दिव्य ध्वनियों के श्रवण की सिद्धि
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
मस्तिष्क को ज्ञान का केन्द्र माना गया है । वस्तुतः वह ज्ञान ग्रहण की क्षमता का केन्द्र है, ज्ञान का नहीं । ज्ञान तो बाहर से आता है । उसे प्रधानतया नेत्रों और कानों के माध्यम से ग्रहण किया जाता है दृश्य जगत से सर्म्पक साध कर संसार के स्वरुप को समझने में सहायता मिलती है और कानों के माध्यम से उपलब्ध होने वाली ध्वनियाँ, विचारों और हलचलों की अदृश्य स्थिति का परिचय देती हैं । सामान्य जीवन में मनुष्य को अपने को समर्थ समझदार बनाने एवं सफल सम्पन्न बनने में इन्हीं माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है ।
इन्द्रियों की शक्ति सामान्य है । प्रकृति ने हर प्राणी को उतनी ही क्षमताएँ प्रदान की हैं, जितनी से कि वह अपनी सामान्य जीवन-चर्या एवं निर्वाह आवश्यकता पूरी कर सके । आवश्यकता एवं पात्रता से जो बाहर है उसे उपलब्ध करना आमतौर से हानिकारक ही सिद्ध होता है । अतएव प्रकृति ने अपने विपुल भण्डार में से उतने ही देने की उदारता दिखाई है जितने से कि दुरुप्योग से उत्पन्न संकटों का सामना न करना पड़े ।
जितना चक्षुओं से दीखता है, वस्तुतः उसकी तुलना में दृश्य जगत असंख्य गुना विस्तृत है। इसी प्रकार कान जो सुनते हैं उसकी तुलना में संसार में विद्यमान ध्वनि प्रवाह का विस्तार ही नहीं स्तर भी बड़ा है । विज्ञानी इस अदृश्य को सूक्ष्मदर्शी एवं दूरदर्शी यन्त्रों से एक सीमा तक देखते हैं । उसी प्रकार वे कानों की पकड़ से बाहर की ध्वनियों को भी सुनते हैं । इस अदृश्य और अश्रव्य श्रवण से मनुष्य ने अत्यधिक लाभ उठाया है । टेलीविजन और रेडियों के माध्यम से अदृश्य देखना और अश्रव्य सुनना सर्वसाधारण के लिए सम्भव हो गया है ।
अब इससे आगे बढ़ने की बात है । भौतिक विज्ञानी प्रकृति के अंचल में छिपे हुए उन विशिष्ठ साधनों को उपलब्ध करने के लिए बेचैन हैं, जिनके आधार पर दर्शन और श्रवण क्षमता बढ़ सके और उस आधार से अविज्ञात को जानने तथा उस जानकारी से लाभ उठाने का अवसर मिल सके ।
पाया गया है कि इस संसार में अगणित ध्वनियाँ प्रवाहित होती हैं । जिनमें से कुछ तो प्राणियों द्वारा उत्पन्न की गई हलचलों की होती हैं और कुछ बादल गरजने जैसे घटनाक्रमों की, किन्तु कुछ ऐसी भी होती हैं जो पृथ्वी को अन्तरिक्ष की-वातावरण की सम्भावनाओं की वह जानकारियाँ देती हैं जो सामान्यतया विदित नहीं होतीं । इन्हें सुनना या समझना सम्भव हो सके तो मनुष्य निकटवर्ती भूत एवं भविष्य के सम्बन्ध में बहुत कुछ जान सकता है । उस आधार पर संकटों से बचने एवं सम्भावनाओं का लाभ उठाने में भारी सहायता मिल सकती है। इस सर्न्दभ में हुई प्रगति से आशा बँधती है कि योगाभ्यास स्तर पर इस दिशा में यदि ठोस प्रयत्न किये जा सकें तो मानवी ज्ञान की परिधि सामान्य से आगे बढ़कर असामान्य तक पहुँच सकती है ।
आयन मण्डल में प्रतिक्षण सीटी की सी आवाज सुनाई देती है । यह ध्वनि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों की सेना के रैडार विभाग ने पकड़ी थी । उसके बाद सुप्रसिद्ध जर्मन वैज्ञानिक बेर्कहासिन तथा ब्रिटिश वैज्ञानिक एकर्स्ली ने उस ध्वनि से स्रोतों का पता लगाया और पाया कि अयन मण्डल में विद्युत कणों से अनौखे राजपथ बने हुए हैं । पृथ्वी को चुम्बक मानकर ग्राफ बनाया जाये तो जिस स्थान पर चुम्बकीय विषुवत् रेखा बनती है ठीक उसी के ऊपर विद्युत कण 9 हजार मील की आर्श्चयनजक ऊँचाई से यह गुजरते हैं। अर्थात् अभी तक सृष्टि के उन पोले भागों को जिन्हें शून्य समझा जाता है, अत्यधिक समर्थ संस्थान समझा जाने लगा है यह ध्वनि उन विद्युत तंरगों की गोलार्द्धों की ओर उछाली गई प्रतिक्रिया के फलस्वरुप उत्पन्न होती हैं । तड़ित तरंग पहले विस्फोट के रुप में फूटती हैं या उसमें चटाका होता है जिससे एक आवाज होती है । यही लम्बे चुम्बकीय पथ पर फैल कर सीटी की ध्वनि ग्रहण कर लेती है । कई बार अन्य विलक्षण प्रकार के शोर भी सुन पड़ते हैं जिससे देव-दावनों के युद्ध का सा दृश्य उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है । धं्रुवों पर आने वाले इस ध्वनि प्रवाह ने तो उसे और अधिक विस्मय कारी बना दिया है ।
चेशायर इंगलैंड की जोड्रेल वेधशाला में दुनियाँ का सबसे बड़ा रेडियों दूरदर्शी यन्त्र लगा है यह आकाश गंगा तथा सूर्य की सापेक्षता में उसके ग्रह नक्षत्रों की ध्वनियाँ सुन सकता है और उनका ग्राफ भी बनाता है । इस ध्वनि की परावर्ती शक्ति द्वारा वैज्ञानिक किसी भी क्षेत्र का रेडियो चित्र बना देने में समर्थ हुये हैं । फैदम मीटर ऐसा ही एक यन्त्र है जो इस ध्वनि में आघात-प्रतिघात के द्वारा समुद्री जहाजों को यह सूचना देता रहता है कि उस स्थान से खाड़ी, द्वीप, अन्य जहाज या प्रायद्वीप कितनी दूरी पर हैं ।
1942 की 28 फरवरी की इंगलैण्ड के सैनिकों को अपने रैडार यन्त्र में एकाएक एक विलक्षण ध्वनि सुनाई दी । उसे सुनकर वे सम्मोहित से हो गये किन्तु तभी उनके ध्यान में आया कि कहीं ऐसा न हो यह जर्मनी जहाजों की कोई करामात हो । अतएव उस ध्वनि का पीछा किया गया। वैज्ञानिक उस समय आर्श्चयचकित और आविर्भूत हो उठे जब उन्होंने पाया कि वे सूर्य और उसके समूचे जगत में एक बार में जो ध्वनि उत्पन्न हो रही है उसे सुन रहे हैं । केवल उसी दिन इस तरह का दिव्य नाद सुन पाने का कारण यह था कि उसी दिन सूर्य के मध्यवर्ती क्षेत्र में एक तेज स्फोट हुआ था।
वर्जीनिया अमेरिका के फोर्ट बेलवोइट में इसी उद्देश्य के लिए विश्वसूचना केन्द्र स्थािपत है,जब भी कोई सूर्य स्फोट होता है वह दुनियाँ भर को सूचना देकर चुम्बक क्षेत्र के अध्ययन की प्रेरणा देता है । इन स्फोटों के अध्ययन की प्रणाली विकसित हो जाने के कारण ही आज रेडियों कारपोरेशन आफ अमेरिका कई दिन पूर्व ही यह भविष्यवाणी कर सकने में सक्षम हो गया है कि किस दिन पृथ्वी के किस भाग में कैसी स्थिति होगी । आज तो प्रायः हर देश में मौसम कार्यालय विकसित हो रहे हैं ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र की यह “क” स्तर की उपलब्धि है “ज्ञ” तक पहुँचने तक मनुष्य के सामने आज खड़ी काल, दिक् और ब्रह्माण्डों की सीमायें टूट जायेंगी और वह यान्त्रिकी के सहारे भी त्रिकालदर्शी हो सकता है । वस्तुतः कुण्डलिनी विज्ञान यान्त्रिकी ही है जिसमें शरीर जैसे सर्वशक्ति सम्पन्न यन्त्र को गतिशील बनाकर उस स्थिति को प्राप्त किया जाता है ।
भूकम्प के क्षणों में होनेवाले परिवर्तनों की जाँच के लिए 1958 के सक्रिय और कलक वर्ष में भू भौतिक शास्त्रियों ने बेधशालाओं में अनेक तरह के उपकरण लगाये थे उन उपकरणों से ज्ञात हुआ कि भूकम्प के क्षणों में पृथ्वी अनेक प्रकार की ध्वनियाँ करती है यह कराहने जैसी वायु की सी साँय-साँय अथवा हाथी के चिंघाडने जैसी, कई बार तो यह ध्वनियाँ पिस्तौल और तोप छूटने जैसी वीभत्स होती हैं । हमारी पृथ्वी सूर्य और आकाश से बरसने वाली ऊर्जा तरंगों के प्रति अधिक सम्वेदनशील है । यह ध्वनियाँ उसी का परिणाम है । इन ध्वनियों की समीक्षा प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री अलक्जेंडरमारशैक ने इन शब्दों में की है “सूर्य की प्रत्यक्ष क्रियाओं के कारण पृथ्वी के गहन अन्तराल में उत्पन्न बलों के कारण यह शोर सुनाई देते हैं इसे न देखा जा सकता है न अनुभव किया जा सकता है।
साइबेरिया प्रायद्वीप के प्रशान्त तट पर एल्युशन द्वीप समूह फैला हुआ है उसी में एक स्थान कामचत्मा भी है। 1952 में वहाँ एक भयानक भूकम्प आया ।भूकम्प की तरंगें इतनी लम्बी थीं कि उसकी तरंग का एक सिरे से दूसरे सिरे का अन्तर कोई 1200 मील था । प्रत्येक साढे़ 6 मिनट बाद एक तरंग आती थी और बीस तरंगें मिलकर पृथ्वी का घेरा डाल लेती थीं । यह स्थिति प्रायः 24 घन्टे तक बनी रही । इन 24 घण्टों में सामान्य पृथ्वी के निवासी तो भयग्रस्त अवस्था में बने रहे किन्तु वैज्ञानिक ने सूक्ष्ममापी यन्त्रों से पृथ्वी के थरथराने की जो ध्वनि सुनी वह पुराणों के उस आख्यान से सर्वथा मेल खाती है जिसमें प्रलय के दृश्य का चित्रण करते हुए लिखा गया है कि पृथ्वी इस तरह उद्वेलित होती है जैसे कोई विशाल काय घंटा । उससे घंटा निनाद की सी प्रलयंकर ध्वनि सुनाई देती है । वैज्ञानिकों ने जो आवाज सुनी वह भी घन्टे के झनझनाने की सी ध्वनि थी । इस नियम बद्ध आन्दोलन के पीछे और किसी का नहीं सूर्य के अन्तः आन्दोलन का ही हाथ था ।
योगाभ्यास से मानवी अन्तराल में छिपे अति महत्व पूर्ण उपकरणों को जागृत किया जाय तो वे इतने सक्षम हो सकते हैं, जितने कि अब तक के बने उपकरणों में से कम भी नहीं है ।चेतना की प्रयोगशाला सूक्ष्म शरीर है उसमें इतने बहुमूल्य यन्त्र जुड़े हुए हैं कि प्रयोग का अभ्यास होते ही चमत्कार प्रस्तुत करने लगते हैं । सूक्ष्म दर्शी के लिए आज्ञाचक्र में सन्निहित तृतीय नेत्र त्राटक के अभ्यास से जागृत किया जाता है । और उससे अदृश्य दर्शन का लाभ मिलता है । उसी प्रका सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय के सहारे नाद योग की साधना द्वारा दिव्य श्रवण की क्षमता प्राप्त होती है । साधना से पात्रता बढ़ती है । और तद्नुसार प्रकृति का रहस्य मय भण्डार साधक को करतल गत होता है । इन्हीं उपलब्धियों में सूक्ष्म ध्वनियों को सुन सकने की सफलता का अपना स्थान और महत्व है ।

