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Magazine - Year 1960 - Version 2

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कुछ भूल जाना भी आवश्यक है।

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(पं. मुकटबिहारीलाल शुक्ल बी. ए. एल. एल. बी.)

सभी मनुष्यों और विशेष रूप से बुद्धिजीवी व्यक्तियों में स्मृति की प्रधानता है। इसको बड़ा सद्गुण समझा जाता है। विद्यार्थी हो या अध्यापक, वकील हो या जज, लेखक हो या वक्ता, डॉक्टर हो या इंजीनियर तीव्र स्मरण शक्ति से ये अपने कार्य में बड़ी सफलता प्राप्त करते हैं। कुछ लोगों की स्मरण शक्ति इतनी अच्छी होती है कि वह एक दफा जिस आदमी को देख लेते हैं, उसकी सूरत को कभी नहीं भूलते। प्राचीन काल में जब पुस्तकें छापी नहीं जाती थीं स्मरण शक्ति ही की सहायता से वेद तथा शास्त्र याद किये जाते थे और संस्कृत को तो प्रायः इसी प्रकार जीवित रखा गया है। हर विषय के अध्ययन में स्मरण शक्ति की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु इतिहास, भूगोल इत्यादि में तो यह विशेष रूप से सहायक होती है। स्मृति एक बड़ा लाभदायक गुण है। यह सभी स्वीकार करते हैं और समझते हैं कि विस्मृति एक अभाव है, कमजोरी है और अवगुण है। एक विद्यार्थी खूब याद कर लेने के बाद परीक्षा के समय जब पढ़ा हुआ पाठ भूल जाता है तो अपने को धिक्कारता है और चाहता है कि यदि उसमें विस्मृति जैसा अवगुण न होता तो वह निःसंदेह प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता। किसी वकील को अवसर पर जब कानून की कोई धारा अथवा नजीर याद नहीं आती या किसी डॉक्टर को बिना किताब देखे औषधियों के गुण और नाम याद नहीं आते अथवा किसी अध्यापक या वक्ता को पढ़े हुये वाक्य या कथन नहीं याद आते तो वह अपनी विस्मृति पर लज्जित होता है। विस्मृति को कोई नहीं चाहता और यही इच्छा करता है कि काश उसकी स्मरण शक्ति इतनी अच्छी होती कि वह किसी देखी, याद की अथवा सुनी हुई चीज को कभी नहीं भूलता ।

इसमें सन्देह नहीं कि स्मृति एक महान गुण है परन्तु यह समझ लेना कि विस्मृति एक अवगुण है और हानिकारक है भूल है। वास्तविकता यह है कि स्मृति की भाँति विस्मृति भी एक गुण है और जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है। यह आश्चर्य की बात भले ही लगे परन्तु निताँत सत्य है कि जितना याद रखना जरूरी है उतना ही भूलना भी आवश्यक है।

एक वृद्ध एवं निःसहाय आदमी का इकलौता जवान बेटा मर जाता है। उस बुड्ढे के लिये सारा संसार अंधकारमय दीखता है। वह लाचार है, दुखी है और जिन्दगी से बेजार है क्योंकि उसको हर समय अपने प्रिय पुत्र की जो उसके जीवन का एक मात्र सहारा था हरदम स्मृति बनी रहती है, उसका चित्र बुड्ढे के मानसिक नेत्रों के सामने से नहीं हटता, उसके कामों और गुणों को याद करके वह हरदम विह्वल होता है। उसकी दशा बड़ी दयनीय है, उसके मित्र आकर धैर्य रखने की सलाह देते हैं पर उसको धैर्य नहीं होता। बजाय धैर्य और साँत्वना के अगर उसको “भूल जाने” की सलाह दी जावे, और किसी प्रकार उसकी विस्मृति शक्ति को सक्रिय बना दिया जाय तो उसका कितना उपकार हो जावे। अगर किसी प्रकार उसकी स्मरण शक्ति लोप हो जावे और केवल विस्मरण शक्ति का उस पर प्रभाव हो तो उसको अपने पुत्र के वियोग का रत्ती भर भी दुख नहीं व्यापेगा, जिस प्रकार “क्लोरोफार्म” सूँघा देने पर शरीर की काट-छाँट करने पर भी कोई पीड़ा नहीं होती।

एक विद्यार्थी को परीक्षा में पास होने की पूरी आशा थी पर वह फेल हो जाता है। अपने अध्ययन का परिश्रम उसकी आँखों के सामने नाचता है जो हानि और लज्जा फेल हो जाने से हुई वह किस दशा में नहीं भूलता अथवा लोक सभा या अन्य किसी संस्था के चुनाव में जब कोई उम्मीदवार असफल हो जाता है तो उस ग्लानि, हानि और अपयश की स्मृति करके वह अधीर होता है। यह असफल विद्यार्थी और पराजित उम्मीदवार किसी को अपना मुँह नहीं दिखाना चाहते हैं और कभी-2 आत्म हत्या तक करने पर उतारू हो जाते हैं। यदि उस समय उनकी स्मरण शक्ति शून्य कर दी जाय और केवल विस्मृति का प्रभाव उनके मस्तिष्क पर रहे तो कैसा अच्छा रहे।

आप बड़े चिन्तित हैं आपके सगों ने जिन पर आपने जीवन भर उपकार किया आपके साथ विश्वास किया या आपके शिष्य अथवा संतान ने आपकी आज्ञा का उल्लंघन किया या आप जिनसे आदर सम्मान की आशा करते थे आपका अपमान और निरादर किया तो स्मृति ही के कारण आपको अपने उपकार याद करके महान् दुख होगा। और वही पुत्र, शिष्य अथवा मित्र ही जिनको आप अभिन्न समझते थे आज आपके शत्रु तुल्य दीख पड़ते हैं। अगर किसी प्रकार यह सम्भव हो कि - जो अपना कर्त्तव्य अथवा भलाई आपने उनके प्रति की उसको एक-दम से भूल जावें और वह आपको याद ही न रहे तो न तो आपको कोई दुख व्यापे और न पुत्र, शिष्य, मित्र ही के सम्बन्ध की ही इति श्री हो।

एक व्यक्ति किसी समय में बड़ी दरिद्रता पूर्ण जीवन व्यतीत कर चुका है अथवा सामाजिक बहिष्कार और अपमान का शिकार हो चुका है या अन्य प्रकार का कष्ट भोग चुका है। या पुराना जमींदार अथवा राजा जमींदार उन्मूलन तथा राज्य समाप्त होने के बाद अपनी वर्तमान स्थिति में जब उसे साधारण नागरिक जैसा जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है अतीत की याद करके रोता है झींकता है और अपने सुखद वर्तमान जीवन को भी अकारण क्लेशमय बनाता है केवल इसलिये कि उसमें विस्मृति का अभाव है। अगर वह सोने के अक्षरों में लिखी जाने वाली सूक्ति “बीती ताहि बिसार दे आगे सुधि लेय” का मनन चिन्तन और पालन कर सके, कैसा उत्तम हो।

उपरोक्त कतिपय उदाहरणों से सिद्ध होता है कि दुख चिन्ता जैसे रोगों को दूर करने में विस्मृति रामबाण का काम करती है। अमेरिका के प्रसिद्ध डॉक्टर का कहना है “वर्षों के अनुभव के बाद मैंने निर्णय किया है कि दुख और चिन्ता को दूर करने के लिये “भूल जाओ” से बढ़कर कोई औषधि नहीं है। पुरानी दुखद घटनाओं और मित्रों के अन्याय और कृतघ्नता एवं कटु स्मृतियों के प्रभाव से बचने के लिए अंग्रेजी में एक मात्रा नुस्खा “क्षमा करो और भूल जाओ” का है जिसके पान करने से प्रभु ईसामसीह को सूली की पीड़ा जरा भी नहीं आयी और महात्मा (सुकरात) को विष का प्याला पीने में कोई संकोच नहीं हुआ और वे दोनों हमेशा के लिए अमर हो गये।

हर समय प्रसन्न रहना या गाते रहना और परोपकार में लगे रहने से भी पुरानी कटु स्मृतियाँ भूली जा सकती हैं। मैंने एक योरोपियन अस्सी वर्षीय योगी “अकिल येहर” को बड़ा स्वस्थ बालक की भाँति फुर्तीला और सदा मुस्कुराते हुए देख कर उनसे पूछा कि आपकी प्रसन्नता और उत्तम स्वास्थ्य शायद इसलिये है कि आपको संसार का कोई कष्ट नहीं है और आपका सुखद जीवन है। तो उन्होंने उत्तर दिया कि साँसारिक कष्ट तो मुझे इतने हैं कि शायद ही किसी पर हों। मेरी पत्नी मर चुकी है। मैंने अपने इकलौते बेटे को उच्च शिक्षा दी, फ्लाइग ऑफीसर नियुक्त कराया। उसका विवाह किया परन्तु वह मुझ से रूठ कर चला गया और कई वर्ष हो गये एक पत्र तक नहीं डाला और हम दोनों को किसी की भी खबर नहीं है। मेरा कोई रिश्तेदार बुढ़ापे में मदद करने को नहीं है। कुछ दिनों तक मैं बड़ा रंज करता रहा और बीमार हो गया जिससे बचने की उम्मीद नहीं रही। इन विपत्तियों से छुटकारा पाने के लिए मैंने तय किया कि मैं पुराने इतिहास को भूल जाऊँगा और मैंने ऐसा ही किया। प्रत्येक युवक को मैं अपना लड़का समझता हूँ जो कोई भी मेरे पास आ जाता है उसको निःशुल्क योग आसन सिखलाता हूँ और इस प्रकार सैकड़ों रोगियों को स्वस्थ बना चुका हूँ। हर समय प्रभु का स्मरण करता हूँ और मग्न रहता हूँ। मुझे कभी ध्यान तक नहीं आता कि मेरा पहला दुखद इतिहास क्या था?

साराँश यह है कि जीवन को सुखमय और सफल बनाने के लिए स्मृति और विस्मृति दोनों ही आवश्यक हैं। परन्तु हमें गम्भीरता पूर्वक निश्चित कर लेना चाहिये कि हम क्या याद रखें और क्या भूलें। जो चीजें हमेशा याद करने की हैं वे हैं दूसरे का उपकार, कर्ज व किराये तथा बिलों का अदायगी, प्रभु प्रार्थना, व्यायाम, बड़ों को प्रणाम करना, अपने कर्तव्य का पालन, सुशिक्षाओं पर चलना, रोज का हिसाब लिखना, किसी के आये हुये पत्र का उत्तर अवश्य देना, किसी मीटिंग में समय पर पहुँचना खास तौर पर जब आपके इन्तजार में सभा का कार्य रुका रहे आदि। जिन बातों को भूलना लाभप्रद हैं वे हैं किसी प्रिय का वियोग, चिन्ता दुखद घटनायें, दूसरे की कृतघ्नता तथा अपकार, बुराई के बदले की भावना, पूर्वजों से चली आई पुरानी रंजिश, तथा कोई भी अप्रिय एवं प्रतिकूल घटना।

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