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Magazine - Year 1967 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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गायत्री की असंख्य शक्तियाँ और उनका सान्निध्य

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परमब्रह्म परमात्मा की चेतना, प्रेरणा, सक्रियता, क्षमता एवं समर्थता को गायत्री कहते हैं, यह इस विश्व की सर्वोपरि शक्ति है। अन्य छुट-पुट शक्तियाँ जो विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती हैं, वे देव-नामों से पुकारी जाती हैं। यह समस्त देव शक्तियाँ उस परम-शक्ति की किरणें ही हैं, उनका अस्तित्व इस महत्व के अंतर्गत ही है, उत्पादन, विकास एवं निवारण की त्रिविध देव शक्तियाँ ब्रह्मा विष्णु महेश के नाम से विख्यात हैं। पंच तत्वों की चेतना को आदित्य, वरुण, मरुत, द्यौ, अन्तरिक्ष कह कर पुकारते हैं। इन्द्र, बृहस्पति, अर्यमा, पूषा, तष्ट्रा, गणेश, अश्विनी, वसु, विश्वे देवा आदि सृष्टि के विभिन्न प्रयोजनों में संलग्न शक्तियाँ ही हैं। चूँकि ये दिव्य हैं, प्राणियों को उनका अपार अनुराग मिलता है, इसलिए उन्हें देवता कहते हैं और श्रद्धापूर्वक पूजा, अर्चना एवं अभिवन्दना करते हैं। यह सभी देवता उस महत्त्व के स्फुल्लिंग हैं जिसे आध्यात्म भाषा में गायत्री कह कर पुकारते हैं। जैसे जलते हुए अग्निकुण्ड में से चिनगारियां उछलती हैं, उसी प्रकार विश्व की महान शक्ति सरिता गायत्री की लहरें उन देव शक्तियों के रूप में देखी जाती हैं। सम्पूर्ण देवताओं की सम्मिलित शक्ति को गायत्री कहा जाए तो यह उचित ही होगा।

हमें जितना भी कुछ वैभव, उल्लास मिलता है वह शक्ति से मूल्य पर ही मिलता है। जिसमें जितनी क्षमता है वह उतना ही सफल होता है और उतना ही वैभव उपार्जित कर लेता है। इन्द्रियों में शक्ति रहने तक ही भोगों को भोगा जा सकता है। ये अशक्त हो जायें तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय और घृणास्पद लगते हैं। नाड़ी-संस्थान की क्षमता क्षीण हो जाए तो शरीर का सामान्य क्रिया-कलाप भी ठीक तरह चल नहीं पाता। मानसिक शक्ति घट जाने पर मनुष्य की गणना विक्षिप्तों और उपहासास्पदों में होने लगती है। धन-शक्ति न रहने पर दर-दर का भिखारी बनना पड़ता है। मित्र-शक्ति न रहने पर एकाकी जीवन सर्वथा निरीह और निरर्थक प्रतीत होने लगता है। आत्मबल न होने पर प्रगति के पथ पर एक कदम भी यात्रा नहीं बढ़ती। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्मबल से रहित व्यक्ति के लिये सर्वथा असंभव ही है।

अतएव शक्ति का संपादन भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने के लिए नितान्त आवश्यक है। हमें यह जान ही लेना चाहिए कि भौतिक-जगत में जितनी पंच भूतों को प्रभावित करने एवं आध्यात्मिक जगत में जितनी भी विचारात्मक भावात्मक तथा संकल्पात्मक शक्तियाँ हैं उन सब का मूल उद्गम एवं असीम भाण्डागार वह महत्त्व ही है जिसे गायत्री नाम से भी संबोधित किया जाता है। इस भाण्डागार में जितने ही गहरे उतरा जाए उतनी ही बहुमूल्य रत्न-राशि उपलब्ध होने की सम्भावना बढ़ती चली जाती है।

विश्व के आत्मोत्कर्ष इतिहास पर दृष्टिपात करने से यही प्रतीत होता है कि चरित्र को उज्ज्वल एवं विचारों को उत्कृष्ट रखने के अतिरिक्त हमारे महान पूर्वजों ने उपासनात्मक सम्बल गायत्री महामंत्र को ही पकड़ा था, और इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए वे देव पुरुषों में गिने जाने योग्य स्थिति प्राप्त कर सके थे। देवदूतों, अवतारों, गृहस्थियों, महिलाओं, साधु, ब्राह्मणों, सिद्ध पुरुषों को ही नहीं साधारण सद्गृहस्थों का उपास्य भी गायत्री ही रही है। और उस अवलम्बन के आधार पर न केवल आत्मकल्याण का श्रेय साधन किया है वरन् भौतिक सुख सम्पदाओं की साँसारिक आवश्यकताओं को भी आवश्यक मात्रा में उपलब्ध किया है। ऐसे कितने प्रमाण देखने में आते हैं।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के 23 वें अध्याय में सावित्र्युपा ख्यान नाम से गायत्री महिमा पर एक सुन्दर कथानक का वर्णन है। महर्षि नारद भगवान विष्णु से पूछते हैं- भगवान् गायत्री उपासना का इतिहास क्रम किस प्रकार चला? उसके उत्तर में भगवान ने उत्तर दिया-

ब्रह्मणा वेद जननी पूजिता प्रथमे मुने।

द्वितीये च देवगणैस्तत्पश्चाद्विदुष्णं गणौः।

तथा चाश्वपितः पूर्व पूजया मास भारते।

अर्थात्-हे नारद, वेदजननी गायत्री की पहले ब्रह्मा ने फिर देवताओं ने, फिर गृहस्थी ब्राह्मणों ने उपासना की। राजाओं में प्रथम अश्वपति ने उपासना की।

अश्वपति का परिचय और उपासना का नियम विधान बताने के उपराँत भगवान ने नारद जी से कहा-

साच राज्ञी महासाध्वी वशिष्ठ स्योपदे शतः।

चकाराराधने भक्त्या सावित्रीश्चैव नारदः।

राजा और रानी को सावित्री की आराधना करते हुए जब बहुत दिन व्यतीत हो गये तो एक दिन आकाशवाणी हुई कि तुम दश लक्ष गायत्री का विशेष जप करो।

शुश्रावाकाशवाणीञ्च नृपेन्द्रश्चा शरीरिणीम्।

गायत्रीदश लक्षं च जपं कुर्वाति नारद।

आकाशवाणी सुनकर उनने 10 लक्ष जप का विशेष अनुष्ठान प्रारम्भ किया।

इसी बीच एक बार महर्षि पाराशर राजा अश्वपति से भेंट और उनने राजा को गायत्री उपासना की महत्ता बताते हुए कहा-

सकुज्जपश्च गायत्र्या पापं दिन कृतं हरेत्।

दशधा प्रजपान्नृपणं दियारात्र्यय मेवच।

गायत्री के एक बार जप से दिन में किये पाप, तथा दश बार जप से दिन-रात के पापों का नाश होता है।

एवं क्रमेण राजर्षे दश लक्षं जपं कुरु।

साक्षात् द्रक्ष्यसि सावित्रीं त्रिजन्म पातक क्षयात्।

सो हे राजन् इसी क्रम से तुम भी जप करो। फलस्वरूप तुम्हारा तीन जन्मों के पापों का क्षय हो जाएगा और साक्षात् गायत्री माता का दर्शन करोगे।

दत्वा ज्ञान नृपेन्द्राय प्रथयौ स्वालयं मुनीः।

राजा सम्पूज्य सावित्री ददर्श वर मा पच।

इस प्रकार मुनि राजा को ज्ञान देकर आश्रम चले गये और गायत्री की उपासना कर राजा ने भगवती का साक्षात्कार और वरदान प्राप्त किया।

भगवती गायत्री ने प्रकट होकर कहा-

जानामि ते महाराज यत्तो अनसि वर्तते।

वाँछितं तव पत्न्या च सर्व दास्यामि निश्चितम्।

साध्वी कन्याभिलाषंच करोति तव कामिनी।

त्वं प्रार्थयसि पुर्त्र च भवष्यति क्रमेण ते।

“राजन् मैं तुम्हारी और तुम्हारी पत्नी की अभिलाषा को जानती हूँ। तुम दोनों की कामनाओं को पूर्ण करूंगी। रानी कन्या की और तुम पुत्र की कामना करते हो तो क्रमशः तुम दोनों की कामना पूर्ण करूंगी।”

तदनुरूप उन्हें पुत्र तथा कन्या की प्राप्ति भी हुई।

अन्यान्य महापुरुषों ने तथा देवताओं ने भी गायत्री उपासना का अवलम्बन लिया है। उसमें उन्हें अभीष्ट आत्म-शक्ति प्राप्त हुई है और उस शक्ति-भण्डार के अधिकारी बन उनने अपने को ऐसा प्रकाशवान बनाया है जिनके प्रकाश से अभी तक संसार में सर्वतोमुखी प्रकाश आलोकित ही रहा दिखाई देता है।

गायत्री वेद मातास्ति साद्या शक्तिर्मता भुवि। जगताँ जननी चैव तामुपासेऽहमेवहि॥

भगवान् शंकर कहते हैं-गायत्री वेदमाता है। यही आदि शक्ति कहलाती है। वही विश्व-जननी है। मैं उसी की उपासना करता हूँ।

प्रभावेणौव गायत्र्याः क्षत्रियः कौशिको वशी। राजर्षिर्त्व परित्यज्य ब्रह्मर्षिपदमीयिवान्॥

सामर्थ्य प्राप चातुच्चैरन्यद्भुवन सर्जने।

किं किं न दद्याद्गायत्री सन्यगेवमुपासिता॥ दुर्लभा सर्वमत्रेषु गायत्री प्रणवान्विता।

न गायत्र्यधिकं किंचित त्र्यीषु परिगीयते॥

(स्कन्द पुराण-काशीखण्ड)

“संयमी एवं तपस्वी क्षत्रिय-विश्वामित्र महर्षि गायत्री मंत्र की आराधना के प्रभाव से ही राजर्षि पदवी को त्यागकर ब्रह्मर्षि बन गये थे फिर उन्होंने अन्यान्य लोकों की सृष्टि करने की श्रेष्ठ सामर्थ्य भी प्राप्त कर ली थी। अच्छी प्रकार से श्रद्धापूर्वक समराधित गायत्री कौन-कौन सा लाभ प्रदान नहीं करती? निस्सन्देह प्रणव मंत्र से युक्त गायत्री समस्त मंत्रों में अतीव दुर्लभ है। इसलिए वेदत्रयी मंत्र से बढ़कर अन्य कोई मन्त्र नहीं माना जाता।”

कौशिल्या सुप्रजा राम पूर्वा संध्या र्प्रवतते।

उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यम् देवमाह्निकम्॥

तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ।

स्नात्वा कृतोदको वीरो जपेतु परमं जपम्॥

“हे कौशल्या के सुपुत्र राम! अब संध्या का समय हो गया है अतः हे नरशार्दूल ! उठ कर अपने नित्य कर्मों को करो । विश्वामित्र जी के ऐसे प्रेमयुक्त वचनों को सुनकर दोनों भाई उठ बैठे और स्नान करके गायत्री-जप में तत्पर हो गये।”

अवतीर्य रथात् तूर्ण कृत्वा शौचं यथाविधि। रथमोचनमादिश्य सन्ध्यामुपविवेशह॥

- महाभारत-उद्योग पर्व

“हस्तिनापुर को जाते समय कृष्ण जी ने रथ से उत्तर कर शौचादि क्रिया करके यथाविधि सन्ध्या की।”

कृतोदकानुजप्यः स हुताग्नि समलंकृतः।

(महाभारत)

“फिर हस्तिनापुर पहुँचकर उन्होंने स्नान, हवन और गायत्री जप किया।

सप्त-कोटि महामन्त्र गायत्री नायकाः स्मृताः आदि देव उपासन्ते गायत्री वेद मातरम्॥

सप्त कोटि महामन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि सेना नायक के समान है । देवता इसी की उपासना करते हैं, यही चारों वेदों की माता है।

भगवान शंकर भी कहते हैं-जहाँ गायत्री माता है, वहाँ शक्ति ठहरती है। वह विश्व जननी है। मैं उसी की उपासना करता हूँ। शंकर जी ही नहीं प्रत्येक प्रमुख देवता तथा भूमण्डल के सभी महापुरुषों ने अपनी साधना में गायत्री का आश्रय लिया है। भगवान कृष्ण का कथन है।

जपताँ जुह्यताँ चैव नित्यं च प्रवतात्मनाम्। ऋषीणाँ परमं जप्लं गुह्यमेतन्नराधिप॥

-महाभारत

“हे युधिष्ठिर! नित्य जप और हवन करने के लिये ऋषियों का परम मंत्र गायत्री ही है।”

संसार में अनेक देवताओं के रूप में जो अनेक शक्तियाँ दृष्टिगोचर हो रही हैं जिनकी सहायता से हमारा जीवन धारण, पोषण, अभिवर्धन एवं श्रेय साधन हो रहा है वे गायत्री महाशक्ति के अंतर्गत आती हैं। इसे यों भी कहा जा सकता है कि वे गायत्री स्वरूप ही हैं। विश्व-व्यापी जल तत्व ही नदी सरोवरों, कूप, तालाबों, जलाशयों, हिमिशृंगों, समुद्र ओर बादलों में विभिन्न रूप, स्वाद और स्थिति में दिखाई पड़ता है। उसी प्रकार एक ही गायत्री महातत्व अगणित देव शक्तियों के रूप में देखा और जाना जा सकता है। शास्त्र कहता है-

आदित्य देवा गन्धर्वा मनुष्या-पितरो सुराः तेषाँ सर्व भूतानाँ माता मेदिनी मातामही, सावित्री, गायत्री जगत्युर्वी पृथ्वी बहुला विद्याभूता।

-नारायणोपनिषद्

देव, गंधर्व, मनुष्य, पितर, असुर इनका मूल कारण अदिति अविनाशी तत्व है। यह अदिति सब भूतों की माता मेदिनी और मातामहि है। उसी विशाल गायत्री के गर्भ में विश्व के सम्पूर्ण प्राणी निवास करते हैं।

पूषार्यमा मरुत्याँश्च ऋषियोऽपि मुनीश्वराः।

पितरो नाग यक्षाश्च गर्न्धवप्सरा गणाः॥

ऋग्यजु सामवेदाश्च अथर्वांगि रसानि च॥

त्वमेव पंच भूतानि तत्वानि जगदीश्वरि॥

ब्राह्मी सरस्वती सन्ध्या तुरीया त्वं महेश्वरी।

त्वमेव सर्व शस्त्राणि त्वमेव सर्व संहिता॥

पुराणानि च तन्त्राणि महागम मतानि च।

तत्सद् ब्रह्म स्वरुपा किंचित्सद् सदात्मिका॥ परात्परेशी गायत्री नमस्ते मातरम्बिके

- वशिष्ठ संहिता

पूषा, अर्यमा, मारुत, ऋषि, मुनि, पितर, नाग, यक्ष गंधर्व, अप्सरा, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, अंगिरस, पंचभूत, ब्राह्मी, सरस्वती एवं सन्ध्या-हे मातेश्वरि तुम ही हो । सर्व शास्त्र संहिता पुराण, तन्त्र, आगम-निगम तथा और भी जो कुछ इस संसार में है सो हे! ब्रह्म-रूपिणी पराशक्ति गायत्री तुम ही हो।

त्वयैतद् धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्। त्वयै तत्पाल्यते देवि त्वमत्सन्ते च सर्वदा।

(सप्तशती 1। 73)

“हे देवी! तुम्हीं इस विश्व की धारण करने वाली हो, तुम्हीं इसकी सृष्टि करने वाली हो, तुम्हीं इसका पालन करने तथा सदैव इसका अन्त करने वाली भी हो।”

सप्तर्षि प्रीतिजननी माया बहुवर प्रदा। शिवयोः कर नेत्रोत्था ह्याश्रुस्वेद समुद्भवा।

“सप्त ऋषियों की प्रीति उत्पन्न कराने वाली बहुत वर देने वाली माया, शिव और शक्ति के हाथ, नेत्र से उत्पन्न और उन्हीं के अश्रु पसीना से उत्पन्न तुम्हीं हो।

शक्ति स्वभाविकी तस्य विद्या विश्व विलक्षणा।

एकानेकस्वरुपेण भाँति भानोरिव प्रभा॥

अनन्ताः शक्तियस्तस्य इच्छाज्ञाना क्रियादयः।

इच्छाशक्ति महेशस्य नित्या कार्य नियामिका॥

ज्ञानशक्तिस्तु तत्कार्यं कारणं करणं तथा।

प्रयोजनं च तत्वेन बुद्धिरुपाध्यवस्यति॥

यथेप्सितं क्रिया शक्तिर्यथाध्यवसितं जगत्॥

कल्पयत्यखिलं कार्य क्षणात् संकल्प रुपिणी॥

(शिवपुराण-वायुसंहिता)

“विश्व-लक्षण वाली विद्या उस परब्रह्म की स्वाभाविक शक्ति है। वह सूर्य की प्रभा की तरह एक ही अनेक रूपों में प्रकट होती है। इच्छा, ज्ञान, क्रिया आदि उसकी अनन्त शक्तियाँ हैं। ये ही दैवी शक्तियाँ संसार के समस्त कार्यों का नियन्त्रण करती हैं। उसी की शक्ति ही कार्य और कारण के रूप में काम करती है और वही अपनी संकल्प शक्ति से अनादि काल से इसका संचालन करता आया है।”

भ्रमति प्रकृतिस्तावत्संसारे भ्रमरुपिणी।

यावन्न पश्यति शिवं नित्यतृप्तमनामपम्॥

संविन्मात्रैक धर्मित्वात्काकतालीय योगतः। संविद्देवशिवं स्पृष्ट् वा मन्मप्येव भावत्यलम्॥

प्रकृतिः पुरुषं स्पृष्ट्वा प्रकृतित्वं समुज्झति तदन्तस्त्वेकताँ गत्वा नदीं रुपमिवार्ण वे ॥

(योग व॰ 6(2) 85) 16-19)

“भ्रमण शालिनी, स्पन्दात्मिका, परमेश्वर की चित्त शक्ति प्रकृति इच्छापूर्वक तब तक संसार में भ्रमण करती है जब तक कि वह नित्य, तृप्त अनामय शिव को नहीं देखती। स्वयं भी संवित् रूप होने के कारण, यदि वह अकस्मात् कभी शिव को स्पर्श कर लेती है तो तुरन्त ही उसके साथ तन्मयी हो जाती है। तब वह शिव के साथ एकता को प्राप्त करके अपने प्रकृति रूप को इस प्रकार खो देती है, “जैसे समुद्र में गिर कर नदी अपने नदी रूप को खो डालती है।”

द्रवशक्तितथाम्भासु तेजशक्तितथाऽनले। शून्यशक्तिस्तथाकाशे भावशक्तिर्भवास्थितौ॥ ब्रह्मणासर्वशक्तिर्हि दृश्यते दशदिग्गता।

नाशशक्तिर्विनाशेषु शोकशक्तिश्च शोकिषु॥ आनन्दशक्तिर्मुदिते वीर्यशक्तिस्तथा भटे।

सर्गेषु सर्गशक्तिश्च कल्पान्ते सर्वशक्तिता ॥

(योग॰ व॰ 3।500।8, 9, 10)

“जल में द्रव-शक्ति, अग्नि में तेज-शक्ति, आकाश में शून्य-शक्ति, जगत की स्थिति में भाव-शक्ति, दश दिशाओं में सर्व साधारण-शक्ति, विनाश में नाश-शक्ति, शोक करने वालों में शोक-शक्ति, प्रसन्न रहने वालों में आनन्द-शक्ति, योद्धाओं में वीर्य-शक्ति, सृष्टि में सर्जन-शक्ति, और कल्प के अन्त में सब-शक्तियाँ उसी में दिखाई देती हैं।”

भागीरथी मर्त्यलोके पाताले भोगवत्यपि।

त्रिलोक वाहिनी देवी स्थानत्रयनिवासिनी॥

मृत्युलोक में भागीरथी, पाताल में भोगवती (स्वर्ग में सीता)-ये त्रिलोक वासिनी देवी तीनों लोकों में विद्यमान् है।”

भूर्लोकस्था त्वमेवासि धरित्री लोकधारिणी।

भूवोलोके वायुशक्तिः स्वर्लोके तेजसो निधिः॥

भूलोक में लोक धारण करने वाली धरित्री तुम्हीं हो। भुवः लोक में वायु-शक्ति और स्वर्ग लोक में तेज तुम्हीं हो।”

महर्लोके महासिद्धिर्जनलोके जनेत्यपि।

तपस्विनी तपोलोके सत्य लोके तु सत्यवाक्॥

“महर्लोक में महासिद्धि, जन लोक में जननी तपो लोक में तपस्विनी और सत्यलोक में सत्य कहने वाली तुम्हीं हो।”

गंगा च यमुना चैव विपाशा च सरस्वती।

सरयूर्देविका सिंधुर्नर्मदैरावती तथा॥

गोदावरी शतद्रुश्च कावेरी देव लोकगा।

कौशिकी चन्द्रभागा च वितस्ता च सरस्वती।

गंडकी तपनी तोया गोमती वेगवत्यपि॥

“गंगा, यमुना, विपाशा, सरस्वती सरयु देविका, सिन्धु, नर्वदा, ऐरावती, गोदावरी, शतद्रु, कावेरी, कौशिकी, चन्द्रभागा, वितस्ता, सरस्वती, गण्डकी, तपनी, करतोया, गोमती, वेगवती आदि समस्त सरिताएं तुम्हीं हो।”

इडा च र्पिगलाचैव सुषुम्णा च तृतीयका।

गाँधारी हस्तिजिह्वा च पूषाऽपूषा तथैव च ॥

अलंवुषा कुहूश्चैव शंखिनी प्राणवाहिनी।

नाड़ी च त्वं शरीरस्था गीयसे प्रक्तनैर्बुधै॥

“इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गाँधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, अपूषा, अलम्वुषा, कुहू शंखिनी, प्राणवाहिनी-ये शरीर में टिकी हुई समस्त नाड़ियाँ भी तुम्हीं हो।”

हृत्पद्मस्था प्राणशक्तिः कण्ठस्था स्वप्ननायिका।

तालुस्था त्वं सदाधारा बिन्दुस्था बिन्दुमालिनी॥

मूले तु कुण्डली शक्ति र्व्यापिनी केशमूलगा॥

“हृदय कमल में टिकी हुई प्राणशक्ति, कंठ में स्थित स्वप्न शक्ति, तालु में सदा धारा, भौं के मध्य में बिन्दु मालिनी, मूलाधार में कुण्डली शक्ति, केश मूल में व्यापिनी शक्ति तुम्हीं हो।”

शिखामध्यासना त्वं हि शिखाग्रेतु मनोन्मनी।

किमन्यद बहुप्रोक्तेनयत् किंचिज्जगतीत्रये॥

“शिखा के मध्य में तुम्हीं विराजमान हो और शिखा के अग्र (ब्रह्मरन्ध्र) में मनोन्मनी भी तुम्हीं हो बहुत कहाँ तक कहा जाए, तीनों लोकों में जो कुछ है वह सब तुम्हीं हो।”

तर्त्सवं त्वं महादेवि शिवे संध्ये नमोस्तु ते।

इतीदं कीर्तिहं स्तोत्रं संध्यायाँ बहुपुण्यवम्॥

“हे श्रीजी और संध्याजी! तुमको नमस्कार है इस स्तोत्र का सन्ध्या समय पाठ करने से अत्यन्त पुण्य होता है।”

कमला विष्णुलोके च गायत्री ब्रह्मलोकदा।

रुद्रलोके स्थिता गौरी हरार्धांगनिवासिनी॥

“तुम्हीं विष्णु लोक में कमला, ब्रह्मलोक में गायत्री रुद्र लोक में महादेवजी के अर्द्धांग में निवास करने वाली गौरी के रूप में निवास करती हो।”

आनन्द जननी दुर्गा दशधा परिपठ्यते।

वरेण्या वरदाचैव वरिष्ठ वर वर्णिनी॥

“तुम्हीं आनन्द देने दश भाँति की दुर्गा हो जिनको इस प्रकार कहा जाता है-वरेण्या, वरदा, वरिष्ठा वरवर्णिनी।”

गरिष्ठा च वराहा च वरारोहा च सप्तमी।

नीलगंगा तथा संध्या सर्वदा भोग मोक्षदा॥

“गरिष्ठा,वराहा, वरारोहा, नीलगंगा, संध्या तथा भोगनोक्षदा।”

हंसस्था गरुडारुढा तथा वृषभवाहिनी।

ऋग्वेदाध्यापिनी भूमौ दृश्यते या तपस्विभि॥

“ब्राह्मी हंसारूढ़, सावित्री वृषभवाहिनी और सरस्वती गरुणारुढ़ है। इनमें से ब्राह्मी ऋग्वेदाध्यापिनी, भूमितल में तपस्वियों द्वारा देखी जाती है।”

ब्रह्माँड में संव्याप्त अनेक शक्तियाँ इस जगत् का संचालन एवं नियंत्रण करती हैं। उन्हीं के कारण पर संसार इतना सुन्दर और गतिशील दिखाई पड़ता है। यदि यह शक्तियाँ न होतीं और केवल जड़ पदार्थ ही इस संसार में भरे होते तो यहाँ सम्मान जैसी नीरवता का ही साम्राज्य होता। न कोई हलचल होती न परिवर्तन की गुंजाइश रहती । तब न प्राणियों, वनस्पतियों का आविर्भाव होता और न उनके कारण जो विविध विधि क्रिया-कलाप चल रहे हैं उनकी कोई सम्भावना रहती। संसार का जो भी स्थूल सूक्ष्म स्वरूप हमारे सामने उपस्थित है उसके मूल में वे अदृश्य शक्तियाँ ही काम कर रही हैं जिन्हें देवताओं अथवा देवियों के नाम से पुकारा जाता है। स्मरण रखने की बात यही है कि यह सारा शक्ति परिवार जगज्जननी गायत्री महाशक्ति का ही सृजन निर्माण, वैभव एवं परिवार है। हम गायत्री महाशक्ति को अपने में जितना ही धारण करते हैं उतना ही वह अधिकार प्राप्त हो जाता है जिससे विश्वव्यापी शक्ति शृंखला के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर सकें। उन्हें अभीष्ट प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त कर सकें। यह क्षमता जिन्हें उपलब्ध हो जाती है वे सिद्ध पुरुष कहलाते हैं। सामान्य मनुष्यों को इन शक्तियों के आधिपत्य में रहना पड़ता है, वे परिस्थितियों के दास रहते हैं पर जिन्हें शक्तियों से सम्बन्ध बनाने एवं उन्हें मोड़ने का अधिकार मिल जाता है वे परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेते हैं। इस अनुकूलता के आधार पर वे अपना और असंख्य दूसरों का भला कर सकते हैं। शक्तिरूपा गायत्री के बारे में शास्त्र कहते हैं-

भ्राजते दीप्यते यस्माज्जगदन्ते हरत्यपि।

कालाग्नि रुप मास्थाय सप्तार्चिः सप्तरश्मिभिः॥

(याज्ञ॰ सं॰)

“जिस तेज के प्रताप से यह जगत् शोभित, वर्द्धित एवं सचेतन होकर अन्त में समाप्त हो जाता है वही सप्तार्चि तथा सप्तरश्मि युक्त सत्ता काल रूपी अग्नि की भाँति रूप धारण करती है।”

आदिशक्ते जगन्मातर्भक्तानुग्रह कारिणी।

सर्वत्र व्यापिकेऽनंते श्रीसंध्ये ते नमोस्तु ते॥

“आदिशक्ति, जगन्माता, भक्तों पर अनुग्रह करने वाली, सर्वत्र व्यापिका, अनन्ता, श्री, संध्या तुम्हारे लिये नमस्कार है।”

त्वमेव संध्या गायत्री सावित्री च सरस्वती।

ब्राह्मी च वैष्णवी रौद्री रक्त श्वेता सितेतरा।

“संध्या, गायत्री, सावित्री, सरस्वती, ब्राह्मी, वैष्णवी, रौद्री, रक्ता श्वेता, कृष्णा तुम्हीं हो।”

ततः परा पराशक्तिः परमा त्वम् हि गीयसे।

इच्छाशक्तिः क्रिया शक्तिर्ज्ञान शक्तिस्त्रिशक्तिदा॥

“तुम्हीं परा, परमा शक्ति कही जाती हो। इच्छाशक्ति और ज्ञानशक्ति भी तुम्हीं हो।”

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानाँ चाखिलेषु या।

भूतेषु तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमोनमः।

चितिरुपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्यस्थिता जगत।

(दुर्गा सप्तशती)

“जो देवी समस्त इन्द्रियों और समस्त भूतों की अधिष्ठात्री है उस सर्वव्यापक महाशक्ति को हम नमन करते हैं। वही इस समस्त जगत् का चेतन रूप रखने वाली है।”

गायत्री वा इदम् सर्व भूतं यदिदं किंचवाग्वे।

गायत्री वग्वा इदम् सर्व भूतं गायत्री त्रायते च॥

“यह जो कुछ है, निश्चय से गायत्री है। गायत्री ही सारे जगत की सार और वाणी है। क्योंकि वाणी ही सारे संसार को बनाती और रक्षा करती है।

सुप्ता नागोपमा ह्येषा स्फ रन्ती प्रभवा स्वया।

अहिवत् सन्धिसंस्थाना वाग्देवी बीज संज्ञका॥

ज्ञेया शक्तिरियं विष्णोर्निभया र्स्वगभास्वरा।

सत्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रय प्रसूतिका॥

(योग शास्त्र)

“वह देवी सोयी हुई नाग के समान मालूम होती है तथा अपने ही प्रकाश से दीप्त है। वह सूर्य के समान ही सन्धि स्थान में रहती है तथा वाग्देवी के बीज के नाम से विख्यात है। इसे विष्णु की शक्ति जानना चाहिए। यह निर्भय, स्वर्ण के समान आभा वाली है तथा सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों का प्रसूति स्थान है।”

यजुर्वेद पठन्ती च अंतरिक्षे विराजते।

सा सामगापि सर्वेषु भ्राम्यमाण तथा भुवि॥

“सरस्वति यजुर्वेद पढ़ती हुई अंतरिक्ष में विराजमान् होती है और सावित्री सामवेद गाती हुई पृथ्वी तल पर सर्वजनों में भ्रमती है।”

रुद्रलोकं गता त्वं हि विष्णुलोकनिवासिनी

त्वमेव ब्रह्मणो लोकेऽमर्त्यानुग्रहकारिणी॥

“सावित्री रुद्र लोक में सरस्वती विष्णु लोक में और ब्रह्मलोक में विराजमान रहती हैं-ये सब प्राणियों पर कृपा करने वाली हैं।”

मानव शरीरों में अनेक शक्तियाँ हैं, उनके मस्तिष्क एवं हृदय में इतनी अद्भुत क्षमतायें हैं जिनका कोई वारापार नहीं। देखने में सभी मनुष्य लगभग एक जैसे प्रतीत होते हैं। हाड़, माँस, इन्द्रियाँ, अंग, अवयव, आहार-विहार, स्वभाव, अभ्यास, लम्बाई चौड़ाई की दृष्टि से मानव प्राणियों में कुछ बहुत ज्यादा अन्तर दिखाई नहीं देता पर उनमें जो सूक्ष्म विशेषताएं सन्निहित हैं उन्हीं की न्यूनाधिकता में कोई गई-गुजरी स्थिति में पड़ा रहता है कोई उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचता है । बहुतों को इन क्षमताओं के अभाव में दुःख दारिद्रय से भरा शोक-सन्ताप ग्रस्त जीवन जीना पड़ता है पर जिनमें कुछ विशेषताएं प्रतिभा के रूप में अधिक होती हैं, वे उन उपलब्धियों के कारण अनेक दिशाओं में सफलताएं प्राप्त करते हैं और सुख-शाँति का लाभ लेते हुए यशस्वी एवं तेजस्वी जीवन व्यतीत करते हैं।

मानवीय शरीर एवं मस्तिष्क में सन्निहित शक्तियों को वैयक्तिक अभ्यास से भी बढ़ाया जाता है पर वे एक दैवी वरदान के रूप में भी न्यूनाधिक मात्रा में लोगों को मिलती हैं। यह दिव्य प्रतिमाओं एवं सूक्ष्म शक्तियों का वरदान मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति पर ही निर्भर है। कहना न होगा कि आध्यात्मिक उच्चस्तर की प्राप्ति में उपासना का अद्भुत महत्व है और उपासनाओं में सर्वोपरि सर्वसुलभ, सर्वांगीण गायत्री उपासना ही है। उसी की अनुकम्पा मानव-जीवन में विभिन्न प्रतिभाओं के रूप में प्रकाशवान होती है।

त्वं भूमि सर्व भूतानाँ प्राणः प्राणवताँ तथा।

धीः श्रीः कान्तिः क्षमा शान्ति श्रद्धा मेधा धुतिः स्मृति

त्वं मुदगीथेऽधं मात्रासि गायत्री व्याहृति स्तथा॥

-देवी भागवत

“तुम सब प्राणियों के धारण करने वाली भूमि हो प्राणवानों में प्राण हो। तुम्हीं धी, श्री, कान्ति, श्रद्धा, मेधा, धृति, स्मृति हो। तुम हो ॐकार की अर्धमात्रा उद्गीथ हो, तुम ही गायत्री व्याहृति हो।”

या श्रीः स्वयं सुकृतिनाँ भवनेष्व लक्ष्मीः।

पापात्मनाँ कृतधियो हृदयेषु बुद्धिः॥

श्रद्धा सताँ कुलजन प्रभवस्य लज्जा।

ताँ त्वाँ नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्॥

“वह भगवती सज्जनों के घर में लक्ष्मी रूप में निवास करती है। वही विवेकशून्यों के हृदय में बुद्धि का प्रादुर्भाव करती है। वही कुलीन जनों में दुष्कर्मों से लज्जा का भाव उत्पन्न करती है। साराँश यह है कि वही समस्त जगत का पालन तथा संचालन करने वाली शक्ति है।

कीर्ति कान्तिन्च नैरुज्यं सर्वेषाँ प्रियताँ व्रजेत्।

विख्यातंचापि लोकेषु भुक्त्वान्ते मोक्षमाप्नुयात्॥

“महादेवी की कृपा से ही कीर्ति, कान्ति, आरोग्य, सर्वप्रियता और संसार में यश आदि की प्राप्ति होती है और अन्त में मोक्ष, लाभ भी निस्सन्देह होता है।

या देवी सर्वभूतेषु विद्यारुपेण संस्थिता (सप्तशती)

“वह देवी ही सब भूतों (प्राणियों) में विद्या के रूप में प्रतिष्ठित है।”

ऐसी महाशक्ति की शरण में हमें जाना ही चाहिए, उसका सान्निध्य एवं संपर्क ग्रहण करना ही चाहिए। इस पारस मणि का स्पर्श कर निस्सन्देह हम अपने लोह जैसी कुरूपता एवं अपूर्णता को सर्वांगीण सौंदर्य एवं समग्र वैभव के रूप में परिणत कर सकते हैं।

सफल उपासना के मूल में जिस अविच्छिन्न श्रद्धा की आवश्यकता है वह इस महाविद्या के तत्व ज्ञान को भली प्रकार जान लेने से ही सम्भव है। इस लिये जिस प्रकार किसी भी कार्य के करने से पूर्व उसका स्वरूप एवं प्रतिफल जानना आवश्यक होता है उसी प्रकार गायत्री विद्या के बारे में भी आवश्यक जानकारी पूरे मनोयोग के साथ प्राप्त करनी चाहिए।

परिपूर्ण जानकारी का प्रयोजन यही है कि उस संबंध में अभीष्ट श्रद्धा उत्पन्न हो और उसके आधार पर नियम-बद्ध, क्रमबद्ध, व्यवस्थित और भावनापूर्ण उपासना संभव हो सके। इसी स्तर की उपासना अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करती है। तभी वे सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं जिनका वर्णन शास्त्रों एवं ऋषियों ने पग-पग पर किया है।

गायत्री उपासना में नियमितता एवं क्रमबद्धता आवश्यक है। जो श्रद्धा विश्वास की दृढ़ता होने पर ही सम्भव हैं। जब तक कौतूहल के रूप में अधूरे मन से कोई कार्य किया जाता है तब तक तन्मयता के अभाव में वह अस्त-व्यस्त ही रहता है। श्रद्धा होने से तत्परता एवं लगन उत्पन्न होती है, तब नियमित उपासना एक स्वभाव बन जाता है। ऐसी दशा में ही अभीष्ट परिणाम भी होता है।

जो गायत्री को जानता है वह उसके मर्म स्वरूप एवं प्रतिफल में परिणत होने के कारण तत्परतापूर्वक उपासना भी करता है, ऐसे व्यक्ति का मन भी लगता है। मन लगा कर जो भी कार्य किया जाता है उनमें सफलता मिलती ही है फिर उपासना में सफलता क्यों न मिलेगी?

यो हवा एव वित् ब्रह्मवित् पुण्याँ च कीर्ति लभते। सुरभीचं गन्धान्। सोऽपहतपास्या अनन्ताँश्चिय मश्रुते। य एवं वेद यश्चैव विद्वान एवमेताँ वेदानाँ मातरम्। सावित्री संपदमुषनिषदमुपास्ते।

- गोपथ ब्राह्मण

जो गायत्री के गहन तत्व को जानता है, वह सच्चा उपासक, पुण्य, कीर्ति, लक्ष्मी आदि को प्राप्त करता हुआ, परमश्रेय को प्राप्त करता है।

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