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Magazine - Year 1980 - Version 2

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जीवन साधना की सिद्धि के रहस्य

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प्रकृति ने शरीर की संरचना इस प्रकार की है कि यदि उसे आहर विहार के प्रकृति प्रदत्त निर्देशों पर चलने दिया जाय और असंयम अव्यवस्था में न उलझा जाय तो आजीवन स्वस्थ बना रहा जा सकता है और रुगणता एवं दुर्बलता का कष्ट न सहना पड़ेगा । इसी प्रकार मन यदि उच्छृंखल तृष्णा के लिए उद्विग्न न रहा हो और परिस्थितियों से निपटने की रीति-नीति समझाता हो तो उस बुद्धिमत्ता विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता के आधार पर संतोष तथा संतुलन बनाये रहा जा सकता है । उद्विग्न तो प्रायः वही लोग रहते हैं । जिन्हें सोचना नहीं आता ।

सारणीय है कि सब कुछ हमारी इच्छा के अनुकूल ही होता रहे- जो चाहते हैं वही मिलता रहे, यह कदापि सम्भव नहीं है प्रतिकूलनाएँ बनी ही रहेंगी । आवश्यकता इस बात की है कि उनसे किस प्रकार निपटा जाय इसकी कला सीखी जाय । जिसे यह कला आती है, जो परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने की कला जानता है वह खीझता झल्लाता नहीं वरन् उनका कोई हल निकाल लेता है। ऐसे मनुष्य ही मानसिक दृष्टि से संतुलित और प्रसन्न चित्त रहने देखे जा सकते हैं । साधनों का बाहुल्य रहने से सुखी रहने की बात आमतौर से सोची जाती है । किन्तु वस्तु स्थिति इससे भिन्न है । जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे हो सकता है, इस तथ्य को यदि कोई ठीक तरह से जानता हो तो स्वल्प साधनों में भी हँसी-खुशी की जिन्दगी जियी जा सकती है । साधन सामग्री प्रचुर मात्रा में प्राप्त हो किन्तु उसका सही उपयोग न आता हो तो उनसे लाभ मिलना तो दूर उलटे समस्यायें उत्पन्न होंगी । कितने ही धनाढ्य लोग, संग्रहीत सम्पदा का उपयोग न हीं जानते । फलतः उससे विग्रह और अनाचार जन्य संकटों की घटायें ही घुमड़ती रहती हैं । उन्हें सम्पन्नता-निर्धनता से भी मँहगी पड़ती है उछृंखल अपव्यय अथवा कृपण संग्रह तरह-तरह के विक्षोभ उत्पन्न करता है और उस व्यक्ति की स्वाभाविक शान्ति का अपहरण कर लेता है ।

जीवन जीना वस्तुतः एक कला है और यह कला मनुष्य जीवन धारणा करने वालों की सर्वोपरि, सर्वप्रधान तथा महानतम आवश्यकता है, उसे समझा और सीखा जाना चाहिए। यहाँ इस असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है कि जीवन जैसी जटिल संरचना वाले सरंजाम के कलपुर्जो को समझना और उनके बनाव बिगाड़ को सुधारने सम्हालने के लिए बहुत लम्बा चौड़ा अध्ययन करना पडे़गा । ऐसा है नहीं । वस्तुतः यह प्रक्रिया जितनी जटिल और कठिन दिखाई पड़ती है उतनी ही सरल भी है । इस विद्या को एक शब्द में कहा जाय तो दृष्टिकोण का परिष्कार कह सकते हैं, यदि यह मान कर चला जाय कि हमें विवेक से प्रेरणा लेनी है और कर्त्तव्य का अवलम्बन करना है तो इतने भर से काम चल जायगा। लोग क्या चाहते हैं ? लोग क्या करते हैं ? क्या कहते हैं ? उस प्रवाह से यदि मुँह मोड़ लिया जाय और आदर्श क्या चाहता है, क्या कहता है, इसे आधार मान कर अपने ‘चिंतन में उत्कृष्टता और कर्त्तव्य की आदर्शवादिता भर ली जाय तो उतने भर से काम चल जायगा तथा जीवन कला का रहस्यमय विज्ञान सहज ही करतलगत हो जायगा । तदनुसार शरीर, मन साधन और परिवार का सुसंचालन कर सकने में निपुणता प्राप्त हो जायगी । तब सुखयुक्त परिस्थिति और शान्तिपूर्ण मनःस्थिति का रसास्वादन पग-पग पर उपलब्ध होने लगेगा।

जीवन की नीति निर्धारण करने में आत्म बल की और परिष्कृत क्रिया-पद्धति अपनाने में मनोबल की आवश्यकता पड़ती है । संक्षेप में इसे आन्तरिक साहसिकता कह सकते हैं । आर्ष ग्रन्थों और आप्तपुरुषों की भाषा में इसी को आध्यात्मिकता कहते हैं । स्वाध्याय सत्संग द्वारा उसी जीवन दर्शन को समझने का प्रयत्न किया जाता है और उपासना साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है । आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निर्मित्त खड़ा किया गया है । ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है । उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण सम्भव हो सकता है । साधना उपक्रम का एकमात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है । आत्मा की पवित्रतम और उदारतम स्थिति का नाम ही परमात्मा है । लोभ, मोह के बन्धनों को काटकर आदर्श और कर्त्तव्य के अपनाने का नाम ही मुक्ति है । र्स्वग न तो स्थान है और न परिस्थिति । वह विशुद्ध रुप से परिष्कृत दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाला देव संज्ञा में गिना जाने लगता है और अति आनवी आनन्द का रसास्वादन करता है। प्रशंसा गान अथवा नाम जय से ईश्वरीय अनुग्रह मिलने की कल्पना बाल-विनोद मात्र है । उसका न कोई आधार है और न कारण । अमुक कर्मकाण्ड को देख कर अथवा अमुक उच्चारण को सुन कर ईश्वर प्रसन्न हो सकता है ऐसा सोचना परमब्रह्म की सत्ता और महत्ता का उपहास करने जैसा ही है । उपासना का तथ्य यदि न समझा जाय तो उस दिशा में किये गये प्रयत्न काल-क्षेपमात्र बनकर रह जायेंगे । हमें हजार बार जानना चाहिए और लाख बार समझना चाहिए कि अध्यात्म का एकमात्र अर्थ परिष्कृत दृष्टिकोण का अवलम्बन ही है ।उपासना का प्रयोजन आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुँचाने वाली उत्कृष्ट प्रेरणा को अन्तःकरण के गहन-तप स्तर में प्रतिष्ठापित करना ही है । अन्यथा ईश्वर को किसी निन्दा-प्रशंसा से अथवा कर्मकाण्ड परक क्रिया-प्रक्रिया से क्यों कर प्रभावित कर सकना सम्भव हो सकता है ?

दृष्टिकोण का परिष्कार सर्वप्रथम अपने अन्तःकरण में विकसित करना होता है । जब उसकी पौध उपज आती है तब शरीर, मन, साधन एवं परिवार में प्रयोग करना पड़ता है । धान की फसल इसी तरह उगती है । उसे पहले एक जगह सधन बोते हैं । पीछे उसे उखाड़ कर जहाँ-तहाँ आरोपित करते हैं उद्यान नर्सरी भी पौध उगाने का व्यवसाय करती है । अपनी जमीनों में पेड़ लगाने वाले, नर्सरी में पौध खरीद कर ले जाते हैं। यही क्रम दृष्टिकोण के सम्बन्ध में भी चलता है ।

अपना वास्तविक स्वरुप मानव जीवन का असाधारण महत्व-नर जन्म का चरम लक्ष्य, उसकी प्राप्ति का राजमार्ग यदि भली भाँति समझ में आजाय तो कहना चाहिए कि परिष्कृत दृष्टिकोण के अंकुर उग आये और उनका स्थूल जीवन के चारों क्षेत्रों में आरोपण सम्भव हो सकेगा। कहना न होगा कि इस आरोपण के फलस्वरुप उगने वाली फसल इतनी बहुमूल्य है कि उसे प्राप्त करने वाला हर दृष्टि से-हर दिशा में अपने आपको सुसम्पन्न सौभाग्य शाली अनुभव करता है ।

सुखशान्ति की स्वर्गीय परिस्थिति और आनन्द उल्लास की देवोपम मनःस्थिति को प्राप्त करने के लिए दृष्टिकोण के परिष्कार की ही रीत-नीति अपनानी पड़ेगी । समस्त विपत्तियों से छूटने और सदैव हर्ष सन्तोष का रसास्वादन करने की आकाँक्षा इसी मार्ग पर चलने से पूर्ण होती है । श्रेय साधन का इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग है ही नहीं । दृष्टिकोण का परिष्कार किये बिना निविड़ नरक से और किसी प्रकार छुटकारा हो ही नहीं सकता । समुन्नत और सुविकसित जीवन की महान उपलब्धि चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं, धर्म और अध्यात्म का एकमात्र प्रयोजन मानवी चेतना को इसी पुण्य पथ पर अग्रसर करना है । ईश्वर अनुग्रह का सर्वोपरि वरदान यही हो सकता है कि भक्ति के साथ अविछिन्न रुप से जुड़ी रहने वाली सद्भावनाएँ उमड़े और सत्प्रवृत्तियों के रुप में प्रत्यक्ष परिलक्षित हों । जहाँ इन उपलब्धियों का दर्शन नहीं होता हो, समझना चाहिए वहाँ आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना ही है यथार्थता नहीं।

मानवी गरिमा के अनुरुप भावनात्मक उत्कृष्टता और क्रियात्मक आदर्शवादिता जब वस्तुतः अपनाई जाती है तो उसकी प्रतिक्रिया स्वार्थ के विकास परमार्थ में विकसित होने के रुप में परिलक्षित होती है । ओंछा आदमी लोभ में निमग्न और मोह में ग्रसित देखा जाता है । उसे पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं । वासना और तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ रुचिकर होता ही नहीं । शरीर और परिवार से आगे भी कुछ है क्या यह समझ में ही नहीं आता । ऐसा अनुदार, सड्डीर्ण स्वार्थी और पाषाण हृदय मनुष्य मानव-जीवन की गरिमा समझता ही कब है- जो उसके सदुपयोग की बात सोचे । जो सोचा ही नहीं गया है वह किया तो जा सकेगा ही कैसे ?

परिष्कृत दृष्टि जब विकसित होगी तो वह लोभ मोह और वासना तृष्णा की क्षुद्रता से छलाँग मारकर परमार्थ के क्षेत्र में प्रवेश करेगी । आत्मवत् एर्व भूतेषु की प्रतिध्वनि उसके हृदयाकाश के कण-कण में गूँजेगी और वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता अपना सुख दूसरों को बाँट देने की-दूसरों को दुख स्वयं बटा लेने की व्याकुलता उत्पन्न करेगी । उसे समझेगा कि समस्त विश्व उसका घर है और समस्त मनुष्य उसके अपने सहोदर । जीवन पेट और प्रजनन पर उर्त्सग करने के लिए नहीं वरन् देश,धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति-विश्व मानव के प्रति-लोक मंगल के प्रति भी उसके कुछ कर्त्तव्य उत्तरदायित्व हैं । इन्हें पूरा करने की आकुलता उत्कृष्ट अन्तःकरणों में पीड़ा और व्यथा के रुप में इस प्रकार प्रकट होती है कि उसका समाधान ढूँढ़े बिना क्षण भर के लिए चैन नहीं पड़ता । परिष्कृत दृष्टिकोण की प्रखरता का चिन्ह यह है कि समस्त विश्व ब्रह्माण्ड भगवान की साकार प्रतिमा दीख पड़े और उसे सुविकसित बनाने के लिए अपने मनोयोग युक्त श्रम बिन्दुओं की श्रद्धाँजलि समर्पण करने की भक्ति भावना जागे । इस सेवा साधना के दोनों रुप हो सकते हैं-अभिवर्धन भी और उन्मूलन भी । कुशल माली अपने बगीचे को सुरम्य बनाने के लिए उसमें कुछ आरोपण करता है कुछ उखाड़-पछाड़ कुछ काट-छाँट । आरोपण की तरह यह उन्मूलन भी एक महत्वपूर्ण विद्या है । सहयोग का सहोदर ही संघर्ष है । आवश्कतानुसार दीपक और जल कलश की तरह उन दोनों ही शीत-ताप पुण्यों का प्र्रयोग करना पड़ता है । परिष्कृत दृष्टि से मानव जीवन की सार्थकता लोक मंगल के क्रिया कलाप को व्यक्तिगत लाभ व्यवसाय की तरह ही परम रुचिकर मानने और उसमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्त होने में मानी जा सकती है । जिसे सभी अपने दीखने लगेंगे वह परिवार के चन्द लोगों को ही अपना मान बैठने और अन्य सबों को पराया समझने की भूल नहीं कर सकता है । सब के सुख-दुख में अपनी साझेदारी, सबके विकास अभिवर्धन में अपनी प्रगति का अनुभव करना यही तो अध्यात्म दृष्टि है । साधना और उपासना का प्रतिफल आत्म विस्तार के रुप में ही उपलब्ध होता है संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धनों को तोड़ के फेंक देने और विराट् के साथ अपनी आत्मीयता जोड़ लेने का ही नाम मुक्ति है । र्स्वग के दो पक्ष हैं उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व । जिसके अन्तःकरण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई, समझाना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही ‘देवयोनि’ प्राप्त कर ली ।

देव मानव न केवल आत्म-कल्याण का लक्ष्य सम्पन्न करते हैं वरन् शरीर, मन साधन एवं परिवार की दृष्टि से भी सुसन्तुलित रहते हैं । विकृतियाँ तो अपने ही दृष्टिकोण की होती हैं जो रुग्णता, उद्विग्नता, दरिद्रता और गृह कलह के रुप में प्रकट होती है । जीवन की जड़ में यदि सुसंस्कुत चिन्तन का जल लगता रहे तो उसके सभी पत्र-पल्लव हरे-भरे बने रहेंगे और उसे फला-फूला सुरम्य सुविकसित देखा जा सकेगा । इसी सर्वागीण सुख-शान्ति को मानव जीवन की सार्थकता कहा जा सकता है । इसकी उपलब्धि पूर्णतया अपने हाथ में है । आत्म चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास को अपनी नीति-निष्ठा में परिणित कर लिया जाय तो हमारा जीवन प्रवाह उस दिशा में सहज ही वह निकलेगा जिसमें अक्षय सुख-शान्ति के आनन्द उल्लास के अनुदान पग-पग पर भरे पड़े हैं । यदि कोई उनसे वंचित है तो उसका कारण यह नहीं है कि इनमें कोई अवरोध नहीं है । अवरोध है तो अपनी ही ओर से दृष्टिकोण परिष्कार की आवश्यकता को समझा और पूरा किया जाय तो निश्चित मानना चाहिए कि जीवन साधना में सफलता और सिद्धि प्राप्त कर ली गई है ।

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