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Magazine - Year 1980 - Version 2

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सर्मथता ही नहीं सहृदता भी

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First 11 13 Last
सम्पन्नता और समर्थता की शक्ति से सभी परिचित हैं । बुद्धि और परिश्रम की सहायता से प्रगति पथ पर बढ़ना और सफलताएँ पाना सम्भव होता है, यह तथ्य भी अविज्ञात नहीं है । किन्तु उससे भी अधिक जिनकी गरिमा और उपयोगिता है उन दो महान विभूतियों से लोग प्रायः अपरिचित ही बने रहते हैं। वे दिव्य सम्पदाएँ हैं-सज्जनता और सहृदयता । इसके बिना श्रेय पथ पर अग्रसर हो सकना और जीवन के सुअवसर का आनन्द ले सकना सम्भव ही नहीं हो सकता ।

सज्जनता के साथ मनुष्य की प्रामाणिकता और सदाशयता जुड़ी रहती है । फलतः मनुष्य का वजन अपनी और दूसरों की आँखों में कहीं अधिक बढ़ जाता है । अप्रामाणिक और कुचक्र्री मनुष्य दुरभिसंन्धियाँ रचने रहते हैं । इसमें उन्हें छद्म के सहारे आरम्भ में कुछ लाभ भी मिलता है पर कुछ ही दिनों में वस्तुस्थिति प्रकट होकर रहती है और उन्हें छूत के रोगी की तरह सब से अलग-थलग होकर रहना पड़ता है। अविश्वासजन्य असहयोग कितना कष्ट कारक होता है और कितना भारी पड़ता है उसे यदि आरम्भ में ही जाना जा सके तो कोई दुर्जन बनने की मूर्खता न करे । आतंक तो कोई भी मचा सकता है किन्तु आत्मिक प्रगति और संसार की सेवा करने का श्रेय प्राप्त कर सकना सज्जनता अपनाये बिना सम्भव नहीं ।

सहृदयता इससे भी उच्चस्थिति है । कला और करुणा के सहारे उत्पन्न होने वाली भाव संवेदना ही अन्तःकरण को आनन्द विभोर बनाती है । उदारता और आत्मीयता का समन्वय ही देवत्व है ।देवता स्वयं धन्य बनते और अन्य असंख्यों को धन्य बनाते हैं । उनका यह वैभव जिस आधार पर बना और बढ़ा है- उसे सहृदयता ही कह सकते हैं । इस संसार में जो कुछ अभिनन्दनीय और अनुकरणीय है उस सब का उद्भव सहृदयता की पृष्ठ भूमि पर ही सम्भव हुआ है ।

हृदयहीन होना मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है । इस दुष्प्रवृत्ति के कारण अपराध और अनाचार पनपते हैं । आततायी जिस शस्त्र के सहारे विनाश लीला रचते, आतंक फैलाते, और चीत्कार उत्पन्न करते हैं वह और कुछ नहीं निष्ठुर दुष्टता ही है । इसी को हृदयहीनता कहते हैं । यों रक्त फेंकने वाली थैली सभी के सीने में विद्यमान है पर जिस अर्थ में हृदय-हीनता का उल्लेख होता है वह करुणा और मैत्री का अभाव ही है । इस दरिद्रता के कारण मनुष्य घृणित बनता और जन-जन का कोप भाजन बनता अभिशाप सहता है, जबकि आर्थिक तंगी वाले दरिद्र लोग सहानुभूति एवं सहायता भी अर्जित कर लेते हैं ।

रक्त फेंकने वाली थैली-हृदय का नाम करुणा की भाव संवेदना के साथ किस प्रकार जुड़ गया ? यह एक असमंजस जैसा प्रश्न है । शरीर में अनेको अवयव हैं वे सभी अपनी हलचलों से शरीर यात्रा के साधन भर जुटाने और जड़ तत्वों से विनिर्मित समझे जाते हैं । फिर हृदय को क्या भाव सम्वेदनाओं की अध्यात्म विभूतियों के साथ जोड़ा गया ?

इस प्रश्न का उत्तर एक सीमा तक विज्ञान देता है। उसने चेतना की उच्चस्तरीय विभूतियों में से मस्तिष्क को बुद्धि का और हृदय को भावना का केन्द्र माना है । जड़ शरीर के साथ चेतना का समीकरण करने वाले इन दो अवयवों को अपना विशेष स्थान है । इसलिए आत्मिक प्रगति के प्रयोजनों में समय-समय पर इनका विशेष उपयोग होता रहता है ।ध्यान धारणा की साधनाएँ प्रायः इन्हीं दो केन्द्रों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है ।

सूक्ष्म संस्थानों में मस्तिष्क एवं हृदय का महत्व सर्वोपरि है । सामान्य वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर तो मस्तिष्क में स्नायु तन्तुओं का जाल बिछा दिखायी पड़ता है रासायनिक तत्वों का सम्मिश्रण मात्र दीखता है । पर सूक्ष्म विश्लेषण-अध्ययन करने पर पता चलता है कि भली-बुरी विचारणाएँ इसी क्षेत्र में उपजती अवतरित होती है । मस्तिष्क के ज्ञान-तन्तुओं, रासायनिक तत्वों में वे कहीं प्रत्यक्ष दिखायी नहीं पड़तीं, पर अनुभव बताते हैं कि इनके माध्यम से ही विचारों को प्रकट होने का अवसर मिलता हैं । इन्द्रियों की सम्वेदनाओं को ग्रहण करने, उन्हें उपयुक्त निर्देश देने-संचालन करने में मस्तिष्क की ही प्रधान भूमिका होती है ।

हृदय आकुँचन प्रकुँचन करता हुआ रक्त से भरी थैली जान पड़ता है, जो शरीर के विभिन्न अंगों को रक्त भेजता-अशुद्ध रक्त को एकत्रित, परिशोधित करता मात्र प्रतीत होता है । जीव-विज्ञान इसी सीमा तक हृदय का महत्व स्वीकार करता रहा है कि यह संस्थान शरीर में उक्त संचार की भूमिका सम्पन्न करता है । यह तो इसका स्थूल पक्ष रहा । आध्यात्मिक प्रतिपादनों में इस संस्थान को सर्वाधिक महत्व दिया गया है । योगियों ने इस अंग को चेतना का केन्द्र-बिन्दु माना है । तीन शरीरों से बनी मानवी काया में सबसे महत्वपूर्ण शरीर कारण शरीर का स्थान बताया है । इसे जाग्रत विकसित करने पर अत्यधिक जोर दिया है । यह अकारण नहीं है। इस आग्रह के पीछे ठोस वैज्ञानिक आधार हैं । जिन्हें समझा और लाभ उठाया जा सके तो मनुष्य का व्यक्तित्व एवं उसकी सामर्थ्य कई गुनी अधिक प्रखर हो सकती है ।

धड़कते हृदय एवं उससे निकले वाली ध्वनि में भाव सम्वेदनाओं की सघनता हो तो उसका चमत्कारी प्रभाव-परिणाम दिखायी पड़ता है । दूसरी को प्रभावित करने, अनुकूल बनाने तथा श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ने के लिए प्रेरित करने में भाव-सम्वेदनाओं की ही प्रमुख भूमिका होती है । सर्व महात्माओं, महापुरुषों में यह विशेषता देखने को मिलती है कि वे अन्तःकरण की महानता द्वारा ही दूसरों को अनुवर्ती बनाते हैं । अन्यों को श्रेष्ठ जीवन जीने-परमार्थ प्रयोजनों में जुटने को बाध्य करते हैं । आध्यात्मिक क्षेत्र में हृदय की महत्ता, उसमें उठने वाली भाव सम्वेदनाओं की उपयोगिता को बहुत पहले से ही स्वीकार किया जाता रहा है ।

इस तथ्य को अब वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा भी मान्यता मिल रही है । सामान्यतया माताएँ नव जात शिशुओं को अपने बायें वक्षस्थल से चिपकाये रहती हैं । इसका कारण दाहिने हाथ का कामों में व्यस्त रहना कहा जा सकता है । पर कारण यह नहीं है ।एक सर्वेक्षण के अनुसार बायें हाथ से काम करने वाली महिलाएँ भी शिशुओं को बायीं गोद में ही लिए रहती हैं । पुरातत्व संग्रहालयों में संकलित मूर्तियों, प्राचीन तैल चित्रों में उन चित्रों, कलाकृतियों का अध्ययन किया गया जिसमें नवजात शिशु को माँ के साथ चित्रित किया गया है । निष्कर्षो में पाया गया कि 80 प्रतिशत महिलाएँ अपने शिशुओं को बायें वक्षस्थल से चिपकाये हुए हैं । इसे चित्रकारी की परम्परागत विशेषता कहकर नहीं टाला जा सकता । मूर्तियाँ चित्र अपने काल की स्थिति का वास्तविक चित्रण करती हैं । कर्नेल विश्वविद्यालय अमेरिका के मानव शास्त्री ने नये तथ्यों का रहस्योद्घाटन किया है । प्रख्यात अमेरिकी पत्रिका साइंटिफिक अमेरिकन में उपरोक्त विषय से सम्बन्धित एक लेख में डा0 ली साल्क ने लिख है कि, “माताओं को शिशुओं को बायीं ओर चिपकाये रहने में विशेष कारण है । हृदय बायीं ओर अवस्थित होता है । जाने-अनजाने माँ बच्चों को हृदय का अधिक सामीप्य देना चाहती है । मातृ हृदय की धड़कन के साथ भाव सम्वेदनाएँ भी तरंगित होती उभरती रहती है । उनके आदान प्रदान से वे स्वयं तो सन्तोष की अनुभूति करती ही हैं। बच्चों के ऊपर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है । हृदय की ध्वनि तरंगों को सुन कर, बच्चा एक अनिर्वचनीय आनन्द में डूबा रहता है । इस संदर्भ में प्रख्यात मानवशास्त्री डा0 डिस्पाण्ड मारिस द्वारा लिखी पुस्तक ‘द इन्टिमेट बिहेवियर” एण्ड द नेकेड एथ’ उल्लेखनीय है । इस पुस्तक में डा0 डित्माण्ड ने महत्वपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन किया है । उनका कहना है कि हृदय की ध्वनि ही एक मात्र एवं शाश्वतः ध्वनि है जिसे शिशु गर्भावस्था में सुनता है । माँ के गर्भ से बाह्य संसार में आने पर वह विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ सुन कर परेशान रहता है । पूर्व परिचित ध्वनि की आस लगाये रहता है । माँ जब उसे गोद में लेती है तो उसे सुखद अनुभूत होती है । देखा यह गया है कि रोते हुए बच्चों को वक्ष से चिपकाते ही चुप हो जाते हैं । माँ के धड़कते सम्वेदनशील हृदय की प्रतिक्रिया है, जिसकी सुखद ध्वनि को सुनते ही बच्चे रोना बन्द कर देते हैं ।

इस तथ्य को परीक्षण की कसौटी पर कसने के लिए अमेरिका कार्नेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा0 ली साल्क ने कुछ प्रयोग किये जिसके आर्श्चयजनक परिणाम निकले । यह परिणाम मातृ हृदय के साथ जुड़ी संवेदनशीलता की महत्ता का प्रतिपादन करते हैं ।डा0 ली साल्क ने मातृ हृदय की धड़कन की ध्वनि को टेप में रिकार्ड किया । रोते हुए नव जात शिशुओं को रिकार्डेड ध्वनियों को सुनाया। बच्चों ने तत्काल रोना बन्द कर दिया । उनके मुखमण्डल पर शान्ति एवं प्रसन्नता के भाव उभरने लगे । डा0 ली साल्क ने निर्ष्कष निकाला की माताओं के धड़कने हृदय के साथ उनी सुकोमल भावनाएँ जुड़ी रहती हैं । इस ध्वनि से पूर्व परिचित होने के कारण बच्चे सहज ही आकर्षित हो जाते । ध्वनि तरंगों में घुली भाव सम्वेदनाएँ बच्चे के हृदय को उद्वेलित करती सुखद प्रभाव डालती हैं ।

इस निर्ष्कष की और भी प्रामाणिक पुष्टि के लिए इन्होंने कुछ शिशुओं पर अन्य प्रकार की रिकार्ड की गई ध्वनि टेपों का प्रयोग किया । उन्हें तीन माह तक निरन्तर सुनाया। परिणामस्वरुप उनका विकास रुक गया । वे अन्यमनस्क तथा अस्वस्थ बने रहे। उनमें से कुछ तो टेप आरम्भ करते ही रोना आरम्भ कर देते थे । कुछ शारीरिक हलचलों द्वारा अपनी दुखद प्रतिक्रिया व्यक्त करते । स्थिति संकट पूर्ण हो जाने पर डा0 ली को अपना प्रयोग रोक देना पड़ा । इस प्रयोग द्वारा निर्ष्कष निकाला कि सामान्य ध्वनियों एवं मातृ हृदय के धड़कन से निकलने वाली ध्वनि तरंगों में विशेष अन्तर है । जहाँ माँ के हृदय की ध्वनि तरंगों को सुनकर बच्चा प्रसन्न चित्त हो जाता है वहीं अन्य ध्वनियों की दुखद प्रतिक्रिया व्यक्त करता है ।

यह तो प्रकृति प्रदत्त मातृ हृदय के साथ जुड़ी भाव सम्वेदनाओं का सामान्य पक्ष रहा, जिसका लाभ बच्चे सहज ही उठाते रहते हैं । असामान्य पक्ष की सामर्थ्य एवं सम्भावनाएँ अनन्त हैं । कारण शरीर में विद्यमान भाव सम्वेदनाओं को उभारा-उछाला जा सके तथा उन्हें मानव मात्र की भावनाओं के साथ जोड़ा जा सके तो मनुष्य जाति को एकता, स्नेह, सौहार्द्र के सूत्र में बाँध सकने का एक महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग जाय । प्रार्थना, उपासना, साधना में भावनाओं का महत्व प्रतिपादित करने, उन्हें विकसित करने पर जोर देने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक आधार है कि परमात्मा द्वारा दिये गये भाव सूत्रों में ही मनुष्य को बाँधा जा सकता है ।

इस दृष्टि से शरीर के अन्य अंगों की तुलना में हृदय का महत्व कहीं अधिक है । सामान्य बोल-चाल के प्रसंगों में सबसे प्रिय वस्तु व्यक्ति का सम्बन्ध हृदय से जोड़ने के पीछे यही कारण है । नारी की सहज संवेदनशीलता बच्चे ही नहीं अन्यों को भी प्रभावित करती है । भाव सम्वेदनाओं से भरपूर व्यक्ति असँख्यों को अपना बना लेते सहयोग करने के लिए विवश कर देते हैं । वस्तुतः यह भावनाओं का ही चमत्कार है । मनुष्य को एकता के सूत्र में बाँधने के अन्य प्रयत्नों की सफलता तब तक संदिग्ध बनी रहेगी? जब तक कि भाव संवेदनाओं को विकसित करने की उपेक्षा होती रहेगी ।

सम्पन्न, समर्थ और सफल बनने के लिए किये जाने वाले प्रयास सराहनीय हैं किन्तु स्मरण यह भी रखा जाय कि सज्जन और सहृदय बने बिना संसार की समस्त सम्पदाएँ और विभूतियाँ नीरस एवं अपूर्ण ही रह जाती हैं । उपार्जन जिस किसी का भी अभीष्ट हो, प्रगति किसी भी दिशा में की जाय पर यह भुलाया नहीं जाना चाहिए कि मनुष्य जीवन का सौभाग्य और आनन्द सज्जनता और सहृदयता के सहारे ही उपलब्ध होता है ।

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