अनासक्ति ही आत्मशाँति का हेतु!
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बहुत प्राचीन काल में महावृष देश पर जनश्रुति नामक राजा राज्य करते थे। वे बड़े ही न्यायी, सत्यवादी, वीर , दानी तथा प्रजा वत्सल थे। उन्हें अपनी प्रजा के लिए हर एक नर-नारी के प्रति निज की संतानवत् ही स्नेह था।
उनका यह नित्य का नियम था कि सौ दुधारू पशु मात्रा में अन्न, वस्त्र तथा स्वर्ण मुद्राओं का दान करके ही भोजन ग्रहण करते थे। दानशीलता में उस समय उनकी कर का अन्य कोई नृपति नहीं था।
सब कुछ था, फिर भी आत्मा में शाँति नहीं थी। बड़े से बड़ा दान देकर भी उन्हें आत्म संतोष न मिल पाता। वे यही सोचते रहते कि “मैं असंख्य नर नारियों को नित्य अतुल दान दिया करता हूँ- मेरे समान कोई अन्य दयालु, उदार तथा दानशील शासक नहीं । “ और यही भावना उस समय चिंता का कारण बन जाती, जब उन्हें यह भावना होने लगती कि “कही कोई अन्य व्यक्ति मुझसे अधिक दानशील अथवा कृपालु तो नहीं।”
उनका यह अहं आंशिक ही सही- ईर्ष्या का भाव कभी उन्हें चैन न लेने देता और वे सदा मानसिक शाँति से वंचित ही रहते।
एक दिन वे अपनी प्रजा की वास्तविक स्थिति का परिचय पाने हेतु राज्य में भ्रमण कर रहे थे। वेश बदला हुआ था तभी उधर से दो व्यक्ति बात करते हुए निकले।
एक कह रहा था, “ राजा जनश्रुति के राज्य में हम कितने सुखी है। किसी प्रकार की चिन्ता अथवा अभाव हमें नहीं। योग्य शासक के रूप में तीनों लोकों में जनश्रुति की ख्याति फैल रही है। उनकी दानशीलता की कोई सीमा नहीं। “
तभी बीच में बात काटता हुआ दूसरा व्यक्ति बोला, “ हाँ भई- तुम ठीक कहते हो। पर सहस्रों व्यक्तियों को सुख-समृद्धि देने वाला यह नर रत्न - स्वयं आत्मिक शान्ति से वंचित है जो संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उससे तो वह रेकवा गाड़ी वाला कही उत्तम है। जिसने इस लोक की तथा लोकोत्तर शान्ति भी प्राप्त कर ली है। उसका पुण्य जनश्रुति की अपेक्षा कही अधिक है।
जनश्रुति ने यह सब सुना और उसी क्षण से उसका अहं हिम की शिला की भाँति बूँद बूँद कर गलने लगा। विवेक झकझोरने लगा। हृदय में अपने आप के प्रति एक हीन भावना का समावेश हो गया और आत्मा तड़प उठी उस नाचीज से गाड़ी वाले के दर्शनों के लिए- जो उनसे कही अधिक पुण्यवान कहा जा रहा था।
इस अहं भाव तथा आत्म प्रशंसा की छोटी दुर्बलता के होते हुए भी- नृपति में सच्चे ज्ञान के प्रति असीम तृषा थी।
दूसरे दिन ही भृत्यों को आज्ञा दी गई कि “ कही से भी, किसी भी प्रकार उस रेकवा गाड़ीवान् को ढूंढ़ निकाला जाए। “
पर अभी केवल रस्सी जली थी- बल नहीं गया था। रेकवा को ढूंढ़ लिया गया। सूचना राजा को दे दी गई। जनश्रुति छः सौ दुधारू गाये, सैकड़ों अश्वों सहित रथ, असंख्य स्वर्ण मुद्राएं तथा प्रचुर मात्रा में बहुमूल्य सामग्री लेकर रेकवा के निवास स्थान पर पहुँचे। किन्हीं साधु सन्त अथवा धार्मिक प्रवृत्ति के महापुरुषों से मिलने जाते समय उनकी दानशीलता कुछ अधिक ही विकसित हो जाया करती थी।
पर यह क्या ? जनश्रुति ने रेकवा को प्रणाम किया- उत्तर में रेकवा ने शुभ आशीर्वाद से भरे मंगल वचन कहे। तब नृपति के कहने पर कि” यह तुच्छ भेंट आपके लिए लाया हूँ - स्वीकार करके मुझे कृतार्थ करे “ रेकवा ने मंद हास्य के साथ कहा- तुम आध्यात्मिक ज्ञान पिपासा की शाँति हेतु यहां आये हो तब इन सब वस्तुओं की क्या आवश्यकता थी ? मैं क्या करूंगा इन्हें ले कर ? आप देखते हैं मेरी कुटी बहुत छोटी है। यह सब कुछ तो राजमहलों में ही शोभा देता है। आपका आना भर पर्याप्त होता। जब इन सब वस्तुओं की सारहीनता का बोध हो जाय तब चले आना- जो कुछ भी मेरे पास होगा- वह तुम्हारे जैसे जिज्ञासुओं के लिए ही है। “
जनश्रुति हतप्रभ होकर राजमहल लौट आये। उस दिन नींद भी नहीं आई। बेचैनी से पार्श्व लेते हुए ही रात्रि के तीन पहर बीत गये। चतुर्थ प्रहर में कही नींद लगी। रेकवा ने वे सब वस्तुएं स्वीकार नहीं की- इस बात का जनश्रुति के हृदय पर बड़ा गहरा असर हुआ था। आज उन्हें लगा कि आज तक मैंने जो भी दान, पुण्य किया वह सब निरर्थक, निरुद्देश्य ही था। पर इससे उनके हृदय में रेकवा के प्रति जो श्रद्धा तथा निष्ठा के भाव थे वे असीम हो उठे थे।
प्रातः होने पर नित्य की भाँति चारण आये और उनके गुणगान करते हुए गायन प्रारम्भ किया पर आज उन्हें वह प्रशंसा सारहीन-सी जान पड़ी। जनश्रुति आज भौतिक जगत से कही दूर- अपने आत्म भवन में ही रम रहे थे। तत्काल गुणवान की प्रक्रिया रुकवा दी गई। जनश्रुति की उद्विग्नता आज चरम सीमा पर थी । अब उन्हें ऐसा लग रहा था कि जब तक रेकवा से न मिलूँ - मुझे चैन नहीं मिलेगा। आज उन्हें वे सब गाथाएं भी याद आ रही थी जो रेकवा का पता लगाने गये हुये भृत्यों ने आकर सुनाई थी- कि किस प्रकार से सैकड़ों व्यक्ति अपनी चिंताएँ, उलझने तथा समस्याएं लेकर जाते है- और उस निरीह गाड़ीवान् से मानसिक परितोष लेकर लौटते हैं।
जनश्रुति बिना कुछ खाये-पिये ही चल दिये और रेकवा के समक्ष पहुंचे। आज न दल-बल साथ में था न कुछ भेंट-चढ़ावा। आज थी मुख मुद्रा में असीम गंभीरता, नयनों में चातक जैसी दर्शन-लालसा, हृदय में अपार वेदना, मन में अमित श्रद्धा तथा आत्मा में अनन्त ज्ञान की प्यास।
रेकवा उन्हें देखते ही प्रसन्नता से खिल गया। सादर बिठाया और कहा “राजन! आज आपने आध्यात्मिक शान्ति का राजमार्ग पा लिया है। “
राजा अवाक् थे। बड़ी मुश्किल में कह सके “ अभी कहाँ पाया है भगवन्! वह आपके अनुग्रह के बिना कहा प्राप्त होगा! अभी तक का जीवन निरर्थक ही चला गया अब आपकी कृपा हो जाये तो इस तप्त मानस पर शीतलता के कुछ छींटे पड़ जाये।
रेकवा ने कहा “ निरर्थक तो सृष्टि में एक कणिका भी नहीं है नरश्रेष्ठ! अभी तक आपने जो दान, पुण्य, प्रजा की सेवा अथवा कार्य किये, वे यश तथा प्रशंसा की भावना से किये। और यश-प्रशंसा तथा आदर आपको उन उपकरणों के माध्यम से मिला भी। “
जनश्रुति की जिज्ञासा अब कुछ और आश्चर्य मिश्रित होती जा रही थी। रेकवा जो एक साधारण गाड़ी हाँकने वाला था- इतना बड़ा दार्शनिक लग रहा था कि जनश्रुति का हृदय झुका जा रहा था।
तब फिर जनश्रुति ने प्रश्न किया “ पर आत्मा को शाँति नहीं मिली है अब तक। मैं राज्य, भोग, सुख, सुविधाएँ सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ देव! बस मुझे संतोष चाहिए- तृप्ति चाहिए- शाँति चाहिए। “
रेकवा अब भी अपने स्वाभाविक मंद हास्य के बीच डूबता इतराता प्रसन्न हो रहा था। उसने स्नेह से कहा “ अधीर न हो नृपवर! राज्य अथवा सुख के साधन कुछ भी त्यागने की आवश्यकता नहीं है आपको। बस इन सबके प्रति मन में जो आसक्ति का भाव है- उसे ही त्यागने से काम चल जाएगा। राज्य करिये- पर अपने आप को सेवक समझ कर। सुख साधनों का उपयोग करिए यह सोच कर कि यह सब आपके उस शरीर की सुरक्षा के लिए है- जिस पर सम्पूर्ण देश की सुरक्षा का भार है। दान भी खूब करिये, पर यही सोच कर कि वे सब वस्तुयें परमात्मा ने आपको केवल इसलिए दी है कि आप उन्हें दीन, पीड़ित तथा असहाय व्यक्तियों तक पहुंचा दे जो उनके सच्चे अधिकारी है। अपने आप को कर्त्ता न मान कर केवल माध्यम मान ले। आत्मा की शाँति और कही नहीं- आत्मा में ही छिपी होती है राजन्! उसे जाग्रत करने भर की देर होती है बस! जो इस तथ्य को देख लेता है वही वास्तव में दृष्टा है। आत्मा समस्त शक्तियों का भण्डार है। और यह भण्डार असीम है- अनंत है। “
जनश्रुति इस ज्ञानामृत का पान उसी प्रकार कर रहे थे , जैसे प्रथम पावस के जल को ग्रीष्म से तपी धरती बूँद-बूँद पी जाती है।
अब राजा अपने निवास स्थान की ओर लौट रहे थे। आज उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे कोई बोझ सा रखा था- वह अचानक ही आज हट गया है। तत्वज्ञानी रेकवा का एक एक शब्द स्मृति पटल पर जैसे शिला लेख की भाँति कर खुद कर गहरा हो गया था। राजा विचार कर रहे थे कि अभी तक कहाँ मैं अन्धकार मैं भटक रहा था। ये सन्त रेकवा एक साधन हीन सा दिखने वाला व्यक्ति अपने अन्दर कितना बड़ा व्यक्तित्व समेटे है। चारों ओर से ज्ञान एकत्रित होकर इसकी आत्मा में उसी प्रकार भर उठा है जैसे झील अपने चारों की ऊंचाइयों का जल अपने आप में खींचती रहती है और असंख्य प्राणियों के तृषा निवारण का उपकरण बन जाती है।
उस दिन से जनश्रुति के जीवन में जो परिवर्तन आये उन्हें लोगों ने खुली आंखों देखा तथा अनुभव किया। अब दिन रात वे भी असीम तृप्ति, अभेद्य शाँति तथा अखंड आनन्द का पान किया करते थे। आत्मा की सात्विकता का स्त्रोत जैसे फूट कर झर-झर करता बह रहा था।

