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Magazine - Year 1971 - Version 2

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भक्षक अणु विकिरण- रक्षक गौ माता

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गाय के प्रति हमारी श्रद्धा का आधार उसकी अन्यतम उपयोगिता रही है। गाय के दूध, घी और मक्खन ही नहीं मूत्र और गोबर में भी ऐसे तत्व पाये जाते हैं जो मनुष्य की न केवल कठिन जीवाणुओं से रक्षा करते हैं वरन् आज तो यह स्वीकार किया जाने लगा है कि अणु-विकिरण जैसे भयंकर विष से मानव-जाति की रक्षा में भी पंचगव्य ही समर्थ है। संसार में बढ़ रही अणु- आयुधों की संख्या, बम- विस्फोट और उसके धुएं से मानव-जाति अगले दिन जो घुटन अनुभव करेगी उससे हमारी रक्षा गाय ही करेगी।

1963 के प्रसिद्ध रसायन शास्त्री लिनस पालिंग को विश्व-शाँति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया। ओस्लो में दिए गए एक भाषण में उन्होंने बताया- जैसी कि मेरी गणना है इस समय सारे संसार के पास 320000 मेगाटन बम है। स्टेंडर्ड अणुबम 20 मेगाटन के बराबर होता है। रूस और अमेरिका ने तो 60 मेगाटन और 100 मेगाटन के भी अणुबम बनाये है। इन अणुबमों की मारक क्षमता इतनी भयंकर है कि कोई भी वैज्ञानिक उसके सही-सही आंकड़े प्रस्तुत नहीं कर सकता।

एक उदाहरण दिया जा रहा है। मान लीजिये सम्पूर्ण सोवियत संघ, सम्पूर्ण अमेरिका और योरोप एक क्षेत्र है और उसमें 80 करोड़ की आबादी रह रही है। इस समय संसार में संचित अणुबमों का कुल दस प्रतिशत ही इस क्षेत्र में डेढ़ सौ किलोमीटर क्षेत्र में एक बम के हिसाब से गिराया जाये तो 72 करोड़ लोग तो तत्काल ही मृत्यु के घाट उतर जाएंगे। शेष बचो में 6 करोड़ तो सख्त घायल होगे जो साल छः महीने कष्ट भोगेंगे जब मरेंगे। बाकी 2 करोड़ लोगों में से एक भी ऐसा न होगा जो रेडियो धर्मी धूल या निक्षेपित विषैली गैसों के प्रभाव से बचा हो। 1952 में एक ऐसा विस्फोट अमेरिका के एनीवंटाक एटाल प्रवाल द्वीप में किया गया था। उस विस्फोट के बाद द्वीप में कुछ न बचा था जो कुछ था सब गैस बन कर उड़ गया था।

न्यूयार्क, वाशिंगटन, पेरिस, लंदन, टोक्यो , बम्बई यह संसार के सबसे बड़े शहरों में गिने जाते हैं। इनमें से किसी भी बड़े शहर को ध्वस्त करने के लिये 20 मेगाटन बम काफी है। 20 मेगाटन की क्षमता का बम जहां भी गिरा दिया जायेगा वही 50 से 100 किलोमीटर तक क्षेत्र आग की धुआँधार लपटों में बदल जायेगा। उससे उत्पन्न विकिरण और रेडियो धर्मी विषैले धुंए से 300 किलोमीटर तक के सारे लोग मर जायेंगे। तब उस स्थान पर एक विकराल गड्ढा मात्र रह जायेगा। जिसका व्यास 20 किलोमीटर लम्बा होगा।

विस्फोट के तात्कालिक और दूरवर्ती विनाशकारी कारणों में सबसे बड़ा हाथ तो विस्फोट से उत्पन्न प्रखर ऊर्जा के विकिरण का होता है। उससे जन-धन संपत्ति का नाश तो होता ही है सृष्टि के जीव मारे जाते हैं और उसके बाद यह रेडियो धूलि न मालूम कितने लम्बे समय तक छाई रहती है और पृथ्वी से पैदा होने वाले खाद्य-पदार्थों को विषाक्त बनाती रहती है।

अब तक जो बम विस्फोट हो चुके है उनके ही अणु- विकिरण का प्रभाव हुआ है कि आकाश में रेडियो धर्मी धूलि भर गई है और अब अधिक से अधिक सुरक्षा प्रदान करके भी खाद्यान्न को शुद्ध नहीं रखा जा सकता।

इससे भी बुरा प्रभाव जीवों की प्रजनन क्षमता पर पड़ रहा है, भावी पीढ़ी इस विकिरण में सौ प्रतिशत प्रभावित होगी। एक 20 मेगाटन बम विस्फोट की रेडियो सक्रियता अभी जो नहीं जन्मे ऐसे 550000 बच्चों की अकाल मृत्यु का कारण बनेगी। यदि विस्फोट की क्षमता 600 मेगाटन बम की हुई तो उसका प्रभाव 160 लाख भावी बच्चों पर पड़ेगा। यदि वे किसी प्रकार सकुशल जन्म लेते हैं तो अधिकाँश विक्षिप्त, क्रूर- कर्मी त्रासदायक होगे। मानसिक ही नहीं शारीरिक दृष्टि से भी सैकड़ों दोष होगे। किसी का शरीर भारी होगा, धड़ पतला, किसी का एक हाथ बिलकुल ठीक होगा पर दूसरा हाथ हथेली तक पहुँचते -पहुँचते ठूँठ हो जायेगा। नाक किसी के चपटी होगी, किसी के नथुने आवश्यक और ऊपर से उठे हुए। जिन बच्चों को पर्याप्त सुविधा देकर पाला जायेगा, जो गर्भिणी बताये अधिक शुद्ध और प्राकृतिक वातावरण में रहकर बच्चों को जन्म देगी उन बच्चों की आयु में भी 10 से 15 वर्ष की कमी होगी। विकिरण का कुछ न कुछ प्रभाव उन पर निश्चित रूप से पड़ेगा। इस तरह की आशंकायें सन 1945 में ही अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ‘फ्रैक रिपोर्ट’ के नाम से प्रकाशित करा दी थी। उस समय किसी ने इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया था। ऊपर बताई गई सारी घटनायें अभी से योरोप और अमेरिका में स्पष्ट देखी जा सकती है। अविकसित भ्रूणों के जन्म की समस्या वहाँ अब हिन्दुस्तान की बेरोजगारी की समस्या की तरह फैलती जा रही है।

आज इस विकिरण के प्रभाव से 20 लाख व्यक्ति कैंसर या ऐसे ही रोगों से पीड़ित है आगे यह संख्या निश्चित रूप से बढ़ेगी ही कम नहीं होगी क्योंकि अभी तो अणुबम संसार के इने-गिने 4-5 देशों के पास ही है। उसमें करोड़ों की लागत आने पर भी दुनिया के अन्य देशों के लोगों में अणु-आयुधों के निर्माण की माँग बढ़ रही है। भारत जैसे शान्तिप्रेमी देश में भी सर्वेक्षण के उपरान्त “दि इन्स्टीट्यूट आफ पब्लिक ओपीनियन “ (यह एक ऐसी संस्था है जो किसी विषय पर जनमत संग्रह करती है) के डायरेक्टर द्वारा प्रस्तुत आंकड़े 15 अगस्त सन 70 के “दि हिन्दू “ समाचार पत्र में दिये गये वह भी अणु बम के निर्माण के पक्ष में है। प्रारम्भिक जाँच के अनुसार दिल्ली में अणु बम बनाने के पक्ष में 75 प्रतिशत लोग थे तो विपक्ष में कुल 22, कलकत्ता के पक्ष में 77, विपक्ष में 23, बम्बई में 72 पक्ष में और 28 विपक्ष में मद्रास में यह औसत लगभग बराबर था। उससे यह निश्चित होता है कि यहाँ भी अणुबम आज नहीं तो कल अवश्य बनेंगे। अभी तो दूसरे देशों के अणु-विस्फोट की जो धूलि और विकिरण यहाँ तक आ जाता है वही प्रभावित करता है पीछे तो यहाँ विस्फोट होगे तो विकिरण और भी तीव्र हो उठेगा और उसके सम्भावित दुष्परिणाम भी।

बम-विस्फोटक रुक नहीं सकते तो विकिरण के प्रभाव से मानव-जाति की रक्षा कैसे हो ? वह आज का सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न है। पहले विकिरण को ही समझ लिया जाय। संसार में जितने भी पदार्थ है वे स्थूल है तो कम, हलके है तो अधिक मात्रा में अपने भीतर से ऊर्जा निकालते हैं। यह ऊर्जा उस पदार्थ के अच्छे बुरे प्रभाव से युक्त होती है बम में जो रेडियम, यूरेनियम, टिट्रियम, हीलियम जैसे विषाक्त तत्व प्रयुक्त है इनका अर्द्धजीवन करोड़ों वर्षा का है अर्थात् यह तत्व वायु मण्डल में करोड़ों वर्षा तक बने रहते हैं और अपने भीतर से रेडियो विकिरण निक्षेपित करते रहते हैं।

फरमाया रसूल अल्लाह ने कि गाय का दूध शिफा है और घी दवा, उसका माँस तो मर्ज (रोग) है।

-हजरत आयशा

अभी कुछ दिन पूर्व श्री नारायण स्वरूप शर्मा संसद सदस्य भारत सरकार के सूचना मंत्री श्री के0 के0 शाह से मिलने गये। बात भारतीय संस्कृति के कुछ मुद्दों पर चल पड़ी तो श्री के0 के0 शाह ने बताया कि- अभी कुछ दिन पूर्व ही रूस वैज्ञानिकों का एक शिष्ट मंडल भारत आया। वे लोग यहाँ की जीवन पद्धति का समीप से अध्ययन करना चाहते थे ताकि रूस में चल रहे उनके कुछ प्रयोगों को नई दिशा मिल सके।

इस शिष्ट मंडल के नेता वहाँ के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री शिरोविच थे- उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ जो प्रयोग हो रहे हैं, उनसे हमने गाय और यज्ञ के सम्बन्ध में आश्चर्यजनक तथ्य एकत्रित किये है जो भारतीयों को भी ज्ञात नहीं है। 1. गाय के दूध में रेडियो विकिरण से रक्षा करने की सबसे अधिक शक्ति होती है। 2. जिन घरों में गाय का गोबर लीपा जाता है उन घरों में रेडियो विकिरण का प्रभाव बिलकुल नहीं होता और 3. अगर गाय के घी को आग पर डाल कर धुआँ उठाया जाय- यानी हिन्दुस्तानी भाषा में हवन किया जाये तो वायु मंडल में रेडियो विकिरण का प्रभाव बहुत कम हो जायेगा।

इस भेंट वार्ता को मासिक “आरोग्य“ के सितम्बर 70 अंक के 80 पेज पर पेनल में छापा गया है और उसमें बताया गया है कि इन तथ्यों पर रूस में विस्तार से रिसर्च चल रहे हैं ताकि अणु-विकिरण के भावी दुष्प्रभाव से वहाँ के लोगों की रक्षा के लिये इन देखने में नगण्य जैसे महान् साधनों को प्रयुक्त किया जा सके।

एक ओर अणु विकिरण की यह मारक भयंकरता तेजी से बढ़ रही है दूसरी ओर उससे माता की तरह रक्षा करने वाली गाय के प्रति यज्ञ के प्रति हम भारतीयों की ही श्रद्धा समाप्त होती जा रही है। लोग भैंसें पालना भैंस का दूध पीना पसंद करते हैं। इसलिए गौ की तेजस्विता से हम जो सत्परिणाम प्राप्त कर सकते थे उनसे वंचित रह जाते हैं। गाय का मूल्य और महत्व पहले जितना था अब उससे सैकड़ों गुना अधिक हो गया है। यह अणु विकिरण के ऊपर के आंकड़े पढ़ कर सहज की अनुमान किया जा सकता है। मानव -जाति और मानवीय संस्कृति की रक्षा करनी है तो हम में से प्रत्येक को गाय पालन, गाय का दूध पीना और घृत से हवन से साँस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न करना बहुत आवश्यक हो गया है यदि ऐसा न हुआ तो अणु-आयुध हमारी भावी संतानों को नष्ट किए बिना न छोड़ेंगे।

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