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Magazine - Year 1967 - Version 2

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अपात्रता की दुःखद प्रतिक्रिया-

विज्ञान ने मनुष्य के लिए आज सुख सुविधा के प्रचुर साधन उपलब्ध कर दिये हैं। किन्तु देखने में यह आता है कि मनुष्य अधिकाधिक दुःखी होता जाता है। युग के इस विपरीत परिणाम का कारण है मनुष्य की अपात्रता। सुख के असंख्य साधन होने पर भी मनुष्य अपनी अपात्रता के कारण उनका उपभोग नहीं कर पा रहा है।

एक व्यक्ति प्यास से बुरी तरह विकल है और एक कुँए के पास भी पहुँच जाता है, किन्तु यदि उसके पास पानी भरने का साधन लोटा डोर आदि नहीं है तो वह पानी पाकर अपनी प्यास नहीं बुझा सकता । इसी प्रकार जब तक मनुष्य में अपात्रता रहेगी तब तक वह सुख को प्राप्त नहीं कर सकता फिर चाहे घर-घर में कल्प-वृक्ष ही क्यों न लगा दिया जाये।

मनुष्य की अपात्रता है पापपूर्ण हृदय। जब तक उसके हृदय से संकीर्णता, स्वार्थ, ईर्ष्या द्वेष आदि पाप दूर नहीं हो जाते कोई भी साधन उसे सुख नहीं दे सकते। इसके विपरीत यदि उसका हृदय पाप शून्य हो जाये तो बिना साधनों के भी सुख पा सकता है।

-आचार्य नरेन्द्र देव

जिज्ञासा जगाइये और अपना ज्ञान भंडार भरिए।

जिज्ञासा मानव-जीवन के विकास का बहुत बड़ा आधार है। जो जिज्ञासु है, जानने को उत्सुक है वही जानने का प्रयत्न भी करेगा। जो जिज्ञासु नहीं उसे जड़ ही समझना चाहिए। पेड़-पौधे यहाँ तक पशु-पक्षी भी कुछ नया जानने के लिये कभी उत्सुक नहीं होते । जिज्ञासा की विशेषता ही मनुष्य को पशुओं से भिन्न करती है। वैसे जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य भी अन्यों की तरह दो हाथ-पैर वाला पशु ही है।

जिज्ञासा में स्वयं अपनी ज्ञान-शक्ति होती है। जिज्ञासा के जगते ही किसी बात को जाने सकने का सहायक ज्ञान स्वयं ही विकसित होने लगता है। ज्यों ज्यों जिज्ञासा गहरी होती जाती है ज्ञान भी बढ़ता जाता है, मनुष्य की जिज्ञासु वृत्ति ने ही उसे दार्शनिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं अन्वेषक बनाया है।

यदि जिज्ञासा ने होती तो मनुष्य में इस प्रकार के प्रश्न ही क्यों जागते कि वह क्या है? यह विराट् विश्व क्या है? इसका रचयिता कौन है? और इस सम्पूर्ण प्रपंच का प्रयोजन क्या है? इस सबका आदि कहाँ से प्रारम्भ होता है? अन्त कहाँ होगा? और क्यों इन प्रश्नों का उत्तर खोजने में परिश्रम करता। जिज्ञासा के अभाव में, मनुष्य आज जिस ज्ञानपूर्ण स्थिति में आया हुआ है, कभी नहीं आ पाता। यह जिज्ञासा की ही प्रेरणा है कि आज मनुष्य का ज्ञान भंडार इतना विशाल हो सका है और आगे इस ज्ञान भण्डार में जो कुछ भी वृद्धि होगी उसका भी मुख्य हेतु जिज्ञासा होगी।

आज यदि मनुष्य की जिज्ञासा-वृत्ति कुण्ठित अथवा तिरोहित हो जाए तो उसका ज्ञानाभिमान जहाँ का तहाँ ठप्प हो जाये और तब ग्रह-नक्षत्रों का वास्तविक अस्तित्व क्या है इसका पता लगाने की दिशा में चलते हुए प्रयास जहाँ के तहाँ रुक जायें और तब आगे भी कभी यह जान सकने की सम्भावना सदा सर्वदा के लिये समाप्त हो जाये कि आखिर इन मंगल, चन्द्र अथवा बुध आदि ग्रहों पर क्या है? इनका वास्तविक अस्तित्व क्या है? क्या इन पर भी उसी प्रकार जीवन का अस्तित्व हो सकता है जिस प्रकार कि हमारी पृथ्वी पर? यदि इनमें जीवन है तो वहाँ के जीव किस प्रकार के हैं? उनका कार्य-क्रम क्या रहता है? वे हम मानवों जैसे कर्म प्रधान मर्त्य है अथवा भोग प्रधान अमर्त्य? क्या हम मानवों की भाँति वहाँ पर भी मनुष्य पाये जाते हैं और क्या वे हमारी तरह की आत्मा परमात्मा और पुरुष प्रकृति पर विचार करते हैं? उनका आध्यात्मिक दृष्टिकोण क्या हो सकता है? उनकी साधन पद्धति क्या होगी? मनुष्य की भाँति उनके परम लक्ष्य मोक्ष की क्या परिभाषा होगी? उनकी भाषा क्या होगी और न जाने उनका साहित्य, सभ्यता, संस्कृति, कलाकौशल शिल्प एवं रहन-सहन किस प्रकार का होगा? उसमें और हम भूमिवासियों में क्या समानता और क्या अन्तर होगा?

आज मनुष्य का अन्तरिक्ष ज्ञान जिस सीमा तक पहुँच चुका है जिज्ञासा के अभाव में वह उसके आगे फिर न जा सकेगा। आज जिस अणु शक्ति को मनुष्य ने खोजकर आज्ञारत बना लिया है कल इस महाशक्ति को वह आगे बढ़ा सकता है ऐसी आशा नहीं रह सकती है।

यही नहीं कि जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य का बढ़ता हुआ ज्ञान जहाँ का तहाँ रुक कर स्थिर हो जाएगा बल्कि वह धीरे-धीरे नष्ट भी हो जायेगा और आज का विकसित मनुष्य कुछ ही दिनों में फिर ‘कोरमकोर’ हो जायेगा। जिज्ञासा के आधार पर ही तो मनुष्य एक दूसरे से ज्ञान ग्रहण कर आगे बढ़ाता है। जब किसी में कुछ जानने, सीखने अथवा ग्रहण करने की उत्सुकता ही न रहेगी तब वह क्यों व्यर्थ में किसी विषय में माथा-पच्ची करेगा?

आज भी जिनमें जिज्ञासा का प्राधान्य होता है। ज्ञान के क्षेत्र में वे ही आगे निकल पाते हैं । यदि जिज्ञासा की मात्रा में अन्तर न होता तो सभी एक जैसे समान स्तर के ज्ञानी, दार्शनिक, आध्यात्मिक, कवि, कलाकार, शिल्पी एवं वैज्ञानिक व अन्वेषक, होते। यदि जिज्ञासा के अभाव में यह सब सम्भव हो सकता तो संसार का प्रत्येक मनुष्य विद्यावान् एवं वैज्ञानिक हो सकता था। मनुष्य में ज्ञान का कम ज्यादा होना भी जिज्ञासा की मन्दता अथवा तीव्रता पर ही निर्भर करता है।

जो जिज्ञासु है वही गहरे पैठता है। जिज्ञासु की दृष्टि सामान्य लोगों से कुछ अधिक पैनी और खोजक होती है। किसी एक दृश्य अथवा घटना को कोई सामान्य व्यक्ति देखता है तो वह उसके लिये एक साधारण बात होती है किन्तु जब उसी विषय पर किसी जिज्ञासु व्यक्ति की दृष्टि पड़ जाती है तो वही साधारण बात कोई दर्शन कि अथवा कवित्वपूर्ण अभिव्यक्ति पाकर असाधारण बन जाती है जिज्ञासु के लिये संसार की हर घटना एक रहस्य एवं एक महत्व लिये रहती है। एक रसोइये के लिये भाप से बटलोई का ढक्कन उछलना नित्य-प्रति की सामान्य बात रहती है किन्तु स्टीविन्सन के लिये भाप से ढक्कन का उठना-गिरना एक असाधारण रहस्य की बात बनकर इंजिन के आविष्कार का हेतु बनी। एक माली के लिये पेड़ से फल गिरना सामान्यतम घटना है किन्तु उसके आधार पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के सिद्धान्त के आदि गुरु न्यूटन के लिये वह असाधारण महत्व की बात थी। इतनी असाधारण कि आगे चलकर उसी आधार सूत्र के बल पर अधर में लटके इस ब्रह्माण्ड के हर ग्रह-नक्षत्र की चाल तथा अवस्थान का रहस्य मालूम कर लिया गया।

जिज्ञासा ज्ञान की महान् जननी है। जिसने जो कुछ जानना चाहा उसे जानकर ही छोड़ा। प्रत्यक्ष में जानने को कोई सूत्र न होने पर भी जिज्ञासा मनुष्य को स्वयं से उसी प्रकार सूत्र निकाल कर दे देती है जिस प्रकार मकड़ी अपने अन्तर से जाल तन्तु निकाल लेती है। गहन के गहन अपराधों का कोई आधार न होने पर भी जासूस जिज्ञासा की तीव्रता के बल पर ही पता लगा लेते हैं। जिज्ञासा के बल पर ही मनुष्य ने शरीर विज्ञान, वनस्पति शास्त्र भूगोल एवं खगोल विद्याओं का ही नहीं, अपने आन्तरिक एवं आत्मिक रहस्यों को भी हस्तगत कर लिया है। मनुष्य की जिज्ञासु बुद्धि उस चींटी की तरह सतत प्रयत्निका होती है, जो सात परदों में छिपी हुई शक्कर को खोजकर ही दम लेती है। जिज्ञासु बुद्धि का सहज गुण होता है कि जब तक वह लक्षित रहस्य को खोज नहीं लेती, सन्तुष्ट नहीं होती। दिन-रात उसके पीछे लगी रहती है।

एक ही मिट्टी से बने हुए एक जैसे हाथ पैर और समान स्थिति के मनुष्यों में से जो आगे निकल गया है,ऊँचा चढ़ गया है और दूसरा जहाँ का तहाँ ही रह गया है उसका कारण जिज्ञासा का भाव ही होता है। निश्चय ही आगे निकल जाने वाले व्यक्ति में जिज्ञासा की प्रबलता रही होती है जब कि फिसड्डी में उसका अभाव होता है। जो जिज्ञासु है, कुछ जानना और सीखना चाहता है वह तो जाने सीखेगा ही और उसी आधार पर आगे भी बढ़ेगा। जिसमें कुछ सीखने तथा जानने अथवा पाने की जिज्ञासा ही न होगी, जहाँ का तहाँ जड़ की तरह पड़े रहने में सन्तुष्ट रहेगा, प्रगतिशीलता उसके लिये अनहोनी बात ही रहेगी।

कक्षा में शिक्षक पढ़ाता है, पचासों लड़के सुनते हैं किन्तु उनमें में दस कुछ प्राप्त कर लेते हैं और चालीस ज्यों के त्यों रह जाते हैं। इसका कारण यही होता है कि उन दस में जिज्ञासा की प्रबलता थी जब कि शेष चालीस में नहीं । जिज्ञासु की बुद्धि बड़ी ही ग्रहणीय होती है वह एक बार में ही कोई बात देख सुनकर ग्रहण कर लेती है और फिर कभी उसे भूलती नहीं, अजिज्ञासु बुद्धि बड़ी ही कुन्द एवं कुँठित होती है। हजार बार देखने-सुनने और पढ़ने पर भी वह न तो किसी बात को ठीक से समझ पाती है और न याद ही रख पाती है। जिज्ञासा का अभाव मनुष्य को बड़ा ही मन्द बुद्धि बना देता है।

एकाग्रता, तन्मयता एवं तल्लीनता के साथ विषय प्रवेश जिज्ञासु व्यक्ति के विशेष गुण होते हैं। जिज्ञासु जिस नवीन बात अथवा चीज को देखता है उसमें एकाग्र होकर तल तक पैठ करने का प्रयत्न किया करता है, जिज्ञासु व्यक्ति का दैनिक ज्ञान अजिज्ञासु की अपेक्षा बहुत कुछ तरो-ताजा रहता है, एक ही स्थिति के दो मित्रों में से एक देश-देशान्तर की गतिविधि से अधिक एवं प्रामाणिक रूप में अभिज्ञात रहता है जबकि दूसरे को अपने पास-पड़ौस की घटनाओं का भी ज्ञान नहीं रहता। यह अन्तर उनकी अपनी-अपनी जिज्ञासा के स्तर के कारण ही होता है।

जिज्ञासु व्यक्ति किसी बात के हर पहलू को जानने एवं समझने का प्रयत्न किया करता है और यथासम्भव अवश्य ही जानबूझ लेता है जबकि अजिज्ञासु व्यक्ति केवल तात्कालिक उपयोग पहलू के संक्षिप्त ज्ञान से ही संतुष्ट हो जाता है। इस संबंध में एक छोटी -सी कहानी प्रसिद्ध है जिससे पता चलता है कि जिज्ञासु व्यक्ति कितना चतुर एवं उपयोगी होता है।

एक बादशाह का एक बहुत ही मुँह लगा नौकर था। दिन-रात बादशाह की सेवा में लगा रहता था। एक दिन उसे विचार आया कि वह बादशाह की सेवा में दिन-रात लगा रहता है तब भी उसे केवल पाँच रुपये ही मिलते हैं जबकि मीरमुँशी, जो कभी कोई विशेष काम नहीं करता वेतन में पाँच सौ रुपये पाता है। निदान एक दिन प्रसन्न देख कर वह बादशाह से प्रश्न कर ही बैठा। सरकार मैं दिन-रात सेवा करता हूँ तो भी मुझे केवल पाँच रुपये ही मिलते हैं और आपका मीरमुँशी जो कभी कुछ नहीं करता है पाँच सौ रुपये वेतन पाता है। इस भेद का का क्या कारण है? बादशाह ने हँसकर कह दिया किसी दिन मौके पर बतलाऊँगा।

एक दिन एक घोड़ों का काफला उसकी सीमा से गुजरा। बादशाह ने अपने सेवक को भेजा कि जाकर मालूम कर यह काफला कहाँ जा रहा है?

नौकर गया और आकर बतलाया कि हुजूर वह काफला सीमा के कंधार देश जा रहा है।

अब बादशाह ने मीरमुँशी को भेजा। उसने आकर बतलाया कि यह काफला काबुल से आ रहा है और कंधार जा रहा है। उसमें पाँच सौ घोड़े और बीस ऊँट भी हैं मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि वे सब सौदागर हैं और घोड़े बेचने जा रहे हैं। इस समय उन्हें पैसे की सख्त जरूरत है यदि हजूर कुछ घोड़े खरीदना चाहें तो कम कीमत पर मिल सकते हैं। मैंने पचास ऐसे घोड़ों को छाँट लिया है जो नौजवान और बड़ी ही उत्तम जाति के हैं। बादशाह ने तुरन्त ही पचास घोड़े खरीद लिये जिससे उसे कम दामों पर अच्छे घोड़े मिल गये। काफिले के विषय में चिन्ता जाती रही और उन परदेशी सौदागरों पर बादशाह की गुण ग्राहकता का बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ा। बादशाह ने नौकर से कहा देखा तुम्हें पाँच रुपये क्यों मिलते हैं और मीरमुँशी को पाँच सौ क्यों? नौकर ने इस अन्तर के रहस्य को समझा और सदा के लिये सावधान हो गया।

जिज्ञासु व्यक्ति किसी भी बात की तह तक बैठ कर उसमें से किसी न किसी प्रकार की उपयोगिता खोज लाता है? जिज्ञासा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चारों उन्नतियों की हेतु होती है। मनुष्य को अपनी जिज्ञासा को प्रमाद पूर्वक कष्ट नहीं करना चाहिए उसे विकसित एवं प्रयुक्त करना चाहिए और यदि जिसमें जिज्ञासा नहीं है तो उसे चाहिए कि वह तब तन्मयता एवं गहरे पैठने के अभ्यास से उसे पैदा करे। क्योंकि जिज्ञासा भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों महान क्षेत्रों में प्रगति एवं उन्नति का आधार बनती है।

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