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Magazine - Year 1967 - Version 2

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सामूहिक उपवास द्वारा राष्ट्र एवं आत्मा की सेवा करिये।

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‘भूखे भजन न होहि गुपाला’, वाली लोकोक्ति से सब लोग अवगत हैं। इसका ठीक-ठीक अर्थ यही है कि यदि मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक आवश्यकताओं की आपूर्ति से व्यग्र एवं चिन्तित रहेगा तो उसका चित्त धर्म कर्म अथवा आध्यात्म मार्ग में नहीं लगेगा। धार्मिक प्रवृत्तियों को तभी प्रोत्साहित किया जा सकता है जब मनुष्य जीवन की मौलिक आवश्यकताओं, रोटी-कपड़े की चिन्ता से मुक्त रहे। जब दिन-रात भूख सता रही हो, बुभूक्षा चैन न लेने दे रही हो, तब कोई भी व्यक्ति वह उच्चस्तरीय आध्यात्मिक चिन्तन किस प्रकार कर सकता है जिसके लिए मानसिक प्रसन्नता एवं बौद्धिक संतुलन की नितान्त आवश्यकता है।

आज देश में यद्यपि धर्म-प्रसार, आध्यात्मिक प्रवर्तन तथा आत्म-उन्नति की अनेक योजनायें चल रही हैं, साथ ही भारतीय जनता स्वभाव से भी आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाली है और वह यथासाध्य आध्यात्मिक विकास करना भी चाहती है, उसके लिए प्रयत्न भी करती है किन्तु उस दिशा में आपेक्षिक प्रगति होती दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। इसका मुख्य कारण यही है कि ‘नर्हि सम्भव भूखे भजन’।

आज अन्नाभाव के संकट ने राष्ट्र के आर्थिक चारित्रिक तथा आध्यात्मिक आस्तित्व को कम्पित कर रखा है। राष्ट्र का नैतिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक स्तर उठाने का प्रयत्न किया जा रहा है किन्तु वाँछित परिणाम के दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। और तब तक इस ओर किसी विशेष प्रगति की आशा भी नहीं की जा सकती जब तक किसी न किसी उपाय से इस अन्न संकट को पराभूत न कर लिया जाये।

ऐसे उपायों में जिनसे अन्न-संकट का प्रभाव भी कम हो और आध्यात्मिक भाव की अभिवृद्धि हो एक उपवास का उपाय भी है। उपवास का महत्व शारीरिक दृष्टि से तो है ही धार्मिक दृष्टि से भी बहुत है। ऋषियों ने भारतीय जीवन पद्धति में पर्वों, त्यौहारों, अनुष्ठानों, शुभ दिनों पर उपवास का विधान रक्खा है। उपवास का व्रत पालन करने से मनुष्य के विषय विकार दूर होते हैं। रोगों की सम्भावना कम रहती है। मानसिक स्फूर्ति तथा बौद्धिक प्रखरता की उपलब्धि होती है। प्रतिभा में चमक और पूजा में प्रकाश का समावेश होता है। उपवासों का प्रभाव मनुष्य की आत्मा पर बड़ा ही अनुकूल पड़ता है। आलस्य प्रमाद और तन्द्रा आदि दुर्गुणों में उपवास के नियम बहुत सहायक होते हैं। मासिक पाक्षिक अथवा साप्ताहिक उपवास रखने से पाचन क्रिया प्रखर रहती है। अनेक दिनों के एकत्र मल से मुक्ति मिलती है। उपवास के नियमों के साथ किया हुआ भोजन, भोजन न रहकर स्वास्थ्योपयोगी पथ्य बन जाता है। उपवास द्वारा किये हुए निर्विकार तन मन तथा बुद्धि आध्यात्मिक प्रगति में बहुत सहायक होते हैं।

अपनी स्थिति, परिस्थिति अथवा शारीरिक क्षमता के अनुसार प्रत्येक भारतीय को मासिक, पाक्षिक अथवा साप्ताहिक उपवास व्रत का पालन करना ही चाहिये। इस प्रकार आध्यात्मिक लाभ तो होगा ही खपत कम होने से अन्न संकट भी हल्का होने लगेगा।

जो वृद्ध, क्षीण अथवा रोगी हैं और साप्ताहिक उपवास व्रत निभाने की स्थिति में नहीं हैं वे मासिक अथवा पाक्षिक उपवास करें किन्तु जो स्वस्थ, तरुण अथवा सशक्त हैं उन्हें साप्ताहिक उपवास का नियम निर्वाह करना ही चाहिये। अच्छा तो यह है कि वे रविवार को पूरे दिन भर कुछ न खायें अन्यथा एक बार निरन्न भोजन करके दूसरे समय कुछ भी न खायें। और यदि इसमें भी कठिनाई हो तो एक समय अन्न लेकर दूसरे समय निराहार रहें अथवा शाक का ही भोजन करें।

उपवास बड़ा ही सुलभ एवं सुखद व्रत है। इसके निर्बलता की सम्भावना बतलाने वाले वास्तव में यह नहीं जानते कि उपवास का व्रत निर्बलता नहीं बढ़ाता बल्कि शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों को प्रखर बनाता है। प्रत्येक श्रमिक ही क्यों लौह मशीन को भी सप्ताह में एक दिन आराम करने के लिए अवकाश दिया जाता है। इससे उसकी थकान दूर होती है। अवकाश वाले दिन उसकी सफाई की जाती है। जिससे अगले सप्ताह भर वह और अच्छी तरह काम करने योग्य बन जाती है जिन मशीनों से निरन्तर काम लिया जाता है वे शीघ्र ही क्षीण होकर अपनी कार्य क्षमता खो देती हैं। मनुष्य का शरीर भी एक यंत्र है। इसको भी आराम तथा पूर्णतया सफाई के लिए सप्ताह में एक दिन अवकाश चाहिए जिससे कि वह अगले सात दिनों तक अच्छी तरह काम कर सके और शीघ्र क्षीण होने से सुरक्षित रहे। तीसों दिन दोनों समय भर पेट खाते-पीते रहने से आंतें तथा पेट का पाचन संस्थान निर्बल हो जाता है जिससे अपच तथा मंदाग्नि आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। पेट को किसी दिन भी अवकाश न देना उस पर अत्याचार करना है। अपने पर अत्याचार करने अथवा अपनी आत्मा को अवाँछनीय व्यवहारों से सताने वाला आध्यात्मिक उन्नति तो दूर साधारण भौतिक जीवन का भी सुख नहीं उठा सकता । शारीरिक, मानसिक, तथा आत्मिक तीनों दृष्टियों से उपवास की आवश्यकता है इस आवश्यकता की पूर्ति प्रत्येक धार्मिक तथा राष्ट्रीय जन को करनी ही चाहिये । उपवास व्रतों का महत्व बतलाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है। विषया विनिवर्तन्ते, निराहारस्य देहिनः-

अर्थात् उपवास करने में मनुष्य के विषय शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते हैं।

आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से चान्द्रायण आदि व्रतों का बहुत महत्व है। किन्तु यह बड़े-बड़े व्रत विशेष उद्देश्य विशेष स्थिति तथा विशेष अनुष्ठानों के लिए हैं, वर्तमान समय में एक साप्ताहिक व्रत की अनिवार्य आवश्यकता है। अनेक लोग सप्ताह में एक दिन भी उपवास रखने अथवा निरन्न भोजन करने से कठिनाई अनुभव करते हैं। इस कठिनाई का कारण और कुछ नहीं केवल यही है कि हम भारतवासी कुछ समय से, अन्न के कीड़े और स्वाद के लोलुप बन गये हैं। सप्ताह में एक बार निराहार अथवा शाकाहार की बात सुनकर ऐसे हताश से हो जाते हैं जैसे न जाने उन्हें कौन-सा पहाड़ टालने के लिए कहा जा रहा है। सप्ताह में एक दिन का उपवास क्षुधा को तीव्र करता है। भोजन तथा रस में आनन्द ही आता है और हर तरह से स्वास्थ्य के लिए हितकर है अध्यात्मिक जीवन पद्धति में विश्वास रखने वाले भारतीयों को भोजन के सम्बन्ध में यह पेटू पन शोभा नहीं देता विजय व्रत के नाम पर हम सबको अपने जीवन क्रम में रविवार, मंगलवार अथवा जो दिन सुविधाजनक लगे को निराहार उपवास करना ही चाहिये। इस प्रकार के लाभकारी व्रत के पालन से अन्न आपूर्ति का संकट भी मन्द होगा, स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और धार्मिक भावना के समावेश से आध्यात्मिक लाभ भी होगा।

सप्ताह में एक दिन अथवा एक जून भी निराहार न रह सकने वाले कम से कम अन्न त्याग का तो व्रत ले ही लें। यदि वे निराहार नहीं रह सकते तो निरन्नाहार ही करें। अन्न भोजन के स्थान पर कंद जैसे आलू शकरकंद, चुकन्दर शलजम अथवा फल ऋतु फल खीरा, ककड़ी फूट, खरबूजा, तरबूजा, आम अमरूद आदि पर रह सकते हैं। इनके अभाव अथवा कठिनाई में शाक भाजी का क्रम चला सकते हैं नहीं तो दूध, दही, छाछ आदि पर तो निर्वाह कर ही सकते हैं यदि इन छूटों, विकल्पों तथा सुविधाओं के बावजूद भी जिन्हें विजय व्रत कठिन विदित होता है उन्हें समझ लेना चाहिये कि वे अन्न के पूरी तरह कीड़े बन गये हैं, स्वादों, सो भी बँधे-टके स्वादों के हाथों पूरी तरह रहन हो चुके हैं। उनके जीवन में किसी भी शुभ परिवर्तन अथवा प्रगति का कोई अवसर नहीं रहा है। उनकी प्रवृत्तियों में से धार्मिक, आध्यात्मिक अथवा राष्ट्रीय प्रवृत्ति का बहिष्कार हो गया है और पेट के सिवाय उनके सामने किसी आदर्श का कोई मूल्य महत्व नहीं रह गया है। ऐसे रूढ़ एवं इन्द्रिय लोलुप व्यक्ति वर्षों तक ही जप तप पूजा पाठ क्यों न करते रहें आध्यात्म लाभ की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं जा सकते।

ईमानदारी से किसी भी राष्ट्रीय अथवा सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करना स्वयं में एक धार्मिक अथवा पारमार्थिक कृत्य है। फिर भी जिनको राष्ट्र अथवा समाज का नाम लेने से भौतिकता का गान होता हो वे इस साप्ताहिक उपवास व्रत में धार्मिक भावना का समावेश कर सकते हैं। उन्हें ऐसा समझ लेना चाहिए कि यह अन्न त्याग का व्रत लोक मंगल के लिए एक अनुष्ठान है, जिसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार का फल भी संसार की अन्न संकटापन्न जनता के लिए समर्पित करते हैं। निष्ठा पूर्वक किसी व्रत का पालन करने से मनुष्य के आत्मबल एवं संकल्प शक्ति की वृद्धि होती है। उसमें दृढ़ प्रतिज्ञता तथा स्थिरता आती है किसी भी आपत्ति, संकट अथवा अप्रत्याशित प्रतिकूलता सहन कर सकने की क्षमता प्राप्त होती है। इस छोटे से विजय व्रत को निभाते-निभाते बड़े-बड़े व्रत तथा संकल्प निर्वाह का अभ्यास होगा जिससे आध्यात्मिक क्षेत्र में बढ़ने में काफी सहायता मिलेगी।

राष्ट्रीय न सही आध्यात्मिक भावना से ही उपवास व्रत का निर्वाह करने और बच्चों को इसका अभ्यास कराते रहने से घर के वातावरण में धार्मिकता का पुट प्रवेश पायेगा जो पूरे परिवार के लिए कल्याणकारी होगा। सप्ताह में एक बार भी श्रद्धापूर्वक निराहार रहने अथवा शाकाहार पर रहने से भी स्वभाव में सात्विक प्रवृत्तियों के बीज पड़ जायेंगे जो अवसर पाकर पूरी तरह से पुष्पित एवं पल्लवित होकर पूरा जीवन ही सात्विक बना देंगे। यह उपवास का विजय व्रत लेकर हम सबको आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ राष्ट्र की सेवा का परमार्थ पुण्य करना ही चाहिये।

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