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Magazine - Year 1976 - Version 2

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प्रतीक उपासना की आवश्यकता और उपयोगिता

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आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाली योग साधना के पथ पर अग्रसर होने की दिशा में प्रथम कक्षा साकार उपासना की है। उसमें आकृति सहित परमात्मा की कल्पना करनी पड़ती है। उसे उच्चस्तरीय श्रेष्ठताओं से सम्पन्न माना जाता है, समीप उपस्थित अनुभव किया जाता है, सघन श्रद्धा का आरोपण करते हैं, गहरी प्रेम भावना उमगाते हैं और उनके साथ घनिष्ठता बनाते हैं। इसी कृत्य के अंतर्गत आने वाले विविध उपचार भक्ति साधना कहे जाते हैं। ‘लय’ प्रक्रिया का यह प्रथम सोपान है। अचिन्त्य चिन्तन में असमर्थ—स्थूल भूमिका की मनःस्थिति के लिए यही कृत्य सरल पड़ता है और चेतना का स्तर आगे बढ़ाने में सहायता करता है। प्रतीक उपासना का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुआ समझा जाना चाहिए।

परब्रह्म एक सर्वव्यापी चेतना शक्ति है। उसके साथ जितनी अधिक घनिष्ठता जुड़ती चली जाती है उसी अनुपात से जीवात्मा की उत्कृष्टता एवं क्षमता बढ़ती जाती है। चेतना को चेतना के साथ घनिष्ठता के बंधनों में बाँधने के लिए एक ही आधार है—सद्भाव भरी स्थिर आतुरता। इसी स्थिति को दूसरे शब्दों में प्रेम या भक्ति कहा गया है। लौकिक जीवन में भी इस प्रकार की आतुरता जिस पदार्थ, व्यक्ति या स्थिति के प्रति होती है उसके लिए समूचा व्यक्तित्व प्रयत्नरत हो जाता है और देर−सबेर में इष्ट प्रायः पूरा होकर ही रहता है। चेतना को चेतना से मिलाने के लिए भी यही भावभरी किन्तु स्थिर आतुरता अभीष्ट है। भक्ति भावना उत्पन्न करने के लिए ईश्वर का स्वरूप बनाने—उस पर श्रद्धा, आत्मीयता, समीपता एवं एकता आरोपित करने के प्रयास किये जाते हैं और वे अभीष्ट प्रयोजन पूरा भी करते हैं।

सार्वजनिक मन्दिरों में अथवा व्यक्तिगत पूजा कक्षों में—भगवान के विविध प्रतीकों की स्थापना करके उनका महामानव गुरुजनों जैसा स्वागत, सत्कार किया जाता है। पञ्चोपचार, षोडशोपचार के विधान उसी के लिए बनाये गये हैं। जितनी देर प्रतिमा सामने रहती है, उतने समय ईश्वर के सान्निध्य का अनुभव होता है—उसका बड़प्पन स्वीकारा जाता है और श्रद्धाभिव्यक्ति से उन्हें सम्मानित करने वाले शिष्टाचारों का प्रदर्शन किया जाता है। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पुष्प, चंदन, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य आरती, नमस्कार आदि के विविध कृत्य समीपता और श्रद्धा की अनुभूति को विकसित करने में सहायता करते हैं। निष्ठा की परिपक्वता के लिए कल्पित देव प्रतिमाओं को यथार्थ मानने की मनः स्थिति उत्पन्न की जाती है।

इससे आगे की सूक्ष्म प्रतीक पूजा यह है जिसमें आँखें बन्द करके अथवा अधखुली रखकर इष्टदेव की प्रतिमा का ध्यान किया जाता है और श्रद्धा, समीपता एवं एकता की वैसी ही भावना की जाती है, जैसी कि मूर्तिपूजा में स्थूल प्रतिमा की। अंतर इतना ही रहता है कि मूर्तिपूजा में प्रतीक उपकरणों की प्रत्यक्ष आवश्यकता पड़ती है और जबकि ध्यान में वह सारे कार्य मात्र कल्पना के सहारे ही पूरे हो जाते हैं। ध्यान में इष्टदेव को हँसता, मुसकाता और श्रद्धा समर्पण के अनुरूप प्रत्युत्तर देता हुआ सोचा जा सकता है। यह स्थिति अधिक उत्साहवर्धक होती है और एकाग्रता का लाभ भी अधिक देती है। इसलिए इस मानस पूजा को भावनाशील, कल्पनाशील साधकों के लिए प्रयुक्त होने वाली उपासना का अगला ऊँचा चरण माना गया है।

प्रतीक साधना की मूर्ति पूजा एवं इष्टदेव के साकार ध्यान में दो कक्षाएँ हैं। मूर्तिपूजा को प्राइमरी शिक्षा और इष्ट ध्यान को हाईस्कूल स्तर की पढ़ाई कह सकते हैं। इसके आगे की कालेज कक्षा है। उसे निराकार साधना कह सकते हैं। उसमें भगवान को मनुष्य रूप में कल्पित नहीं किया जाता और न व्यक्ति के लिए किये जाने वाले स्वागत, सत्कारों की आवश्यकता पड़ती है। यों चिर अभ्यास को बनाये रहने के लिए नित्य कर्म में उसे सम्मिलित रखे रहना भी आवश्यक है। इससे संग्रहीत श्रद्धा परिपुष्ट होती रहती है। उच्चस्तरीय स्थिति पर पहुँचे हुए साधक भी नित्य कर्म के प्रतीक पूजा को छोड़ते नहीं वरन् आस्था को परिपक्व करने के लिए उसे भी पूर्ववत् अपनाये रहते हैं।

निराकार उपासना में भी ध्यान का अवलंबन तो करना ही पड़ता है—उसके बिना तो सम्पत्ति की पूर्णता में पहुँचने पर भी गति नहीं; पर यह ध्यान अधिक परिष्कृत होता है। भगवान व्यक्ति नहीं शक्ति बन जाता है और उसे स्थान विशेष पर प्रतिष्ठित नहीं वरन् व्यापकता के सहित अनुभूति में उतारा जाता है। यों मूर्ति पूजक भी प्रतिमा को प्रतीक ही मानते हैं और भगवान को सर्वव्यापी ही मानते हैं ध्यान के लिए ही वे उनकी अवतारी प्रतिमाएँ गढ़ते हैं निराकार ध्यान में उससे आगे की ध्यान धारणा अपनानी पड़ती है।

विराट् ब्रह्म की प्रतिमा निराकार वर्ग की प्रथम कक्षा है और उच्चस्तरीय सद्भावनाओं की सम्वेदना दूसरी। प्रथम वर्ग में अनुभव करना होता है कि यह समस्त दृश्य संसार भगवान का विराट् शरीर है। गीता में अर्जुन को और माता यशोदा को भगवान कृष्ण ने अपना यही स्वरूप दिखाया था। कौशल्या को पालना सुलाते समय और काक भुशुंडी की शंका समाधान के लिए राम ने भी इसी प्रकार का दिव्य दर्शन कराया था। विश्व−ब्रह्माण्ड गोल है इसलिए शिवलिंग एवं शालिग्राम की पाषाण प्रतिमाएँ गोलमटोल−ग्लोब आकृति की बनाई जाती हैं।

चित्र अथवा मूर्ति के आधार पर की जाने वाली उपासना के समय मन में यह निष्ठा जमनी चाहिए कि जिस दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता जोड़नी है वह उपासना स्थल पर असामान्य स्थिति में विद्यमान है। इसके लिए प्रतीक प्रतिमा की स्थापना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। आद्य शक्ति गायत्री माता की अथवा अपने विश्वास के आधार पर कोई अन्य प्रतिमा—एक छोटे किन्तु सुसज्जित सिंहासन पर स्थापित रहनी चाहिए। जब भी पूजा करनी हो तब उसी के सामने बैठ कर करना चाहिए। जिस स्थान पर जो कार्य बहुत समय तक किया जाता रहता है वहाँ अनायास ही ऐसी विशेषता उत्पन्न हो जाती है जिससे प्रेरित होकर उन कार्यों की पुनरावृत्ति के लिए मन मचलने लगता है। चाहे जहाँ—चाहे जब बैठकर—भजन करने पर मन लगा लेना कठिन है, पर नियत स्थान पर, नियम समय पर, पूजा स्थल पर बैठते ही मन स्वभावतः उन अभ्यस्त क्रियाओं को स्वेच्छापूर्वक दुहराने लग जायगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए नियत स्थान पर पूजा कक्ष का स्थापित करना और नियत समय पर नियत विधि से उपासना कृत्य को क्रियान्वित करना ही उपयुक्त रहता है।

प्रतीक प्रतिमा में भगवान का विशेष अवतरण होता है या नहीं। इस प्रश्न का उत्तर पदार्थ विज्ञान की दृष्टि से नहीं भाव विज्ञान की दृष्टि से दिया जा सकता है। ‘मीटर’ लगाकर प्रतिमा में भगवान की उपस्थिति नापी जायगी तो उत्तर निराशाजनक ही मिलेगा। पर भाव विज्ञान के ज्ञाता समझते हैं कि मान्यताएँ रस्सी को साँप और झाड़ी को भूत बना देती हैं, पत्थर में चमत्कारी देवता और मन्त्र में जादू उत्पन्न कर देती हैं। प्रतिमा में ईश्वर की, विशेष शक्ति की, विशेष मात्रा में—उपस्थिति मानी जाय तो वैसी ही अनुभूति निश्चित रूप से होती है। उपासना का ध्यान अनिवार्य अंग है। जप के साथ उसका जुड़ा रहना निताँत आवश्यक है। अन्यथा मन यहाँ−वहाँ भागता रहेगा। ध्यान, शब्द, रूप, रस, गंध स्पर्श की पाँच तन्मात्राओं में से किसी न किसी का आश्रय लिये बिना सम्भव नहीं हो सकता। यह तन्मात्राएँ क्रमशः आकाश, अग्नि, जल, पृथ्वी और वायु इन जड़ यन्त्र तत्वों की है। जड़ का आश्रय लिये बिना अपनी अंत−चेतना के लिए निराकार को पकड़ना तो दूर उसे समझने में भी समर्थ नहीं हो सकतीं। मूर्तिपूजा का विरोध करने वाले भी प्रकारान्तर से किसी न किसी पदार्थ में देव भावना करते हैं। यज्ञाग्नि, संगे असवद, क्रूस, राष्ट्रध्वज, सूर्य, तस्वीरें, यह सभी एक प्रकार की मूर्तियाँ हैं। इनमें दिव्य भावना रखना एक प्रकार से मूर्ति पूजा ही हो जाता है। गाँधीजी की समाधि हो अथवा लेनिन का सुरक्षित शव, इनमें से किसी के प्रति भी श्रद्धावनत हो जाना प्रकारान्तर से मूर्ति पूजा ही है।

पूज्य गुरुजनों की तरह उनके प्रथम दर्शन पर सम्मान, शिष्टाचार प्रदर्शित किया जाता है। उपासना के समय प्रतीक में देव शक्ति का आह्वान करने के उपराँत उनका सम्मानोपचार किया जाना चाहिए। इससे भाव निष्ठा में और भी अधिक परिपक्वता उत्पन्न होने का अवसर मिलता है। इस प्रयोजन के लिए पञ्चोपचार पूजन की परम्परा प्रचलित है। पञ्चोपचार में (1) जल (2) चावल−नैवेद्य (3) पुष्प (4) धूप दीप (5) चन्दन−रोली को गिना जाता है। इन्हें एक तश्तरी में रखना चाहिए और क्रमशः एक−एक को पास में रखी दूसरी तश्तरी में श्रद्धा, सम्मान की अभिव्यक्ति के लिए छोड़ते जाना चाहिए। यही दो ईश्वरीय शक्तियाँ लीला कर रही हैं। प्रकृति का प्रतीक जल और पुरुष का प्रतीक अग्नि को माना गया है। यह भी एक प्रकार से चित्र स्थापना ही है।

उपचार के इन उपकरणों के पीछे जीवन के दिव्य निर्माण की प्रेरणा है। इस विश्व ब्रह्माण्ड को ईश्वर का विराट् रूप माना जाना चाहिए और लोक−मंगल की क्रिया−प्रक्रिया द्वारा उसकी यथार्थ पूजा में संलग्न रहा जाना चाहिए। यह इस दिशा में पहला चरण, अपने आपको अधिक पवित्र, संयत एवं आदर्श बनाकर ही बढ़ाया जा सकता है। आत्म−निर्माण और विश्व−निर्माण की उभय−पक्षीय जीवन साधना संपन्न करने के लिए किन आदर्शों को सामने रखा जाय इसी का दिशा निर्देश इस पंचोपचार पूजा में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों के साथ जुड़ा हुआ है।

जल—शीतलता, शाँति, नम्रता, विनय, सज्जनता का प्रतीक है—सत्प्रयोजनों के लिए हमें समय लगाना एवं श्रम बिन्दुओं का समर्पण करना है। उसी से श्रेष्ठ सत्कर्म बन पड़ते हैं। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान के लिए श्रम, मनोयोग, प्रभाव एवं धन इन चारों उपलब्धियों का यथासम्भव अधिकाधिक भाग ईश्वरीय प्रयोजन के लिए समर्पित करेंगे।

अक्षत—उपार्जित अन्न, धन, वैभव का प्रतीक है। अपनी कमाई को आप ही खाते रहने वाले अनुदार स्वार्थी को शास्त्रकारों ने ‘चोर’ कहा है। उपार्जन को अपने तथा परिवार के उपयोग भर में सीमित नहीं किया जाना चाहिए वरन् उसमें देश, धर्म, समाज, संस्कृति का भी भाग स्वीकार करना चाहिए। ईश्वर अर्थात् साकार रूप में विराट्−एवं निराकार रूप में सद्भाव, सदुद्देश्य। इनके लिए अपनी कमाई का एक बड़ा अंश नियमित रूप से निकाला जाय यह अक्षत समर्पण की प्रेरणा है।

पुष्प—अर्थात् खिलने−खिलाने की, हँसने हँसाने की, हलकी फुलकी जिन्दगी और सत्प्रवृत्ति। हम फूल जैसे कोमल रहें। भीतर और बाहर से सर्वांग सुन्दर बनें। इस विश्वोद्यान को शोभायमान बनाने वाला जीवन जियें। अपनी गरदन नुचवाने और मर्मभेदी सुई का छेदा जाना स्वीकार करके प्रभु के गले का हार बनने की आकाँक्षा रखें।

पूजा में पुष्प चढ़ाने का प्रचलन है। भगवान के चरणों पर, गले में, शिर पर तथा समस्त शरीर पर पुष्प अलंकार चढ़ाये जाते हैं। भगवान को पुष्प प्रिय है। इस संकेत में यही तथ्य है कि पुष्प जैसी हँसती हँसाती कोमलता भगवान को प्रिय है। अपना जीवन पुष्प ऐसा ही खिलना चाहिए; ताकि ईश्वर का परमप्रिय बन सके।

दीपक—स्नेह से, चिकनाई से भरा−पूरा—स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देने वाला—ऊपर को उठती हुई ज्योति दृष्टि । इन्हीं विशेषताओं के कारण दीपक को पूजा में स्थान मिला है। जिनके अन्तःकरण में असीम स्नेह, सद्भाव भरा है—जो परमार्थ के लिए बढ़−चढ़ कर त्याग, बलिदान कर सकते हैं, कष्ट सह सकते हैं। जिसकी दृष्टि , महत्वाकांक्षा, ऊर्ध्वगामी है। वे उत्कृष्ट आदर्शवादी है वे जीवन्त दीप ज्योति कहे जा सकते हैं। अपने को इसी मार्ग का पथिक बनाकर हम ईश्वर के निकटवर्ती और अनुकम्पा के अधिकारी बन सकते हैं। धूपबत्ती में अग्नि स्थापन भी प्रकाराँतर से दीपक की ही आवश्यकता पूर्ति करती है और यही उसकी भी प्रेरणा है।

चन्दन—वह वृक्ष जिसका कण−कण सुगंधित है और जो समीपवर्ती झाड़−झंखाड़ों को भी सुगन्धित करता है। अपनी शीतलता से साँप, बिच्छू जैसे विष दंश वालों तक को शान्ति प्रदान करता है। कहते हैं चन्दन वृक्ष पर लिपटे हुए सर्प, बिच्छू शाँति पाते हैं। उसकी छाया में बैठने वाले सुगंध भरी शीतलता प्राप्त करते हैं। उसकी लकड़ी काटने, बेचने वाले पत्थर पर घिसने वाले कष्टदायक लोग भी बदले में प्रतिशोध नहीं उपकार ही पाते हैं। नष्ट होते−होते भी चन्दन अपनी लकड़ी से भजन करने की माला, हवन−सामग्री का चन्दन चूरा दे जाता है। हमारी शक्ति, सामर्थ्य का उपयोग भी इसी प्रकार होना चाहिए।

चन्दन के अभाव में उसका प्रतीक रोली, पुष्प के अभाव में उसका प्रतीक चन्दन केशर में रंग चावल−दीपक की प्रतिनिधि अगरबत्ती काम में लाई जाती है। अक्षत और नैवेद्य (मेवा, मिष्ठान्न) भी एक ही प्रयोजन के लिए हैं। यह वस्तुएं अलग−अलग भी ली जा सकती हैं। इस प्रकार पञ्चोपचार की जगह अक्षत, नैवेद्य, धूप, दीप, चन्दन, रोली, जल, पुष्प, आठ भी हो सकते हैं। यहाँ संख्या की न्यूनाधिकता का अथवा मूल पदार्थ एवं प्रतीक भेद का विशेष महत्व नहीं है। आधार तो इन प्रतीकों के माध्यम से भावनाओं के परिष्कार की आवश्यकता अनुभव करना है।

इन पाँचों वस्तुओं में से जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन तश्तरी में डाले जायं, नैवेद्य चौकी पर रखा जाय और उसे प्रमाद के रूप में उठा लिया जा सकता है। धूप, दीप, जहाँ के तहाँ रहने देने चाहिएं।

अभिवन्दन, नमस्कार, स्तवन, गुण−गान, यह सब भी देव पूजा वर्ग में ही आते हैं। इनमें भाषा, सम्प्रदाय क्षेत्र, प्रचलन आदि के आधार पर क्रियाकृत्य के विधि विधान में थोड़ा अंतर भी हो सकता है, पर मूल प्रयोजन सबका एक ही है। देव शक्ति को अपने चारों ओर सघनतापूर्वक घिरी−छाई अनुभव करना, उसके निकट बैठना, आत्म−समर्पण करना उसके प्रकाश−निर्देश को अन्तःकरण में धारण करके तदनुकूल जीवन ढालना यही है, देव स्थापन एवं आह्वान पूजन का प्रधान उद्देश्य। हमें देव आह्वान पूजन के आरम्भ और अंत में दो बार भगवान का ध्यान करते हुए नतमस्तक होकर, हाथ जोड़कर नमस्कार करना चाहिए। इस श्रद्धाभिव्यक्ति में परमेश्वर की इच्छा पूर्ति में संलग्न होने एवं अनुशासन मानने का भाव है।

इस संसार का सृजेता पोषक और परिवर्तनकारी एक ही परब्रह्म है। उसकी अगणित शक्तियाँ हैं। इन्हें एक ही शक्ति सागर की लहरें, एक सूर्य की अनेक किरणें कहा जा सकता है। किरणों के सात रंग यों अलग से भी देखे, जाने और प्रयोग में लाये जा सकते हैं, इतने पर भी सूर्य सत्ता से भिन्न उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।

ब्रह्म चेतना से ओत−प्रोत प्रज्ञा शक्ति को गणेश, समृद्धि शक्ति को लक्ष्मी, विद्या को सरस्वती, बलिष्ठता को, दुर्गा, सृजन शक्ति को ब्रह्मा, पोषण को विष्णु, परिवर्तन को शिव कहते हैं। इसी प्रकार अन्यान्य देवी देवताओं के संबंध में समझा जाना चाहिए। चिकित्सा एवं वैज्ञानिक आवश्यकतानुसार सूर्य की अमुक किरणों का उपयोग करते हैं। अल्ट्रावायलेट, अल्फावायलेट, एक्सरेज आदि को विभिन्न यंत्रों से पकड़ा और प्रयुक्त किया जाता है। देवी−देवता, परब्रह्म में सविता देवता की−भिन्न गुण, धर्म की किरणें कहा जा सकता है, पर साथ ही यह भी मानना होगा कि वे डाली में जुड़े हुए पत्तों की तरह एक ही महा शक्ति की स्फुरणाएँ मात्र हैं उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।

मनुष्य की आस्था अपनी श्रद्धा, विश्वास के सहारे कोई समर्थ दिव्य सत्ता का सृजन कर सकती है और उसकी हलचलें उतनी ही सामर्थ्यवान हो सकती हैं जितनी की इसकी श्रद्धा की गहराई। अनेक भक्तों की उनके उपास्य ने जो असाधारण सहायताएँ की हैं और चमत्कार दिखाये हैं इनमें देवताओं का स्वतंत्र अस्तित्व बल एवं उपासनात्मक विधि−विधानों का अंतर नहीं साधक के व्यक्तित्व की पवित्रता एवं उपास्य के प्रति गहन श्रद्धा को ही आधारभूत कारण मानना चाहिए। प्रतीक उपासना से इसी प्रयोजन की पूर्ति होती है।

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