• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • कर्म ही सर्वोपरि
    • गायत्री नगर में देव परिवार बसेगा जागृत आत्माएं उसमें प्रवेश पाने की तैयारी करें
    • जीवन अनुसंधान
    • मायापति विष्णु और उनकी योगमाया
    • Quotation
    • मरण न डरावना है न कष्टदायक
    • तर्क ही नहीं, श्रद्धा विश्वास भी
    • Quotation
    • आज मिल पाया नहीं, तो कल मिलेगा
    • अध्यात्म सिद्धान्त उपयोगी भी और प्रामाणिक भी
    • प्रत्यक्ष जगत पर अदृश्य जगत का प्रभाव
    • सर्मथता ही नहीं सहृदता भी
    • किसी से लुकमान से पूछा (kahani)
    • वशीकरण एक मन्त्र है.
    • जीवन साधना की सिद्धि के रहस्य
    • Quotation
    • कामोल्लास की सृजनात्मक शक्ति
    • ईरान और टर्की (kahani)
    • परहित सरिस धर्म नहिभाई ।
    • दिव्य ध्वनियों के श्रवण की सिद्धि
    • सज्जनता का परिचय शिष्टाचार से
    • सच्चरित्रता मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा
    • स्वप्नों में निहित आत्मसत्ता के प्रमाण
    • आहार के त्रिविधि स्तर, त्रिविधि प्रयोजन
    • Quotation
    • क्रोध अपने लिए घातक
    • विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज
    • महामानवों के अवतरण की नई पृष्ठभूमि
    • जन्म समय के आधार पर परिजनों के स्तर का पर्यवेक्षण
    • कर दो प्रयाण अब प्राणवान ।
    • कर दो प्रयाण अब प्राणवान (kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1980 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


स्वप्नों में निहित आत्मसत्ता के प्रमाण

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 22 24 Last
सो जाने के बाद व्यक्ति जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच जाता है । उसे अपने आसपास की परिस्थितियों वस्तुओं और सम्बन्धों की कुछ भी स्मृति नहीं रहती । एक तरह से उस व्यक्ति की आँशिक मृत्यु ही हो जाती है । हृदय की धड़कन, रक्त का संचार और श्वाँस प्रश्वाँस भले ही चलते रहें, परन्तु उसकी चेतना का सम्बन्ध उस समय तो स्थूल जगत से कट ही जाता है । उस समय मन अपनी ही दुनियाँ में घूमता है और चित्र विचित्र सपने देखता है । जागने पर तो यह लगता है कि बे सिर-पैर के सपने देखे गये हैं परन्तु जिस समय वे देखे जाते हैं उस समय तो वास्तविक ही लगते हैं ।

निद्रा और स्वप्न में परस्पर क्या सम्बन्ध है । शरीर का कौन-सा अंग स्वप्नों के लिए उत्तरदायी है, यह जानने के लिए शिकागो विश्वविद्यालय के दो छात्र नेपोलियन क्लीरमाँ और यूजोन एसेटिस्की शोध करने लगे ।दोनों की खोज पूरी तो नहीं हो सकी, पर उससे कई नये तथ्य प्रकाश में आये हैं उन्होंने पाया क कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है तो उसकी आँखों की पुतलियाँ ठीक उसी प्रकार घूमती है जैसे जागृत अवस्था में कोई दृश्य देखते समय घूमती हैं । अर्थात् आँखें उस समय बन्द रहते हुए भी देखती है ।

आधुनिक विज्ञान ने स्वप्नों के सन्म्बन्ध में कई नये तथ्यों का पता लगाया है और उनमें से अधिकाँश तथ्य भारतीय ऋषियों के निष्कर्षो से मेल खाते है उदाहरण के लिए निद्रा के समय व्यक्ति का शरीर शिथिल पड़ जाता है, उसकी इन्द्रियाँ काम करना लगभग बन्द कर देती हैं । फिर भी स्वप्नों की दुनियाँ में पहुँचकर व्यक्ति जागृत होने की अवस्था जैसे ही काम करता है । इस आधार पर प्रसिद्ध मनोविज्ञानी हैफन राबर्ट ने प्रतिपादित किया है कि ज्ञान और अनुभव का आधार इन्द्रियाँ नहीं है । बल्कि मनुष्य की सूक्ष्म सत्ता ही उनके माध्यम से ज्ञान और अनुभव प्राप्त करती है ।

अभी उस सूक्ष्म सत्ता की खोज में मन तक ही पहुँचा जा सकता है और बताया जाता है कि मन ही विभिन्न स्तरों पर देखी, सुनी, जानी और अनुभव की हुई बातों की स्मृति व कल्पना करते हुए सपने के रुप में देखता है । मानसिक गुत्थियाँ और जीवन की उलझनें, अनुभूतियाँ मस्तिष्क में लुक-छिपकर बैठी रहती हैं और जब बुद्धि का दबाव घट जाता है तो निद्रावस्था में स्वप्नों के रुप में बाहर निकल आती हैं । इसके अतिरिक्त यह भी माना जाने लगा है कि मन कई बार ऐसी तरंगों को भी पकड़ लेता है, जो किसी स्थान पर घटी घटना के कारण सूक्ष्म जगत् में उत्पन्न हुई हैं अथवा निकट भविष्य में होने वाली है । इस स्तर के स्वप्नों को मन की अतीन्द्रिय चेतना कहा जाता है ।

परन्तु भारतीय मनीषियों की दृष्टि में मन ही एक मात्र समर्थ या सूक्ष्म सत्ता नहीं है । उससे भी सूक्ष्म सत्ता मनुष्य की चेतना है जिसे जीवात्मा कहा जाता है और वही मन तथा इन्द्रियों का उपयोग कर ज्ञान व अनुभव प्राप्त करता है । ऐतरेयोपनिष्द् में इस सम्बन्ध में कहा है-

यदेत हृदयं मनश्चैतत्। संज्ञानपाज्ञान विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्घृति र्मनीषा जूति स्मृतिः संकल्प क्रतुरसुः कामो वश प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥

अर्थात्-यह अन्तःकरण ही मन है । इस मन की ज्ञानशक्ति, विवेचन शक्ति, तत्काल समझने, अनुभव करने, देखने की शक्ति तथा धैर्य, बुद्धि, स्मरण, संकल्प, मनोरथ , प्राण, कामना, अभिलाषा आदि शक्तियाँ उस परमात्मा से ही प्राप्त होती हैं जो जीवात्मा के रुप में इस शरीर में अवस्थित रहता है ।

मन की शक्तिस्रोत परमात्म सत्ता का प्रतिनिधि जीवात्मा है । इसलिए कई बार ऐसे स्वप्न आते हैं जिन्हें परोक्ष दर्शन, पूर्वाभास जैसी अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ कहा जा सकता है । कुछ समय पूर्व समाचार पत्रों में रोम की एक घटना छपी थी, जिसमें स्त्री ने अपने पति की हत्या और उसके हत्यारे में बारे में बता दिया था । उस युवती का नाम था एमेलिया रुसों । उसका पति फ्राँसिस्कों रुसों कुछ दिनों के लिए व्यापार सम्बन्धी कार्यो से बाहर गया था । एमेलिया घर में अकेली थी ।

एक दिन जब वह गहरी नींद में सो रही थी तो उसने देखा कि एक बहुत बड़े खाली कमरे में उसके पति का शव पड़ा हुआ है और उस शव पर एक युवती बैठी हुई है । इस डरावने स्वप्न को देख कर एमेलिया की चीख निकल गई और उसे लगने लगा कि उसके पति को कुछ हो गया है । वह किसी से कुछ कह भी नहीं सकती थी, क्योंकि स्वप्न के आधार पर कही गई बात पर कौन ध्यान देगा । तीन दिन तक वह इसी पेशोपेश में पड़ी रहीं । अन्ततः उससे रहा न गया और वह पुलिस अधिकारियों के पास पहुँची । आरम्भ में पुलिस अधिंकारियों ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु कुछ ही दिनों बाद रोम से 50 किलोमीटर दूर एक दुर्घटना ग्रस्त कार में फ्राँसिस्कों का शव मिला ।

अधिकारियों ने इसे एक दुर्घटना माना और शव को पोस्टमार्टन के लिए भेज दिया । पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ने अधिकारियों की धारणा को भ्रम सिद्ध किया और डाक्टरों ने बताया कि फ्राँसिस्कों की मृत्यु दुर्घटना के कारण नहीं विष देने के कारण हुई है । इसके बाद तो एमेलिया द्वारा देखे गये स्वप्न तथा उसके बारे में और अधिक पूछताछ करने के बाद उस स्त्री को गिरफ्तार किया जा सका, जिसने फ्राँसिस्कों की हत्या की थी । उस स्त्री को देखते ही एमेलिया ने पहचान लिया कि स्वप्न में उसे ही फ्राँसिस्कों के शव पर बैठे हुए देखा था ।

यदि स्वप्न मन की ही कल्पना और तरंग हैं तो इस तरह की घटनाओं के क्या कारण हैं ? प्रश्नोपनिषद् के तीसरे अध्याय में पाँचवाँ मन्त्र है जिसमें पिप्पलाद ऋषि कहते हैं-

अन्नेव देवः स्वप्ने महिमा नमनुभवति यद् दृष्टं दृष्टमनु प्श्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थ मने श्रृणोति ॥ देशदिगन्तैरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्व पश्यति सर्वः पश्यति ॥

अर्थात्- इस स्वप्न अवस्था में जीवात्मा ही मन और इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है । इसने पहले जहाँ कहीं भी जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया है, उसी को यह स्वप्न में देखता, सुनता और अनुभव करता है । परन्तु यह नियम नहीं है कि जागृत अवस्था में इसने जिस प्रकार, जिस ढंग से और जिस जगह जो घटना देखी, सुनी और अनुभव की है उसी प्रकार यह स्वप्न में भी अनुभव करता है । अपितु स्वप्न में यह देखे और न देखे हुए को भी देखता है, सुने और न सुने हुए को भी सुनता है, अनुभव किये और न अनुभव किये हुए को भी अनुभव करता है।

आमतौर पर मनुष्य का मन जीवात्मा के साथ उस स्तर का सम्बन्ध नहीं बना पाता, बिजली का बल्व तार द्वारा बिजली घर से सम्बद्ध होता है, तभी प्रकार दे पाता है। अन्यथा उसका उपयोग किसी खिलौने से अधिक नहीं हो सकता, वही बात मन के साथ लागू होती है । मन का सम्बन्ध सूत्र भी परमात्म सत्ता के प्रतिनिधि जीवात्मा से सीधा जुड़ा रहता है तो वह परम साम्थ्यवान हो जाता है, अन्यथा वह क्रीड़ा कौतुकों में ही रमा रहता है ।

कई बार यह सम्बन्ध सूत्र अनायास ही जुड़ जाते हैं रेडियों का बटन घुमाते जिस तरह कभी-कभी ऐसे स्टेशन भी पकड़ में आ जाते हैं जिन्हें लगाने में कई बार प्रयत्न करने पर भी सफलता नहीं मिलती, उसी प्रकार मन का सम्बन्ध भी जीवात्मा-परमात्म सत्ता के साथ यदाकदा अनायास ही जुड़ जाता है और उस अवस्था में परोक्ष-दर्शन, पूर्वाभास जैसी दिव्य अनुभूतियाँ होने लगती हैं । आयरलैण्ड में एक सराय मालिक राजर्स की पत्नी ने अपनी सराय में ठहरे एक युवक की हत्या का पूर्वाभास इसी प्रकार स्वप्न में पा लिया था ।

हुआ यह कि उक्त युवक जिसका नाम हिकी था, वह कहीं यात्रा पर गया था, परन्तु निर्धारित समय पर हिकी अपने घर नहीं पहुँचा तो घर के लोगों ने इसकी सूचना पुलिस में दी । पुलिस ने छानबीन के दौरान पता लगाया कि वे राजर्स की सराय में ठहरे थे । राजर्स ने पूछताछ के समय बताया कि वह हिकी को रोकना चाहता था । क्योंकि जिस दिन हिकी अपने साथ एक मित्र को लेकर उस सराय में आकर ठहरा था उसी दिन रोजर्स की पत्नी ने एक विचित्र स्वप्न देखा । सुबह उठकर राजर्स की पत्नी ने बताया कि उसने अपने में हिकी के मित्र को एक झोंपड़ी में उसकी हत्या करते हुए देखा है। कहीं यह सपना सच न हो जाय इस भय से वह हिकी को रोकना चाहता था ।

रोजर्स की पत्नी ने पुलिस का बताया क वह उस झोंपड़ी को दिखा सकती है जिसमें हिकी की हत्या होती हुई देखी थी । उसने यह भी बताया कि वह हत्यारे युवक को पहचान भी सकती है । श्रीमती रोजर्स द्वारा स्वप्न के आधार पर बताये गये सूत्रों से हिकी का हत्यारा पकड़ लिया गया । वह वस्तुतः हिकी का दोस्त ही था और उसने यह भी बताया कि जिस दिन वे सराय से लौट रहे थे उसी दिन रोजर्स ने हिकी को रुकने तथा उसे चले जाने को कहा था । हमने समझा कि रोजर्स हिकी से कोई बात करना चाहता है, इसलिए उसी समय बात करने के लिए कहा । परन्तु रोजर्स का आग्रह था कि हिकी अधिक समय के लिए अकेला रुके तभी बात हो सकती है । इस पर हम लोग चले आये थे ।

आत्म-चेतना समय, देश और काल के बन्धनों से बँधी हुई नहीं है, क्योंकि ईश्वरीय सत्ता को तो असीम, कालातीत और सर्वव्याप्त कहा गया है । जीव सत्ता मूलतः है तो उसी का प्रतिनिधि, उसी का अंश है और उसी की प्रेरणा-उपस्थिति मात्र से मन, प्राण, इन्द्रिय अपने-अपने कार्यो में प्रवृत्त होते हैं। केनोपनिषद् ने शिष्य गुरु से प्रश्न करता है -

केनेषितं पतति प्रेषितंमनः केन प्राणः प्रथमः प्रैतियुक्तः । केनेषिताँ वाचमिमाँ वदंतिंचक्षुः श्रोत्र करदेबो युनक्ति ॥

अर्थात् अन्तःकरण, प्राण, वाणी आदि कर्मेन्द्रिय तथा चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों को अपना-अपना कार्य करने की शक्ति देने वाला तथा अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त करने वाला देव कौन है ?

इसके उत्तर में गुरु कहते हैं-

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो य़द्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः चक्षुषश्चक्षुरति मुच्च धीराः प्रत्योस्मा ल्लोकदमृताभवति ।

अर्थात् जो इन मन, प्राण और सम्पूर्ण इन्द्रियों का कारण है, जिसकी शक्ति को पाकर ये सब अपना अपना कार्य करने में समर्थ हैं और जो इन सबको जाने वाला है वह (आत्मा) ही इन सबका प्रेरक है, जिसे जानकर जन्म-मृत्यु के क्लेशों का नाश हो जाता है ।

दैनंदिन जीवन में घटने वाली सामान्य घटनाओं और व्यवहारों में तो हमारी मनःचेतना इतनी लिप्त रहती है कि इस जगत और जीवन के सभी व्यवहार सामान्य स्वाभाविक प्रतीत होते हैं तथा उनका कारण भी स्थूल जगत में-स्थूल अस्तित्व में ही प्रतीत होता है । परन्तु स्वप्नों में दिखाई पड़ने वाले दृश्य, जब सारी इन्द्रिदयाँ शिथिल हो जाती हैं, शरीर सो जाता है तथा मस्तिष्क का सोचना विचारना भी लगभग बन्द-सा ही हो जाता है, उस समय दिखाई पड़ने और अनुभव होने वाला एक नया संसार आत्म-चेतना के अस्तित्व को प्रमाणित करता है । ऊल-जलूल और बेसिर-पैर के स्वप्नों को जाने दें, जो हमारे चित्त की मलीनता के ही प्रतीक हैं तथा उन स्वप्नों का अध्ययन करें जो पूर्वाभास, परोक्ष दर्शन तथा दूरानुभूति कराते हैं तो प्रतीत होता है कि आत्म-चेतना अति समर्थ, शक्तिशाली और समग्र व्यक्तित्व का मूल आधार है । जिसे समझ लिया जाय, जान लिया जाय तो व्यक्ति मानव से महामानव, साधारण से सिद्ध पुरुष और नर से नारायण बन सकता है ।

First 22 24 Last


Other Version of this book



Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • कर्म ही सर्वोपरि
  • गायत्री नगर में देव परिवार बसेगा जागृत आत्माएं उसमें प्रवेश पाने की तैयारी करें
  • जीवन अनुसंधान
  • मायापति विष्णु और उनकी योगमाया
  • Quotation
  • मरण न डरावना है न कष्टदायक
  • तर्क ही नहीं, श्रद्धा विश्वास भी
  • Quotation
  • आज मिल पाया नहीं, तो कल मिलेगा
  • अध्यात्म सिद्धान्त उपयोगी भी और प्रामाणिक भी
  • प्रत्यक्ष जगत पर अदृश्य जगत का प्रभाव
  • सर्मथता ही नहीं सहृदता भी
  • किसी से लुकमान से पूछा (kahani)
  • वशीकरण एक मन्त्र है.
  • जीवन साधना की सिद्धि के रहस्य
  • Quotation
  • कामोल्लास की सृजनात्मक शक्ति
  • ईरान और टर्की (kahani)
  • परहित सरिस धर्म नहिभाई ।
  • दिव्य ध्वनियों के श्रवण की सिद्धि
  • सज्जनता का परिचय शिष्टाचार से
  • सच्चरित्रता मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा
  • स्वप्नों में निहित आत्मसत्ता के प्रमाण
  • आहार के त्रिविधि स्तर, त्रिविधि प्रयोजन
  • Quotation
  • क्रोध अपने लिए घातक
  • विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज
  • महामानवों के अवतरण की नई पृष्ठभूमि
  • जन्म समय के आधार पर परिजनों के स्तर का पर्यवेक्षण
  • कर दो प्रयाण अब प्राणवान ।
  • कर दो प्रयाण अब प्राणवान (kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj