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Magazine - Year 1960 - Version 2

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भोजन और भजन का संबंध

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(श्री शम्भूसिंह कौशिक)

मनुष्य जीवन का लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है क्योंकि जीवात्मा उस परमात्मा का ही एक अंश है और अंश तब तक शान्ति को प्राप्त नहीं कर सकता जब तक वह अपने अंश में न मिल जावे। जैसे पानी का उद्गम स्थान समुद्र है। इसलिए इधर-उधर नदी नालों में भटकता हुआ अपनी जल समाधि की तलाश में छटपटाता रहता है और अपने पिता समुद्र की गोद में पहुँच कर ही शाँति की साँस लेता है। इसी प्रकार अग्नि की उत्पत्ति सूर्य से होने के कारण उसकी लपटें सदैव अपने प्रियतम से मिलने को ऊपर को लपलपाती रहती हैं चाहे उसे कितना ही नीचे झुकाया जावें। पानी और अग्नि की तरह तोता, मैना, कौआ, गाय, भैंस आदि पशु-पक्षी तथा मनुष्य भी सभी अपने अपने समूह में पहुँच कर चैन लेते हैं क्योंकि तोता तोते से मनुष्य मनुष्य से उत्पन्न होने के कारण वह उसी के पास सुखी रहता है। कोई भी तोता पिंजरे में बढ़िया दूध रोटी खाते हुए भी वहाँ सुख का अनुभव नहीं करता है जितना अपने स्वजातीय तोतों में। इसी प्रकार जीवात्मा इस संसार के नाना प्रकार के भोग साधनों को प्राप्त करके भी उतना सुख प्राप्त नहीं करता है जितना कि अपने परम पिता परमात्मा से मिलने में अनुभव करता है।

उस परम पिता परमात्मा से मिलने के लिए जीवात्मा छटपटाती रहती है और उसका निरंतर स्मरण करके ही शाँति का अनुभव करता है। जब जीव परमात्मा का स्मरण, ध्यान एवं नाम उच्चारण करता है तो उसके गुणों का भी चिन्तन करता है और उनसे आकर्षित होकर उससे मिलने के लिए तड़पने लगता है। इस जप, तप, पूजा उपासना से अन्तरात्मा में एक दिव्य घर्षण होता है। इस घर्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया से अन्तःकरण में एक आध्यात्मिक विद्युत उत्पन्न होती है जिसमें एक चैतन्य चुम्बकत्व सन्निहित रहता है। कुतुबनुमा की सुई पर चुम्बक होने से उत्तरी ध्रुव की तरफ की धाराएँ उस सुई को अपनी ओर आकर्षित करती रहती हैं। जब तक यह चुम्बक उस सुई पर रहता है तब तक ही उत्तरी धारा उसे अपनी ओर खींचती रहती है। इसी प्रकार जीवात्मा में परमात्मा के पूजन, भजन से उत्पन्न होता रहता है उससे प्रभावित व्यक्ति को वह परमात्मा भी अपनी ओर आकर्षित करता है अपनी गोद में बिठाता है और अपने दिव्य गुणों से उसे भर देता है। अनेक दिव्य तत्व स्वयमेव जीवात्मा में एकत्रित होते रहते हैं और परमात्मा तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। इसलिए प्रत्येक जीवात्मा को अपने परम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति, उसका पूजन, भजन, उसके गुणों को मनन चिन्तन की वैज्ञानिक क्रिया को निरंतर करते रहना चाहिए जब तक उन्नति की सीमा तक न पहुँच जावे।

प्रत्येक वस्तु के विकास की एक सीमा होती है उस सीमा तक उन्नति के लिए निरन्तर उपाय ही धीर पुरुषों का अर्थ रहा है। जीवात्मा के विकास की चरम सीमा परमात्मा का साक्षात्कार करना, अपने अन्तःकरण में परम तत्वों को धारण करना है। जिस प्रकार ‘अणु’ का अन्तिम विकास ‘विष्णु’ में मिलना, ‘अंड’ का ‘ब्रह्माँड’ बनना है उसी प्रकार जीवात्मा को अपनी पूजा उपासना द्वारा अपना विकास महात्मा, विश्वात्मा और परमात्मा बन जाता है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए उस प्यारे प्रभु के गुणों का चिन्तन और मनन निरंतर चलते रहना आवश्यक है। ‘भृंग कीट’ के उदाहरण में जब कीड़ा निरन्तर भृंग का ध्यान करता है तो वह शरीर समेत भृंग ही बन जाता है, इसी प्रकार मनुष्य भी भगवान के स्वरूप और गुणों की चिन्तन करता हुआ उसी जैसा बन जाता है।

वह परम पिता परमात्मा सर्वव्यापक और न्यायकारी है। जब जीवात्मा उसकी पूजा उपासना करता है तो उसे उस सर्वव्यापी सत्ता का बोध होने लगता है कि वह अन्तर्यामी प्रभु सारे जड़, चेतन पदार्थों में रमा हुआ है और हमारे अच्छे बुरे कर्मों का निरीक्षण कर रहा है। इस प्रकार उसकी सत्ता पर विश्वास होने लगता है कि वह सहस्रों नेत्रों से हमारे प्रत्येक के पाप पुण्य को देख रहा है। उसके विशाल नेत्रों से कोई बात छिपाई नहीं जा सकती है। जैसे कोतवाल के समक्ष चोर चोरी करने का साहस नहीं कर सकता उसी प्रकार सर्वव्यापी परमात्मा को सर्वत्र देखकर पूजा उपासना करने वाला भी कोई पाप कर्म नहीं कर पाता। वह बुराइयों से बचने लगता है और अच्छाइयों को ग्रहण करने लगता है। ऐसे अच्छे गुणों के ग्रहण करते रहने से वह व्यक्ति समाजोपयोगी बन जाता है। समाज में ऐसे उत्तम नागरिक ही उसकी व्यवस्था ठीक रख पाते हैं। समाज की व्यवस्था बनाये रखने के लिए उत्तम व्यक्ति आवश्यक है और उनके निर्माण के लिए परमात्मा की पूजा, उपासना का प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में स्थान होना आवश्यक है।

इस प्रकार परमात्मा के गुणों का मनन चिन्तन करते रहने से और उसके उपकारों के प्रति श्रद्धा से मस्तक झुकाने से नम्रता, मधुरता और सहिष्णुता आदि सद्गुण स्वयमेव उत्पन्न होने लगते हैं। उसके अन्तःकरण में सेवा की वृत्ति जागृत होने लगती है। वह सबको प्यार करने लगता है और सब उसको प्यार करने लगते हैं। इस प्रकार के सद्व्यवहार से वह इस लोक में यशस्वी बनकर जीवन व्यतीत करता है और मरने पर सद्गति को प्राप्त होता है। इस प्रकार लौकिक व्यवहार के लिए जो गुण आवश्यक हैं वे भी भगवान की पूजा उपासना से उत्पन्न होने लगते हैं। इसके लिए भी पूजा उपासना का जीवन में स्थान होना आवश्यक है।

शारीरिक विकास के लिए भोजन, पानी और हवा पर्याप्त मात्रा में मिलना आवश्यक है। इनके बिना शरीर का पूर्ण विकास संभव नहीं। इसी प्रकार मन का पूर्ण भोजन उत्तम विचार है। इनके अभाव में मनुष्य कुँठित हो जाता है स्वाध्याय, सत्संग, शिक्षण, चिन्तन आदि के बिना मनुष्य का मस्तिष्क पशु श्रेणी में ही बना रहता है। जिस प्रकार शरीर के लिए संतुलित भोजन, मन के लिए उत्तम विचार आवश्यक है उसी प्रकार जीवात्मा को स्वस्थ रखने, बलवान बनाने और विकसित करने के लिए नित्य प्रति भगवत् साधना का संतुलित भोजन आवश्यक है। जैसे भोजन के अभाव में शरीर का विकास रुक जाता है और उत्तम विचारों के न मिलने पर मन कुँठित हो जाता है उसी प्रकार भगवान की पूजा उपासना न करने से भी जीवात्मा की शुभ करने की प्रेरक शक्ति कुँठित हो जाती है और अपने पूर्ण विकास की स्थिति परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रह जाती है।

जीवात्मा को निर्मल बनाने पर ही दिव्य तत्वों का आभास होता है। इसलिए जिस प्रकार घर की सफाई के लिए बुहारी लगाना, कपड़ों की सफाई के लिए साबुन लगाना, शरीर शुद्धि के लिए स्नान करना आवश्यक है उसी प्रकार संसार की दुष्प्रवृत्तियों के प्रभाव से जीवात्मा पर जमा होते रहने वाले कुसंस्कारों एवं मल विक्षेपों को हटाते रहने के लिए परमात्मा के पवित्र नामों का उच्चारण और उस के गुणों का चिन्तन करना आवश्यक है। इसके बिना अन्तःकरण में जमे हुए कुसंस्कार नष्ट नहीं होते हैं। जिस प्रकार बिना चौका लगाये भोजन करना उचित नहीं है इसी प्रकार बिना परमात्मा के भजन के दैनिक जीवन प्रारम्भ करना अशुद्ध ही रहता है।

जिस परम पिता परमात्मा ने यह अमूल्य मानव देह प्रदान किया है उसके प्रति नित्य कृतज्ञता के भाव प्रकट करना हमारा परम कर्त्तव्य है। कृतज्ञता मनुष्य जीवन में एक आवश्यक गुण है। इसके अभाव में मानव ही दानव बन जाता है। जो जीव अपने पर किये गये उपकारों का बदला नहीं चुकाता और उपकारियों का कृतज्ञ नहीं रहता वह तो पशुओं से भी गिरा समझा जाता है। बहुत से पशु, नेवला, गाय, भैंस, घोड़ा, कुत्ता आदि में भी यह गुण न्यूनाधिक मात्रा में सन्निहित रहने से वे मनुष्य को प्यारे हैं। कुत्ता अपने मालिक के उपकारों के बदले में नित्य प्रति पूँछ हिलाकर, पैर चाटकर अपने कृतज्ञता के भाव प्रकट करता रहता है। जो अपने ऊपर किये उपकारों को भूल जाता है उपकारी के प्रति प्रत्युपकार की भावना नहीं रखता वह कृतघ्न कहलाता है। ऐसे लोगों की कृतघ्नियों की शास्त्रकारों ने भरसक निंदा की है। यहाँ तक कहा है कि “कृतघ्न का माँस राक्षस भी नहीं खाते हैं।” जहाँ कृतज्ञता एक उच्च कोटि का गुण है वहाँ वह कृतघ्नता निकृष्ट कोटि का अवगुण है इसी कृतज्ञता तत्व के विकास के लिए हमारे धर्म में तो चूल्हा, चक्की, कुआँ, तालाब, पेड़, बैल, हल, यहाँ तक कि कूड़े के घूरे तक का पूजन करने का विधान बताया है और समय-समय पर वह सब किया भी जाता है। माता पिता और गुरुजन जिन्होंने इस शरीर के उत्पन्न करने और पालन करने में उपकार किये हैं उनको नित्य प्रति चरण स्पर्श करके प्रणाम करके हम अपने कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं। जो पितृ और ऋषि शरीर त्याग चुके हैं उनके उपकारों के प्रति श्राद्ध करके हम कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं। युग पुरुष महात्मा गाँधी के निधन दिवस पर सभी मनुष्य उनके उपकारों के लिए उनकी दिवंगत आत्मा को श्रद्धाँजली अर्पित करके यही भाव प्रकट करते हैं। तो फिर जिस परम पिता ने यह बहुमूल्य मानव शरीर प्रदान किया और नाना प्रकार के उत्तम पदार्थ दिये हैं, उसके प्रति नित्य प्रति उसकी पूजा उपासना द्वारा कृतज्ञता न प्रकट करने पर हम कर्त्तव्यच्युत एवं कृतघ्न बन जाते हैं।

वैसे तो उस परमात्मा की कृपा सभी प्राणियों को समान रूप से प्राप्त रहती है परन्तु जिस प्रकार जो बच्चा माता को अधिक याद करता रहता है, अधिक प्यार करता है, अधिक मचलता है, उसके मिलने के लिए व्याकुलता प्रकट करता है। माता उस बालक से जल्दी मिलती है। इसी प्रकार परमात्मा से मिलने के लिए जो जीवात्मा विशेष प्रयत्न पूर्वक लालायित हो उठता है वह उसकी समीपता तथा कृपा जल्दी प्राप्त कर लेता है। जो बछड़ा अपनी माता गाय के स्तन सहलाता है उसे ही प्यार से वह दूध पिलाती है, उसी प्रकार उस परमपिता परमात्मा का अनुग्रह अमरत्व उसे ही प्राप्त हो पाता है जो उसकी नित्य पूजा, उपासना करता है, उसके कार्य करने के लिए हनुमान की तरह, अर्जुन, प्रहलाद की तरह तत्पर रहता है।

नित्य जीवन में नियमित रूप से सर्वव्यापी परमात्मा का पूजन भजन करने से जीवात्मा में सद्गुणों का विकास आरंभ होने लगता है, वह बुराइयों से बचने लगता है, उनके व्यवहार में सात्विकता बढ़ जाने से सब संतुष्ट होने लगते हैं, वह सेवाभावी बनने लगता है। फलस्वरूप उसे संसार में समुचित श्रेय एवं सम्मान भी प्राप्त होता है। कहने का साराँश यह है कि उसका समस्त जीवन पुण्यमय बनने लगता है जिसका परिणाम है सुख शाँति एवं स्वर्ग, मुक्ति। इसलिए उस परमात्मा की पूजा उपासना करके अपनी आत्मा में दिव्यतत्वों का विकास करना ही इस मानव जीवन का लक्ष्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आत्मा का भोजन - भजन करने के पश्चात् ही शरीर का भोजन करना सार्थक है। इसीलिए तत्व दर्शियों की एक महत्वपूर्ण उक्ति ध्यान रखने ही योग्य है कि - “भोजन उसी को करना चाहिए जो भजन करता है।”

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