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मनुष्यता की प्रतिमूर्ति—श्रीमती एना-राबर्टस्
कैंसर एक ऐसा भयानक रोग है जिसका नाम सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं तब इस रोग से जो मनुष्य पीड़ित हो जाते हैं उसका कष्ट तो या तो कैंसर का रोगी ही जान सकता है अथवा कोई सहृदय व्यक्ति अनुभव कर सकता है। श्रीमती एना-राबर्टस् एक ऐसी ही सहृदय महिला थीं जिन्होंने कैंसर के रोगियों की पीड़ा अपनी आत्मा में अनुभूत की थी।
आज कैंसर के अच्छे-अच्छे उपचार खोजे जा चुके हैं। किन्तु यह प्रसंग उस समय का है जब यह एक असाध्य रोग समझा जाता था और इसका आक्रमण मृत्यु का ही संदेश माना जाता था।
कैंसर का रेडियम उपचार आज बड़ा ही सरल एवं सुगम हो गया है। किन्तु उस समय वैज्ञानिक इसके प्रयोग में लगे थे और रोग पर इसकी प्रतिक्रिया का अनुसंधान कर रहे थे। रेडियम का उपचार एक इतना खतरनाक उपाय था कि डाक्टरों की हिम्मत इसका प्रयोग करने में हारती थी। रुग्ण अंग के अतिरिक्त रेडियम की किरणें मनुष्य के जिस अंग पर पड़ जाती हैं वह अंग बिल्कुल गल जाता है। ऐसी दशा में उसकी ठीक-ठीक जाँच-पड़ताल किये बिना उसका प्रयोग बुद्धिमानी नहीं समझा जाता था।
अनुसंधान-कर्त्ता डॉक्टर किसी ऐसे साहसिक व्यक्ति की तलाश में थे जो अपने अंगों पर रेडियम के प्रयोग की अनुमति देकर कार्य को आगे बढ़ाने में सहायक बन सके। यह स्पष्ट प्राणोत्सर्ग करने की माँग थी। अन्त में एना राबर्टस् इस आत्मोत्सर्ग के लिए प्रस्तुत हुई। उसने कहा कि यदि मेरे एक के प्राण जाने से सहस्रों की प्राण रक्षा हो सके तो मुझे इसका शोक नहीं हर्ष ही होगा और उसने अपना वचन पूरा कर दिखाया।

