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Magazine - Year 1967 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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गायत्री का स्त्री-स्वरूप क्यों?

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कई व्यक्ति पूछते हैं-गायत्री महाशक्ति को नारी रूप में क्यों पूजा जाता है जब कि अन्य सभी देवता नर रूप हैं। इसी प्रकार यह भी कहा जाता है कि गायत्री मंत्र में सविता देवता की प्रार्थना के लिये पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग हुआ है, फिर उसे नारी रूप क्यों दिया गया?

इन शंकाओं के मूल आधार में मनुष्य की वह मान्यता काम करती है जिसके अनुसार नर को श्रेष्ठ और नारी को निकृष्ट माना गया है। घरों में नारियाँ नर की सेवा पूजा करती हैं, उसके अधिकार आधिपत्य में रहती हैं, उन्हें छोटा या हेय माना जाता है। स्त्री का वर्चस्व स्वीकार करने में पुरुष अपना अपमान मानते हैं। किसी स्त्री अफसर के नीचे पुरुष कर्मचारियों को काम करना पड़े तो बाहर से कुछ न कहते हुए भी भीतर कुड़कुड़ाते हैं। किसी घर में स्त्री की बात चलती हो, पुरुष अनुगामी हो तो उसकी मखौल उड़ाई जाती है। नर की नारी के प्रति जो यह सामन्तकालीन तिरस्कार बुद्धि है उसी से प्रभावित होकर उसे यह सोचना पड़ता है कि वह नारी शक्ति की पूजा क्यों करे? जब नर देवता मौजूद हैं तो नारी के आगे मस्तक झुका कर अपने नरत्व को हेय क्यों बनाया जाए?

भगवान को नारी रूप में पूजने से किसी की कोई हानि नहीं वरन् लाभ ही है। माता के हृदय में अपार वात्सल्य है। जितनी करुणा एवं ममता माता में होती है उतनी और किसी सम्बन्धी में नहीं। उपासना के लिये भगवान के किसी घनिष्ठ सम्बन्धी के रूप में ही मान्यता प्रदान करनी पड़ती है। निराकार ब्रह्म का ध्यान संभव नहीं। ध्यान के बिना उपासना नहीं हो सकती। निराकारवादी भी ध्यान उपासना प्रयोजन के लिए प्रकाश का ध्यान करते हैं। प्रकाश ही आखिर पंचभूतों के अंतर्गत आता है। ध्यान भूमिका में प्रयुक्त किये जाने वाले प्रकाश बिन्दु एवं सूर्य मंडल का एक आकार बन ही जाता है इसलिए उपासना में कोई न कोई आकार तो निर्धारित करना ही पड़ता है। इस आकार के साथ जितनी ही आत्मीयता ममता, घनिष्ठता होगी उतना ही मन लगेगा और चित्त एकाग्र होगा और भावनात्मक तन्मयता की और दृष्टि के साथ भगवत् प्राप्ति की ओर प्रगति होती चली जाएगी।

जिनके साथ घनिष्ठता स्थापित की जाती है उनके साथ कोई रिश्ता बन जाता है। रिश्ते का अर्थ है-असाधारण घनिष्ठता। परिवार के सदस्य कुटुम्बी और कन्याओं के आदान-प्रदान में सम्बन्धित रिश्तेदार कहलाते हैं। उससे अतिरिक्त लोगों को मित्र कहते हैं, गुरुजन भी। इन्हीं वर्गों में स्वाभाविक प्रेम बढ़ता है। इनके सान्निध्य में सुख और वियोग में दुख मिलता है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उससे प्रेम सम्बन्ध दृढ़ करना होता है और उसके लिए उसे कोई प्रेम-पात्र कुटुम्बी रिश्तेदार अथवा मित्र जैसा सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। इस सम्बन्ध, मान्यता में जितनी अधिक आत्मीयता होगी उतनी ही प्रतिक्रिया भी मिलेगी। गुम्बज अथवा कुँए की प्रतिध्वनि की तरह हमारा प्रेम ही ईश्वरीय प्रेम एवं अनुग्रह बन कर हमारे पास वापिस लौटता है। जिस स्तर का भाव या प्यार हम भगवान के प्रति व्यक्त करते हैं उसी के अनुरूप दीवार पर मारी हुई रबड़ की गेंद की तरह लौटकर भगवान की अनुकंपा हमारे पास आ जाती है। इसलिये भगवान को कोई न कोई सम्बन्धी मान कर चलना होता है। उस मान्यता के आधार पर ही हमारी उपासना में प्रगति होती है।

भगवान से कोई भी सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। उस एक को ही किसी भी आत्मीय भावना के साथ देखा जा सकता है। उसके लिए हर मान्यता उपयुक्त है। कहा भी है-

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव भ्राता च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

प्रार्थना में जिन सम्बन्धों को गिनाया गया है उनमें माता का सम्बन्ध सर्व प्रथम है, वह सर्वोपरि भी है। क्योंकि माता से बढ़ कर परम निस्वार्थ, अतिशय कोमल करुणा एवं वात्सल्य से पूर्ण और कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता। जब हम भगवान को माता मान कर चलते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया किसी सहृदय माता के वात्सल्य के रूप में ही उपलब्ध होती है। इन उपलब्धियों को पाकर साधक धन्य हो जाता है।

पिता से माता का दर्जा सौ गुना अधिक बताया गया हैं। यों पिता भी बच्चों को प्यार करते हैं पर उस प्यार का स्तर माता की तुलना नहीं कर सकता। इसलिये सब में भगवान को माता मान कर चलना अपने ही हित में है। इसमें अपने को ही अधिक लाभ होता है।

नारी के प्रति मनुष्य में एक वासनात्मक दुष्टता की प्रवृत्ति जड़ जमाये बैठी रहती है। यदि इसे हटाया जा सके -नर और नारी के बीच काम-कौतुक की कल्पना हटाई जा सके तो विष को अमृत में बदलने जैसी भावनात्मक रसायन बन सकती है। नर और नारी के बीच जो रयि और प्राण विद्युत धारा सी बहती है। उनका संपर्क वैसा ही प्रभाव उत्पन्न करता है जैसा कि बिजली के नेगेटिव और पॉजिटिव धाराओं के मिलन से विद्युत संचार का माध्यम बन जाता है। माता और पुत्र का मिलन एक अत्यन्त उत्कृष्ट स्तर की आध्यात्मिक विद्युतधाराओं का सृजन करता है। मातृ स्नेह से विहीन बालकों में एक बड़ा मानसिक अभाव रह जाता है भले ही उन्हें साँसारिक अन्य सुविधाएं कितनी ही अधिक क्यों न हों। पत्नी बहिन, पुत्री आदि के रूप में भी नारी नर को महत्वपूर्ण भावनात्मक पोषण प्रदान करती है और उसकी मानसिक अपूर्णता को पूर्ण करने में सहायक होती है। यह साँसारिक स्तर की बात उपासना के भावना क्षेत्र में भी लागू होती है। माता का नारी रुप ध्यान भूमिका में जब प्रवेश करता है तो उसमें प्राण की एक बड़ी अपूर्णता पूरी होती है।

युवती नारी के रुप में माता का ध्यान करके हम नारी के प्रति वासना दृष्टि हटा कर पवित्रता का दृष्टिकोण जमाने का अभ्यास करते हैं। इसमें जितनी ही सफलता मिलती है उतना ही बाह्य जगत में भी हमारा नारी के प्रति वासना दृष्टि रखने में मन हटता जाता है। उस प्रकार नर नारी के बीच जिस पवित्रता की स्थापना हो जाने पर अनेक आत्मिक बाधाएं कुंठाएं एवं विकृतियाँ दूर हो सकती हैं उसका लाभ सहज ही मिलने लगता है। गायत्री माता का ध्यान एक वृद्ध नारी का नहीं वरन् एक युवती का होता है। युवती में यदि उत्कृष्टता की तथा पवित्र दृष्टि रखी जा सके तो समझना चाहिए कि आत्मिक स्तर सिद्ध योगियों जैसा तेजस्वी बन गया। गायत्री उपासना में इस महाशक्ति को नारी रूप देकर इस एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ति का प्रयत्न किया गया है।

भाषा विज्ञान की दृष्टि में ‘शक्ति स्त्रीलिंग‘ है। इसलिए यदि ध्यान कल्पना में उसे नारी रूप में निश्चित किया जाए तो उसमें अनुचित कुछ भी नहीं है। उस महामंत्र में सविता देवता के लिये पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग भले ही हुआ है वह है तो स्तुति ही, प्रार्थना ही। प्रार्थना और स्तुति दोनों ही स्त्रीलिंग हैं। इसी दशा में यदि गायत्री को स्त्री रूप में निश्चित किया जाता है तो इसमें बुराई क्या है। सच तो यह है कि शक्ति तत्व को स्त्री पुरुष के वर्गों में विभक्त ही नहीं किया जा सकता यह विभाजन तो शरीरधारी प्राणियों में सन्तानोत्पत्ति प्रयोजन के लिये होता है। दिव्य शक्तियाँ न तो शरीर-धारी हैं और न उन्हें प्रजनन ही करना है ऐसी दशा में उनमें वास्तविक लिंगभेद नहीं। उन्हें नर-नारी के रूप में तो ध्यान सुविधा के लिये ही चित्रित किया जाता है अथवा भाषा में जिस प्रकार लिंग प्रयुक्त होता है उसी आधार पर उनका शरीर बना दिया जाता है। यह वस्तु वास्तविक नहीं वरन् मानवी कल्पना का खेल है।

अग्नि स्त्रीलिंग है तेजस् पुल्लिंग। शब्दों में लिंग भेद है पर वस्तु एक ही है। वायु स्त्रीलिंग और मरुत पुल्लिंग है। बात एक ही है पर शब्दों के आधार पर लिंग बदल गया। उपवन पुल्लिंग है, वाटिका स्त्रीलिंग एक ही चीज के दो स्वरूप। शैय्या और पलंग एक होते हुए भी लिंग पृथक है। चन्द्रमा को हिन्दी में नर और अंग्रेजी में नारी मानते हैं। वस्तुतः चन्द्रमा एक ग्रह पिंड-मात्र है वह नर है न नारी। भाषा और कल्पना में उसे नर नारी के रूप में खींचा जाता है। परब्रह्म की सर्वोपरि शक्ति को स्त्री कहा जाए या पुरुष यह हमारी भाषा और कल्पना पर निर्भर है। वस्तुतः यह लिंगभेद से परे है। उपासना में गायत्री की तुलना नारी रूप में करके हम अपना ही साधनात्मक एवं भावनात्मक प्रयोजन पूर्ण करते हैं। अतएव इसमें सन्देह तथा विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है।

नर की जननी होने के कारण वस्तुतः नारी उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ एवं पवित्र है। उसका स्थान सम्भवतः बहुत ऊँचा है। माता का पूज्य स्थान पिता एवं उस से भी ऊँचा है। पुरुष की अपूर्णतायें नारी के स्नेह सिंचन से ही दूर होती हैं । इसलिए यदि नारी के रूप में हमारा उपास्य इष्ट हो तो वह एक औचित्य ही है। अनादिकाल से भारतीय धर्म में ऐसी ही मान्यता चली आ रही है, जिसके अनुसार माता को ही नहीं पत्नी को भी पति से अधिक एवं प्रथम सम्मान मिला है। पत्नी-पत्नी के सम्मिलित नामों में पत्नी की प्राथमिकता है। लक्ष्मी-नारायण, सीताराम, राधेश्याम, उमा-महेश, शची-पुरन्दर, माता-पिता, गंगा-सागर, आदि नामों में पत्नी को ही प्राथमिकता मिली है। कारण उसकी वरिष्ठता ही है। इस दृष्टि से भी यदि देवता का पुल्लिंग स्वरूप अधिक उत्तम है या स्त्रीलिंग स्वरूप, तो उसका सहज उत्तर नारी के रूप में ही जाएगा। ऐसी दशा में यह शंका संदेह करना उचित नहीं कि गायत्रीशक्ति को नारी का रूप देकर उसे जो पूज्य स्थान पर बिठाया गया है उसमें कुछ अनुचित हुआ है। नर की श्रेष्ठता का अहंकार ही इस प्रकार के प्रश्नों को सृजन करता है।

उपरोक्त तथ्यों के पुष्टि में अगणित शास्त्रीय प्रमाण मिलते हैं उसमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया जाता है-

अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य निर्गुर्णस्य गुणात्मनः।

उपासकानाँ सिद्धयर्थ ब्रह्मणो रूप कल्पना॥

“परब्रह्म की सभी शक्तियाँ अचिन्त्य और निर्गुण है। उन स्वरूपों को उपासकों को समझाने के उद्देश्यों से ऋषियों ने उनके रूपों की कल्पना करके मूर्तियों को बनाया है।”

भेद उत्पत्तिकाले वै सर्मा प्रभवत्यज।

दृश्यादृश्य विभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा॥

नाऽहं नारी पुमाँश्चाहं न क्लीवं सर्गसंक्षये।

सर्गे सति विभेदः स्यात् कल्पितोऽयं धिया पुनः॥

अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धुतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।

श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा, तृष्णा तथा क्षमा॥

(देवी भागवत)

“उत्पत्ति के समय सृष्टि के अर्थ से ही भेद प्रतीत होता है। यह दृश्य, अदृश्य का विभेद-द्वैतभाव सदैव रहता है। अर्थात् सृष्टि-दशा में ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति दोनों स्वतन्त्र रूप से प्रकट होते हैं। प्रलय हो जाने पर न मैं स्त्री हूँ न पुरुष और क्लीव हूँ, केवल सृष्टिकाल में ही बुद्धि द्वारा कल्पित भेद दृष्टि में आता है। सृष्टि की विकास अवस्था में ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, पिपासा और क्षमा मैं ही हूँ।”

अरुपं भावनागम्यं परं ब्रह्म कुलेश्वरि।

अरुपाँ रुपिणी कृत्वा कर्मकाण्डरता नरः॥

(कुलार्णव तंत्र)

“वह ईश्वरी शक्ति अरूप और केवल भावनागम्य है। पर कर्मकाण्ड में संलग्न मनुष्य उस अरूप में से ही रूप की कल्पना कर लेते हैं।”

“एवं विधो यो भगवान चिदात्मा सा एव गायत्री ..........गायत्री परमेश्वरावेवास्थैव चेतनापुरुषस्य द्वे नामनी ध्यानेन तु स्त्री लिंग।”

(विष्णु धर्मोत्तर)

“इस प्रकार जो भगवान है वही गायत्री है। गायत्री और परमेश्वर ये उस चेतन-पुरुष के ही दो नाम हैं परन्तु ध्यान के लिये वह (गायत्री रूप में) स्त्रीलिंग है।

जगन्माता च प्रकृतिः पुरुषश्च जगत्पिता।

गरीयर्साति जगताँ माता शतगुणैः पितु॥

(ब्रह्मवैवर्त पुराण)

“जगज्जननी प्रकृति है और जगत का पिता पुरुष है। जगत में पिता से सौ गुना अधिक महत्व माता का है।”

न बाला न च त्वं वयस्था न वृद्धा,

न च स्त्री न षणढः पुमानैव च त्वम्।

सुरो नासुरो नरो वा न नारी,

त्वमेका परब्रह्मरुपेण सिद्धा॥

(महाकाली स्तवन)

“हे महामाया! न तुम बालिका हो, न वयस्क हो न वृद्ध हो, स्त्री, क्लीव और पुरुष भी तुम नहीं हो, न देवता हो, न दानव हो, न नर हो, न नारी हो, तुम केवल परब्रह्म स्वरूपिणी हो।”

अचिन्त्यापि, साकारशक्ति स्वरुपा,

प्रतिव्यक्त्यधिष्ठान सत्त्वैक मूर्तिः।

गुणातीतानिर्द्वन्द्व बौधैकगम्या,

त्वमेका परब्रह्म रुपेण सिद्ध॥

(महाकाली स्तवन)

“तुम अचिन्तनीय होते हुए भी साकार मूर्ति रूपा हो प्रत्येक प्राणी में सत्वगुण रूप में विराजमान् रहती हो तथा गुणातीत हो। केवल तत्वज्ञान से ही तुम जानी जाती हो । तुम्हीं परब्रह्म रूप से प्रसिद्ध हो।

त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं,

कुमार उत वा कुमारी।

त्वं जीर्णो दण्डेन वंचसि त्वं,

जातो भवसि विश्नतो मुखः॥

(श्वे. 4-3)

“तू स्त्री है, तू पुरुष भी है, तू ही कुमार और कुमारी है, तू वृद्ध होकर लाठी के सहारे चलता है और तू ही उत्पन्न होकर सब ओर मुख वाला हो जाता है।”

सा च ब्रह्म स्वरूपा च नित्या सा च सनातनी।

यथात्मा च तथा शक्तिर्यथाग्नौ दाहिका स्थिता॥

अत एव हि यीगीन्दै स्त्री पुम्भेदा न मन्यते।

सर्व ब्रह्ममयं ब्रह्मन् शश्वत् सदपि नारद॥

(देवी भाग 9। 1। 10। 11 )

“वही ब्रह्म प्रकृति ब्रह्म स्वरूपा, नित्या और सनातनी है। पर ब्रह्म परमात्मा के अनुरूप सभी गुण उस प्रकृति में निहित हैं जैसे अग्नि में दाहिका शक्ति सदा रहती है इसी से परम योगीगण स्त्री-पुरुष में भेद नहीं मानते। हे नारद! वे कहते हैं कि सत्-असत् जो कुछ भी है सब ब्रह्ममय है।”

‘कामधेनु तंत्र’ में कहा है कि-

“युवती सा समाख्याता सा महाकुण्डली परा॥”

अर्थात् “वह परा जैसी महा कुण्डली अर्थात् महागायत्री युवती के रूप में कही गई है।”

स तस्मिन्नेवाकशे स्त्रिमाजगाम बहुशोभः मानामुमाँ हैमवतीम्।

“इन्द्रादि देवताओं को ब्रह्मज्ञान प्रदान करने को ब्रह्म स्थान में जो प्रतिमा प्रकट हुई उसी स्त्री-मूर्ति का दर्शन इन्द्र को हुआ।”

जगद्धात्रीं महामायाँ ब्रह्मरुपाँ सनातनीम्।

दृष्ट् वा प्रमुदिताः सर्वे देवताप्सर किन्नराः॥

(वृहद् विष्णु पुराण)

“जगन्माता, महामाया, ब्रह्ममाया, ब्रह्मरूपा, सनातनी महाशक्ति को देख कर देवगण, गंधर्व, अप्सरा, किन्नर सब परम हर्षित हुए।”

जयखिला सुराराध्ये जय कामेशि कामदे।

जय ब्रह्ममयि देवि ब्रह्मानन्द रसात्मिके।

(लितोपास्यान 8।2)

“हे महादेवी! तुम ही समस्त देवताओं की आराध्या हो, तुम्हीं सर्व कामनाओं की ईश्वरी और उनको पूर्ण करने वाली हो।”

त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी।

त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका॥ कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्।

पर ब्रह्मस्वरुपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥

तेजः स्वरूपा परमा भक्त नुग्रहविग्रहा।

सर्वस्वरुपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा।

सर्वबीज स्वरुपा च सर्वपूज्या निराश्रया।

सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्व मंगल मंगला॥

(ब्रह्मवैवर्त पु. प्रकृति 2166।7।10)

“तुम्हीं विश्वजननी, मूल प्रकृति ईश्वरी हो, तुम्हीं सृष्टि उत्पत्ति के समय आद्यशक्ति के रूप में विराजमान रहती हो और स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो। यद्यपि वस्तुतः तुम निर्गुण हो तथापि प्रयोजन वश सगुण हो जाती हो। तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो । परम तेजस्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने के हेतु मानव शरीर धारण करती हो। तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी सर्वाधार एवं परात्पर हो। तुम सर्वबीजस्वरूप, सर्व पूज्य एवं आश्रय रहित हो। तुम सर्वज्ञ, सब प्रकार से मंगल करने वाली और सर्व मंगलों की भी मंगल हो।

कथं जगत् किमर्थं तत् करोषि के न हेतुना।

नाहं जानामि तद्देव यतोहं हि त्वदुद्भवः॥

(शक्तिदर्शन)

“हे देवी! तुम किसके लिये, किस हेतु जगत् की सृष्टि करती हो -मैं इस बात को नहीं जानता क्योंकि मैं तुम से उत्पन्न हूँ।”

माया ख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वराबुभौ।

(शक्तितत्त्व विमर्शिनी)

“जीव और ईश्वर दोनों माया रूपी कामधेनु के दो बछड़े हैं।”

उपरोक्त में परब्रह्म को नारी रूप में चित्रण करने का रहस्य प्रकट किया गया है। नर और नारी में से किसे प्राथमिकता मिले? इस प्रश्न के उत्तर में नृतत्व विज्ञान का, जीव विज्ञान का भी सहारा लिया जा सकता है। शोधकर्त्ता इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि प्राथमिकता नारी को ही है। पहले भूमि बनी, बीजों का आविर्भाव उसके उपरान्त हुआ।

नृतत्ववेत्ता ‘हेवलाक ऐलिस’ इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि मानव जाति का आरम्भ नारी से ही होता है। पुरुष का आस्तित्व पीछे प्रकाश में आया। उन्होंने लिखा है-

“प्राथमिकता और प्रकृति के नियमानुसार पहले नारी की ही उत्पत्ति हुई। साधारणतया प्राणीमात्र की उत्पत्ति नारी जाति पर ही अवलंबित है। प्राणी जगत् की सृष्टि के लिये पुरुष की आवश्यकता ही न थी अथवा गौण थी। रज और वीर्य के संयोग से विभिन्न गुणों द्वारा जीवन-शक्ति को परिपुष्ट एवं प्रस्फुटित करने के हेतु लाभ की दृष्टि से पुरुष जाति का पीछे से विकास हुआ।”

नारी में देवत्व की मात्रा पुरुष की तुलना में कहीं अधिक है। इसलिये जहाँ पुरुष को अपने गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता होने पर ही पूज्य पद एवं सम्मान मिलता है वहाँ नारी को उसकी जननी, भगिनी, कन्या आदि विशेषताओं के कारण जन्मजात सम्मान मिल जाता है। उनके हृदय में वह विशालता विद्यमान है जिसके आधार पर शिशु को अपने शरीर का रस निचोड़ कर प्रदान कर सकती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण मानवी होते हुए भी उसे देवी कहा जाता है। अधिकाँश स्त्रियों के नाम के अन्त में देवी पद जोड़ा जाता है जैसे शकुन्तला देवी, उर्मिला देवी, भगवती देवी आदि। शास्त्र कहते हैं-

स्त्रीषु प्रीतिर्विशेषेण स्त्रीप्वपत्यं प्रतिष्ठितम्।

धर्मार्थो स्त्रीषु लक्ष्मीश्च स्त्रीषु लोकाः प्रतिष्ठिताः॥

(चरक संहिता-चि. स्था. अ. 2)

“प्रीति का निवास अधिकतर स्त्रियों में ही होता है। सन्तान की जननी भी वे ही होती हैं। धर्म स्त्रियों में रहता है, लक्ष्मी भी स्त्रियों में रहती है। इसलिये संसार स्त्रियों में ही स्थित है।”

नारी रूप में परमात्मा का दिव्य दर्शन हम पग-पग पर कर सकते हैं। इस प्रकार की दिव्य-दृष्टि जिसे प्राप्त है उसे सच्ची आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त हुई समझनी चाहिये। गायत्री उपासना में नारी प्रतिमा को वन्दनीय मानकर मनुष्य को पवित्रतम बनाने का प्रयत्न किया गया है नारी वस्तुतः मूर्तिमान महामाया ही है। देखिये-

जननी जन्म काले च स्नेह काले च कन्यका।

भार्या भोगाय सम्पृक्ता अन्तकाले च कालिका

एकैव कालिका देवी बिहरन्ती जगत्त्रये॥

“वही महामाया जननी रूप में हमको जन्म देती है, कन्या रूप में हमारी स्नेह की पात्र बनती है, भार्या के रूप में भोगदात्री बन जाती है और अन्त समय में कालिका के रूप में हमारी इहलीना संवरण कर देती है। इस प्रकार एक ही महादेवी तीनों लोकों में विचरण करती रहती है।”

तन्त्र ग्रन्थों में नारी को भगवान् की मूर्तिमान प्रतिमा मानकर उसकी विधिवत् पूजा करने का विधान है। विभिन्न आयु तथा स्थिति की नारियों को विभिन्न देवियों के रूप में पूजनीय मानकर उनका वंदन-अर्चन किया जाता है। ब्राह्मण भोजन की तरह ही कन्या भोजन का भी पुण्य माना गया है। नवरात्रियों में पुरश्चरणों के अन्त में तो विशेष रूप से कन्या भोजन करने की ही परम्परा ब्राह्मण तो विद्या, तपश्चर्या एवं सेवा के आधार पर ब्राह्मणत्व प्राप्त करते हैं पर कन्याओं में वह तत्व जन्मजात रूप से स्वभावतः अनायास ही विद्यमान रहता है इस संदर्भ में तन्त्र ग्रन्थ का अभिमत देखिये-

“एक वर्ष की आयु वाली बालिका ‘कुमारी’ कहलाती है, दो वर्ष वाली ‘सरस्वती’, तीन वर्ष वाली ‘त्रिधामूर्ति’, चार वर्ष वाली ‘कालिका’, पाँच वर्ष की होने पर ‘सुभगा’, छः वर्ष की ‘उमा’, सात वर्ष की ‘मालिनी’, आठ वर्ष की ‘कुब्जा’, नौ वर्ष की ‘काल-संदर्भ’, दसवें में ‘अपराजिता’ ग्यारहवें में ‘रुद्राणी’, बारहवें में ‘भैरवी’, तेरहवें वर्ष में ‘महालक्ष्मी’, चौदह पूर्ण होने पर ‘पीठनायिका’, पन्द्रहवें में ‘क्षेत्रज्ञा’ और सोलहवें में ‘अम्बिका’ मानी जाती है इस प्रकार जब तक ऋतु का उद्गम न हो। तभी तक क्रमशः संग्रह करके प्रतिपदा आदि से लेकर पूर्णिमा तक वृद्धि-भेज कुमारी पूजन करना चाहिये।”

(रुद्रयामल-उत्तराखण्ड)

“आठ वर्ष की बालिका गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी और दश वर्ष की कन्या कहलाती है । इसके बाद वही महामाया और रजस्वला भी कही गई हैं। बारहवें वर्ष से लेकर बीसवें तक वह सुकुमारी कही गई हैं।”

(विश्वसार तन्त्र)

“यजमान को चाहिए कि दस कन्याओं का पूजन करें। उनमें भी दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की अवस्था की कुमारियों का ही पूजन करना चाहिए। दो वर्ष की आयु वाली है वह ‘कुमारी’-तीन वर्ष की ‘त्रिमूर्ति’-चार वर्ष की ‘कल्याणी’-पाँच वर्ष की ‘रोहिणी’-छः वर्ष की ‘कालिका’-सात वर्ष की ‘चण्डिका’-आठ वर्ष की वर्ष की ‘शाम्भवी’-नौ वर्ष की ‘दुर्गा’ और दस वर्ष की ‘सुभद्रा’ कही गई है। इनका मंत्रों द्वारा पूजन करना चाहिए। एक वर्ष वाली कन्या को पूजा से प्रसन्नता नहीं होगी, अतः उसका ग्रहण नहीं है और ग्यारह वर्ष से ऊपर वाली कन्याओं का पूजा में ग्रहण वर्जित है।”

“जो कुमारी को अन्न, वस्त्र, जल अर्पण करता है उसका वह अन्न मेरु के समान और जल समुद्र के सदृश अक्षुण्य और अनन्त होता है। योगिनी तन्त्र के कथनानुसार पूजा का फल अवर्णनीय है, इसलिये सभी जाति की बालिकाओं का पूजन करना चाहिए कुमारी पूजन में जाति भेद का विचार करना उचित नहीं काली-तंत्र में कहा गया है कि-”सभी बड़े-बड़े पर्वों पर अधिकतर पुण्य मुहूर्त में और महानवमी की तिथि को कुमारी पूजन करना चाहिए। सम्पूर्ण कर्मों का फल प्राप्त करने के लिये कुमारी पूजन अवश्य करें।” ‘वहन्नीलतन्त्र’ के अनुसार-”पूजित हुई कुमारियाँ विघ्न, भय और अत्यन्त उत्कट शत्रु को भी नष्ट कर डालती हैं। रुद्रयामल में लिखा है कि-कुमारी साक्षात् योगिनी और श्रेष्ठ देवता है। विधियुक्त कुमारी को अवश्य भोजन कराना चाहिए। कुमारी को पाद्य, अर्घ्य, कुंकुम और शुभ चन्दन आदि अर्पण करके भक्तिभाव से उसकी पूजा करें।

- कुञ्जिका तन्त्र

कुमारी कन्याओं तक ही यह दिव्य भाव सीमित नहीं माना गया है। वरन् उसका क्षेत्र अत्यंत विशाल है। प्रत्येक नारी में देवत्व की मान्यता रखना और उसके प्रति पवित्रतम श्रद्धा रखना एवं वैसा ही व्यवहार करना उचित है जैसा कि देवी देवताओं के साथ किया जाता है। नारी मात्र को भगवती गायत्री की प्रतिमायें मानकर जब साधक का हृदय पवित्रता का अभ्यास हो जाए तो समझना चाहिए कि उसके लिये परम सिद्धि की अवस्था अब समीप है शास्त्र उसी प्रकार की मनोभूमि बनाने का हमें निर्देश करते हैं और बताते हैं-

सर्मस्त्रीनिलया, जगदम्बामयं पश्य स्त्रीमात्रमाविशेषतः।

“स्त्री-मात्र को जगत्माता और जगत्गुरु मान कर पूजो।”

गायत्री बा इदं सर्वम्

(नृसिंह पूर्णतापनीयोपनिवह 4-2)

“यह समस्त सृष्टि गायत्री स्वरुप ही है।”

विद्यासमस्तास्तव देवि भेदाः,

स्त्रिय समस्तासकला जगस्तु।

स्तकैकया पूरितमम्व व्वैतत्

वास्ते स्तुतिः स्तव्य परा परोक्ति॥

इस सम्पूर्ण संसार में जो परा-अपरा विद्यायें हैं सो आपका ही भेद हैं। इस संसार में समस्त नारियाँ आपका ही भेद हैं। संसार में समस्त नारियाँ आपका ही रूप हैं।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्र नार्यो न पूज्यन्ते श्मशानं तत्र वैगृहम्॥

-मनु

“जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं जहाँ नारी का तिरस्कार होता, वह घर निश्चय ही श्मशान है।”

स्त्रीणाँ निन्दाँ प्रहारं च कोटिल्यं चाप्रियं वचः। आत्मनो हितमान्विच्छन्देवी भक्ते विवर्जयेत्॥

अपना कल्याण चाहने वाला, माता का उपासक स्त्री निन्दा न करे, न उन्हें मारे, न उनसे छल करे न, छल करे न उनका जी दुखाये।

नारी मात्र के प्रति उच्च भाव रखने और उनके साथ सहृदय सद्व्यवहार करने से व्यक्ति एवं समाज का सर्वांगीण उत्कर्ष हो सकता है। भावात्मक पवित्रता से बढ़ मनुष्य के पास और कोई श्रेष्ठता हो नहीं सकती।

जब हम भगवान को माता के रूप में पूजते हैं तो वे भी हमारे लिये माता जैसा वात्सल्य लेकर प्रस्तुत होते हैं। कहना न होगा कि पिता की तुलना में माता का हृदय अत्यधिक कोमल होता है। वह अपने पुत्र एवं भक्त के प्रति सहज ही करुणार्द्र हो उठती है। माता की शरण लेने वाला अपेक्षाकृत सदा ही अधिक लाभ में रहता है। ऐसे उदाहरण भी हैं-

पिते वत्वत्प्रेयाजननि परि पूर्णागसि जने।

हित स्त्रोती वृत्या भवति च कदाचित्कलुषधीः॥

कि येतन्निदोषः व इहं जगतीति त्वमुचितैः।

रुपापै विस्यार्थ स्वजनयसि माता तद सिनः॥

- पराशर भट्ट

“परम पिता परमात्मा जब अपराधी जीव पर पिता के समान कुपित हो जाते हैं तब आप ही उन्हें समझाती हो कि- यह क्या करते हो? इस संसार में पूर्ण निर्दोष कौन है? उनका क्रोध शान्त कर आप ही उनमें दया उपजाती हैं। इसलिये आप ही हमारी दयामयी माता हैं।”

पुरतः पतितं देवी धारण्याँ वायसं तदा।

तच्छिरः पादयो स्तस्य योजयामास जानकी॥

(रामायण)

“जब काक रूपी जयन्त तीनों लोकों में आश्रय न पाकर रामचन्द्रजी की शरण आकर दूर पड़ गया तो जानकी जी ने उसका सिर रामचन्द्रजी के पैरों में रखकर उसकी रक्षा की प्रार्थना की।

मातमैथिलि राक्षसी स्त्वयि तदैवाद्रपिराधास्त्वया। रक्षन्त्या पवनात्सजाल्लघु तरा रामस्य गोष्ठी कृता॥ काकं ते च विभीषणं शरणभित्युक्ति क्षमौ रक्षतः। सानरसान्द्र महागस सुख यतु क्षान्तिस्त्वया कस्यिका॥

“रामचन्द्रजी ने शरण आने पर ही काक और विभीषण की रक्षा की । उसमें उनका क्या बड़ा गौरव रहा। जानकी जी की महानता तो देखा, उनने अपराध करने वाली राक्षसियों के बिना कोई प्रार्थना किये ही दण्ड देने को उद्यत हनुमान जी से छुड़ा दिया। जानकी जी की करुणा रामचन्द्रजी से कहीं बड़ी है।

अस्तु नारी को हेय या छोटा मानकर उसे पूजा के अयोग्य होने की कुशंका मन में नहीं उठने देनी चाहिए और न यह सोचना चाहिए कि पुल्लिंग देवता का पूजन मातृ के पूजन से अधिक उत्तम है। माता ही प्रथम देवता है। गायत्री माता की शरण लेकर हम अपने ऊपर चढ़े हुए चिन्ताओं, कुण्ठाओं, दैन्य दुर्भावों एवं शोक-संतापों से छुटकारा पा सकते हैं। इस रहस्य को जानने वाला आध्यात्म विद्या का मर्मज्ञ भावनापूर्ण हृदय से उस महाशक्ति के प्रति अपनी अभिव्यंजना व्यक्त करते हुए कहता है-

ॐ नमस्ते देविः! गायत्री! सावित्री! त्रिपदेऽक्षेट।

अजरे! अमरे! मातस्राहि माँ भवसागरात्॥

ब्रह्मविद्ये! महाविद्ये! वेदमातर्नमोऽस्तु ते।

अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड व्यापिन! ब्रह्मचारिणि॥ नमोन्मस्ते गायत्री! सावित्री! त्वाँ नमाम्यहम्।

सरस्वति! नमस्तुभ्यं तुरीये! ब्रह्मरुपिणी॥

(वसिष्ठ-संहिता)

“हे देवी गायत्री! हे सावित्री! हे त्रिपदा स्वरूपा! हे अक्षरा ॐ स्वरूपा! हे अजर-अमर स्वरूपा! मेरा तुझे नमस्कार है। हे माता! भवसागर से मेरी रक्षा कर। हे ब्रह्म विद्ये! हे महाविद्ये! हे वेदमाता! हे अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों से व्यापक! हे ब्रह्मचारिणि! तुझे नमस्कार है-नमस्कार है। हे गायत्री! हे सावित्री! हे सरस्वती! तुरीय ब्रह्मरूपिणी तुझे मेरा नमस्कार है।”

अपनों से अपनी बातें-

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