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Magazine - Year 1967 - Version 2

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Language: HINDI
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अडिग निष्ठा के साथ कार्यक्षेत्र में उतरें।

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भाग्य के भरोसे अथवा संयोग की प्रतीक्षा में बैठे-बैठे समय बरबाद करने वाले जीवन में कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। सफलता परिश्रमपूर्ण तत्परता का ही फल है।

भाग्य के भरोसे अथवा संयोग की राह देखते रहने वाले स्वभाव से आलसी एवं दीर्घसूत्री हो जाते हैं, वे यह नहीं समझ पाते कि भाग्य पुरुषार्थ से बनाता है ओर संयोग कार्यक्षेत्र में उतरने पर ही प्राप्त होता है। जो कार्यक्षेत्र से दूर बैठा-बैठा अलसाता रहेगा उसके पास संयोग आ जाने की सूचना देने के लिये कोई नहीं आयेगा। लोगों को अपनी व्यस्तता में इतना बेकार समय कहाँ जो किसी व्यक्ति को बतलाने के लिए उसके पास चलकर जायें कि भाई अब उठो, आप जिस संयोग अथवा अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे वह आ गया है। फिर चाहे वह किसी का मित्र ही क्यों न हो ।

यदि एक बार यह भी मान लिया जाये कि समाज में आपके ऐसे हितैषी भी हैं जो किसी अवसर अथवा संयोग की सूचना देने में अपना समय खराब करने की उदारता बरत सकते हैं। तब भी वो जब तक वह सूचना देने के लिए आयेगा और आप तैयार होकर चलेंगे तब तक वह संयोग अथवा अवसर आधा निकल चुकेगा और आप सिर्फ उसकी पीठ ही देख सकेंगे।

ऐसा होने पर भी कि आपका कोई हितैषी मित्र जो कि दीर्घ-दृष्टि वाला है और आपकी सफलता हृदय से चाहता है, किसी अवसर की सूचना इतने पूर्व दें गया है जितने में आप तैयार होकर यथा समय यथा स्थान पहुँच सकें, यदि आप आलसी एवं दीर्घ-सूत्री हैं तब भी उस अवसर का उपयोग नहीं कर पायेंगे। आपका आलस्य दीर्घसूत्रता का सहारा पा कर उस बीच के थोड़े समय को भी बहुत समझ लेगा और निश्चिन्तता से पड़े रहने को मजबूर कर देगा। आप जल्दी न कर पायेंगे और यथा स्थान पहुँच कर देखेंगे कि आपको देर हो गई है, अवसर आपकी पहुँच के बाहर जा चुका है। तत्परता के अभाव में आपने अपनी हानि ही की होगी और उस मित्र को भी यह सोचने पर विवश किया कि आपको समय खराब करके सूचना देने जाना बेकार है और जिसका उसे हार्दिक दुःख होगा।

इस प्रकार अवसर खोते-खोते मनुष्य के मस्तिष्क से अवसरों की महत्ता निकल जायेगी और तब वह और अधिक भाग्यवादी बन कर सदा के लिए असफलता में विश्वास करने लगेगा।

जिसने प्रमाद, आलस्य एवं दीर्घसूत्रता के दोष से अपनी तत्परता तथा कार्यक्षमता को शिथिल कर लिया है यदि वह किसी समय जा कर अवसर को घेर भी लेता है तब भी वह अवसर बिगड़ैल घोड़े की तरह कमजोर हाथों से छूट कर जा सकता है। अवसर मिल जाने पर भी तो पुरुषार्थ के अनभ्यस्त लोग उसका लाभ नहीं उठा पाते।

सफलता चाहिए तो उद्योग, पुरुषार्थ तथा तत्परता के गुणों का विकास करना ही होगा। यह परिश्रमपूर्ण उद्योग घर बैठे-बैठे करने से जाग्रत नहीं हो सकते इसके लिये कार्यक्षेत्र में उतर कर संघर्ष करना होगा अभ्यास करना होगा। जो मनुष्य तत्परता पूर्वक कार्यक्षेत्र में डटा रहता है उसके लिये संयोगों एवं अवसरों की कमी नहीं रहती क्योंकि कार्यक्षेत्र ही एक मात्र उनके आवागमन का स्थान होता है जहाँ वे हर समय आते और जाते रहते हैं जिस वस्तु का जहाँ मिलना सम्भव है वह वहीं मिलेगी अन्यत्र बैठ कर उसकी प्रतीक्षा करना अथवा खोजना अपनी अज्ञता का परिचय देना है।

अनेक लोगों की तत्परता एवं उद्योगशीलता साहस के अभाव में अनुपयोगी हो जाया करती है। उनमें परिश्रम करने की प्रवृत्ति तो होती है किन्तु आगे बढ़ने का नया, और ऊँचा काम हाथ में लेने का साहस नहीं होता, निदान कोल्हू के बैल की तरह उनकी सारी जिन्दगी यथास्थान चक्कर काटते-काटते समाप्त हो जाती है और उनके हाथ में उतना ही कुछ जीवन के अन्तिम क्षण में रह जाता है जो जीवन के प्रारम्भ में था।

सफलता तो आगे बढ़ने, कुछ नया करने अथवा पुराने को ऊँचा उठाने से ही मिलती है। एक ही स्थान पर एक ही ढर्रे पर ढुलकते रहने से सारा परिश्रम, सारी तत्परता उसी सीमित दायरे में समाप्त हो जाती है और प्रगति के नाम पर शून्य ही हाथ रहता है।

जिसमें आगे बढ़ने कुछ नया करने अथवा ढर्रा बदलने का साहस नहीं है, अच्छा है कि वह प्रगति एवं उन्नति की आकाँक्षा न करे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो इसका कोई निश्चय नहीं कि उसकी अनधिकार आकाँक्षा उसके लिए एक अनुताप नहीं बन जाएगी।

यदि उन्नति की आकाँक्षा है तो साहस संचय कीजिये और आगे बढ़िये, जो कुछ है भी वह जा सकता है, इस अनिष्ट आशंका को दूर भगाइये। संसार में कुछ खो कर ही कुछ पाया जा सकता है। खतरा पार करके ही विजय मिल सकती है। बीज गला कर ही फसल प्राप्त हो सकती है। बिना साहस किये और खतरा मोल लिये न तो कोई आज तक आगे बढ़ पाया है और न आगे ही उन्नति कर सकेगा। उन्नति एवं प्रगति के इस नियम को प्रकृति किसी के लिये अपवाद बना कर ईश्वरीय विधान में व्यवधान डालने का साहस नहीं कर सकती।

साहस संचय करने के लिए कहीं जाना नहीं होता वह मनुष्य की अपनी आत्मा में निवास करता हुआ इस बात की प्रतीक्षा किया करता है कि कब हमारा स्वामी पैर आगे बढ़ाये और कब मैं उठ कर अपना अस्तित्व प्रकट कर दूँ।

प्रगतिपथ पर अपना कदम बढ़ाइये आपका साहस साथ देगा। इस सत्य को, यद्यपि प्रमाण की आवश्यकता नहीं, तथापि यदि आप चाहते हैं तो किसी ऐसे अवसर की याद कर लीजिए जिसकी सम्भावना में आप भयभीत हो रहे थे किन्तु जब वह आ ही गया तो आपने उसका डट कर मुकाबला किया था। यह क्या बात थी? उस संयोग का सामना करने का इरादा, कदम बढ़ाते ही आप का साहस आपके साथ हो लिया था? यही साहसहीनता एवं आशंका आप को तब भी तो रही होगी जब आप पहले पहल अपनी वर्तमान स्थिति में उतरने के लिए बढ़ने लगे थे, किन्तु जब आप उसमें उतर ही गये तो आपकी सारी आशंका सारा भय जाता रहा, आपके साहस ने आपका साथ दिया और आप आज निःशंक होकर अपना काम कर रहे हैं। भय अथवा आशंका अनागत के प्रति होती है। समागत के प्रति नहीं और साहस का जागरण आगे बढ़ने पर ही होता है। ठिठकने अथवा पीछे हटने से नहीं यह एक स्वाभाविक नियम है। इसे अपनी दुर्बलता, अयोग्यता अथवा साहसहीनता समझ कर आगे बढ़ने से कदापि न रुकिये। प्रयत्न से जगाया हुआ एक बार का साहस फिर जल्दी सोता नहीं, यदि उसको निष्क्रियता की अफीम न खिला दी जाये। जो उन्नति चाहता है प्रगति का आकाँक्षी है वह जागे हुए साहस को सुलाने के लिए निष्क्रियता को प्रश्रय ही क्यों देगा? आप यदि उन्हीं प्रगति आकाँक्षियों में से हैं तो कदम बढ़ाइए साहस को जागने का अवसर दीजिये और आगे बढ़िए आप सफलता अवश्य प्राप्त करेंगे।

अनेक लोग इस प्रकार ऊहापोही होते हैं कि “यह करूं अथवा वह, करने में ही समय और अवसर गंवा देते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक लोग तो बहुत ही कमजोर होते हैं। काम प्रारम्भ किया कदम बढ़ाया किन्तु जरा सी कठिनाई आते ही पीछे हट जाते हैं। कमजोर निश्चय वाले अनेक बार दूसरों के परामर्श पर ही निर्भर रहा करते हैं जिसने जो बतलाया उसी को करने के लिए चल पड़े। विचार वैचित्र्य होने से हर आदमी अपनी तरह से ही परामर्श देगा, तब ऐसी दशा में हर एक का परामर्श मानते रहने से कोई एक काम पूरा ही नहीं हो पायेगा। एक निष्ठा के अभाव में सफलता की आशा करना दिन में स्वप्न देखने के समान ही है।

इस प्रकार के अनिश्चय स्वभाव वाले लोग परावलम्बी ही होते हैं। उन्हें अपनी बुद्धि में न तो विश्वास होता है और न अपने निर्णय में पूरी आस्था। अनिश्चय एवं एक निष्ठा के अभाव में आदमी अस्त-व्यस्त हाथ-पैर मारता हुआ अपनी सारी शक्ति को बिखेर देता है जब कि किसी सफलता के लिए शक्तियों का संगठित एवं एकाग्र होना बहुत आवश्यक है।

सफलता पानी है तो दृढ़ निश्चयी बनिये। एक बार विवेकपूर्वक जो निश्चय कर लीजिए उसे पूरा करने में अपनी सारी शक्तियाँ संगठित रूप से नियोजित कर दीजिए। निश्चय करने से पूर्व अपने हितैषियों मित्रों एवं शुभचिन्तकों से परामर्श कर लेना ठीक हो सकता है किन्तु निश्चय हो जाने के बाद किसी के कहने से उसे बदलना अदृढ़ता का द्योतक होगा। अपनी क्षमताओं एवं योग्यता के अनुरूप जो काम उठाइये उसे पूरा करके ही मानिये। आपकी दृढ़ता निश्चय ही आपका कार्य सफल करेगी और आत्म-विश्वास, योग्यता एवं सफलता में वृद्धि करेगी। जब दूसरे काम में भी यही अड़चनें, यही कठिनाइयाँ आ सकती हैं, तब उनके डर से करते हुए काम को छोड़ कर नये सिरे से नया काम शुरू करने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।

इस प्रकार निरालस्य होकर साहसपूर्वक तत्परता के साथ अडिग उद्योग करते हुए सिद्धान्त में आस्था रखिये कि पुरुषार्थ मेरा अधिकार है और फल परमात्मा का। आप अवश्य उन्नति करेंगे और जीवन में मनोवाँछित सफलता के अधिकारी बनेंगे।

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