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Magazine - Year 1980 - Version 2

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युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि और आधार

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युग परिवर्तन इतना बड़ा काम है जिसके विस्तार कीसही कल्पना कर सकना सामान्य मस्तिष्क के बते से बाहर है। इन दिनों अपनी धरती पर प्रायः 450 करोड़ मनुष्य रहते हैं। इनके स्वभावों और प्रयासों में इतनी अधेक अवाँछनियता भर गई है जिसे विद्यमान सुसंस्कारिता की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक माना जा सकता है। आदमी जितना बुद्धिमान है उसकी तुलना में हजार गुना अधिक मूर्ख। वह बनाता और कमाता भी बहुत है, पर जितना विगाड़ता उजाड़ता है उसे देखते हुए यह असमंजस उत्पन्न होता है कि उसे अन्य प्राणियों की तुलना में बुद्धिमान कहा जाय या मूर्ख। यह ठीक है कि अन्य प्राणी बुद्धि वैभव के अभाव में निर्वाह लाभ तक सीमित रहे और कोई चमत्कारी प्रगति न कर सके। इतने पर भी उनमें से प्रत्येंक को यह सन्तोष करने का अधिकार है कि प्रकृति के सहज अनुदानों का वे प्रसन्नतापूर्वक उपभेग करते हैं और मोद मनाते हुए जीवित रहते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर मनुष्य इससे भी वंचित प्रतीत होता है। शरीर में रुग्णता,मस्तिष्क में अद्विग्नता, परिवार में विपन्नता, समाज में आक्रमकता, साधनों में दरिद्रता और व्यवहार में अनुदारता का बाहुल्य देखते हुए प्रतीत होता है कि ठाट-बाट कितना ही बढ़ा-चढ़ क्यों न हो मनुष्य की जीवनचर्या दयनीय स्तर की बन गई है। वह अर्ध मृतक की जीवनचर्या दयनीय स्तर की बन गई है। वह अर्ध मृतक औससर अर्ध जीवित बनकर रह रहा है। श्शरीर की सुविधा सज्जा देखते हुए भी मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा अनुपयुक्त घुस पड़ा है जो विष की तरह काटता और काँटों की तरह चुभता है। चैन, सन्तोष, अल्लास और आनन्द जैसे तत्व कहने-सुनने के चर्चा प्रसंग भर रह गये हैं। उन्हें अनुभव करने वालों को पा सकना कठिन है। हर व्यक्ति अपने-अपने ढ़ंग की बेचैनी और खीज में जलता-भुनता रहता हैं।

टाज न तो सम्पन्नता की कमी है और न अक्लमंदी की। साधन की प्रचुर है और विज्ञान ने सुविधाओं के पर्वत आसमान से उतारकर जमीन पर ला खड़े किये है। इतने पर भी हर व्यक्ति अभावग्रस्त और अशिक्षित समझे जाने वाले पूर्वंजों की तुलना में व्यक्त्वि की दृष्टि से कहीं अधिक दीन-दुर्बल, खोखला और घिनौना बनता चला जा रहा है। एक के बाद दूसरी पीढ़ी अधिक क्षीण अधिक असहाय और अधःपतित होती चली जा रही है। उसके कारण अर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक भी कहे जा सकते है। किन्तु वास्तविकता दूसरी ही है मनःक्षेत्र में घुसी हुई निकृष्टता ही मदारी की तरह वह रंग-बिरंगे जादुई खेल तमाशे खडे़ करती रहती है जिन्हें न समझते बनता और न सुधारते। चिन्तन में समाया हुआ ‘भ्रष्ट’ और चरित्र में जमा हुआ ‘भ्रष्ट’ इतने प्रकार की अवाँछनियताएँ अपनाने के लिए विवश करता है कि भ्रमित मस्तिष्क उस भूल भूलैयाँ से भरे-पूरे तिलस्म में से छुटकारे का कोई रास्ता ही नहीं खोज पाता। शासकीय कानून व्यवस्था और दण्ड विधान का प्रबन्ध तो है पर अपराधियों में से कितनों को सुधारने, बदलने में वह खर्चीला प्रबन्ध सफल हो पाता है इसे हम सभी जानते हैं। कभी समाज का अनुशासन था और लोग लोक-लाज जनमत तथा समाजगत अवमानना से डरते थे। फलतः नीतिमत्ता का पक्षधर अनुशासन किसी कदर बना रहता था। अब तो सभी धोती के भीतर नंगे हैं। कौन किसे सिखाये और कौन किसे रोके। जब स्वयं ही ऐड़ी से चोटी तक दलदल में फँसे हैं तो दूसरों को उबारने सुधारने की हिम्मत कौन करे। संगठित और सदाशयता त्योरी बदलने और घूसा तानने भर से संव्याप्त उद्दण्डता की रोकथाम कर सकती है पर उसका तो कहीं अस्तित्व तक दर्शन नहीं होता। हर एक को खुदगर्जी के अतिरित्त और कुछ सूझता ही नहीं। अपने ऊपर मुसीबत आये तो दूसरों से सहायता पाने की इच्छा तो होती है, पर यह किसी बिरलेका ही मन चलता है कि दूसरों की मुसीबत में हाथ बँटाने, उसका वनज हल्का करने, और सहारा देकर ऊपर उठाने में मदद करे। जहाँ लोक प्रवाह ऐसी आपाधापी का चल रहा हो। साथी को शोषण का निमित्त भाजन बनाने की बात प्रथा परम्परा की तरह मान्यता प्राप्त करने लगे तब मित्रता के साथ जुड़ी हुई सुखद सम्ीवना की कल्वना करना र्व्यथ है। जब मित्रता के नाम पर बलवान कमजोंरों को फाँसने, पछाड़ने की ही बात सोचें तब दुर्बलों की भलाई इसी में है कि भाग्य भरोसे एकाकी निर्वाह की बात सोचे और बुरे दिनों मो धैर्यपूर्वक काटें। समर्थो की मित्रता इस वर्ग को कदाचित ही कभी लाभदायक सिद्ध होगी। वह तो मात्र चतुर लोगों का व्यवसाय है जिमें चित्त भी उनकी और पट्ट भी उनकी रहती है।

आर्थिक सम्पन्नता से समस्याओं का हल होने-उसी कठिनाई को समस्त विपत्तियों की जड़ बताने के जोश खराश भरे प्रतिपादन अब बूढ़े हो गये और उन दलीलों में कोई दम नहीं रहा। असमर्थो को भड़काने में वह हथियार अब भी काम आतात रहता है, पर इस तथ्य को स्वीकारने में अब किसी का मन नहीं होता कि सम्पन्नता ही सुख-शान्ति की जननी है। योरोप और अमेरिका के अधिकाँश देश धनी है। एशिया में जापान के अतिरिक्त तेल देशों को भी समृद्धि कहा जाता है। वहाँ जाकर निकट से देखने पर यह भली-भाँति जाना जा सकता है कि दौलत और दुर्बुद्धि का संयोग होने पर व्यक्ति विलासी तो हो सकता है, पर सुखी समुननत होने की आशा तो तब भी मृग मरीचिका ही बनी रहीती है। तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि निर्धनों की तुलना में धनाध्यक्षों की परिस्थितियाँ कुचक्रों एवं दुर्व्यसनों के कारण अपेक्षाकृत अधिक गई-गुजरी देखी जाती है। इस स्थिति को बदलना ही युग परिवर्तन है। इसके लिए चिन्तन और स्वभाव का ढाँचा ही उलटना होगा। प्रचलनों में से अधिकाँश को निरस्त करने के अतिरिक्त अगणित ऐसी स्िपनाएँ करनी होंगी जिन्हें आज भी लोग जानते और पसन्द तो करते हैं, पर अपनाने के लिए किसी के भी कदम नहीं बढ़तें। प्रस्तुत विपन्नता को एक प्रकार से उलट देना ही युग परिवर्तन है। इतने भरे से वे सभी सपने साकार होने लगेंगे जिन्हें सतयुग का पुरावर्तन या उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण कहा जा सकें।

प्राचीन काल में आज की तरह न तो साधन सम्पन्नता थी न सुविधाओं का विज्ञान ही विकसित हो सका था। फिर भी उस समय के उपलब्ध विवरण बताते हैं कि पहले का मनुष्य आज की अपेक्षा सुखी था। कारण एक ही था कि पहले लोग अपेक्षाकृत निश्छल होते थे, नीति, सदाचार के प्रति, उनमें गहन निष्ठा होती थी व्यवहार में स्वार्थ को इतना महत्व नहीं दिया जाता था कि दूसरों उचित हितों को नुकसान पहुँचे। उस समय परम्परा यह थी कि अपनी हानि होने देकर दूसरों को लाभ पहुँचाया जाए। व्यष्टि के हितों को समष्टि के हितों पर बलिदान किया जाये। जब इस तरह की उदार परमार्थ परायणता का प्रचलन था तो समाज में सेख, शान्ति और सुव्यवस्था समुन्नति क्यों न रहेगी?

आस्थाएँ बदलें, व्यक्ति के सोचने, विचारने की काम करने की और व्यवहार की रीति-नीति की दिशाएँ सद् हों तो आज भी वैसी ही सुख, शान्ति उपलब्ध हो ही सकती है, जैसी पहले कभी थी बल्कि पहले से अधिक सुखी और समुन्नत जीवन जिया जा सकता है क्योंकि विज्ञान के रुप् में एक ऐसी शक्ति मनुष्य को करतलगत हो गई है जिससे आज और अभी धरती पर र्स्वगं बसाया जा सकता है। कहने-सुनने में यह कल्पना कितनी सरील लगती है? बाल बुद्धि यह परिवर्तन किसी जादुई चमत्कार की तरह आसमान से टूट पड़ने की कल्पना भी कर सकती है। परन्तु वस्तुतः ऐसी है नहीं। पुरुषार्थ चाहे मनुष्य ने अपने संकल्प से किया हो अथवा दैवी प्रेरणा से उभरा हो, इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, काम तो मनुष्य की आस्थाओं में परिवर्तन लाने से ही चलेगा।

इसके लिए लोकमानस को जगाना और उसका परिष्कार कर नई दिशा में अग्रसर करना है। यह कार्य एक ही प्रकार से सम्भव है जगृत आत्माओं के अग्रगमन द्वारा। इसके बिना औसर किसी उपाय से लोक-मानस को जगाना और उत्कृष्टता अपनाने के लिए सहमत कर सकने का कठिन कार्य सम्पन्न हो ही नहीं सकता। यह कार्य मात्र वही कर सकते हैं, जिनमें जागरण की पूर्व प्रेरणा को समझने और अपनाने की क्षमता विद्यमान हो। सूर्योदय की प्रथम किरणें पर्वतों के शिखर पर चमकती हैं-धरती पर उतने में तो उन्हें बहुत विलम्ब लगता है। प्रभात का परिचय उषा की लालिमा देती है, या फिर पर्वत शिखरों पर उतरने वाली आभा। इन दो प्रतीकों को देखकर ही जन-जन का प्रभात की उपस्थिति पर विश्वास जम जाता है। यों उन तक गर्मी रोशनी पहुँचने में वब भी विलम्ब ही रहता हैं।

युग-निर्माण परिवार विशालकाय है। विस्तार की दृष्टि से उसे अनुपम भी कहा जा सकता है। पच्चीस लाख व्यक्ति बहुत होते हैं। उनके चिन्तन, श्रम और साधन की संयुक्त शक्ति इतनी बड़ी है कि युग प8रिवर्तन जैसे दुष्कर कार्य में सरलता और सफलतापूर्वक बन सकने की आशा उसका प्रयोग बन पड़ने पर हसज ही की जा सकती है। संसार के बीस मनुष्यों पीछे एक युग परिवार परिजन की संख्या आती है। इतने लोगों के परिवार को गृहपति सम्भाल सकता है, तो कोइ कारण नहीं कि भावनात्मक परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति सर्म्बधन जैसे लोक-प्रिय कार्यो को अग्रसर करने में उतनी जागृत आत्माएँ समर्थन हो सके। फिर कठिनाई क्या रही? इसका उत्तर ढूँढ़ने पर लौट कर वहाँ पहूँचना पड़ता है, जहाँ से चर्चा आरम्भ हुई थी। सोतों को जगायें कौन? जागे को झकझोरे कौन? आलसियों का विस्तर उलटने और उन्हें घसीट कर खड़ा कौन करे? जागरण की बेला में जागने का मन तो सभी का है, परी खुमारी छोड़े तब न? अभ्यस्त ढर्रे के जंजाल से छुटकारा मिले तब न? प्रश्न यही आता है कि यह सब कैसे किया जाए? इस परिवर्तन को किस आधार पर प्रयुक्त किया जाए? उत्तर एक ही है कि मनुष्यों के अन्तःकरण में सोई उस विशेषता को जगाया जाए जिसे श्रद्धा कहते हैं।

आदर्शवादिता का महत्व समझने और उसके तत्वज्ञान को हृदयंगम करने पर अर्न्तजगत में जो सम्बेदनशील निष्ठा उभरती है, जिसे श्रद्धा भावना कहते हैं वही धर्म धारणा मनुष्य की जीवन दिशा, चिन्तधारा और कतृव्व प्रवाह में परिवर्तनकारी स्थिति उत्पन्न करती है। इसी श्रद्धा निष्ठा के बल पर भौतिक जगत में अनेकानेक संकटों और विपत्तियों से पार पाया जाता है। व्यापार क्षेत्र में लोग पूर्वानुमानों के आधार पर बड़ी-बड़ी जोखिम उठा लेते है। यह जोखिम अन्तःजगत में साहस मनोबल के अभाव में किसी भी प्रकार नहीं उठाया जा सकता है। इस स्तर का मनोबल कहाँ से उभरता है? श्रद्धा निष्ठा, विश्वास और सहस के बल पर ही न। इन्हीं तत्वो से अन्तःक्षेत्र में वह सशक्तता उभरती है जिसके कारण मनःस्थिति को जरिस्थिति की जन्मदात्री कहा जा सकता है।

युग सन्धि की इस विषम बेला में लिप्सा को घटा कर उदात्त तत्वों को उभारना ही प्रमुख कार्य है। इसी से व्यक्ति महान् बनता है और समाज समर्थ। बादल बरसने को हों तो पहली बूँद बनने का साहस कौन करे? ताकि बाद की बूँदे भी बरसने लगे। यह पहली बूँदे बनने का साहस युग निर्माण परिवार के परिजनोकं को करना चाहिए और अपनी रीति-नीति अपनानी चाहिए जिससे कि अन्य औरों को प्रकाश तथा प्रेरणा प्राप्त हो सके। अपने दृष्टि-कोण और व्यवहार में आदर्शवादी चिन्तन तथा उत्कृष्ट कतृत्व को प्रधानता दिया जाने लगें तो युग निर्माण परिवार के लाखों परिजन करोड़ो मनुष्यों के समाज को प्रभावित कने में निश्चिय सक्षम हो सकेंगे ? इसमें कोई सन्देह नहीं हैं।

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