“चींटी के पग हस्ती बाँधे।”
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(श्री सन्त साहबदास)
कबीर साहब वेदान्त मत को गलत बतलाते थे। अर्थात् वे यह मानने को तैयार नहीं थे कि जीव और ब्रह्म एक ही हैं। क्योंकि ऐसा होने पर फिर उपासना, भक्ति, पूजा आदि की आवश्यकता ही जाती रहती है और मनुष्य में झूँठा अभिमान घुस जाता है कि हम तो ब्रह्म हैं, इसको साँसारिक नियमों और लौकिक प्रथाओं के मानने की क्या जरूरत है। इससे लोगों में उच्छृंखलता और कर्त्तव्य हीनता की प्रवृत्ति बढ़ती है। नीचे के पद में उन्होंने अपने ढंग से ऐसे ब्रह्म ज्ञानियों का खण्डन किया है-
बूझि लीजै ब्रह्मज्ञानी।
घोरि-घोरि वर्षा बरसावै, पुरिया बुन्द न पानी॥ 1॥
चींटी के पग हस्ती बाँधै, छेरी वीगै खायो।
उदधि माहँ ते निकसि छाँछरी, चौड़े गेह करायौ॥2॥
मेढुक सर्प रहै इकसंगै, बिल्ली श्वान वियाही।
निप उठि सिंह सियार सों जूझै, अद्भुत कथा नजाही॥3॥
संशय मिरगा तन मन घेरे, पारथ बाना में लै।
सायर जरै सकल वन डाहै, मच्छ अहेरा खेलै॥4॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना, को यहि ज्ञानहि बूझै।
बिन पंखे उड़ि जाहि अकाशै, जीवहि मरण न सूझै॥5॥
(1) ब्रह्म ज्ञान के फैलाने वाले गुरु लोग नये- नये ग्रन्थों को बनाकर लोगों को यह समझाने की बेहद चेष्टा कर रहे हैं कि ब्रह्म, जीव, माया सब एक ही है। उनकी वाणी वर्षा के समान शिष्य गण के बीच बरसती है, पर किसी के ऊपर एक बून्द पानी भी नहीं गिरता, अर्थात् उनमें से कोई भी ब्रह्म नहीं बन सका।
(2) चींटी का तात्पर्य बुद्धि से है क्योंकि वह चींटी के समान सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयों में प्रवेश कर जाती है और हाथी कहते हैं मन को, जैसे अनेक जगह लिखा है “मन-मतंग मानै नहीं”। पर बुद्धि ही मन का संचालन करती है। छेरी (बकरी) का तात्पर्य है माया से, उसने बीगा (भेड़िया) रूपी जीव को खा लिया। वास्तव में तो जीव का यह कर्त्तव्य था कि वह माया का नाश कर देता, पर माया ने उसे अपने प्रभाव में फँसाकर अपना अनुगामी बना लिया। इस विश्व रूपी समुद्र से निकल कर जीव ने इस विस्मृत जगत में माया द्वारा अपना घर बनवा लिया अर्थात् वह अपने आत्मरूप को भूलकर साँसारिक प्रपंचों में फँस गया।
(3) यह संसार कैसा है कि जहाँ मेंढक रूपी जीव और सर्प रूपी काल एक साथ रहते हैं। काल बराबर शरीरों को खाता रहता है और मेंढकों की तरह नये-नये शरीर उत्पन्न होते रहते हैं। बिल्ली से आशय है मनुष्य की मानसिक वृत्ति का, क्योंकि जैसे बिल्ली गारस (दूध दही आदि) को ढूँढ़कर खाती रहती है इसी प्रकार मन भी रस पूर्ण विषयों में लीन रहना पसन्द करता है। श्वान का अर्थ है साँसारिक आनन्द और भोग से, हमारी मानसिक वृत्तियाँ उसी में लग जाती हैं अर्थात् वे एक दूसरे से विवाहित अथवा सम्बन्धित हो जाते हैं। फिर यह संसार कैसा है कि यहाँ सदैव ज्ञान रूपी सिंह को अज्ञान रूपी सियार दबा देता है। इस प्रकार संसार की वास्तविक दशा को देखने से जान पड़ता है कि ब्रह्मज्ञानियों की बातें केवल जबानी जमा खर्च है। उनके द्वारा कोई मनुष्य ब्रह्म रूप नहीं बन रहा है बल्कि और भी अधिक प्रपंच में फँस रहे हैं।
(4) इस मानव शरीररूपी वन में संशय रूपी हिरन फिर रहे हैं। उनको मारने के लिए पारथ अर्थात् गुरु लोग ब्रह्मज्ञान रूपी बाण चलाते हैं। पर उनकी वाणी से संशय तो दूर नहीं होते हैं उल्टा सायर अर्थात् मनुष्य में स्वाभाविक रूप से पाया जाने वाला विवेक और सद्ज्ञान नष्ट हो जाता है। जब गुरुओं के शिष्य वही विपरीत ज्ञान दूसरे लोगों को देते हैं तो वे भी वनों की तरह जल जाते हैं। इस प्रकार लोगों को भगवान का ज्ञान जो होना था वह न हो सका तो जीव काल रूपी मगरमच्छ के शिकार बन जाते हैं।
(5) कबीर साहब कहते हैं कि यह संसार बड़ा अद्भुत है और ब्रह्म भी अद्भुत है। इन दोनों के सम्बन्ध में जिनको यह ज्ञान हो गया है कि ये भ्रम मात्र हैं, ऐसे पुरुष संसार में कदाचित् ही दिखने में आते हैं। पर जो बिरले मनुष्य इस बात को समझ लेते हैं कि यह मन और माया दोनों धोखे की बातें हैं अर्थात् इन्हीं के कारण मनुष्य संसार सागर में और नाना योनियों में भ्रमण करता फिरता है, वे मनुष्य फिर सहज में इससे उड़ जाते हैं अर्थात् इस के बाहर निकल कर भगवान को प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ कुछ लोग शंका करेंगे कि वह बिना पंख के कैसे उड़ सकेंगे तो कबीर साहब बतलाते हैं कि उपासना दो प्रकार की होती है। एक बन्दर के बच्चे की सी, जो स्वयं ही अपनी माता को पकड़े रहता है। उसी प्रकार ऐसा व्यक्ति भी नाना प्रकार के शास्त्रों से विचार करके और असत्व सिद्धान्तों का खण्डन करके स्वयं ही अपने उपास्यदेव को प्राप्त करता है। दूसरी उपासना बिल्ली के बच्चे की सी होती है, जो सब से नाता तोड़ कर केवल अपनी माता की आशा लगाये रहता है। वह बिल्ली जहाँ ठीक स्थान देखती है वहीं अपने बच्चे को उठा कर ले जाती है। उसी प्रकार जो जीव वेद, शास्त्र सबको छोड़ कर और किसी के खण्डन -मंडन में ध्यान न देकर केवल यह निश्चय कर लेता है कि मैं भगवान् का हूँ वे ही मेरा कल्याण करेंगे, उसको भगवान ही हंस रूप बना कर अपने लोक में ले जाते हैं।
इस प्रकार कबीर साहब ने “अहं ब्रह्मास्मि” न कह कर साँसारिक कर्तव्यों से दूर हटने वाले लोगों का खण्डन करके यह सिद्ध किया है कि कोरी ब्रह्मज्ञान की बातों से न तो संसार का काम चल सकता है और न जीव का उद्धार हो सकता है। उसका परम कर्तव्य यही है कि भगवान पर दृढ़ भरोसा रखकर उनकी आज्ञाओं के अनुसार सत्कर्म करता रहे। तभी उसका उद्धार होना सम्भव है।

