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Magazine - Year 1971 - Version 2

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देव-मन्दिर के देवता और परमात्मा के दर्शन

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“ स्वर्गादि उच्च लोक, अन्तरिक्ष पृथ्वी, जल आदि की उत्पत्ति हो चुकी तब परमात्मा ने लोकपालों की रचना का विचार किया। इस रचना का विचार आते ही सर्वप्रथम प्रकाश अणु पैदा किये। यह अणु अण्डाकार थे और उसमें पुरुष के लक्षण थे, फिर उस अंड में परमात्मा ने छेद किया जो मुख बना, मुख से वाणी, वाणी से अग्नि उत्पन्न हुई। इसके बाद दो छेद किये जो नासिका कहलाये उससे प्राण की उत्पत्ति हुई, प्राणों से वायु और नेत्रों के छिद्र बने। उनमें सुनने की शक्ति उत्पन्न हुई, श्रोतेन्द्रिय के द्वारा दिशाएँ प्रकटी, फिर त्वचा उत्पन्न हुई त्वचा से रोम, रोम से औषधियाँ, फिर हृदय, हृदय से मन और मन से चन्द्रमा प्रकट हुआ। फिर नाभि बनी, नाभि से अपान देवता और अपान देवता से मृत्यु देवता प्रकट हुये। फिर उपस्थ, उपस्थ से रेत, रेत से जल की उत्पत्ति हुई।”

“इस प्रकार उत्पन्न हुये देवतागण अभी तक अपने सूक्ष्म रूप में थे। परमात्मा ने उनमें भूख और प्यास की अनुभूति भी उत्पन्न कर दी थी किन्तु वे संसार-समुद्र में निराश्रय पड़े थे, उन्हें रहने के लिये योग्य स्थान का अभाव खटक रहा था। उसके लिये उन्होंने परमात्मा से प्रार्थना की तब परमात्मा ने उन्हें गाय का शरीर दिखाया। उस शरीर को देवताओं ने पसंद नहीं किया। तब फिर उन्हें घोड़े का शरीर दिखाया वह भी उन्हें अच्छा नहीं लगा। बहुत से शरीर विधाता ने देवताओं को दिखाये पर वे इन्हें पसंद नहीं आये तब उसने मनुष्य शरीर दिखाया। यह देवताओं को पसंद आ गया अग्नि उसमें वाणी बन कर घुस गया, वायु प्राण बन कर नासिका में, सूर्य चक्षु बनकर नेत्र गोलकों में प्रविष्ट हुआ दिशायें क्षेत्र बन कर कानों में घुसी औषधि रोम बन कर त्वचा में पहुंची, चन्द्रमा मन बन कर हृदय में उपस्थित हुआ मृत्यु अपान बन कर नाभि में जल रेत बन कर उपस्थ में स्थित हो गया।”

“ शरीर की यहाँ तक की रचना में पूरी तरह प्रकृति का ही आधिपत्य था देवताओं की प्रतिष्ठा होने के कारण शरीर देवमंदिर तो बन गया पर उसमें निवास करने वाली मूर्तियां एक नहीं अनेक थी सब की अपनी-अपनी आकाँक्षाएँ, अपनी-अपनी वासनायें थी। भगवान् ने विचार किया। यदि इन सभी देवताओं ने केवल अपनी वासनायें तृप्त करनी चाही तब तो यह शरीर एक भी दिन नहीं चल सकेगा। फिर इनके लिये मेरा भी तो कुछ अस्तित्व होना चाहिये अन्यथा वे मुझे कैसे जानेंगे। इस विचार के आते ही उसने मनुष्य शरीर की मूर्धा- शरीर का वह भाग जहाँ से दाहिने बाँये भाग बराबर-बराबर विरक्त होते हैं चोटी वाले स्थान से लेकर यह भाग नीचे चूतड़ों तक के सीवन वाले भाग तक चला जाता है -से प्रवेश किया। अब मनुष्य ने देखा कि मुझ में पंच भौतिक प्रकृति के अतिरिक्त बुद्धि रूप में कौन आ गया- तब उसने परमात्मा को पहचाना और दर्शन पाकर स्वर्गीय सुख में विभोर हो गया।”

ऐतरेय उपनिषद् की इस आख्यायिका में जहाँ सृष्टि के विकास का सूक्ष्म विज्ञान भरा पड़ा है वहाँ ईश्वर दर्शन का महत्वपूर्ण तत्वदर्शन भी। सामान्य दृष्टि से देखने पर इन्द्रियाँ ही मनुष्य शरीर में सक्रिय दिखाई देती है इस लिये अज्ञान ग्रस्त लोग दिन−रात उन्हीं की तृप्ति में जुटे रहकर मनुष्य देह रूपी मन्दिर को भग्न और गन्दा किया करते हैं। देवताओं को स्थूल पूजा मिलनी चाहिये पर यदि देवताओं की संतुष्टि ही एक मात्र शरीर का उद्देश्य रह जायेगा तो उस परमात्मा की प्राप्ति के आनन्द का क्या होगा जो इन सभी शक्तियों को उत्पन्न करने वाला आनन्द का आनन्द और सृष्टि का मूल है। सारी परिपूर्णतायें तो एकमात्र ब्रह्म में ही है उसे प्राप्त किये बिना आत्मिक सुख कहाँ ?

परमात्मा को कैसे प्राप्त किया जाये ? यह संसार के सामने एक जटिल और गंभीर प्रश्न है? ऐतरेय उपनिषद् इस प्रश्न की हल्की दिशा में एक महत्वपूर्ण शोध है इसमें तथ्यों को बड़े सरल ढंग से समझाया गया है, यह बताया गया है कि इंद्रियों की वासनायें मनुष्य की आवश्यकताएँ नहीं वरन् देव शक्तियों की आकांक्षाएं होती है मनुष्य तो बुद्धि ज्ञान और चेतना को कहते हैं। बुद्धि परमात्मा की प्रतिनिधि है। उसे इंद्रियों का स्वामी बन कर देव शक्तियों का लाभ उठाना चाहिए और अपनी बौद्धिक एवं आत्मिक क्षमताओं का विकास करके विराट् ब्रह्म को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। यही परम पुरुषार्थ है और यही है योग। जो अपनी इंद्रियों का स्वामी बन गया उसे अपने लघु रूप को विराट् ब्रह्म में परिवर्तित करते देर न लगेगी।

अभी तक यह ज्ञान केवल शास्त्रों तक सीमित था। शास्त्रीय व्याख्याओं से विश्वास उठ जाने के कारण इस तरह के विवेचनों के प्रति अश्रद्धालु होना और इस तरह जीवन-विकास के मूल-ज्ञान से वंचित रह जाना स्वाभाविक ही था। इसे अपना दुर्भाग्य कहना चाहिये कि हमारे देशवासी स्वयं इस महत्तम विज्ञान को भूल गये जिसका प्रतिपादन आज भौतिक विज्ञान भी करता है।

शरीर विज्ञान मानता है कि मनुष्य का मस्तिष्क इंद्रियों की सामर्थ्य से बड़ा और उनका स्वामी है अतएव इंद्रियों को नहीं महत्व बौद्धिक शक्तियों को देना चाहिये। इस दृष्टि से मस्तिष्क की बारह नसों और सात शून्य स्थानों (सात लोक) की शोध एक विशिष्ट महत्व रखती है। यह नसें मस्तिष्क के नीचे वाले धरातल से निकलती है तथा शरीर के सभी तन्मात्रा अवयवों तक चली जाती है।

1. आलफैक्ट्री नस का सम्बन्ध नासिका नली से है जिससे मस्तिष्क सूँघने की अनुभूति करता है। 2. आष्टिक नस नेत्र गोलकों तक चली जाती है और वही मस्तिष्क को सामने वाली वस्तुओं का ज्ञान कराती है। 3. आकुलो मोटर का सम्बन्ध भी आँख से है इससे पुतलियों को गति मिलती है। 4. ट्राक्लियर नेत्र की माँस पेशियों को जोड़ने वाली नस है। 5. ट्राय जोव्हिनल मुख के निचले जबड़े एवं जीभ की माँस पेशियों से सम्बन्ध जोड़ती है और स्वाद की अनुभूति में सहायक है। 6. अब्डूऐन्ट आँख को भीतर की ओर खींचे रहती है। 7. फेशियल मुख की माँस पेशियों को। 8. आडिटरी- कानों में। 9. ग्लासोफेरिब्जयल-स्वर ध्वनि यंत्र (लेरिंग्स) जीभ, पेट और जिगर को मस्तिष्क के उस चमत्कारी अवचेतन अंश से जोड़ते हैं। 10. स्वाइनल अऐसरी गले को जाती है। 11 बेगस स्वर ध्वनि यंत्रों का फेफड़ों से सम्बन्ध जोड़ती है और 12 वीं हाइपोग्लोसल जीभ की मांसपेशियों को इसके अतिरिक्त सुषुम्ना शोषक जो कि लगभग सम्पूर्ण मेरुदण्ड है। मस्तिष्क का सम्बन्ध सीधे प्रजनन केंद्रों से जोड़ती है।

आधुनिक शरीर वैज्ञानिकों का ज्ञान अधिकांश शरीर के स्थूल अवयवों तक सीमित है। चेतना की आन्तरिक अनुभूति का ज्ञान वे नहीं कर सके। इसीलिये जीवात्मा के दार्शनिक पक्ष को इनमें से कोई भी प्रमाणित करने में आज तक सफल नहीं हुआ है। यही नहीं इन नसों में कई ऐसी है जिनके यथार्थ उद्देश्य की ही इन वैज्ञानिकों को जानकारी नहीं है उदाहरणार्थ अकुलोमीटर का सम्बन्ध मस्तिष्क से त्रिकुटी मध्य के उस भाग से है जहाँ ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं पर शरीर रचना शास्त्री उसे केवल दोनों पुतलियों पर से सम्बन्धित मानते हैं।

नाशवान शरीर की नहीं चिन्ता तो सदैव स्थिर रहने वाले यश की करनी चाहिये।- भोज

स्पाइनल नाभिस्थित सूर्य चक्र (सोलर फलैक्स) से सम्बन्धित है और योग विद्या में उसका अपना विशिष्ट महत्व है पर उसे भी शरीर रचना शास्त्री नहीं जानते यहां तक कि नाभि जैसे महत्वपूर्ण संस्थान का जिससे कि गर्भावस्था में सारे शरीर को पोषण मिलता है। तो भी यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि उन्होंने इन जानकारियों के आधार पर इतना तो सिद्ध कर ही दिया कि मस्तिष्क ही सम्पूर्ण इंद्रियों का अधिष्ठान है। यदि मस्तिष्क नहीं रहता तो इन सभी इंद्रियों की चेतना अपना कारोबार समेट कर उसे नष्ट कर देने में ही जुट जाती है और अपनी समस्त सूक्ष्म तन्मात्राओं को मस्तिष्क में ही केन्द्रित कर देती है यही चेतना इंद्रियों की सूक्ष्म तन्मात्रायें लेकर मृत्यु काल में शरीर से विदा होकर फिर दूसरी योनियों की तलाश में चली जाती है और यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक मस्तिष्कीय द्रव्य प्रकृति के अज्ञान आवरण और इंद्रियों की लिप्साओं को स्वच्छ नहीं कर लेता। यजुर्वेद में ऋषि ने लिखा है-

यस्य प्राणाय मन्त्रस्य इद्ययुर्देंवा देवस्य महिमान भोजसा। यः पार्थिवानि विममे स एतशो रजाँ सि देवः सविता महित्वना ॥ यजुर्वेद 11।6

अर्थात्- दूसरे सभी देवता (इन्द्रियाँ) जिस देवता (जीवात्मा) के अधीन गति करती है जब जीवात्मा शरीर त्याग देता है तो उसी के आधीन चली जाती है। जिस देवता (जीवात्मा)की यह ओजस-शक्तियां उन्हीं के अनुरूप बन जाती है यह श्रेष्ठ योनियों को प्राप्त होकर मुक्ति का स्वामी बनता है अन्यथा निम्नगामी योनियों में चला जाता है। इस प्रकार जीवात्मा के बड़प्पन के लिये प्राप्त हुई इंद्रियां ही उसे दुर्गति में ले जाने वाली अथवा मुक्ति में सहायक होती है।

इन्द्रियाँ स्ववश नहीं होती यह कहना गलत है ऐसा कहने की अपेक्षा यह कहना चाहिये हमने अपने मानसिक संस्थान को प्रखर नहीं बनाया। मनुष्य के मस्तिष्क की शक्ति अपार है हम उसका जागरण कर पाये तो सचमुच ही ब्रह्म की सारी शक्यों की अनुभूति शरीर में ही कर सकते हैं। साधारण अभ्यास से ही मस्तिष्क की शक्तियों का विकास होते देखा गया है योग प्रक्रिया तो उससे कही लाखों गुना उच्चस्तरीय विज्ञान है। अमरीकी प्रेसीडेन्ट रुजवेल्ट का सेक्रेटरी जेम्स ए॰ फेचरली ने अपनी याददाश्त का इतना विकास किया था कि वह 20000 व्यक्तियों से परिचित था और सब के बारे में सैकड़ों बाते जानता था। जर्मन मैथमेटीशियन जकेरियस से एक बार एक प्रदर्शन में पूछा गया- 2-2 का 100 गुणा करने से कितना गुणनफल आयेगा तो उसका उत्तर उसने प्रश्नकर्ता का वाक्य पूरा होते ही दे दिया मानो उसके मस्तिष्क में वह सब कुछ पहले से लिखा था। वैज्ञानिक मानते हैं कि हम सारे जीवन में मस्तिष्क के कुल 17 प्रतिशत भाग से काम लेते हैं शेष 83 प्रतिशत के बारे में वैज्ञानिक कुछ नहीं जानते।

रीडर डाइजेस्ट में “ आपके मस्तिष्क की सीमा क्या है” शीर्षक से अर्डिस हिटमैन ने एक लेख छापा था उसमें उन्होंने लिखा है कि सारे संसार में जितनी भी विद्युत और विद्युत उपकरणों की सामर्थ्य है, उसे पूरी तरह इकट्ठा करके तराजू के एक पलड़े पर रख दिया जाये और दूसरी तरफ मस्तिष्क का 3 पिन्ट (एक पिन्ट डेढ़ पाव के बराबर होता है) रखकर तौला जाये तो ग्रे मैटर की शक्ति कही अधिक होगी।

यह केवल सैद्धान्तिक कथा मात्र नहीं है इस पर प्रयोग हुये है और प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है कि मस्तिष्क के इस भूरे द्रव्य (ग्रे मैटर) में वह सारे गुण विद्यमान है जो परमात्मा में होने की कल्पना की जाती है। ईश्वर के बारे में मान्यता है कि वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वदृष्टा अजर अमर सनातन आदि है पूर्ण विकसित मस्तिष्क में वह सारे लक्षण हो सकते हैं। इन चमत्कारों पर मैकगिल यूनिवर्सिटी मान्ट्रियल में डॉ0 विल्डर पेनफील्ड के निर्देशन में खोज चल रही है। उनकी खोजे आज नहीं तो कल पूर्ण रूप से भारतीय दर्शन को प्रमाणित करेगी।

यह प्रयोग मस्तिष्क के चमत्कारी केंद्रों की विद्युत शक्ति बढ़ाकर किये गये है। एक रोगी को इलेक्ट्रोड के द्वारा मस्तिष्क के दृश्य भाग को स्पर्श कराया गया तो उसने बताया कि मैं सारे आकाश को देख रहा हूँ बड़े-बड़े तारागण घूम रहे हैं। कितने ही उल्कापात हो रहे हैं, आकाश की यह भयंकर हलचल देखते ही वह भयभीत हो उठा शायद उसकी स्थिति कृष्ण के मुँह में देखे गये भगवान के विराट रूप देखने वाले अर्जुन की सी हो गई हो। इसके बाद उसके श्रवण केन्द्र की शक्ति बढ़ाई गई तो उसने अजीब ध्वनियाँ सुनी और यह सिद्ध कर दिया हम जो ध्वनियाँ अपने आस-पास सुना करते हैं वही नहीं सृष्टि के अन्तराल में ग्रह नक्षत्रों के परिभ्रमण आदि की आकाश गंगाओं के विस्फोट आदि की भी भयंकर ध्वनियाँ सुनाई दे रही है। इसके बाद एक ओर आश्चर्यजनक स्थान में इलेक्ट्रिड स्पर्श कराया गया तो रोगी एकाएक हंस पड़ा और बोला - अरे, यह तो मेरी माँ का कमरा है, वह पियानो रखा है, मेरी माँ इधर ही आ रही है, वह कोई कपड़ा निकाल कर पहन रही है। कपड़े का यह रंग है वह अब नौकर को बुलाकर कार निकालने को कह रही है। पीछे फोन करके उसके घरवालों से पूछा गया तो सारी घटना ठीक वैसी ही थी जैसी रोगी ने बताई थी। इन प्रयोगों में वर्षों पूर्व के दृश्य और शब्द मस्तिष्क में ज्यों के त्यों सुने गये है।

यह खोजे इस बात की प्रमाण है कि बुद्धि और मस्तिष्क सचमुच ही ईश्वरीय चेतना के प्रतिनिधि है। हम उस शक्ति को - तुच्छ इन्द्रिय सुखों में खर्च न करके केवल मस्तिष्क को ही प्रखर बनाने में जुट जाये तो अपने आप में ब्रह्म की अनुभूति कर लेना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऋषियों का यह अलौकिक शोध आज भी उतना ही आनन्द वही उपलब्धियाँ दे सकती है पर यह तभी संभव है जब लोग इंद्रियों के गुलाम नहीं स्वामी बनकर उस शक्ति का क्षय रोके जो मस्तिष्क को वैसे ही प्रखर बनाकर विराट् की अनुभूति कराती है जैसे विल्डर पेनफील्ड इलेक्ट्रोड से अतिरिक्त विद्युत शक्ति देकर क्षणिक अनुभूति कराते हैं।

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