सदस्य बढ़ाने तथा नए स्थानों में शाखाएं स्थापित करने का प्रयत्न किया जाय। प्रत्येक सदस्य कम से कम दो नए सदस्य बनाने तथा प्रत्येक शाखा दो नई शाखा बनाने का प्रयत्न करे।
गायत्री ज्ञान मन्दिर के लिए प्रत्येक शाखा में स्थान नियत कर लिया जाय, जहाँ गायत्री माता का चित्र सुसज्जित चौकी पर प्रतिष्ठित रहे। प्रातः सायं आरती तथा भजन कीर्तन की व्यवस्था रहे। इस प्रत्येक ज्ञान मन्दिर में एक पुस्तकालय रहे। इस पुस्तकालय में केवल मनुष्य के नैतिक उत्कर्ष का ही साहित्य रहे। इस साहित्य का घर पर पढ़ने देने और वापिस लेने का कार्यक्रम चलता रहे।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति का आरंभ मथुरा से हुआ है। जिसमें एक हजार हवन कुण्ड थे। जितनी आहुतियाँ होती हैं उसके अनुसार अभी 23 हजार हवन कुण्डों में आहुतियाँ और होनी है। तब 24 हजार कुण्ड की पूर्णाहुति पूर्ण होगी। इस अधूरे संकल्प को पूरा करने के लिए प्रत्येक शाखा अपने यहाँ छोटा-बड़ा एक सामूहिक जप-अनुष्ठान तथा सामूहिक हवन करने का प्रयत्न करे। इन आयोजनों में भाग लेने वालों से गायत्री परिवार की निर्धारित तीन प्रतिज्ञाएं कराई जायं, तथा उन प्रतिज्ञाओं के विषयों को विस्तारपूर्वक समझने तथा कार्यान्वित करने संबंधी भाषणों की व्यवस्था की जाय।
जहाँ संभव हो वहाँ गायत्री ज्ञान मन्दिर के लिए एक छोटा सा स्वतंत्र स्थान बना लिया जाय। इसमें एक ऐसे सेवाभावी व्यक्ति के निवास की भी व्यवस्था हो जो आस-पास के क्षेत्र में नियमित रूप से धर्म प्रचार करने जाया करे और रात को उसी ज्ञान मन्दिर में लौट आया करे।
अपने गायत्री परिवार का आवश्यक खर्च चलाने के लिए व्रतधारी सक्रिय सदस्य एक मुट्ठी अनाज या एक-दो पैसा नियमित रूप से निकालें। इस प्रकार के व्रतधारी हर शाखा में अधिकाधिक बढ़ने चाहिए, ताकि शाखा और ज्ञान मन्दिर का कार्य अर्थ-संकोच के कारण रुकने न पावे।
दुष्प्रवृत्तियों को छुड़ाने के लिए 1. प्रचारात्मक 2. निषेधात्मक 3. विरोधात्मक आन्दोलन चलायें जायें। इसकी व्यवहारिक रूपरेखा अगले अंक में प्रस्तुत करेंगे।
स्थानीय धार्मिक संगठनों का एकीकरण करने का प्रयत्न किया जाय। मिलजुल कर कार्य चलाने की जहाँ सुविधा हो सके वहाँ रामायण, गीता, कीर्तन आदि की प्रधानता रखने वाली संस्थाओं को साथ ले लिया जाय। अलग-अलग उठते हुए अनेक धार्मिक संगठनों को एक सूत्र में पिरोने का प्रयत्न किया जाय।
पर्व त्यौहार, व्रत उत्सव सामूहिक रूप से मनाये जायं और उनका महत्व तथा संदेश जनसाधारण को बताया जाय, व्यक्तिगत रूप से जन्मदिन मनाये जायं उस दिन शिक्षा-उपदेश, जप हवन के क्रम रखे जायं। यज्ञोपवीत आदि महत्वपूर्ण संस्कार सामूहिक रूप से इस प्रकार किए जायं कि उनके कारण किसी पर आर्थिक दबाव न पड़े। इन संस्कारों के समय आवश्यक शिक्षाएं भली प्रकार दी जायं।
जहाँ संभव हो प्रतियोगिता, पुरस्कार, प्रतिस्पर्धा के सामूहिक आकर्षक आयोजन करके लोगों की सद्वृत्तियों को उभारा जाय।
इन दस कार्यक्रमों के अतिरिक्त स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार और भी ऐसे प्रयत्न किए जायं जिससे गायत्री माता तथा यज्ञ पिता के मूल तथ्य, सद्विचारों तथा सत्कर्मों का प्रसार होता रहे।
*समाप्त*

