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Magazine - Year 1980 - Version 2

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क्रोध अपने लिए घातक

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क्रोध होने पर मनुष्य का ज्ञान नष्ट हो जाता है । क्रोधाक्रान्त मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि वह क्या कह रहा है और क्या कर रहा है । क्रोध में आकर लोक अधिकतर अपनी ही हानि कर लेते हैं । दो परस्पर विरोधी व्यक्तियों में जो अपेक्षाकृत अधिक शान्त और सन्तुलित रहता है, वही जीतता है। बुद्धिमान लोक अपने शत्रु को क्रोध से नहीं, शान्ति ने नष्ट करते हैं । क्रोधी व्यक्ति जब एक बार किसी एक से क्रुद्ध हो जाता है, तब उसका संतुलन यहाँ तक बिगड़ जाता है कि वह अन्य असम्बन्धित व्यक्तियों से भी क्रोधपूर्ण व्यवहार एवम् वार्ता करने लगता है और इस प्रकार अपने और भी विरोधी बना लिया करता है ।

क्रोधी व्यक्ति जब किसी पर क्रूद्ध होकर उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता तो अपने को क्रोध करने लगता है, अपने को दण्ड देने और अपनी ही हानि करने लगता है क्रोध मनुष्य को पागल की स्थिति में पहुँचा देता है । बुद्धिमान और मनीषी व्यक्ति क्रोध का कारण उपस्थित होने पर भी क्रोध का आक्रमण अपने पर नहीं होने देते । वे विवेक का सहारा लेकर उस अनिष्ट कर आवेग पर नियंत्रण कर लेते हैं और इस प्रकार अपनी हानि से बच जाते हैं ।

प्रचेता एक ऋषि के पुत्र थे । स्वयं भी साधक थे, वेद वेदाँग के ज्ञाता थे । संयम और नियम से रहते थे दिन अनुदिन तप संचय कर रहे थे । किन्तु उनका स्वभाव बड़ा क्रोधी था । उन्होंने क्रोध को एक व्यसन बना लिया था और जब-तब उससे हानि उठाते रहते थे । किन्तु न जाने वे अपनी इस दुर्बलता को दूर क्यों नहीं करते थे। इस दुरभिसन्धि की उपेक्षा करने से होता यह था कि एक लम्बी साधना प्रचेता से जो आध्यात्मिक शक्ति संचय करते थे वह किसी कारण से क्रोध करके नष्ट कर लेते थे। इसलिये साधना में रत रहते हुए भी वे उन्नति के नाम पर यथा स्थान ही ठहरे रहते थे । होना तो यह चाहिए था कि अपनी इस अप्रगति का कारण खोजते और उसको दूर करते, लेकिन वे स्वयम् पर ही इस अप्रगति से क्रूद्ध रहा करते थे । अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से उनका स्वभाव खराब हो गया था और वे जरा-जरा सी बात पर उत्त्जित हो उठते थे ।

एक बार वे एक वीथिका से गुजर रहे थे । उसी समय दूसरी ओर से कल्याणपाद नाम का एक और व्यक्ति आ गया । दोनों एक दूसरे के सामने आ गये । पथ बहुत सकरा था । एक के राह छोड़े बिना ,दूसरा जा नहीं सकता था, लेकिन कोई भी रास्ता छोड़ने को तैयार न हुआ और हठपूर्वक आमने-सामने खड़े रहे । थोड़ी देर खड़े रहने पर उन दोनों ने हटना न हटना प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया । अजीव स्थिति पैदा हो गई ।

यहाँ पर समस्या का हाल यही था कि जो व्यक्ति अपने को दूसरे से अधिक सभ्य, शिष्ट और समझदार समझता होता वह हट कर रास्ता दे देता और यही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण होता निश्चित था कि प्रचेता कल्याणपाद से श्रेष्ठ थे। एक साधक थे और आध्यात्मिक उन्नति में लगे थे। कल्याणपाद एक धृष्ट और ढीठ व्यक्ति था यदि ऐसा न होता तो एक महात्मा को रास्ता तो देता ही, साथ ही नमन भी करता । प्रचेता को यह बात समझ लेनी चाहिए थी । किन्तु कुस्वभाव के कारण उन्होंने वैसा नहीं किया बल्कि उसी के स्तर पर उतर कर अड़ गये । कुछ देर दोनों खड़े रहे । पर फिर प्रचेता को क्र्रोध हो आया । उन्होंने उसे श्राप दे दिया, कि राक्षस हो जाए । तप के प्रभाव से कल्याणपाद राक्षस बन गया और प्रचेता को ही खा गया । क्रोध से विनष्ट प्रभव हुए प्रचेता अपनी रक्षा न कर सके ।

क्रोध अपने आप तो पैदा नहीं होता वह अपनी मानव संतान के समान अपने से ही पैदा होती और अपना ही नाश करती है, ऐसी सन्तान से दूर रहने में ही भलाई है ।

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