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Magazine - Year 1980 - Version 2

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जागृतों की अंतरात्मा में इस उषा का उदय इन्ही दिनों

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पशु इन्द्रिय प्रेरणा में कार्यरत रहता है। मनुष्य का दर्जा उससे ऊँचा है उस बुद्धि की विशेषता रहती है। सामान्यता वह स्वार्थ प्रधान और अहंतारत होती है। इसी परिधि में सोचती तथा कार्य करती है। उच्चस्तर देवता का है वे शवना प्रधान होते है। शवनाएं उत्कृट सोचती और आदर्शां के परिपालन की उमंगे उत्पन्न करती है। वैसे तो प्राणी समुदाय तीन स्वंतन्त्र वर्ग माने जाते है,पर वस्तुतः इन्हे मानवी चेतना के तीन विभाजन ही समझा जाना चाहिए।

नर पशु वे है जिन पर पेट और प्रजनन की प्रकृति प्रेरणा ही छाई रहती है और इस दबाव में विवशतापूर्वक कुछ न कछ कृत्य करते रहते है। उसके लिए उन्हे बहुत सोचने-विचारने की आवश्यकता नहीं पडती। प्रकति प्रेरणा के प्रवाह में वे अनायास ही बहते रहते है। शरीर यात्रा ही उनके लिए सब कुछ होता है। इन छोटी परिधि में दिन काटते हुए उन्हे उल्लास की अनुभूति तो नहीं होती, पर कुछ असंन्तोष भी नहीं उठता। ज्यो-त्यो करके समय गुजर जाता है। नर-पशुओं के समुदाय की यही स्थिति रहती है।

औसत मनुष्य अक्लमंद और चतुर होता है। इस विशेषता का उपयोग वह प्रधानतया स्वार्थ सिद्धि के लिए करता है। वह सोचता, समझता तो है, पर वह उसकी समझ की परिधि अपने लिए सम्पन्नता एवं बड़़़प्पन जुटाने की परिधि में ही परिभ्रमण करती है।

पशु वासना प्रधान है। मनुष्य में वासना भी होती है, साथ ही तृष्णा भी प्रबल रहती है। फलतः वह साथियों की तुलना में अधिक साधन सम्पन्न बनने और सुख पाने का ताना-वाना बुनता रहता है। यह आकाँक्षा सीमित हुई तो उसे अनुदार रखती है, ताकि अहंता की पूर्ति के लिए उपलब्धियों का समान उपयोग हो सके। यह ललक थोड़ी और आगे बढ़ती है तो जल्दी ही अधिक पाने के लिए उद्धत आचरण पर उतारु होती है। अपराधि एंव आततायी इसी वर्ग के होते है। औंसत मनुष्य को सम्पन्नता, सम्पन्नता एवं बड़़़प्पनपाने के लिए लालायित देखा जाता है और उसका चातुर्य इसी सीमा बन्धन में समाप्त होता रहता है। वे प्शुओ की तुलना में धाटे में रहते है। तृष्णा उनसे वह कृत्य कराती है जो ईश्वर प्रदत मानवी गरिमा को उठाते नहीं गिराते है।

उन्हे पग-पग पर अन्तद्वन्द्वो और उर्द्वगों की आग में झुलसते रहना पड़ता है। दर्शन की शषामे नरक इसी को कहते है। औसत मनुष्य को नारकीय कहते है। वह श्गवान के दरबार में लौटता है तो अपने को उत्तर-दायित्वों की अवहेलना करने वाले अपराधियो की श्रेणी में खडा़ पाता है। यह आत्मप्रताड़ना ही उसे ईश्वरीय दण्ड़ की तरह इतना कष्ट देती है जितना कि निर्वाह रत नर-पशु श्ी सहन नहीं करता। उन्हे महत्वाकाँक्षा पूरी करने का अवसर नहीं मिलने पर असंन्तोष की आग में जलते-झुलसते रहने की व्याथा बेदना श्ी सहन नहीं करनी पड़ती।

देवताओं की दुनिया इन दोनो से ऊँची होती है। उनमें इन्द्रियाँ श्ी होती है और बुद्धि श्ी, पर दोनो को उच्छड्ढल नहीं होने देने वाला विशेषसंयम का अकुँश उन पर रहता है।

अतएवं वे सरलतापूर्वक सज्जनों जैसी जीवनचर्या अपना कर निरन्तर आत्मसन्तोष मर्यादा पालन का रसास्वादन करते रहते है। देवताओं की-मनःस्थिति शवना प्रधान होती है। इनका उत्पादन इन्द्रिय क्षैत्र एंव बुद्धि संस्थान में नहीं क्रअन्तःकरण में होता है। आत्मीयता और उदारता की उमगें हर समय उठती रहती है। वह प्रायः इतनी प्रबल होती है कि तृप्ति पाये विना चैन ही नहीं लेने देती। अपनी सम्पन्नता बाँटने और दूसरो की विपत्रता बाँट लेने के लिए उनकी अन्तःप्रेरणा इतनी प्रबल होती है जितनी कि वासना, तृष्णा और अहन्ता की तीनो ललक लिप्साएँ श्ी मिलकर श्ी उत्पन्न नहीं कर सकती। यही कारण है कि देव मानव संचित पशु प्रवृतियों और प्रचलित लोकप्रवाह की उपेक्षा करने में तनिक श्ी कठिनाई अनुभव नहीं करतें। वे अपना रास्ता आप चुनते है और मस्त हाथी की तरह अन्तःप्रेरणा का अनुसरण करते हुए उत्कृष्टता की चरम सीमा तक जा पहुँचने के लिए अनवरत गति से बढ़ते रहते हैं। रास्ते में कितने कुत्ते शैके, कितने कंकड़-पत्थर बाधक बने इस पर ध्यान देने की उन्हे आवश्यकता तक नहीं पड़ती। उच्चस्तरीय शव सम्वेदनाएँ इतनी अधिक रसीली होती है कि जिन्हें उनका एकबार रसास्वादन करने का अवसर मिल गया उनमें कदाचित ही कोई अपना अपवाद प्रस्तुत करता है और वापस लौट कर कीचड़ में लोट-पोट करता है।

देव मानवों को बोल-चाल की शषामें महामानव,आर्दशवादी, लोकसेवी, सन्त ब्राह्मण, सुधारक, श्देव ऋर्षि दृष्टा, देवता आदि नामों से जाना जाता है। उनमें तीन विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती है। एक उत्कृट चिन्तन अर्थात् र्स्वग, दूसरे लोकप्रवाह की उपेक्षा अर्थात् मुक्ति, तीसरे प्रामाणिकता और उदार परमार्थ परायणता के आधार पर वरसने वाला असीम सहयोग सहित लोक-सम्मान। असी को देवनुग्रह, ईश्वरीय वरदान कहते है।

नवयुवक को देवयुग कहा जायेगा। उसकी तुलना सतयुग एवं राम-राज्य सें होगी। उसी स्थिति में धरती पर र्स्वग का अवतरण कहा जायेगा। इसकी श्मिका निभाने की पूरी-पूरी जिम्मेदारी मनुष्य के अन्तराल में उद्भूत होने वाले देवत्व को वहन करनी होगी। यही है वह देवी निर्धारण जो जागृत आत्माओं के शग्य-विधान में इन दिनों प्रकट होने के लिए विधाता ने अपनी लेखनी लिख रक्खा है। युग सन्धि के इस पावन पर्व पर हर ऐसा जागृत आत्मा को अपनी जीवनचर्या में ऐसा ही प्राण-वान परिवर्तन प्रकट होते दृष्टिगोचर होगा ये नर-प्शुओं की तरह पेट प्रजनन के लिए जीवित रहने की निकृष्टता साहसपूर्वक अस्वीकार कर देगें इतना ही नहीं चतुर लोगो द्वारा अपनायी जाने वाली अक्लमंन्दी श्ी उन्हें रुचेगी नहीं और लगेगा कि सचय ‘विलास एवं बड़प्पन के कोहलू में पिलन वाली तथाकथित बुद्धिमानी में भी कुछ सार नहीं है। अन्ततः वह बज्र मूखता से श्ी मंहगी पडती है।

कहते है कि प्रजापति के शुभमूहुर्त देखकर समुद्र मंथंन की योजना बनाई थी। फलत; उस पराक्रन के फलस्वरुप बहुमुल्य रत्न राशि पाने का लाभ इस संसार को मिल सका।

उस गाथा की सामयिक पुनरावृत्ति इस प्रकार होती दिखाई है कि जागृत और जीवन्तों को इन दिनो प्रचण्ड आत्म मंथन का सामना करना पडेगा और उनमें से कुछ ऐसा अमृत उद्भूत होगा, जैसा गोमुख से गंगावतरण के रुप में श्रद्धालुओ को परिलक्षित होता है।

आर्दशवादी शव सम्वेदनाओ को श्रद्धा कहते यही है नवयुवग के-देवयुग के स्वप्न को साकार बना सकने वाली प्रचण्ड शक्ति। इसी के अभाव में दुर्गति हुई है उसी के प्रभात-उषा के उदर में उस अरुणोदय के दर्शन होगे जिसके सहारे संव्याप्त अन्धंकार और उसके दुष्प्रभाव से छुटकारा मिल सकेगा।

युग अंवतरण के लिए साधनो की, परिश्रम की, मनोयोग की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पडे़गी। एक से एक शरी प्रयोजनो के सरंजाम खडे़ करने होगे, पर वे न तो समृद्धवानो के जुटाये जुटेगे और न बुद्धिमानो ने उसकी व्यवस्था बन पड़ेगी, सामर्थ्य तो शैतिक उथल-पुथल श्र कर सकती है। जब कि आवश्यकता इन दिनो शवनाशील श्रद्धा की, उदार आत्मीयता की और प्रचण्ड़ परामर्थ परायणता की है। कुछ बनना है तो इस देव व के बलबूते ही बनेगा। समय ने इसे उभारने और कार्य क्षैत्र में उतारने के लिए देव मानवों की विशेष रुपम में निर्देश श्जा है। वे जो जागेगें और प्रसुप्तों को जगायेगें। उनकी श्रद्धा उभरेगी तो सर्वत्र उसे बर्षा और बंसन्त की तरह अपने प्रभाव का उल्लास श्रा परिचय देनें का अवसर मिलेगा। यही है नवयुवक की पृष्ठभूमि जिसे जागृत आत्माओं में से श्रद्धा सम्वेदना के रुप में उभरती हुई सहज ही सर्वत्र देखी जा सकेगी।

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