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Magazine - Year 1971 - Version 2

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काल ब्रह्मांड और काररा का प्रदेश-स्वप्न

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विश्व-विख्यात गणितज्ञ आइन्स्टीन को एक वैज्ञानिक गोष्ठी में किसी जटिल समीकरण का हल प्रस्तुत करना था। वे कई दिनों से उसे हल करने में लगे थे पर कोई हल निकल नहीं पा रहा था। एक दिन पूर्व वे सोये तब तक वह प्रश्न हल नहीं हो पाया था पर सो जाने के उपरान्त न जाने किस अज्ञात सत्ता ने उन सारे कठिन संदर्भों को सरल बनाकर आइन्स्टीन को उनके प्रश्न का समाधान प्रस्तुत कर दिया। स्वप्न टूटने के बाद आइन्स्टीन ने स्वप्न में देखे गये दृश्य के अनुसार फिर से प्रश्न को हल किया और उसका सही उत्तर उन्हें मिल गया। ऐसा उनके जीवन में कई बार हुआ इसलिये वे कहा करते थे स्वप्नों में कोई सत्य है जो हम वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे।

कुछ ग्रामीण कुछ प्रभावशील व्यक्तियों द्वारा ही स्वप्नों में सत्य घटनाओं के आभास की बात रही होती तो सम्भवतः इस तथ्य को उपेक्षित भी किया जा सकता था पर विस्तृत खोज करने पर पता चलता है कि स्वप्नों ने कई बार विश्व इतिहास को भी प्रभावित किया है। अब्राहम लिंकन ने अपनी हत्या का पूर्वाभास स्वप्न में ही पाया था। एलियस होवे ने सिलाई मशीन का ज्ञान स्वप्न में ही पाया था। कहते है- तुलसीदास द्वारा लिखी सारी चौपाइयाँ उन्हें कोई अतींद्रिय सत्ता स्वप्न में ही बता जाया करती थी। उनकी बुद्धि निर्मल और आत्मा इतनी पवित्र हो गई थी कि उन्हें स्वप्न की हर बात याद बनी रहती थी प्रातः काल वे उन चौपाइयों को भोज-पत्र पर लिख दिया करते थे।

यह बाते पुरानी कही जा सकती है स्वप्नों में पूर्वाभास और भविष्य के ज्ञान की घटनाएँ अभी भी कम घटित नहीं होती ? जितनी अधिक ये घटनाएं घटती जा रही है , उस अतीन्द्रिय लोक के प्रति वैज्ञानिक मन में जिज्ञासा भी बढ़ती जा रही है। कौन जाने यह जिज्ञासायें एक दिन वह तथ्य खोज निकाले जो आत्मा के रहस्य पर प्रकाश डालने वाले हो।

अंग्रेजी दैनिक इंडियन रिपब्लिक के सम्पादक रमेश चौधरी आरिगपूडि की अपनी जबानी कही और धर्मयुग 10 फरवरी 1963 अंक में छपी घटना- प्रथम निर्वाचन के दिन थे। श्री आरिगपूडि की एक दिन इच्छा हुई आँध्र के किसी निर्वाचन को अपनी आंखों से देखना चाहिये। वे मद्रास से नेल्लूर होते हुए अपनी ससुराल तेनाली पहुँचे। सायंकाल वे स्वस्थ चित्त सोये- लोग कहते है- फ्रायड ने लिखा है कि मनुष्य दिन भर की जो कल्पनाएं करता है वह दमित कल्पनाएं ही स्वप्न में उभरती है पर श्री आरिग पूडि के इस स्वप्न ने फ्रायड के तर्क को काट दिया।

रात गहरी नींद आई। प्रातः काल होने को थी तभी एक स्वप्न देखा- पिताजी बीमार है और तख्त पर लेटे है उनको हल्का दौरा आया और वे अचेत हो गये। हाथ तख्त से नीचे लटक गये। आंखें बन्द, ओठों से झाग बह निकला सुना कोई कह रहा है- “अब वे इस संसार में नहीं रहे। “

स्वप्न टूट गया। सामान्य स्वप्न लोगों को इतना कचोटते नहीं न जाने क्या बात थी कि श्री आरिग पूडि स्वप्न की बात जितना भूलना चाहते उतना ही तेजी से उभरता और उन्हें किसी अज्ञात आशंका से भर देता।

पिताजी विजयवाड़ा रहते थे। श्री अरिग पूडि ने उसी दिन तेनाली से कलकत्ता का टिकट कटाया। मार्ग में विजयवाड़ा पड़ता था पर वहाँ उतरने का उनका कोई इरादा नहीं था। विजयवाड़ा आया- श्री अरिगपूडि प्लेटफार्म पर उतरे एक बार फिर वही स्वप्न मस्तिष्क में झंकृत हुआ। न जाने किस प्रेरणा से उन्होंने सामान उतरवा लिया और घर की ओर चल पड़े। घर जाकर जो दृश्य उन्होंने देखा और सुना उसमें और स्वप्न में देखे दृश्य में पाई-पैसे का अन्तर नहीं था। इस घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया आखिर जिसे लोग स्वप्न कहते हैं और जिनके बारे में मनोवैज्ञानिक भी कोई उचित निष्कर्ष नहीं दे पाते, उनमें इन सत्याभासों का क्या रहस्य हो सकता है ?

श्री उदयकुमार वर्मा रूस में पढ़ने वाले भारतीय स्नातक तब दोम अस्पीरान्तोव उनीवरसितेतस्काया ताशकंद 15 में रहते और ताशकंद में ही पढ़ते थे। जब भारत पाकिस्तान समझौता वार्ता के लिये वहाँ श्री लाल बहादुर शास्त्री तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष अयूब और रूसी प्रधान मंत्री श्री कोसीगिन एकत्रित हुए थे। एक दिन श्री वर्मा के पड़ोस में रहने वाली एक सोवियत छात्रा उनके पास आई और बोली- आप हमें श्री शास्त्री जी के आज दर्शन करा दे अन्यथा फिर उनके दर्शन नहीं हो पायेंगे। उसने बताया कि मैंने स्वप्न में देखा शास्त्रीजी की मृत्यु हो गई है। वर्मा जी ने इस बात का बुरा माना। उस दिन शास्त्रीजी का प्राच्य भाषा संस्थान ताशकंद में भाषण था। श्री वर्मा उक्त छात्रा के साथ वहाँ गये और शास्त्रीजी के दर्शन किये थे।

उसी रात को वर्मा ने स्वयं भी स्वप्न में देखा कि वे शास्त्रीजी को विदा करने हवाई अड्डा पहुँचे वहाँ कोई छात्रा कह रही है शास्त्रीजी तो मर गये है क्या आप उनके शव को विदा करने आये है। इसके बाद नींद टूटी। वर्मा ने छात्रा को बुलाकर नाराजी प्रकट की और कहा- देखो तुम्हारी उन बातों को मेरे अवचेतन मन पर प्रभाव पड़ा और मैंने भी वैसा ही अशुभ स्वप्न रात में देखा। पर वर्माजी को यह मालूम न था कि अवचेतन से भी अवचेतन कोई एक सत्ता जीवन प्रवाह के रूप में बाहर-भीतर सर्वत्र प्रवाहित हो रही है उसमें सारी अतीन्द्रिय क्षमताएं है और उसकी अनुभूतियां एकाएक गलत नहीं हो सकती।

सारा संसार जानता है कि 10 जनवरी 66 को उसी रात शास्त्रीजी का देहान्त हो गया। 11 को जब श्री वर्मा उन्हें काबुल प्रस्थान के लिए विदा करने जाने वाले थे तभी उन्हें समाचार मिला- शास्त्रीजी नहीं रहे तो वे स्तब्ध रह गये।

ऐसी घटनाओं ने ही वैज्ञानिकों को इस सम्बन्ध में विस्तृत खोज की प्रेरणा दी है। अमरीका के प्रसिद्ध डाक्टर आइसवुड ने बहुत समय तक स्वप्न-पीड़ित लोगों की चिकित्सा की। एक दिन उन्हें ख्याल आया- चूँकि स्वप्न- एक विचार एक स्पन्दन की नाई मस्तिष्क से निसृत होते हैं अतएव क्या रिकार्ड नहीं किया जा सकता ? उनकी इस जिज्ञासा ने ही “इलेक्ट्रोएन सेफलोग्राफ” यंत्र का आविष्कार किया यह यंत्र सोये हुये व्यक्ति के स्वप्नों को ध्वनि तरंगों की भाँति रिकार्ड कर देता है यदि उस व्यक्ति को स्वप्न की एक-एक बात याद रहे तो उन स्वप्न रेखाओं से और भी विस्तृत जानकारियाँ प्राप्त की जा सकी है। अभी तक तो यह संभावना थी कि स्वप्नों को इस प्रकार अंकित कर लेने से एक व्यक्ति के स्वप्न दूसरे व्यक्ति देख सकेंगे, स्वप्न खरीदे और बेचे जा सकेंगे। पर पीछे जब “मैमी फला स्वप्न अनुसंधान संस्थान” की स्थापना हुई और सभी आयु वर्ग देश जाति के लोगों पर प्रयोग करके स्वप्नों का विश्लेषण किया तब पता चला कि स्वप्न एक सत्ता जगत है अर्थात् उस समय मानसिक चेतना का आत्मिक चेतना में आँशिक और पूर्ण विलय भी होता है। इस संस्थान ने यह पाया कि जो लोग अधिक पवित्र थे उनके स्वप्नों जहाँ भविष्य सम्बन्धी स्पष्ट जानकारियाँ थी वही जिन लोगों के मस्तिष्क दूषित थे उनके स्वप्न न केवल निताँत अस्पष्ट थे वरन् उनकी मानसिक स्थूलता इतनी अधिक थी कि उन्हें हर स्वप्न में कुछ न कुछ भयानक दृश्य दिखाई देते हैं।

डॉ0 कैल्विन हाल ने मैक्सिको आस्ट्रेलिया, नाइजीरिया के लोगों के लगभग 30 हजार स्वप्न एकत्रित किये और विश्लेषण किया तो पाया कि स्वप्नों को लोगों के व्यक्तिगत चरित्र से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जिनके आचार-विचार अच्छे नहीं इन्हें तीन में से दो स्वप्न भयानक देखने पड़ते हैं। जिन्हें रात में 7-7 स्वप्न आते हैं, वह भी ऐसे ही अस्थिर चित्त लोग होते हैं। ईश्वर-भक्त , पुण्यात्माओं को यदि आहार में कोई गड़बड़ न हो तो रात में लम्बा, गहरा और इतना स्पष्ट स्वप्न दिखाई देता है जिसे बीसियों वर्षों तक ज्यों का त्यों रखा जा सकता है। इन्हें इन दृश्यों में सिनेमा के दृश्य से भी अधिक आनन्द आता है। उन्हें स्वप्न में संगीत, गायन नृत्य आदि भी देखने सुनने को मिलते हैं।

स्काटलैण्ड यार्ड पुलिस के अपराध विशेषज्ञों ने स्वप्नों को एक- दूसरे ही रूप में लिया और किसी अर्थ में भी उसका विशिष्ट महत्व यह सिद्ध हुआ कि जो चेहरे बाहर से बहुत सुन्दर, आकर्षक सभ्य और शिक्षित प्रतीत होते हैं आवश्यक नहीं कि वे भीतर से वैसे ही हो। लोग बाहर से कितनी ही बनावट क्यों न करे यदि उनका अन्तःकरण विकार ग्रस्त और पापपूर्ण है तो उनके स्वप्न में उसका असर स्पष्ट पड़ेगा। एक और बात सामने आई वह यह कि स्वप्न में पूर्व किये गये अपराध पानी को लहर की तरह बार-बार टकराते हैं। इसलिए स्वप्नों को अंकित करने की पद्धति से अपराधियों की पकड़ का एक अच्छा क्रम चल पड़ा । आगे तो विज्ञान स्वप्नों द्वारा पूर्व जन्मों के काण्ड भी खोलने वाला है इसमें जरा भी संदेह नहीं रह गया।

उदाहरण के लिये अमेरिकी पुलिस ने एक बार अमेरिका के शिक्षित और संभ्रान्त माने जाने वाले 1000 व्यक्तियों के स्वप्नों का विश्लेषण किया तो पाया कि उनमें से 40 प्रतिशत व्यक्तियों का सम्बन्ध किसी न किसी अपराध से है। कई लोग अपनी धर्म पत्नि के समक्ष बड़े चरित्रवान बनते थे। पर स्वप्नों में यह सत्य पाया कि यह उनके द्वारा किया गया सफेद धोखा था। कई लोग त्यागी दीखते थे पर उन्होंने कभी न पकड़ में आने वाले गबन किये थे। कई लोगों ने चोरियाँ, कई ने मिलावट और कितनों ने हत्यायें तक की थी। इससे अमेरिका में एक भय प्राप्त हो गया और लोगों ने स्वप्न विश्लेषण कराना बंद कर दिया क्योंकि इससे उनके जीवन में अपराध चाहे कभी भी हुए हो सामने आ सकते थे।

वैज्ञानिकों ने खोज करके पाया है कि 98 प्रतिशत अपराधी स्वप्न बार-बार आते हैं। कृत्रिम स्वप्नों द्वारा इन आवृत्तियों को उत्तेजित कर दिया जाता है जिससे किसी भी व्यक्ति के कितने प्राचीन अपराधों के दृश्य रिकार्ड आ जाते हैं। एक दिन सम्भव है कि हर व्यक्ति के जीवन के ऐसे रिकार्ड रखे जाये और उनका सम्बन्ध उसी तरह के स्वप्न देखने वालो से जोड़ा जाये तो पुनर्जन्म प्रमाणित होगा। विज्ञान इस दिशा में तेजी से अग्रसर हो रहा है।

स्वप्न को एक जगत एक प्रवाह, एक चेतन अस्तित्व कह सकते हैं जिसमें कोई काल नहीं कोई ब्रह्मांड नहीं क्योंकि वह एक मात्र मनोमय अनुभूति है उसका कोई निश्चित कारण भी नहीं आज तक कोई वैज्ञानिक यह नहीं बता पाया कि स्वप्न क्यों देखते हैं। वह आत्म-चेतना की आँशिक अनुभूति मात्र है। जो यह प्रमाणित करता है कि जीवात्मा अपना विकास करके अतीन्द्रिय लोक को पा सकती है वहाँ भी सब कुछ है जिसकी स्थूल जगत में कल्पना हो सकती है। फ्रायड ने अपनी पुस्तक “इंटर पिटेशन आफ ड्रीम” में स्पष्ट स्वीकार किया है कि उस समय चित्त आत्मिक ज्ञान की अनुभूति उसी तरह करता है जैसे रेडियो की सुई रेडियो स्टेशन विशेष का। हम इन स्वप्नों के माध्यम से भी आत्मा के रहस्यों की कल्पना और चिन्तन कर सके तो आत्म-साक्षात्कार का मार्ग और भी सरल हो सकता है।

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