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Magazine - Year 1967 - Version 2

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अबोधों की बात महत्वहीन है-

किसी सत्य की खोज करके संसार के सामने रखते समय यह विश्वास न रखना चाहिए कि लोग उसे आसानी से स्वीकार कर लेंगे। संसार हर उस नई बात से, चाहे वह उसके लिये प्रत्यक्ष रूप में हो, कितनी भी उपयोगी तथा कल्याणकारी क्यों न हो, प्रारम्भ में विचकता ही है। इसमें उसमें कोई दोष नहीं है, वह अपने प्राचीन संस्कारों के कारण ही ऐसा करता है।

संसार अधिकतर अबोध ही रहता है और अपनी इस अबोधता के कारण ही उसके संस्कारों में एक ऐसी कायरता घर कर जाती है जो उसे किसी नई खोज या नये निष्कर्ष को स्वीकार करने से भय दिखाती है। संसार की यह कायरता धीरे-धीरे दूर होती है। इसमें सहसा क्राँति उत्पन्न कर देने से किसी भयानक सांस्कारिक संघर्ष का भय रहता है। मनुष्य को सच्चे हृदय से काम करना चाहिए और धैर्यपूर्वक निर्लिप्त भाव से परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

-बंकिम चन्द्र

महत्ता प्राप्ति से उद्धत न बना जाए

मान, सम्मान, आदर प्रतिष्ठा की इच्छा कुछ न कुछ सबके हृदय में रहती है। कौन ऐसा होगा जो यह न चाहे कि लोग उसे आदर की दृष्टि से देखें, उपयुक्त स्थान दें, उसकी और उसके कार्यों की सराहना करें। निःसन्देह सभी में यह इच्छा रहती है। विशेषता पाकर मनुष्य को बड़ा आत्मसंतोष तथा आत्मसुख मिलता है।

मान और बड़प्पन की इच्छा होना बुरा नहीं है। यह वह आकाँक्षा है जो मनुष्य को महान कार्य करने लिये प्रेरित करती है। यदि मनुष्य के हृदय से यह प्रेरक भाव निकल जाये तो वह इस प्रकार का कोई काम करने में श्रम तथा त्याग न करे जो संसार की सेवा अथवा शोभा का सम्पादन कर सके।

होना तो यह चाहिये कि हम मनुष्य होने के नाते, ईश्वर का विशेष अंश होने की महत्ता से प्रेरित होकर संसार की सेवा करें उसकी शोभा बढ़ायें। उसमें अधिकाधिक सुख शाँति की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने में योगदान करें। तथापि यदि एक बार मान बड़ाई पाने की भावना से भी श्रेयस्कर कार्यों को करते हैं तब भी किसी हद तक आलोचना अथवा निन्दा की बात नहीं है। किन्तु जब किसी का यह भाव मनुष्यता की सीमा से बाहर आकर संसार पर बड़प्पन थोपने की दिशा में प्रेरित करने लगता है तो निश्चय ही वह निन्दा का ही नहीं घृणा का विषय बन जाता है। अपने सत् एवं महान कार्यों द्वारा बड़प्पन पाने का प्रयत्न यद्यपि राजस भाव है तथापि किसी सीमा तक क्षम्य है। किन्तु जब बड़प्पन की भावना भूख बन कर किसी प्रकार भी अपनी तृप्ति पाने के लिये तड़पने लगती है तब वह पैशाचिक प्रवृत्ति की परिधि में चली जाती है। यह प्रवृत्ति संसार ही नहीं स्वयं अपने लिये भी भयंकर एवं विनाशकारी होती है। बड़प्पन की इस तृष्णा को इस सीमा तक नहीं बढ़ने देना चाहिये।

अनेक लोग अपने दम्भ को तुष्ट करने और समाज में महत्ता पाने के लिये बहुधा गलत उपायों का आश्रय ले लिया करते हैं। साधारण, अशिक्षित तथा असभ्य लोग विशेषता पाने के लिये वेश-भूषा, और वस्त्राभूषणों पर निर्भर हो कर तरह तरह के फैशन बनाते और प्रदर्शन किया करते हैं। आज जो फैशन के नाम पर तरह-तरह के वेश विन्यास चल रहे हैं, प्रसाधनों तथा उपकरणों पर पानी की तरह पैसा खर्च किया जा रहा है उसके पीछे विशेषता, महत्ता, प्रशंसा अथवा प्रतिष्ठा पाने का भाव ही छिपा रहता है। बड़ी दावतें, शराब और नाच रंग का आयोजन करने वाले भी इसी झूठी प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा से प्रेरित होकर करते हैं। शादी ब्याह में प्रदर्शन पर अपने को मिटा देने वाले अधिकतर इसी लिप्सा से पीड़ित रहा करते हैं। किन्तु खेद का विषय है कि वे यह नहीं समझ पाते कि समाज में महत्ता तथा प्रतिष्ठा पाने के कुछ और ही मार्ग होते हैं। इन थोथे प्रदर्शनों से हानि के सिवाय कोई श्रेय हाथ नहीं लगता। त्याग, तपस्या सेवा परोपकार, परमार्थ, विद्या तथा मानवता पूर्ण भावनायें ही वे विषय हैं जिनका अवलम्बन करने पर सच्ची महत्ता अथवा प्रतिष्ठा प्राप्त हुआ करती है।

अनेक बार जब यह आकाँक्षा हठ में बदल जाती है तब ध्वंसात्मक मार्ग का अनुसरण करने लगती है। संसार के सारे आक्रान्ता, आततायी, अत्याचारी तथा आतंकवादी महत्वाकांक्षा की इसी निम्न कोटि से ग्रस्त रहे हैं। जब वे गुणों के अभाव में त्याग, तपस्या अथवा सेवा का मार्ग न अपना सके तो उन्होंने उद्दण्डता तथा आतंक का मार्ग अपना लिया और संसार पर अपना महत्व तथा सिक्का थोपने के लिये उन प्रयत्नों को अपना चले जो आज भी मनुष्यता के नाम पर कलंक बने हुए हैं।

बहुत बार मनुष्यों के सामान्य जीवन में देखा जा सकता है कि अपनी क्षमता न होने पर बहुत से लोग अपना बड़प्पन प्रकट करने के लिये आगे बढ़े अथवा ऊँचे उठे लोगों को नीचे गिराने की कोशिश किया करते हैं। उनकी आलोचना, निन्दा तथा उपेक्षा किया करते हैं और सोचते हैं कि इस प्रकार लोग उन्हें बुद्धिमान, महान, अप्रभावित तथा उक्त महापुरुष के समकक्ष समझने लगेंगे। समाज में विशेषता पाने के इस तरीके को हीनता के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?

समाज में, अनेक लोग जब गुणों के अभाव अथवा दुर्गुणों के कारण प्रतिष्ठा नहीं पाते तो वे डाह से प्रेरित होकर उद्दण्ड बन जाते हैं। झगड़ा फसाद, मारपीट और चोरी डकैती पर उतर आते हैं और तरह-तरह से लोगों को सता और आतंकित करके अपनी महत्ता की तृषा मिटाने का प्रयत्न किया करते हैं। अयोग्य विद्यार्थी अपनी इसी हीनता के कारण कक्षा के सुयोग्य एवं प्रखर विद्यार्थियों के स्वभावतः विरोधी बने रहते हैं। वे विद्या के सहक्षेत्र में उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते तो उद्दण्डता का मार्ग ग्रहण कर अपना रोब जमाने का प्रयत्न किया करते हैं। रावण, कंस, हिरण्यकशिपु, हिटलर, लड़ाकू नेपोलियन, तैमूर तथा नादिर आतंकवादी आक्रान्ता महत्ता की इसी तृष्णा से पीड़ित थे। सद्गुणों के अभाव में जब उनका महत्वाकाँक्षी दम्भ, महत्ता न पा सका, पूजा एवं प्रतिष्ठा से वंचित रहा तो वे अकारण ही अपनी दुर्बलता से दुनिया के दुश्मन बनकर हठात् अपनी महत्ता थोपन के लिये ध्वंस के मार्ग पर दौड़ पड़े। किन्तु क्या वे इतना सब रक्त बहा कर और संसार को त्रास देकर कोई बड़प्पन कोई प्रतिष्ठा अथवा कोई आदर सम्मान पा सके? बल्कि मनुष्य की पैशाचिक वृत्ति के उदाहरण बनकर और शिर पर पाप एवं अपवाद की गठरी बाँध कर संसार से उठ गये।

माना जा सकता है कि इनमें शक्ति थी, मनोबल और विश्वास था, साहस और समझ थी जिसके आधार पर वे संसार को अपने आतंक से आक्रान्त कर सके। किन्तु क्या उनकी यह विशेषतायें उनके लिये एक शब्द प्रशंसा और एक बूँद प्रतिष्ठा का अर्जन कर सकी हैं। कितना अच्छा होता कि उन्होंने अपनी इन विशेषताओं को ध्वंस में न लगाकर सृजन में लगाया होता। संहार के स्थान पर सेवा का मार्ग अपनाया होता आतंक के स्थान पर संराधन को श्रेय दिया होता तो जीवन काल में जो पूजा प्रतिष्ठा होती वह तो होती हो आज इतिहास में उनका नाम सूर्य चन्द्र की तरह चमकता होता। लोग श्रद्धापूर्वक उनका नाम लेते और गौरव गरिमा के प्रति सिर नवाते। किन्तु महत्ता के प्रति मनुष्य के उस दुराग्रह को क्या कहा जाए? दम्भ की उस दुर्बलता को किन शब्दों में कोसा जाये? जो देवता बन सकने वाले मनुष्य को पिशाच की श्रेणी से भी नीचे गिरा देती है। अधैर्य, असहिष्णुता तथा गुणहीनता की स्थिति में जगी हुई महत्व की आकाँक्षा मनुष्य को गलत मार्ग पर ही ढकेल देती है। महत्वाकाँक्षा बुरी बात नहीं है, बड़प्पन अथवा महत्ता की इच्छा अच्छी कही जा सकती है किन्तु कब जब इसके पीछे पात्रता वर्तमान हो अथवा उसे उत्पन्न करने का प्रयत्न चल रहा हो। अन्यथा उसका जो पाप होता है वह मत्थे चढ़े बिना नहीं रहता।

नेपोलियन बाल्यकाल से महत्वाकाँक्षी था। वह समाज में अपना विशेष मूल्य एवं महत्व चाहता था। उसकी बड़ी इच्छा थी कि लोग उसका आदर करें, शिर नवाये और यह मानें कि नेपोलियन बोनापार्ट संसार का एक विशेष व्यक्ति है। उसकी यह कामना ही इस बात का द्योतन करती है कि उसमें उस पात्रता की कमी थी उन गुणों का अभाव था जो मनुष्य को चुपचाप महान् पथ पर लगा देते हैं और अनायास ही उससे ऐसे काम कराने लगते हैं जिन के कारण बिन चाहे ही उसकी महत्ता हो जाती है प्रतिष्ठा मिलने लगती है। नेपोलियन की महत्वाकाँक्षा अहंमन्यताजन्य थी।

नेपोलियन ने अपनी बहुमूल्यता, विशेषता तथा प्रशंसा प्रतिष्ठा के लिये मार्ग तथा क्षेत्र के निर्वाचन पर विचार किया। उसे ऐसा लगा कि यदि वह लेखक बन सके तो निश्चय ही समाज में अपनी महत्वाकाँक्षा को मूर्तिमान देख सकेगा। उसने अपने अन्दर लेखक के गुण, उसकी विशेषताओं तथा पात्रता के भावाभाव पर विचार नहीं किया और एक ऊँची आकाँक्षा के साथ उस क्षेत्र में उतर पड़ा। वह सत्तरह से चौबीस वर्ष तक लेखक बनने का प्रयत्न करता रहा किन्तु सफलता न पा सका। उसे तो एक महान लेखक के रूप में प्रतिष्ठा पाने की जल्दी थी। वह जल्दी से जल्दी अपने नाम की ध्वजा उड़ते देखना चाहता था। इसलिये वह अध्ययन एवं अभ्यास पर समय एवं श्रम को पर्याप्त मात्रा में न दे सका। उसका उद्देश्य लेखक अथवा विचारक बनने का नहीं था क्योंकि उसमें इसके बीजाणु ही नहीं थे। उसका उद्देश्य इस माध्यम से समाज में महत्व प्राप्त करने का था। उसने जल्दी-जल्दी कार्सिका इतिहास नामक एक पुस्तक लिख डाली जो उसे अपनी महत्वाकाँक्षा तथा अहंमन्यता के कारण बड़ी ही सफल तथा महान् लगी। उसने उसे बड़े गर्व के साथ उस समय के प्रसिद्ध विद्वान एब्बे रेनाल के पास सम्मति के लिये भेज दी।

निष्पक्ष विद्वान ने अपनी सम्मति देते हुए पुस्तक वापस कर दी कि और “गहरी खोज के साथ पुस्तक दुबारा लिखो।” नेपोलियन ने तो पुस्तक प्रशंसा के लिये भेजी थी। एब्बे रेनाल की सम्मति से उसे बड़ी झुँझलाहट हुई। अनन्तर उसने ‘प्रेम’, ‘आनन्द’ तथा ‘भान’ आदि विषयों पर अनेक लेख लिख कर लिवरे पुरस्कार की प्रतियोगिता में भेज दिये जो कि असफल घोषित कर दिये गये। इस घटना ने नेपोलियन को बिल्कुल निराश कर दिया और उसका विचार बन गया कि समाज मुझे मान्यता देना नहीं चाहता -बस यहीं से उसका मार्ग गलत हो गया और उसमें संसार पर हठात् महत्ता थोप देने की प्रतिहिंसा जाग उठी। इस प्रतिक्रिया का दोष उसकी उस अहंमन्यता को था जिसके कारण लोग अपनी अपात्रता की ओर न देखकर समाज से द्वेष मानने लगते हैं।

प्रतिहिंसा से प्रेरित नेपोलियन सैनिक क्षेत्र में चला गया और अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को केन्द्रित एवं नियोजित कर बहुत कुछ कर दिखाया। किन्तु उस बहुत कुछ का मूल्याँकन कुछ भी न हुआ। वह सैनिक बना, सेनापति बना, आक्रामक हुआ और विजय पर-विजय प्राप्त की, सारे यूरोप पर आतंक बन कर छा गया, शासक एवं सम्राट बना किन्तु फिर भी उसका उद्देश्य असफल ही रहा। साहस, वीरता, पुरुषार्थ एवं संलग्नता के गुणों की शक्ति तथा विशेषता तो अवश्य ही उसके माध्यम से प्रभावित हुई किन्तु नेपोलियन का व्यक्तित्व अपने उद्देश्य में सफल न हो सका। जिस मूल्य, महत्व एवं प्रतिष्ठा के लिये वह लालायित था, जिस महत्ता की उसे आकाँक्षा थी वह न मिल सकी । इसके स्थान पर वह इतिहास के वामपक्ष में लिखा जाकर आलोचना, निन्दा, भर्त्सना तथा अपवाद का पात्र जरूर बन गया। यदि नेपोलियन ने अहंमन्यता के वशीभूत न होकर, उचित मार्ग पर चलकर इसका चतुर्थांश भी कर दिखाया होता तो शायद वह संसार के महानतम व्यक्तियों में गिना जाता। उसकी पूजा प्रतिष्ठा उससे शत सहस्र गुना अधिक होती जिसकी कि वह कामना कर रहा था।

महत्वाकाँक्षा बुरी नहीं, सम्मान एवं आदर की इच्छा है, किन्तु जब यह अहंमन्यता, राग, द्वेष, प्रतिहिंसा, स्पर्धा, ईर्ष्या अथवा अपात्रत्व से दूषित हो जाती है तो विष बनकर अपने आश्रयदाता को नष्ट कर देती है। हीनता से भड़की हुई महत्ता की भावना प्रायः ध्वंसक बना देती है। जिससे मनुष्य ऐतिहासिक होकर भी अपयश के कारण लोक-परलोक दोनों में पाप एवं अपवाद का भागी बनता है। मनुष्य के मूल्याँकन का सही मापदण्ड सफलता अथवा असफलता नहीं है बल्कि वह मार्ग और वह राजनीति है जिसे उसने अपने अभियान का आधार बनाया है।

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