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जहाँ शक्ति का भण्डार न्यून पड़ जाता है, वहाँ सस्ती सधुता अकस्मात् आ जाती है। इसके विपरीत जिस मनुष्य में शक्ति का अपार भंडार है उसे प्रयत्नपूर्ण उद्देश्यों की ललकार स्वीकार करने में प्रसन्नता प्राप्त होती है। वह शक्तियुक्त जीवन व्यतीत करता है।
जनता किसी की प्रशंसा शक्तिमान अधिकारियों के मुँह से सुनती है तो उसकी दृष्टि में उस प्रशंसित मनुष्य का आदर-सम्मान शतगुण हो जाता है। सम्पत्ति शक्ति की प्रतीक है। इसलिये सम्पत्ति को पूर्णता-प्राप्ति के हेतु गतिमान और प्रवाह युक्त होना चाहिये। क्योंकि शक्ति क्रियाशील और गतिमान होती है। -टैगोर
स्वच्छ रहें-उच्च बनें
सदा साफ -सुथरे रहिये क्योंकि आप मनुष्य हैं। गंदगी पशुओं का दुर्गुण है। मनुष्य की शोभा नहीं। मनुष्य और पशु में जो एक मूल अन्तर है वह सफाई और गंदगी का है।
पशु जहाँ बैठता है वहीं मल-मूत्र किया करता है। गंदगी अपने शरीर में लथेड़ लेने पर उसको दूर करने की चिन्ता नहीं करता। इसी गंदी आदत के कारण वह पशु कहा जाता है। अब चूँकि मनुष्य ऐसा नहीं करता, वह पशु से श्रेष्ठ उपाधि मनुष्य से विभूषित किया जाता है।
जिस मनुष्य में जिस मात्रा में जितनी अधिक गन्दी आदत हो उसे उतनी मात्रा में पशु ही मानना चाहिए, जिस प्रकार पशु को गन्दा रहने पर लोग उसे उसको दोष लगाकर बुरा-भला नहीं कहते उस प्रकार मनुष्य का यह दोष क्षमा नहीं किया जा सकता।
सफाई की अपेक्षा किसी पशु से की भी नहीं जा सकती और न उसको इस दोष के लिये अपराधी ठहराया जा सकता है। इसलिये कि परमात्मा ने उसे गन्दगी पहचानने की बुद्धि नहीं दी है।
किन्तु मनुष्य गन्दगी के दोष से मुक्त नहीं किया जा सकता। परमात्मा ने उसे गन्दगी पहचानने वाली आँख सूँघ सकने वाली नाक और निर्णय कर सकने वाला मस्तिष्क दिया है।
मनुष्य-जीवन सर्वश्रेष्ठ योनि है। एक कम चौरासी लाख योनियों में अपने कर्म-योग की किश्तें चुकाता हुआ कोई जीव न जाने कितने दिनों में इस योनि में आकर अपने बंध छुड़ाने के लिये कर्म करने की स्वतन्त्रता पाता है। इसीलिये मनुष्य योनि कर्मयोनि के साथ अन्तिम योनि मानी जाती है। किसी जीव के लिये मनुष्य योनि वह अलभ्य एवं अन्तिम अवसर है जिसमें या तो वह अपने गुण कर्म, स्वभाव का परम परिष्कार करके आत्म लोक की कक्षा में पहुँचकर परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। सदा सर्वदा के लिये भव-बंधन से मुक्त हो सकता है। अथवा पुनः न जाने कितने युगों के लिये मनुष्येत्तर विवश योनियों में भटकने के लिये चला जायेगा। अपने इसी उद्धार कार्यक्रम के लिये ही परमात्मा ने मनुष्य को विशेष इन्द्रियाँ और विशेष विवेक बुद्धि अनुग्रह की है जिससे कि वह भला बुरा, ऊँच-नीच गुण दोष तथा मलीनता-मंजुलता को ठीक से पहचान सके।
कायिक, वाचिक एवं मानस परिष्कार ही मनुष्यता की पहली पहचान है। जो अपने इन लक्षणों से रहित दिखाई देता है उसे मनुष्य होने पर भी पशुओं की गन्दी वृत्ति का साझीदार ही समझना चाहिए।
स्वच्छता न केवल मनुष्यता बल्कि देवत्व का लक्षण है और गन्दगी न केवल पशुता बल्कि असुरता का चिन्ह है। इस प्रकार गन्दे आदमी को केवल पशु न कहकर असुर कहना ही अधिक ठीक रहेगा।
इस प्रकार गंदे रहकर असुरता को अपनाने वाले मनुष्य जीवन में देवत्व पाना तो दूर ठीक-ठीक मनुष्यता भी प्राप्त नहीं कर सकते। जो अपना बाह्य साफ नहीं रख सकता, जिसमें कि केवल हाथ-पैर के स्थूल परिश्रम की ही आवश्यकता होती है, वह अपने अन्तर एवं अन्तरात्मा की सफाई क्या कर सकेगा, जिसमें कि अत्याधिक कठिन एवं सूक्ष्म परिश्रम की आवश्यकता होती है।
बाह्य स्वच्छता आन्तरिक स्वच्छता की ओर बढ़ने का पहला कदम है। अनास्था एवं उपेक्षा जो कि आन्तरिक उन्नति के सबसे बड़े बाधक शत्रु हैं बाह्य स्वच्छता रखने के प्रयत्न में दूर हो जाते हैं। जिसे गन्दगी नापसन्द होगी वह एक क्षण को मलीन दशा में नहीं रह सकता। गन्दे होते ही कपड़े धोयेगा। स्वच्छता के लिये नित्य नियमित स्नान करेगा। घर द्वार साफ रक्खेगा। यहाँ तक कि अपने पास पड़ोस तक में गन्दगी न रहने का भरसक प्रयत्न करेगा। ऐसा करते रहने से न तो उसको आलस धर दबायेगा ओर न उपेक्षा वृत्ति ही उस पर हावी हो सकेगी। उसमें परिश्रम करने, तत्परता और नियमित काम करने की आदत के साथ दोष दूर करने की अभिरुचि पैदा होगी। इस प्रकार के अभ्यास मनुष्य ही को स्वभावतः आन्तरिक परिष्कार एवं प्रसन्नता की ओर अग्रसर करते हैं। परमात्मा को मनुष्य का साधन पवित्रता सब से प्रिय है और पवित्रता की पहली शर्त स्वच्छता है। अस्तु प्रभु की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि मनुष्य पवित्र बनने के लिये स्वच्छता का अभ्यास करे, साफ -सुथरा रहना सीखे।
साफ-सुथरे मनुष्य के साधन न केवल उसको ही परमात्मा की ओर बढ़ाते हैं बल्कि परमात्मा को भी अपनी ओर आकृष्ट किया करते हैं। इस प्रकार यह दोहरा अभियान शीघ्र ही मनुष्य को परमात्मा से मिला कर बंधनमुक्त कर देता है।
अस्तु मनुष्य को चाहिए कि अपना मानव-जीवन धन्य करने के लिये गंदगी की असुरता का त्याग करके स्वच्छता का देवत्व अपनाये। स्वच्छता में स्वर्ग की समीपता और मलीनता में नर्क का निवास होता है।
गन्दगी मनुष्य की मानसिक हीनता की परिचायक होती है। जिसके मन की वृत्तियाँ सुरुचिपूर्ण होंगी वह किसी प्रकार भी गन्दा रहना पसन्द नहीं करेगा। जिसे अपने कपड़ों की सफाई, शरीर की स्वच्छता और उठने-बैठने व रहने की जगह की झाड़-बुहार की परवाह नहीं होती वह वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य नहीं होता। मनुष्यता के प्रति जिसके मन में जरा भी आदर होगा वह गन्दगी की पाशविक वृत्ति को अपने पास फटकने तक न देगा। नित्य प्रति शरीर की सफाई करेगा, गन्दे होते ही कपड़े धो डालेगा और अपने आस-पास के स्थान को झाड़-बुहार कर रखेगा।
अपरिष्कृत मनोवृत्ति के मनुष्यों में ही गंदगी पसन्द अथवा सहन करने का दोष रहता है। मानसिक परिष्कार ही वास्तव में मनुष्यता है। जिसका मन परिष्कृत होगा स्वभाव सुरुचिपूर्ण होगा वह गन्दगी कदापि सहन न करेगा।
स्वच्छता का सुन्दर स्वरूप न देखने तक ही कोई गन्दगी स्वीकार किये रहता है पर जैसे ही उसे स्वच्छता का सौंदर्य अनुभव होने लगता है उसको गन्दगी से घृणा हो जाती है। जब समय-समय पर साफ -सुथरी स्थिति में आने पर स्वभाव से गंदे लोगों की भी मनोवृत्ति परिमार्जित एवं परिष्कृत हो जाती है तब स्थायी रूप से हर समय साफ -सुथरा रहा जाये तब किसी की भी मनोवृत्ति कितनी परिष्कृत एवं ऊँची हो जायेगी इसका अनुमान सहज में ही लगाया जा सकता है।
ठीक-ठीक मनुष्य बनने और अपनी मनोवृत्तियों को स्थायी रूप से उन्नत एवं परिष्कृत रखने के लिये हम सब को हर समय हर प्रकार से सुथरा तथा स्वच्छ रहना चाहिए। स्वच्छ रहने से मन प्रसन्न रहता है स्फूर्ति बनी रहती है और जीवन के प्रति एक सुन्दर रुचि उत्पन्न होती है, जिससे मनुष्य अधिक से अधिक सुख सम्पन्नता एवं सफलता की ओर अग्रसर होता है।
तन से पहले मन शुद्ध करो-
अशुद्ध वह नहीं करता जो कुछ मुँह में जाता है, अशुद्ध वास्तव में वह करता है जो मुँह से बाहर निकलता है। क्योंकि जो मुँह में जाता है वह पेट में पच कर संडास में निकल जाता है। किन्तु जो कुछ मुँह से निकलता है वह मन की गन्दगी की गवाही देता है वही मनुष्य को गन्दा करता है।
गाली, असत्य, निन्दा और चुगली आदि विकार मुख द्वारा मन से निकलते हैं और यही मनुष्य को अशुद्ध बनाते हैं। बिना हाथ धोये भोजन करना उतना अशुद्ध नहीं है जितना कि गंदी बात कहना।
इसीलिये मैं तुमसे कहता हूँ कि बाह्य क्रियाओं से पूर्व अपने मन को शुद्ध करने का प्रयत्न करो। क्योंकि पिता के स्वर्ग राज्य में तन की नहीं मन की शुद्धता पर विचार किया जाता है।
-सेंट पाल
पंचगव्य की तेजवर्द्धिनी, जीवन दायिनी शक्ति
डॉ. मैकनीकाफ साहब को एक बार यह सोचकर बड़ा विस्मय हुआ कि 6 करोड़ आबादी वाले जर्मन देश में शतजीवियों की संख्या केवल सौ ही है जबकि केवल 50 लाख आबादी वाले बल्गेरिया में शतायु पुरुषों की संख्या 5000 से भी अधिक है। उन्होंने इसके कारण की खोज के लिये बल्गेरिया निवासियों के स्वास्थ की विस्तृत जाँच की और यह पाया कि उन लोगों के आहार में गाय के दूध और दही (योगुर्ट) की मात्रा अधिक रहती है। गो-दधि में कुछ ऐसे विशेष प्रकार के बैक्टीरिया पाये जाते हैं जो अन्न नली साफ रखते हैं उसमें मल नहीं जमा होने देते जिससे शारीरिक शक्ति का अधिकाँश भाग अवयवों के पोषण और विकास करने में लगता है। रोग और बीमारियों के निरोध से बची हुई शक्ति ही उनकी तेजस्विता और दीर्घ-जीवन का कारण है। बल्गेरिया निवासियों के इस सौभाग्य की स्मृति में ही डॉक्टर साहब ने उक्त बैक्टीरिया जाति का नाम “बेसिलस बल्गेरिक्स” रखा।
यह खोज बहुत ही सामान्य और साधारण माना जानी चाहिए-उस तुलना में जो उपलब्धि शताब्दियों पूर्व भारतीयों को हुई थी। यहाँ का जन-जीवन अधिकाँश गौ माता पर निर्भर था। अन्न को केवल सहायक मात्रा में ही लिया जाता था। आहार की अधिकाँश आवश्यकता दूध से पूरी की जाती थी। बच्चों को काफी युवक हो जाने तक केवल दुग्धाहार ही कराया था जिससे उनके शरीर एक प्रकार से रोग-प्रूफ हो जाते थे। दीर्घ जीवन-दायिनी शक्तियों के कारण ही वे लम्बी आयु और प्रचुर भोग सौ वर्ष तक सुखपूर्वक भोगते थे। गौ की महत्ता का मुख्य कारण यही था। उस पर एक प्रकार से सम्पूर्ण लौकिक और भौतिक सुख टिका हुआ था। उसे देखते हुए गौ को इतनी अधिक आध्यात्मिक प्रतिष्ठा देना सर्वथा बुद्धि संगत ही था।
गाय के दूध के आश्चर्यजनक लाभों से आज सारा संसार परिचित है, हम भूल गये हैं। इंग्लैंड जैसे छोटे देश में 1932 और 1936 के मध्य गौरक्षा और दूध पर चालीस करोड़ रुपया व्यय किया गया जबकि इसी वर्ष केवल अधिक दूध पीओ अभियान के प्रचार में 9 लाख रुपया खर्च किया। सरकार ने गर्भिणी स्त्रियों, बच्चे वाली माताओं, शिशुओं, स्कूल जाने वाले बच्चों और श्रमिक मजदूरों को बिना मूल्य या बहुत कम पैसों में दूध दिया ताकि लोग माँसाहार की प्रवृत्ति त्याग दें और गाय के दूध के लाभों से लाभान्वित हो सकें। ब्रिटिश युवकों की ऊँचाई और तोल बढ़ जाने के अनेक आँकड़े दि इकानामिस्ट पत्रिका के 10 जून सन् 1936 पृष्ठ 594 में देखे जा सकते हैं। पत्रिका में बताया गया है।
“हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, चिकनाई, खनिज लवण और विटामिन सम्मिलित हों तो हम अधिक स्वस्थ और दीर्घजीवी हो सकते हैं। यह सब तत्व गाय के दूध में विद्यमान हैं गाय के दूध की प्रोटीन इतनी अच्छी होती है कि स्वयं 95 प्रतिशत पच जाती है और साथ में 5 प्रतिशत गेहूँ की प्रोटीन को भी पचा देती है। केवल गेहूँ 20 प्रतिशत प्रोटीन दे सकता है पर यदि उसमें दूध का सम्मिश्रण हो जाता है तो 50 प्रतिशत प्रोटीन शरीर को मिल जाती है। गाय के दूध की चीनी श्रेष्ठ बलदायक और अतिरिक्त पाचन शक्ति देने वाली होती है।
निर्बल हुए बच्चों, युवकों और माताओं के स्वास्थ्य तथा शारीरिक विकास में गाय के दूध से आश्चर्यजनक परिवर्तन किये जा सकते हैं। डॉ. एच.एच.सी. कैरीमेन के अनुसार लन्दन मेडिकल रिसर्च कौन्सिल के परिणामों से यह जानकर लोग आश्चर्य में पड़ गये कि विकासशील बालक की क्षुधा पूर्ति के लिए जितना आहार पर्याप्त है उसमें यदि 12 औंस गाय के दूध की वृद्धि कर दी जाए तो प्रत्येक बच्चे के वजन में औसतन 4 से 7 पौंड तक ही वार्षिक वृद्धि होगी और वार्षिक ऊँचाई का मान 1.85 इञ्च से 2.65 इञ्च तक पड़ेगा। इस निष्कर्ष से प्रभावित होकर स्काटलैंड में पाठशाला दूध (स्कूल-मिल्क) की योजना चलाई गयी जो बाद में योरोप और एशिया में सर्वत्र लोकप्रिय हुई।
गाय के दूध में 25 प्रकार के खनिज लवण जिनमें कैल्शियम हड्डी बनाने, फास्फोरस हड्डी और मस्तिष्क बनाने, लोहा रक्त में लाली बनाये रखने, आयोडीन शरीर में शक्ति और स्फूर्ति के लिये व थाइराइड ग्लैंड्स को ठीक रखने के लिये बहुत आवश्यक है। वे ऐसी अवस्था में उपलब्ध हैं कि हमारा शरीर उन्हें सुगमता से पचा लेता है। लवणों की कमी से जब शरीर में कोई रोग हो जाता है तब आयोडीन, फास्फोरस, कैल्शियम आदि से युक्त दवाइयाँ डॉक्टर लोग सेवन के लिये देते हैं पर अक्षम शरीर उन्हें पचा नहीं पाते। अतः औषधियों की प्रतिक्रिया हानिकारक हो सकती है, उनका विजातीय द्रव्य कुछ मात्रा में जमा रह जाता है जो कभी भी किसी दूसरे रोग के रूप में फूट सकता है।पर यदि खनिज तत्वों की पूर्ति के लिये गाय के दूध का सेवन किया जाए तो वह स्वयं ही ऐसी औषधि का काम पूरा कर देता है। गर्भकाल में केवल दूध पीने की आयु तक बालक इन लवणों का बड़ा भाग माता से ही ग्रहण कर लेता है इसीलिये चरक आदि आयुर्वेद ग्रन्थों में गर्भिणी को अधिक दूध देने की आवश्यकता बताई गई है। ऐसा न करने से बच्चा और सच्चा दिनों निर्बल हो सकते हैं।
दूध की तरह गाय के दूध से जमाया हुआ दही भी बड़ा गुणकारी होता है कई बार तो वह दूध की अपेक्षा अधिक गुणवर्धक समझा जाता है। दूध में जो चर्बी या फेट्स होते हैं-दही के रूपांतर में वे समाप्त हो जाते हैं और वह सुपाच्य और रोग निरोधक हो जाता है। इस सम्बन्ध में विस्तृत खोजें की गई हैं उनसे पता लगा है कि एक क्यूबिक सेन्टीमीटर दूध में 5 से 10 लाख तक ऐसे अणु रहते हैं जो रोगाणुओं को मारने का काम करते हैं, दही में उनकी संख्या सौ गुनी अधिक बढ़ जाती है। इसलिए दही या मट्ठा दूध की अपेक्षा अधिक स्वास्थ्य-वर्द्धक हो जाता है। इससे शरीर में ताजगी, प्रसन्नता और आरोग्यता बढ़ती है। दही सेवन करने से मानसिक शीतलता, चैतन्यता और मुख की लावण्यता में वृद्धि होती है। यह अनुभूत प्रयोग है इन लाभों को कोई भी व्यक्ति कुछ दिन के निरन्तर प्रयोग से ही देख सकता है।
शक्ति-पदार्थ के रूप में गौ घृत को अमृत तुल्य माना गया है। मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डॉ. किंग साहब ने अनेक परीक्षणों से सिद्ध किया था कि प्लेग की बीमारी के समय गाय के घी से मिश्रित चावल और केसर से प्लेग दूर होता है। जबलपुर टी॰बी॰ सैनीटोरियम में गौघृत के हवन से 80 टी॰ बी॰ के बीमारों को लाभ पहुँचा । गाय के दूध की चिकनाइयों से श्रेष्ठ होती हैं स्वाद, सुगन्ध और सात्विकता में गाय के घी की कोई तुलना नहीं। इसमें कृमिनाशक गुण विशेष होता है सभी वनस्पति तत्व होने पर भी गाय का घी सुपाच्य और शक्तिवर्द्धक होता है।
गाय के गोबर और मूत्र में ऐसे तत्व होते हैं जो रोगाणुओं को नष्ट करने में भारी सामर्थ्य रखते हैं घरों के चौके इसी लिये गोबर से लीपे जाते हैं। गोमय शरीर में मलकर स्नान से चर्म रोग दूर होते हैं। गोबर को उबाल कर लेप करने से गठिया जैसा रोग अच्छा होता है, कटे घाव को जोड़ने की भी शक्ति गोबर में होती है। इसी तरह गौमूत्र के बारे में-चरक संहिता में लिखा है-
गव्यं सुमधुरं किञ्चद् दोषघ्नं कृमिकुष्ठनुत्
कण्डूघ्नं शमपेत पीतं सम्यग्दोषोदरेहितम्
“अर्थात्-गोमूत्र के सेवन से कृमि रोग कोढ़ खुजली प्लीहा आदि रोग दूर हो जाते है।” गोबर और गोमूत्र की खाद की उपजाऊ शक्ति का मुकाबला आधुनिक रासायनिक खादें नहीं कर पाती हैं, यह बात वैज्ञानिक भी मानते हैं।
उपरोक्त लाभ आज भी प्राप्त किये जा सकते हैं पर इसके लिये गौ पालन और गौ संरक्षण आवश्यक है। अपने स्वास्थ्य तथा सम्पत्ति की रक्षा भी हम गाय की सुरक्षा रख कर कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में दो मत नहीं हो सकते ।
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना-

