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Magazine - Year 1967 - Version 2

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यों तो आध्यात्मिक दृष्टि से मौन का महत्व अनन्त है। मौन को मानसिक-तप कहा गया है, जिसकी साधना मनुष्य को मुनि बना देती है। मौन का आश्रय लिये बिना कोई भी मुमुक्षु लक्ष्य की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। जीवन की सारी साधनाओं में मौन का विशेष स्थान है। किन्तु लौकिक, दृष्टि तथा साँसारिक व्यवहार में भी इसका मूल्य, महत्व कम नहीं है।

मौन से मनुष्य में गम्भीरता की वृद्धि होती है। गंभीर व्यक्ति का आदर करने के लिये सभी तैयार रहते हैं। लोगों का उसमें विश्वास बढ़ता है। यहाँ तक कि पारिवारिक प्रसंगों तथा झगड़ों में लोग ऐसे बोझ वजन वाले व्यक्तियों का पंच तक बना लेते हैं और उसके निर्णय को शिरोधार्य करते हैं। मोहल्ले बस्ती में अल्पभाषी बड़े-बूढ़ों को सभी लोग आदर के भाव से देखते हैं। कम वाचालता अथवा अल्प भाषण के आधार पर यह सामाजिक आदर-भाव कुछ कम मूल्यवान् नहीं है।

यद्यपि सामाजिक सम्मान में व्यक्तिगत लाभ का दृष्टिकोण रखना उचित नहीं है। लोगों का आदर-भाव स्वयं एक बड़ा लाभ है। इससे व्यक्ति का आचरण, विचार भाव तथा आत्मा सब में निखार एवं अनुशासन आता है, जिससे जीवन में एक अनिर्वचनीय शीतलता एवं सन्तोष की अनुभूति आती है। उत्तरदायित्व का भाव बढ़ता है जो कि जीवन के हर क्षेत्र में उपयोगी होता है। तथापि इससे अन्य अनेक प्रकार के अनचाहे स्थूल लाभ भी होते हैं और हो सकते हैं। लोक-प्रिय व्यक्ति का कोई काम रुकने नहीं पाता। उसके दुःख-दर्द तथा अभाव आवश्यकता को लोग अपना समझते और हर समय यथासाध्य सहायता सहयोग करने को तैयार रहते हैं। लौकिक दृष्टि से यह लाभ जीवन विकास में कम उपयोगी नहीं होता।

जीवन में मौन समावेश कर लेने से अथवा अल्पभाषी स्वभाव का विकास कर लेने पर निश्चय ही व्यक्तित्व में गरिमा की वृद्धि होती है। मुख पर एक आभा का आभास वास करने लगता है। गरिमावान व्यक्ति परिचितों में ही नहीं अपरिचितों के बीच विदेश अथवा अनजान जगहों में अपना स्थान बना लेता है। बहुत बार रेलों, स्टेशनों तथा सार्वजनिक स्थानों आदि में लोग चुपचाप दूर खड़े व्यक्ति के लिये स्थान की व्यवस्था कर देते हैं, अपना स्थान तक देने को तैयार हो जाते हैं जब कि स्थान के लिये झक झक करने और लड़ने-झगड़ने वाले लोगों की सुविधा का कम ध्यान रखते हैं। बहुधा देखा जाता है तेज-तर्रार और वाद-विवाद करने वाले लोग खड़े रहते हैं और मौन तथा किनारा कश लोगों को बैठने का स्थान मिल जाता है। इस प्रकार की अनेक छोटी-मोटी सुविधायें जीवन में अनेक बार बड़े-बड़े कार्य सम्पादित कर देती हैं जब कि छोटी से छोटी असुविधा कुछ न कुछ प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष मानसिक हानि तो करती ही है।

मित-भाषण अथवा मौन से वाणी में प्रभाव बढ़ता है। इसमें आध्यात्मिक प्रभाव क्या और कितना आ जाता है इस बात को छोड़कर यदि लौकिक प्रभाव पर विचार किया जाये तो एक मोटी-सी बात तो यह होती है कि अनावश्यक वाणी का अपव्यय न करे आवश्यकतानुसार समय पर बोला या बात की जाती है तो मौन द्वारा संचित शक्ति भी शब्दों के साथ बाहर निकलती है, विश्राम पायी हुई स्वर नलिकायें परिपूर्ण स्वर निष्क्रमण करती हैं जिससे न केवल आवश्यकतानुसार कथन का ही सम्मान होता है बल्कि शक्ति सम्पन्न धीर गम्भीर स्वर भी अपना एक विशेष अर्थ रखता है।

बकवासी की तरह बहुधा लोग मित-वक्ता की वाणी में अनृत अथवा असत्यता का सन्देह नहीं करते और अधिकतर उसके कथन का मूल्याँकन ही करते हैं। समाज में वचनों का मूल्याँकन कम महत्व की बात नहीं है। इससे साख बढ़ती और विश्वासपूर्ण वातावरण का निर्माण होता है।

मौन रहने से मुख पर एक सौम्यता तथा सरलता का भाव निवास करने लगता है जिससे समिति आदि भाव-भंगिमाओं में ही नहीं दृष्टि में आकर्षण का चमत्कार उत्पन्न हो जाता है, जो परकीयों को भी अपना और अनेक अवस्थाओं में विरोधियों को भी सहयोगी बना लेता है। इस सामान्य लाभ को शुभ लाभ की सूची में रक्खा जा सकता है।

अमौन अथवा वाचालता बेकार का बातूनी बना देता है। वाचाल स्वभाव का व्यक्ति एक छोटे तथा महत्वहीन प्रसंग पर बोलता बकता चला जाता है, जिससे स्वभाविक है कि उसकी बातों में अतिरेकता, अतिशयता, अतिशयोक्ति, व्यर्थता, अनुपयुक्तता, अनुपयोगिता यहाँ तक कि अनर्गलता का समावेश हो जाये। किसी के कथन के यह दोष जल्दी ही पहचान लिये जाते हैं तब लोग उसकी बातों पर विश्वास तो क्या ध्यान देना तक छोड़ देते हैं। अनेक लोग उससे बात करने से कतराते और चटुल लोग तो मखौल तथा उपहास तक करने लगते हैं। वाचाल व्यक्ति झूठे के नाम से बदनाम हो जाता है और बहुत बार लोग उसकी सही बात को भी लन्तरानी समझ लेते हैं। मौन अथवा मित भाषण इस वाचालता के दोष से बचाता और उससे होने वाली हानि से रक्षा करता है जो एक लाभ ही माना जायेगा।

वाचालता बहुत बार निन्दा स्तुति, वाद-विवाद, खंडन कहा-सुनी और यहाँ तक कि कभी-कभी कटुता तथा गाली-गलौज तक की नौबत ला देती है, जबकि मितभाषण में इस प्रकार की कोई सम्भावना नहीं रहती। कम बोलने का अभ्यासी चुपचाप दूसरे की बात सुनता रहता है, उसे बोलने, वाद-विवाद अथवा कहा सुनी में पड़ने के लिये तरंग ही नहीं आती। ऐसी दशा में उससे किसी की अप्रियता होने का प्रश्न ही नहीं उठता। बल्कि वह दो के बीच में समाधान करने वाला पंच बना लिया जाता है जिससे कण या दो कण ही सही उसकी मान्यता बढ़ती ही है।

मौन से मनुष्य में सहन-शक्ति की वृद्धि होती है इसका एक कारण तो यह है कि अधिक बात करने से मनुष्य की जिस प्राणशक्ति का व्यय होता है मौन के अभ्यास में उसकी बचत होती रहती है। शरीर में शक्ति का संचय सहनशक्ति बढ़ा देता है। जो जितना निर्बल होता है वह उतना ही असहनशील होता है यह एक स्वास्थ्य सम्बन्धी नियम है। निर्बल व्यक्ति की तरह शक्तिवान् व्यक्ति को जल्दी क्रोध नहीं आता। अनेक अप्रिय प्रसंगों को वह हंस कर टाल जाने की क्षमता रखता है। निश्चय ही मौन साधना से उस शारीरिक तथा मानसिक शक्ति का विकास किया जा सकता है। कहावत प्रसिद्ध है कि एक चुप सौ बालाओं को टालती है। जहाँ किसी अप्रिय प्रसंग के समय मौन हो जाने वाला पक्ष संघर्ष टालने में सहायता करता है वहाँ मौन का सामान्य अभ्यासी अपने मितभाषी अथवा मौन स्वभाव के कारण परिस्थिति का प्रारंभ ही नहीं होने देता। बहुत बोलने और बात करने से एक छोटी-सी बात भी तूल पकड़ जाती है। उत्तर-प्रत्युत्तर से क्रोध बढ़ता है और बात सुलझाने के स्थान पर अधिक उलझ जाती है। अप्रिय प्रसंग के समय मौन रहने वाला पक्ष प्रायः जनमत को अपने पक्ष में कर लेता है और असंघर्षशील अथवा सज्जन पुरुष का नाम पा लेता है इस प्रकार मौन के आधार पर सहनशीलता आती है और सहनशीलता के आधार पर संघर्ष अथवा कलह के दुष्परिणामों से बच जाना लाभ का ही विषय है।

गोपनीयता मौनता की विशेष देन है। वाचाल व्यक्ति न तो अपने रहस्यों अथवा मन्तव्यों की रक्षा कर सकता है और न दूसरे के । उसकी अनियंत्रित जुबान भेद उद्घाटन किये बिना चैन ही नहीं पाती। जबकि मौन द्वारा अपनी वाणी पर अधिकार वाला व्यक्ति रहस्यों को आसानी से हृदय में रखे रहता है। व्यवसाय, व्यापार तथा राजनीति के क्षेत्र में गोपनीयता का बहुत मूल्य है। संगोपन भाव वाले व्यक्तियों की वेदना, पीड़ा तथा अभावों को लोग नहीं जान पाते। संसार में दुष्टों प्रवंचकों, विरोधियों, असद्भावियों तथा बिडम्वकों की कमी नहीं। यह लोग दूसरे के भेद तथा रहस्यों अथवा मन्तव्यों को जान कर हानि पहुँचाने की कोशिश किया करते हैं। मौनता का अभ्यास बहुत हद तक इन असज्जनों की रक्षा किये रहता है। बहुत से लोग तो प्रदेशों, बाजारों यात्राओं तथा अपरिचितों में केवल इसी कारण ठगे जाते हैं कि अपनी व्यर्थ की वाचालता के कारण वे जल्दी ही खुल जाते हैं और अपने रहस्य बतला दिया करते हैं।

वाणी का अपव्यय न करने अथवा मौनता को महत्व देने से विचार-शक्ति बढ़ती है। बुद्धि अपेक्षाकृत अधिक स्थिर तथा संतुलित रहती है। संतुलित विचारों वाला हानि लाभ हित-अहित के प्रसंगों पर बड़े धैर्यपूर्वक सोच-समझ सकता है। संकट अथवा आपत्ति के समय मौन द्वारा प्रखर की हुई विचार शक्ति बड़ी सहायक सिद्ध होती है। कभी भी देखा जा सकता है कि जब मनुष्य किसी गहन प्रसंग पर सोचना चाहता है तब वह एकान्त की तलाश करता है। न तो वह उस समय बोलता और न किसी से बात ही करता है। बोलना और विचार दोनों क्रियाएं एक साथ नहीं हो सकतीं। विचारक जितने गहरे मौन में उतरता जाता है उतना ही समस्याओं का सार्थक हल खोज लाता है। महात्मा गाँधी को जब-जब किसी विकट समस्या पर विचार करना होता था, तब-तब वे अनेक दिनों का मौन व्रत ले लिया करते थे।

मौनता का गुण कार्य में एकाग्रता तथा दक्षता बढ़ा देता है। जो जितना मौन रहकर काम करता है वह उतना ही अधिक कुशल तथा सही काम कर लिया करता है। बातूनी का काम कभी भी पूरी मात्रा में सही-सही नहीं हो पाता। इस बात का एक बहुत बढ़िया उदाहरण महाभारत के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है।

भगवान् वेद व्यास ने महाभारत लिखने का विचार बनाया तब उन्हें एक लेखक की आवश्यकता अनुभव हुई। क्योंकि उस वृहत् ग्रंथ के प्रसंगों पर विचार और लेखन क्रिया एक साथ नहीं चल सकती थी। उसमें अपेक्षाकृत अनेक गुना समय लगता। वे बोलते जायें और कोई लिखता जाये-इस प्रकार से ही वह महान कार्य सुविधापूर्वक अपेक्षित समय में हो सकता था। निदान उन्होंने गणेशजी का सहयोग प्राप्त किया। पूरी महाभारत लिख जाने के बाद व्यास जी ने पूछा-गणेशजी आप इस बीच में बोले बिल्कुल नहीं। गणेश जी ने कहा कि यदि मैं बीच बीच में बात करता चलता तो निश्चय ही आपका यह काम होना कठिन ही नहीं भार बन जाता। बोलने से मनुष्य की कार्यशक्ति का ह्रास होता है जबकि मौनता पूर्वक कार्य करने से कार्य में रुचि आती है और जल्दी होता है। इस प्रकार यदि विचार किया जाए तो पता चलेगा कि मौनता को महत्व देने से आध्यात्मिक ही नहीं न जाने कितने लौकिक लाभ होते हैं। जहाँ वाचालता एक दुर्गुण है वहाँ मौनता एक दैवी गुण है जिसका अपने में विकास करना ही चाहिए। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य बिलकुल बात ही न करे। मौनता का मूल मन्तव्य यह है कि जितना आवश्यक हो उतना ही बोला जाये। अनावश्यक वार्तालाप न करना अथवा यों ही निरर्थक दिन भर हा-हा, हू-हू न करते रहना भी मौन ही है। जिह्वा पर संयम रखकर और वाणी विषयक मितव्ययिता का अवलम्बन लेकर मनुष्य को अपनी शक्तियों में वृद्धि करना ही चाहिए। यह उसके जीवन के लिये बड़ा ही लाभदायक एवं हितकर होगा।

धन्य हैं वे जो विनम्र हैं-

तुम्हारे पास धन है, बल है, तुम्हारे बहुत से आज्ञाकारी सेवक भी हैं, तुम्हारे पुत्र और पौत्र भी हैं। तुम किसी के अधीन नहीं, तुम्हें किसी का भय नहीं। तुम अपने को बड़ा मानते हो और हो सकता है तुम बड़े हो भी। लेकिन तुम्हारा बड़प्पन तुम्हारे किसी काम ने आयेगा।

मैं फिर कहता हूँ कि तुम जिसे सब कुछ समझते हो वह कुछ भी नहीं। क्योंकि इस वैभव भंडार की मादकता ने तुम्हें अहंकारी बना दिया है। पिता को अहंकार से घृणा है। वह तो उन्हें ही अपने स्वर्ग-राज्य में प्रवेश देता है जो बच्चों के समान भले और भोले होते हैं। धन्य हैं वे लोग जो अभिमानी नहीं शिष्ट और विनम्र हैं। क्योंकि वे पृथ्वी का राज्य भोग कर पिता के स्वर्गीय राज्य में स्थान पाते हैं।

- महात्मा ईसा

- महात्मा ईसा

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