ज्ञान-तेरे लिये सर्वस्व बलिदान
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एक बार एक मित्र ने सर जान हर्शल नामक प्रख्यात पश्चिमीय विद्वान से प्रश्न किया-”आपको सृष्टि में सर्वोत्तम वस्तु कौन-सी लगी” तो उन्होंने मुस्कराते हुए उत्तर दिया-
“भाँति-भाँति के संयोग-वियोग आए पर वह दृढ़तापूर्वक मेरे साथ बनी रहे, मेरे सारे जीवन में सुख और आनन्द का झरना बनी रहे। मेरे खिलाफ हवा चले, लोग मुझे बुरा कहें, धिक्कारें, रास्ता रोकें उस समय मुझे बे-परवाह बना दे। जीवन के दुःखों में मेरी ढाल बन जाये। ईश्वर से प्रार्थना करने का मुझे अवसर मिले तो मैं निवेदन करूंगा हे प्रभु मुझे विद्या पढ़ते रहने की रुचि दे। ज्ञान के धार्मिक महत्व को घटाये बिना यहाँ मैंने केवल उसके साँसारिक लाभ बताये हैं। विद्या की अभिरुचि कैसी आनंददायिनी है, सन्तोष का कैसा उन्मुक्त साधन है इतना ही मैंने यहाँ स्पष्ट किया है।
यदि मनुष्य का जीवन सामान्य भोगोपभोग और सामाजिक जीवन के कुछ ही स्तर पर ऊँचा चढ़ने में बीता, तो सारा मनुष्य जीवन तुच्छ गया यह समझना चाहिये, महानता की उच्च सीढ़ी पर प्रतिष्ठित होना चाहिये, ज्ञान ही उसका एक मात्र आधार है।
विद्वान किंग्सले ने एक स्थान पर लिखा है-ज्ञान से ही मनुष्य में ऊंचे उठने की पात्रता आती है, सुख और वैभव भी ज्ञान के बिना नहीं मिलते फिर आध्यात्मिक आनन्द तो उसके बिना मिलेगा ही कैसे? ईश्वर तक कोई चीज पहुँचा सकती है तो वह विद्या ही हो सकती है।
संसार विलक्षण है। यहाँ की प्रत्येक वस्तु विलक्षणता से परिपूर्ण है। संसार में ऐसा कौन व्यक्ति है जो आश्चर्यों के प्रति आकर्षित न होता हो। इस सृष्टि की रचना क्यों की गई और हमारा उसके प्रति क्या कर्तव्य है? हम शरीर क्यों धारण किये हुए हैं? यह प्रश्न जानने बड़े जरूरी हैं इसके लिये हमें अपनी धार्मिक वृत्ति को तेजस्विनी बनाकर आध्यात्मिक तत्व की खोज करनी चाहिए। ज्ञान की धार्मिकता के साथ मिलकर विद्या कहलाती है, यह विद्या ही मनुष्य को बन्धनों से मुक्त कराती है। जिन-जिन महापुरुषों ने बड़े-बड़े काम किये हैं उन्होंने वे काम समय का सदुपयोग, विद्याध्ययन और बौद्धिक-प्रतिभाओं के विकास के द्वारा ही किये हैं। दिन भर में 24 घंटे होते हैं। 8 घंटे काम करने के लिये निकाल दिये जायें तो अन्यान्य विकास कार्यों अथवा मनोरंजन के लिये 8 घण्टे बचते हैं। विद्याध्ययन सर्वोत्तम मनोरंजन है यदि इसके लिये प्रतिदिन 2 घण्टे का भी समय दिया जा सके तो संसार की अनेक वस्तुओं, परिस्थितियों, समस्याओं , जीवों, जीव-वृत्तियों, तत्वों को ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । बढ़े हुए ज्ञान की पूँजी से साँसारिक सुख भी भुनाये जा सकते हैं और पारलौकिक अनुभूतियों का सुख भी प्राप्त किया जा सकता है।
पहले लोगों में आराधना की स्वाभाविक वृत्ति हुआ करती थी-”काव्य शास्त्र विनोदेन कालौगच्छति धीमताम्” का सिद्धान्त प्रायः सभी मानते हैं। भारतीय संस्कृति की प्रतीक देवी सरस्वती स्वयं विद्या अथवा ज्ञान का ही स्वरूप हैं। लोग उनकी आजीवन उपासना किया करते थे और इस प्रकार बिना श्रम संसार-समुद्र से पार उतर जाया करते थे।
अब स्थिति तब से भिन्न है। विद्यार्थी विद्यालय की शिक्षा समाप्त होते ही पुस्तकों को दूर रख देते हैं और उनकी और देखते भी नहीं। समस्याओं का उग्र होना शिक्षा की कमी नहीं बल्कि ज्ञान के अभाव का कारण है। ज्ञान मनुष्य की वृत्तियों को सतोगुणी बनाता है। विद्या मनुष्य को सौम्य, विनम्र और उदार बनाती है। जहाँ उसकी प्रतिष्ठा होगी क्यों तो वहाँ कलह और उपद्रव होंगे क्यों समस्यायें खड़ी होंगी। समस्याओं का अन्त करने के लिये सबसे पहले विद्या-बल बढ़ाना होगा। उसके लिये अधिक से अधिक साधन जुटाना होगा।
लोग अभाव और आर्थिक परिस्थितियों को कारण बताया करते हैं। कुछ लोगों को समय न होने की भी शिकायत होती है। मूल बात यह है कि व्यक्तियों को विद्याध्ययन का न तो महत्व ही मालूम होता है और न उनकी रुचि ही होती है। अनेक दृष्टान्तों से यह सिद्ध हो चुका है कि गरीबी विद्याभ्यास में बाधक नहीं है। पब्लियस, साइरस, इसप, किलेन्थिस, बुकर टी वाशिंगटन और टेरन्स आदि प्रतिभाशाली विद्वानों का प्रारम्भिक जीवन बड़ी ही कठिनाइयों में बीता है तो भी उन्होंने ज्ञानार्जन की महत्ता प्रतिपादित कर दिखाई। एपिक टेटस 10 वर्ष गुलाम रहा था। उसके मालिक ने उसका पैर ही तोड़ दिया था किन्तु बाद में उसने अपनी झोंपड़ी में बैठकर शास्त्रों का स्वाध्याय किया और विद्वता उपलब्ध की। रोम के तत्कालीन सम्राट आड्यान भी उसके पाँडित्य का लोहा मानते थे।
पाइथागोरस ज्यामिति शास्त्र का प्रकाँड विद्वान हुआ है, वह जीवनशास्त्र और नैतिक दर्शन का भी पंडित था। बहुत कम लोग जानते होंगे कि वह जंगल से लकड़ियाँ काट कर लाता था और उन्हें बेचकर अपनी आजीविका चलाता था।
टस्कनी की फ्लोरण्टाइन एकेडमी कौन्सिल के उच्च और महान् प्रतिष्ठा के पद पर नियुक्त होने वाला प्रसिद्ध इटालियन लेखक जेली जात का दरजी था। उसने इतने ऊँचे पद पर पहुँच जाने पर भी अपना धन्धा दर्जीगिरी नहीं बन्द किया। वह कहा करते थे “मैंने इसी व्यवसाय के सहारे विद्या पाई है मुझे ज्ञान से इतना प्रेम हो गया है कि अपनी इसी आजीविका के सहारे मृत्युपर्यन्त ज्ञानार्जन करते रहने की हार्दिक अभिलाषा है।”
इटली का मेटास्टासिओं जब बालक था तो शहर की सड़कों में गाने गाया करता था। उससे जो पैसे मिलते थे उनकी किताबें और पत्र-पत्रिकायें खरीद कर अधिकाँश समय पढ़ने में लगाया करता था। अन्त में उसकी भावना सिद्ध हुई और वह एक दिन इटली का मशहूर कवि हुआ। डॉ॰ जान प्रीडा जो बुर्स्टर के पोप नियुक्त हुए थे उन्हें पढ़ने की अभिलाषा इतनी तीव्र हुई कि वह आक्सफोर्ड तक पैदल चलकर गये। फीस और खाने के लिये कोई सहारा नहीं था इसलिये वह कालेज के होटल में काम करने वाले रसोइये की मदद किया करते थे उसी से उन्हें इतने पैसे मिल जाते थे जिससे किसी तरह फीस और रोटी का साधन बन जाता था। वनस्पति शास्त्र के जन्मदाता मीनियस भी इसी तरह एक मोची के पास काम करते हुए पढ़े थे।
यह उदाहरण इसलिये दिये गये हैं कि आर्थिक स्थिति विपरीत हो तो भी ज्ञान की आराधना की जा सकती है पेट पालने के लिये कोई भी साधारण काम किया जा सकता है पर ज्ञान की उपयोगिता ओर आवश्यकता देखते हुए उसका परित्याग करना अथवा उधर से मुख मोड़ना अपने लिये ही हानिकारक होता है। ज्ञान मनुष्य की शोभा है। ज्ञान ही धन और ज्ञान ही जीवन है उसके लिये किया गया कोई भी बलिदान व्यर्थ नहीं जाता।
हम इस आध्यात्मिक आवश्यकता को भूल गये हैं। विद्या आत्म-कल्याण का साधन है पर अब उसे अर्थोपार्जन का माध्यम बनाकर पंगु कर दिया गया है इसीलिये हम नैतिक, आत्मिक, आध्यात्मिक क्षेत्रों में पिछड़ गये हैं। यह उपलब्धियाँ अब हमें तभी मिल सकती हैं जब ज्ञान को उचित प्रतिष्ठा दी जाए उसके लिये सर्वस्व न्यौछावर के भावना बनाई जाए।

