गायत्री रहित ब्राह्मण की दुर्गति
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गायत्री उपासना मानव मात्र की उपासना है। इस ईश्वर की वाणी को हृदयंगम करना और उसकी उपासना में तत्पर होना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है। परन्तु ब्राह्मण कुल में उत्पन्न अथवा ब्राह्मणत्व की आकाँक्षा करने वाले लोगों के लिए तो वह नितान्त आवश्यक है। शास्त्र कारों ने गायत्री उपासना को ब्राह्मण का अनिवार्य कर्त्तव्य बताया है और आदेश दिया है कि जीवन के अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्यों में गायत्री उपासना को प्रथम स्थान देना चाहिए। जो इस धर्म कर्त्तव्य का पालन नहीं करते, उनकी जगह-जगह तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें शूद्र चाण्डाल आदि कहा गया है। देखिए :-
गायत्री रहितो विप्रः शूद्रादृष्य शुचिर्भवेत्।
गायत्री ब्रह्मतत्वज्ञाः संपूज्यते जनै द्विजाः।
पागसर स्मृति 2-32
अर्थात्- जो ब्राह्मण गायत्री से रहित है वह शूद्र के समान अपवित्र है। जो ब्राह्मण ब्रह्मतत्त्व गायत्री को जानता है वही पूजने योग्य है।
गायत्री यो न जानाति ज्ञात्वा नैव उपासयेत्।
नाम धारक मात्रो सौ न विप्रो वृषली हि सः॥
जो गायत्री को नहीं जानता, यदि जानता भी है तो उपासना नहीं करता, ऐसा नाम मात्र का ब्राह्मण ‘वृषल’ शब्द से निन्दित होता है।
एवं यस्तु विजनाति गायत्रीं ब्राह्मण गुरुः।
अन्यथा शुद्र धर्मस्या द्वेदानाभपि पारगः।
-योगी याज्ञवलक्य
जो ब्राह्मण गायत्री को जानता और जपता है वही सच्चा ब्राह्मण है। जो गायत्री की उपेक्षा करता है वह वेद में पारंगत होने पर भी शूद्र समान है।
अज्ञात्वा चैव गायत्री ब्राह्मणया देव हीयते।
अपवादेन संयुक्तो भवेच्छु तिनिदर्शनात्। यो. दा.
गायत्री को न जानने वाला ब्राह्मण ब्राह्मणत्व से हीन और लोक निन्दित हो जाता है। ऐसा वेदों में कहा गया है।
गायत्र्युपासना नित्या सर्व वेदैः समीरिता।
यस्या विनात्वधः पातो ब्राह्मणस्याति सर्वथा।
देवी भागवत 12। 8
अर्थात्- वेदों में नित्य गायत्री उपासना करने का आदेश है। गायत्री उपासना न करने से ब्राह्मण की सब प्रकार अधोगति होती है।
सन्ध्या नोपासते यस्तु ब्राह्मणो हि विशेषतः।
सजीवन्नेव शूद्रः स्यान्मृतः स्वाचैव जायते।
दक्ष स्मृति 1-22
जो व्यक्ति, विशेषतया ब्राह्मण, संध्या उपासना नहीं करता, वह जीवित रहते शूद्र है और मृत्यु के उपरान्त श्वान बनता है।
केवलं वा जपेन्नितयं ब्राह्मणस्य च पृतये।
सहस्रभ्यसोन्नित्यं प्रातर्बाह्मण पुँगवः ।
-शिव वि 13 -18
ब्राह्मणत्व का आवश्यक कर्त्तव्य पालन करने के लिए प्रातः काल एक हजार गायत्री मंत्र जपना आवश्यक है।
गायत्रीष्वप्य विश्वासो यस्य विप्रस्य जायते।
स एव यवनो देवि, गायत्री स कथं जपेत्।1।
तस्य संसर्गिणों विप्राः पतिता स्तेऽत्र निन्दिताः।
गायत्री रहितस्यान्नं यवनादधमं स्मृतम्।2।
गायत्री रहितो विप्रः स एव पूर्व कुक्कुरः।
स चाणडाल समो देवि, किं तस्य जप पूजनम्।3।
-गायत्री तंत्र, तृतीय पटल।
अर्थात्- हे देवि, जिस ब्राह्मण का गायत्री पर विश्वास नहीं उसे यवन समान जानो। भला ऐसा व्यक्ति उपासना क्यों करेगा? उसके तो साथ रहने वाला भी पतित और निन्दित हो जायेगा। इसलिए उसका अन्न भी नहीं खाना चाहिए। जो ब्राह्मण गायत्री रहित है उन्हें इस जन्म के चाण्डाल और पूर्व जन्म के श्वान समझो। ऐसे को जप पूजन कैसा?
वेदभक्ति विहीनाश्च पाखण्ड मत गामिनः।
अग्नि होत्रादि सर्त्कम स्वधा स्वाहा विवर्जिताः।
पण्डिता अपि ते सर्वे दुराचार प्रवर्तकाः।
वेद भक्ति से विहीन, पाखण्डियों के मत पर चलने वाले अग्निहोत्र और स्वाहा स्वधा से रहित, ऐसे दुराचार प्रवर्तक पण्डित नारकीय है।
अन्य देवताओं की उपासनाएं साँसारिक लाभों सकाम प्रयोजनों, या सीमित लाभों के लिए होती हैं। पर आत्मबल प्राप्त करने के लिए तो गायत्री का ही आश्रय लेना पड़ता है। गायत्री को त्याग कर अन्य उपासनाओं में लगा रहा जाय तो अन्य प्रकार के लाभ मिल सकते हैं पर आत्म बल के लाभ से वंचित ही रहना पड़ेगा। इसलिए शास्त्रकारों ने ब्राह्मण के लिए यह आवश्यक बताया है कि गायत्री उपासना करने के अतिरिक्त यदि अन्य साधनाएं करना चाहे तो कर सकता है, पर इस महामंत्र को त्याग कर यदि उसने अन्य मंत्रों या अन्य देवताओं का सहारा लिया है तो यह उसकी भूल है। इस भूल के फलस्वरूप उसे ब्रह्मतेज का अभाव ही रहेगा।
अन्य कोई वस्तु उसे चाहे भले ही मिल जाय। इसलिए अन्य उपासनाओं के लिए गायत्री का त्याग करना उचित नहीं। यदि अन्य उपासनाएं करनी ही हो तो प्रथम स्थान गायत्री उपासना को देकर तब अन्य उपासनाएं करे।
गायत्री यः परित्यज्य चान्य मंत्रमुपासते।
न साफ ल्य मवानोति जन्म कोटिः शतैरपि।
-संध्याभाष्य
जो मनुष्य गायत्री मंत्र को त्याग कर अन्य मंत्रों की उपासना करता है वह चिरकाल में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
विहायताँ तु गायत्री विष्णु पास्ति परायणः।
शिवो पास्ति रतो विप्रो नरकं याति सर्वथा।
देवी भागवत्
जो विप्र गायत्री को त्याग कर विष्णु शिव आदि देवों की उपासना में रत है वह नरक को जाता है।
यज्ञ, जप, संस्कार ब्रह्मभोज, आदि धर्म कार्यों में केवल उन्हीं ब्राह्मणों को सम्मिलित करने की आज्ञा शास्त्रकारों ने दी है जो गायत्री उपासना नियमित रूप से करके अपने ब्राह्मणत्व को जीवित रखे हुए हैं। जिनने अपने इस कर्त्तव्य का त्याग कर दिया, जो गायत्री उपासना नहीं करते, उन्हें ऐसे धर्म कार्यों में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए।
न तिष्ठति तु यः पूर्वां नो पास्ते यश्च पश्चिमाम्।
स शूद्रवद् वहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विज कर्मणः।
अर्थात् जो प्रातः और सायं संध्या उपासना नहीं करता उसे सर्व द्विजोचित कर्मों से बहिष्कृत कर देना चाहिए।
अनभ्यासेन वेदानाम् आचारस्य च वर्जनात्।
आलस्यात् अन्न दोषाश्च मृत्युर्विप्रान जिघाँसति॥
वेदों का अभ्यास न करने से, आचार छोड़ देने से, आलस्य से, कुधान्य खाने से ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है।
स्वयं शुद्धो हि पूतात्मा नरोन संत्रातु मर्हति।
गायत्री जप शुद्धो हि शुद्ध ब्राह्मण उच्यते।
गायत्री जप में शुद्ध हुआ ब्राह्मण ही शुद्ध कहा जा सकता है। जो स्वयं शुद्ध हो चुका है वही दूसरों को भी शुद्ध कर सकता है।
तत्स्माद्दानं जपे होमे पूजायाँ सर्व कर्मणि।
दानं कर्तुं तथा त्रातु पात्रं तु ब्राह्मणोर्हति।
इसलिए दान, जप, होम, पूजा आदि कर्मों में केवल सत्पात्र ब्राह्मण को ही लेना चाहिए।
लक्ष द्वादश युक्तस्तु पूर्ण ब्राह्मण ईरितः।
गायत्र्या लक्ष हीनं तु वेद कार्ये न योजयेत्।
शिव 13-4-6
बारह लाख गायत्री जपने पर ही पूरा ब्राह्मण कहलाता है। जिसने एक लाख भी जप न किया हो उसे वेद कार्यों में सम्मिलित न करना चाहिए।
चतुर्विशति लक्षं वा गायत्री जप संयुतः।
ब्राह्मणस्तु भवेत्पात्रं सम्पूर्ण फल योगदम्।
शि. वि. 15-14
जिस ब्राह्मण ने 24 लक्ष गायत्री जप कर लिया हो वही ‘सत्पात्र’ कहलाता है। उसी से फल की आशा की जा सकती है।
ब्राह्मण को भूसुर अर्थात् पृथ्वी का देवता कहते हैं। उसे ‘अपने पद और गौरव की रक्षा के लिए ब्राह्मणोचित कर्म जिनमें गायत्री उपासना प्रथम है - करने ही चाहिए। जो उन्हें न करके साधारण साँसारिक झंझटों में अपना जीवन नष्ट करता रहता है भारी भूल करता है। यों मनुष्य जन्म ही दुर्लभ है पर ब्राह्मण होना तो और भी बड़ा सौभाग्य है। जिन्हें यह सौभाग्य प्राप्त है वे अपनी इस देह को क्षुद्र कार्यों में न लगाकर आत्म कल्याण का मार्ग अपनावें। उपासना द्वारा आत्म बल प्राप्त करें और संसार में धर्म वृद्धि के लिए कटिबद्ध रहें।
ब्राह्मणस्य च देहोऽयं क्षुद्र कामाय नेष्यते।
कृच्छाय तपसे चेह प्रेत्यानन्त सुखाय च।
अर्थात्- ब्राह्मण का यह देह क्षुद्र कामों के लिए नहीं है। वह इस लोक में कठिन तप करके परलोक से सद्गति प्राप्त करने के लिए ही है।

