संसार नाचता है एक उँगली के इशारे पर
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अगस्त 1965 की बात है, बम्बई में एक फ्रांसीसी परामनोवैज्ञानिक श्री पाल गोल्डीन आये थे। गोल्डीन का कथन है- मनुष्य जितना व्यक्त है उतना ही नहीं है, वरन् वह अव्यक्त भी बहुत अधिक है। और इस शरीर में व्याप्त यह जो अव्यक्त अतीन्द्रिय (छठी शक्ति या सिक्सथ सेन्स) सत्ता है वह इतनी बलवान्, साधनों, सामर्थ्य से परिपूर्ण है कि उसे पूर्णरूप से जान लेने एवं प्राप्त कर लेने वाला मनुष्य कभी दुःखी और अभाव ग्रस्त नहीं रह सकता वह चाहे तो सारे संसार को एक उँगली के इशारे पर नचा सकता है।
आज की दुनिया तो तर्कवाद पर विश्वास करती है। श्रद्धा और विश्वास के लिये अब लोगों के अन्तःकरण में स्थान कहाँ रहा? आज की अशाँति, बढ़ते अपराध, द्वेष, क्लेश और वैमनस्य परस्पर विश्वास के अभाव में ही बढ़ रहे हैं। लोग तो त्यागी तपस्वी आत्माओं द्वारा लिखित वेद-पुराणों पर विश्वास नहीं करते पाल गोल्डीन की बात को कैसे मान लेते ? कुछ लोगों ने कहा- आप पचास-पचास लोगों को ही नचा कर दिखा दीजिये हम मान लेंगे हाँ सचमुच आत्मा नाम की कोई शक्तिशाली सत्ता मनुष्य देह में है।
श्री पाल गोल्डीन बोले- देह में नहीं यह कहो प्राणिमात्र सब वही एक आत्मा के विभिन्न रूप है। आत्मा को जानना और प्राप्त करना ही मनुष्य शरीर में अवतरण का मूल उद्देश्य है। चमत्कार और प्रदर्शनों से अहंकार बढ़ता है, आत्म कल्याण में बाधा उत्पन्न होती है, आप सब लोग तो भारतीय है यह बात तो आप सबने पढ़ी है और जानते हैं कि आत्मा को प्राप्त सिद्ध योगी उस शक्ति से संसार का अपने धर्म, जाति, संस्कृति और मानवता का कल्याण करते हैं। चमत्कार के छलावे में नहीं आते फिर आप लोग ही प्रदर्शन की बात करते हैं। अच्छा चलो यही तो होगा मेरी थोड़ी शक्ति व्यर्थ चली जाएगी पर भारतीय लोगों ने ही आत्मा पर विश्वास न किया, उसका उद्बोधन, उसकी प्राप्ति न की तो मानवता की लोककल्याण की पारमार्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति कौन करेगा। इसलिए जाओ मंजूर किया- 15 अगस्त के दिन उस शक्ति का प्रदर्शन भी करके दिखलायेंगे।
“ 15 अगस्त को माटुँगा बम्बई के शरामुखानन्द हाल में फ्रांस के परामनोवैज्ञानिक आत्मशक्ति का प्रदर्शन करेंगे” यह समाचार अखबारों, पर्चा, पत्र-पत्रिकाओं द्वारा सारे शहर में आँधी तूफान की तरह फैल गया। उस दिन हजारों लोग यह प्रदर्शन देखने शरामुखानन्द हाल में उपस्थित हुए। ठीक बारह बजे जब हाल खचाखच भर गया और भीड़ को रोकना कठिन हो गया तो हाल के दरवाजे बन्द कर दिये गये । अब रंगमंच पर थे पाल गोल्डीन और विस्मय बम्बई के हजारों नागरिक।
“ आत्मशक्ति पर विश्वास नहीं करते, जिन्हें मनुष्य की भौतिक शक्ति पर ज्यादा विश्वास है वे लोग कृपा कर इधर स्टेज में आ जायें” पाल गोल्डीन ने सामने आते ही कहा। एक एक करके सैकड़ों लोग जिन्हें अपने मनोबल पर बड़ा विश्वास था वहाँ पहुँच गये। पाल गोल्डीन ने एक बार उन सब की ओर देखा- हाल में ऐसी निस्तब्धता छा गई जैसी नील आर्मस्ट्राँग ने चन्द्रमा पर उतर के भी न पाई होगी। गोल्डीन ने कहा- आप लोग देख रहे हैं यह सब लोग अपने को बड़ा शक्तिशाली मानते हैं। अभी मैं चुटकी बजाऊंगा और आप लोग देखेंगे कि इनमें से एक भी स्टेज पर खड़ा नहीं रहता। इतना कहकर उन्होंने माइक पर चुटकी बजाई। चुटकी बजाना था कि जैसे बिल्ली को देखकर चूहे भागते हैं, स्टेज पर चढ़े सभी व्यक्ति उतर कर भागे जैसे उनको भीतर से किसी ने बलात् डरा दिया हो। बात ही बात में सचमुच स्टेज खाली हो गया।
हम नहीं जानते शरीर में साँस कौन लेता है। हम नहीं जानते विचार कहाँ से उत्पन्न होते हैं। आंखों का मिचकना (पलकों का खुलना बंद होना), नाडी की गति, हिचकी, जम्हाई, जैसी क्रियायें कहाँ से प्रेरित होती है, इन छोटी छोटी क्रियाओं पर नियंत्रण भी नहीं कर सकते फिर स्थूल शरीर को ही सब कुछ मानना उचित नहीं। पाल गोल्डीन आज उस मौलिकतावादी मान्यता को ही पराजित करने को खड़े हुए थे। उन्होंने एक बार उपस्थित कई हजार लोगों की ओर देखा और बोले- यहाँ तक आने में आप सब लोग बहुत थक गये है अब थोड़ा आराम कर लीजिये यह कहते कहते उन्होंने चुटकी बजाई और जैसे बाजीगर के इशारे पर बन्दर कला दिखाता है वैसे ही हाल में उपस्थित विशाल जनसमूह बात की बात में इस तरह अपनी-अपनी कुर्सियों पर ढेर हो गया मानो उनमें से हर व्यक्ति 14-14 घंटे के परिश्रम से इस तरह थक कर चकनाचूर हो गया हो कि अपने आप की संभालने की शक्ति भी समाप्त हो गई हो। श्री पाल गोल्डीन थोड़ी देर में दुबारा चुटकी न बजाते तो बहुत संभव था लोगों के दिलों की धड़कन बंद हो जाती । चुटकी बजाते ही फिर सब लोग स्वस्थ होकर अपने अपने ठिकानों पर संभलकर बैठ गये।
यह सब मैं कोई हिप्नोटिज्म या बाजीगरी नहीं कर रहा। पाल गोल्डीन बोले- ‘ आत्मा की शक्ति इतनी प्रचंड और प्रखर है कि उसके सहारे कोई चाहे तो हजारों लाखों मील दूर बैठे व्यक्ति से ऐसे संपर्क स्थापित कर सकता है, लोगों को प्रेरित और प्रभावित कर सकता है, एक बार में सैकड़ों को रोग-मुक्त कर सकता है, रोगी बनाना तो क्या मार भी सकता है। आप सब लोग भारतीय है, अष्ट सिद्धियों के बारे में सबने सुना होगा वह तो जादू नहीं वरन् आत्मशक्ति के सामान्य गुण मात्र होते हैं। इसके बाद उन्होंने 25-30 लोगों को जिनमें महिलायें भी थी ऊपर स्टेज पर बुलाया और सब से बारी-बारी से पूछा- ‘ आपको कोई चर्म रोग, खाज , खुजली , दाद वगैरह तो नहीं है?’ प्रायः सभी ने इनकार किया। जो नहीं बोले उन्हें नीचे उतार दिया। फिर हाथ की चुटकी बजी और जैसे सिनेमा का पर्दा उठते ही कोई प्रहसन दृश्य सामने आता है- सब के सब कोई हाथ, कोई पाँव, कोई नाक तो कोई गर्दन इस तरह खुजलाने लगे जैसे उन्हें खुजली की पुश्तैनी बीमारी रही हो। यदि पाल गोल्डीन दुबारा चुटकी न बजाते तो बहुत संभव था लोग खुजला खुजलाकर अपना खून निकाल लेते।
एक सीन का पटाक्षेप और दूसरा प्रारम्भ। पाल गोल्डीन ने उन्हीं लोगों में से एक ने पूछा-” आप गाना जानते हैं ?” “नहीं” उत्तर मिला। दूसरे से पूछा- “ आप नृत्य कर सकते हैं ?” उत्तर मिला “नहीं।” इस तरह एक एक करके किसी से हारमोनियम बजाने की बात पूछी तो किसी से सरोद वायलिन, बंशी, तबला और झाँझ की। सबने इनकार किया तो सबको सम्मोहित से करते हुए पाल गोल्डीन ने हँसी की-”तब तो भाई आज का संगीत कार्यक्रम फेल हो जायेगा- खैर कोई बात नहीं- जब तक आत्मा की शक्ति है घबराने की जरूरत नहीं।” इसके बाद उन्होंने आर्कस्ट्रे का सारा सामान स्टेज पर मंगाया और एक कोने में रख दिया। फिर एक चुटकी बजी और देखते ही देखते सारा सीन बदल गया। जो लोग अभी नाचने गाने से इनकार कर रहे थे, गिटार और वायोलिन जिन्होंने हाथों से नहीं छुए थे वही लोग आगे बढ़े और एक एक वाद्य उठा कर ऐसे बजाने लगे मानो वे किसी संगीत विद्यालय के शिक्षक हो।
अहमिन्द्रो न पराजिग्ये। -ऋग्वेद
मुझ अविनाशी आत्मा को संसार में कौन पराजित कर सकता है।
एक क्षण में ही गाने वाले गाने लगे, नृत्य करने वाले नृत्य करने लगे। जितनी बार चुटकी बजी उतनी ही बार धुन बदली। फ्राँसीसी, अमेरिकी, भारतीय सभी तरह की धुनें और सभी तरह के नृत्य और गीत- दर्शक भी मुग्ध और अनोखे कलाकार भी। सारा काम यंत्रवत् जैसे बिजली बटन दबाते ही जल पड़ती, उठाते ही बुझ जाती वैसे ही सारा दर्शक समाज पाल गोल्डीन की उंगलियों के इशारे पर नाना प्रकार के करतब कर रहा था और गोल्डीन बताते जा रहे थे-” यह सब मेरी नहीं उस आत्म-सत्ता की शक्ति से हो रहा है जो जन जन के अन्तः करण में व्याप्त नाना शरीरों, रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। जिसे जानना ही मनुष्य का जीवन-लक्ष्य है। जिनको जाने बिना मनुष्य बंधनों से छुटकारा नहीं पाता। सच्चे सुख, शान्ति और संतोष की दात्री यह आत्मा ही है। उसे जानने का प्रयत्न न करने वाला अपना जीवन व्यर्थ ही गँवाता है।
पाल ने इस तरह के और भी अनेक करतब दिखाये, जो लोग जो काम नहीं करना चाहते थे उन्हें अन्तः प्रेरित करके उन्होंने वह काम खुशी-खुशी करने को विवश करके दिखा दिया। कि मनुष्य की भौतिक सामर्थ्य नगण्य और तुच्छ है सर्व समर्थ तो आत्मा ही है। उन्होंने अन्त में लोगों से कहा- अब सब लोग एक दूसरे को नये साल की मुबारकबाद देंगे और विदा हो जायेंगे, तो सबने चिल्लाकर कहा- अगस्त के महीने में नया साल कैसा ? तब पाल हँसे और बोले- बावलो! आत्मा कोई मरने जीने का पदार्थ नहीं, उसके लिये समय का कोई प्रतिबन्ध नहीं उसके लिए हर क्षण सब कुछ नया है और आप लोग भी देखेंगे कि आज से सचमुच नया साल आरम्भ हो गया है। इसके बाद फिर चुटकी बजी फिर वही जादू- अभी तक जो लोग मना कर रहे थे। वही एक दूसरे को शुभकामनाएं देने लगे सारे हाल में हलचल मच गई पाल ने चुटकी बजाई तब खामोशी आ गई।
पाल जो अपने आपको पूर्व जन्म का भारतीय बताते हैं उन्होंने प्रश्न किया- आप लोगों ने क्या यह सब स्वेच्छा से किया- तो सब ने कहा- उन्हें तो यह पता रहता था कि हम अमुक काम कर रहे हैं और किस की प्रेरणा से कर रहे हैं हम जान नहीं पाये।
प्रदर्शन समाप्त हो गया। लोग अपने घरों को लौट आये। आत्मा के प्रति लोगों में जिज्ञासायें उमड़ी और फिर शान्त हो गई क्योंकि यह आखिर प्रदर्शन ही तो था। जब तक अन्तः करण से इतनी प्रखर जिज्ञासा न उत्पन्न हो कि मनुष्य शरीर नश्वर है अमर तो वह आत्म-चेतना ही है, उसे ही प्राप्त करना चाहिये- तब तक ऐसे प्रदर्शन भी काम नहीं देते। आत्म-साक्षात्कार के लिये उत्कृष्ट अभिलाषा और वैराग्य तो अपने आप जगाना पड़ता है तब कही मनुष्य उसकी प्राप्ति के साधना पथ पर निष्ठापूर्वक अग्रसर हो पाता है। यह समाचार 16 अगस्त में बम्बई के अधिकांश समाचार पत्रों में छपा था ? 24 जुलाई 1966 के धर्मयुग अंक में सभी फोटो देकर इस घटना को विस्तार से छापा गया था।

