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Magazine - Year 1980 - Version 2

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युग साधना में निष्ठा का समावेश

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आत्मिक समर्थता और सफलता इस बात पर निर्भर है कि साधक की निष्ठा किस स्तर की बन पड़ी। उपासनात्मक कर्मकाण्डों को कलेवर और निष्ठा को उसके अन्तरंग को प्राण शक्ति कहा जाता है। साधना की सिद्धि इसी एक तथ्य पर निर्भर है कि उसे कितनी गहन निष्ठा के साथ अपनाया गया। यों जब तब, ज्यों-त्यों करके कुछ न कुछ भजन-पूजन करते रहने में भी हर्ज नहीं, उतने से भी रुचि बदलती है और प्रवाह बनता है, पर इस तथ्य को भुलाया नहीं जाना चाहिए कि वाण की बेधक शक्ति इस बातपर निर्भर रहती हैं कि धनुष्य की प्रत्यंचा को कितना खींचा जा सका और लक्ष्य बेध में कितने एकाग्र मनोयोग का उपयोग किया गया। आत्मिक सफलताओं का रहस्य एक ही है कि ‘निष्ठा’ का महत्व कितना समझा गया और उसे कितनी गम्भीरतापूर्वक अपनाया गया। कर्मकाण्ड तो उपचार भर है। चमत्कार तो निष्ठा की प्रखरता एवंपरिपक्वता ही दिखाती है।

युग संधि महापुरश्चरण को लक्ष्य समष्टिगत सन्तुलन को बनाने एवं अदृश्य वातावरण में अनुकूलता उत्पन्न करने की जानकारी सभी को हैं। उसे विशिष्ट आत्माओं द्वारा सम्पन्न किया गया इस युग का अभूत पूर्व सहकारी धर्मानुष्ठान समझा जा सकता है और यह विश्वास किया जा सकता है कि इस माध्यम से सूक्ष्म अन्तरिक्ष में उत्पन्न हुई अदृश्य ऊर्जा प्रस्तुत परिस्थितियाँ को बदलने में आसाधारण भूमिका सम्पन्न करके रहेगी। युग परिवर्तन की सम्भावना कोटि-कोटि मानवों को उज्जवल भविष्य का आश्वासन दे सकने में समर्थ हैं।

यह सर्वजनीन सार्वभौम हित साधन की-सृष्टि सन्तुलन की-अवतारी प्रक्रिया की चर्चा हुई। अब साधकों के निजी लाभ पर विचार करने से प्रतीत होता है कि वे भी इस प्रक्रिया को अपनाकर कम लाभ में न रहेंगे। ‘निष्ठा’ की उपलब्धि इतनी महान है कि उसे पारस मणि की, कामधेनु की उपमा देने में तनिक भी अतयुक्ति नहीं हैं। आदर्शवादिता के प्रति आगध श्रद्धा और उन्हं क्रियान्वित कर सकने की सहसिकता को ‘निष्ठा’ कहते हैं। प्रकारान्तर से यही देवत्व है। भौतिक और आत्मिक सिद्धियों का भाण्डागार इसी भाव गरिमा के अन्तराल में छिपा रहता हैं जो अन्तराल के उस मर्मस्थल को जगाने की समर्थता को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। यह उपलब्धि जिसने हस्तगत कर ली उसके लिए संसार में ऐसा कुछ शेष नहीं रह जाता जो इस उपलब्ध के बदले सम्भव न हो सकें।

संसार में अनेक प्रगति क्षेत्र है। उन सब में निष्ठा की प्रखरता ही जीतती है। यहाँ तक कि भौतिक सफलताओं में ही दृढ़ निश्चयी, पराक्रमी आर साहसी ही सफल होते हैं। शेष तो ऐसे ही असमंजस के पिछड़ेपन से ग्रसित न रहकर किसी प्रकार जिन्दगी के दिन काटते रहते हैं। भौतिक क्षेत्र में तो कईवार छद्य और भाग्य भी काम दे जाता है ओर कु तात्कालिक सफलताएँ सामने ला खड़ी करता है भले ही सत्परिणाम उत्पन्न करने एवं स्थिर रहने योग्य न बन सकें। यह अपवाद आत्मिक क्षेत्र में नहीं देखे जाते। उसमें ओजस्वी, मनस्वी और तपस्वी ही सफल होते हैं। यह तीनों ही विभूतियाँ ‘निष्ठा’ की ही परिणितियाँ मानी जाती हैं।

युग सन्धि महापुरश्चरण की भागीदार सामान्य स्तर का पूजा-पाठ करते रहने वालों की नहीं वरन् ‘नैष्ठिकों’ को मिली हैं। आस्ि को परिपकव करने के लिए उन्हें कई आदर्शवादी अनुशासन पालने के लिए वचनबद्ध किया गया है। गुरुवार को अस्वाद, ब्रह्मचर्य एवं मौन की व्रत शीलता है साथ ही यह भी अनुबंध है कि पाँच माला या आधा घण्टे का जप ध्यान खाने तक न सही सोने तक तो पूरा कर ही लिया जाय। व्यतिरेक व्यस्तता से नहीं मनःस्थिति की दुर्बलता एवं बहानेवाजी से हो ही होता रहता हैं। आपत्ति कालीन अपवाद तो यदा-कदा ही आते हैं और उनमें आगे चलकर छूटी हुई उपासना को पू कर लेने की सुविधा भी है। पर निष्ठा के अभाव में लड़खड़ानें वाले अन्तराल में तो नियमित पूजा-पाठ तक नहीं बन पड़ता। फिर व्यक्तित् के उच्चस्तरीय बनाने वाले जिस आन्तरिक पराक्रम की आवश्यकता है वह तो बनेगा ही केसे ? ऐसी मनोभूमि के लोग ही असफलता का रोना रोते और उसका कारण यहाँ-वहाँ-ढूँढ़ते रहते हैं। जब कि निष्ठा का अभाव ही अशक्तता के रुप में असफलता का एकमात्र निमित्त कारण हैं।

अगले दिनों मनस्वी प्रतिभाओं की आवश्यकता पड़ेगी। तेजस्वी व्यक्तित्व ही बड़े कार्यो का भार वहन कर सकेंगे। उनका उत्पादन इन्हीं दिनों आवश्यक है। देवत्व की प्रगति में तपश्चर्या ही माध्यम बनती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक समझा गया कि निष्ठा का अभयास कराया जाय। युग सन्धि महापुरश्चरण का जहाँ एक समष्टिगत उर्त्कष एक उद्देश्य है वहाँ दूसरा यह भी है कि निष्ठावाद महामानवों की पीढ़ी उत्पन्न करने के लिए उन्हें सर्वप्रथम उपासनात्मक अभ्यास सौंपा जाय। तद्नुसार एक लाख साधकों द्वारा प्रतिदिन 4 करोड़ गायत्री जप के युग पुरश्चरण की योजना बनाई गई है। यहाँ यह स्मरणीय है कि इसमें मात्र उनहीं को लिया गया है जो निष्ठा को परिपक्व करने वाले अनुबन्धों का कड़ाई से पाल कर सकें। यही कारण है इस युग साधना के साध “नैष्टिक” कहलाते है। निष्ठा से उत्पन्न ऊर्जा ही आत्मकल्याण और लोकनिर्माण के उीय पक्षीय प्रयोजन पूरी कर पाती है। युग सृजन में यह मानवी निष्ठा ही दिव्य ऊर्जा के रुप में परिणित होगी। व्यष्टि में देवत्व के उदय और समष्टि में स्वर्गीय वातावरण की आशा अपेक्षा इसी आधार पर की गई कि निष्ठावानों का समुदाय सृजन शिल्पियों के रुप में भागीरथ, हनुमान, अर्जुन जैसे पराक्रम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होंगे और समय की आवश्यकता पूरी करेंगे।

उपासना में अधिकाधिक निष्ठा का समावेश, युग साधकों की साधना प्रखरता बनाने के लिए अनिवार्य समझा जाना चाहिए। निष्ठा का जितना ही समावेश हो सकेगा, नैष्ठिक उपासकों द्वारा चलायें जाने वाले युग सन्धि महापुरश्चरण के सत्परिणाम उसी अनुपात में फलित होंगे।

युग पुरश्चरण की नैष्ठिक साधना के अतिरिक्त सामान्य जनों को गायत्री उपासना में प्रवृत्त कने का उत्तरदायित्व भी युग साधकों को सौंपा गया है। सामान्य उपासक एकदम तो युग पुरश्चरण जैसी निष्ठ प्रधान साधनाओं में संलग्न नहीं हो सकते। उन्हं क्रमशः ही नैष्ठिक उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता हैं। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हे वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।

‘नियमित उपासना’ में समय एवं संख्या का बन्धन तो नहीं है, पर नियमितता को जीवन्त रखने के लिए इतना तो करना ही होगा कि जो भी करना हो उसे संकल्पपूर्वक तथा नियमित रुप से किया जाय। अस्त-व्यस्तता अश्रद्धा की परिचायक है। निष्ठा में अनुशासन जुड़ा हुआ है। भले ही न्यूनतम मात्रा में उपासना की जाय, पर उसमें ढ़ील-पोल नहीं चलनी चाहिए।

शारीरिक नित्य कर्मो की तरह मानसिक स्वस्थता बनाये रखने के लिए उपासना का अवलम्बन आवश्यक है। समय का अभाव य अन्य कोई कारण हो तो न्यूनतम उपासना पाँच मिनट की भी हो सकती है। स्नान की असुविधा हो तो मौन मानसिक जप किसी भी स्थिति में एवं किसी भी समय किया जा सकता है। जप के साथ ध्यान आवश्यक है। युग पुरश्चरण में शक्ति संचार की उच्चस्तरीय ध्यान धारणा का समावेश है। पाँच मिनट की न्यूनतम गायत्री जप उपासना में प्रकाश मंडल के अर्न्तगत महाप्रज्ञा का गायत्री माता का-ध्यान किया जाना चाहिए। प्रातःकाल का स्वर्णिम सूर्य-उसकी दिव्य किरणों का साधक की काया में प्रवेश-स्थूल शरीर काय कलेवर में सत्पुरुषार्थ-सूख्म शरीर-ज्ञान संस्थान में सद्भाव-कारण शरीर-अन्तःकरण में सद्भाव के रुप में सविता प्रकाश में अनुभूति। यही है वह सरलतम ध्यान जो पाँच मिनट की नितय जप साधना करने के रुप में चलता रह सकता है।

यह सरलतम साधना समय, स्थान, स्नान आदि के अनुबन्धों से तो मुक्त रखी गई है, पर निष्ठा को जीवन्त बनाये रहने के लिए इतना अनुशासन तो उसमें भी रखा गया हैं कि खाने या सोने से पूव उसे कर ही लिया जाय। इतनी नियमितता बनी रहने से भी उस निष्ठा का परिपोषण होता रहेगा जो उपसनात्मक कर्मकाण्डों में जीवन प्राण मानी जाती है। अस्त-व्यस्त रखने पर तो स्वास्थ्य, साधना, शिक्षा, व्यवसाय आदि किसी में भी सफलता नहीं मिलती फिर उपासना को ही उस स्थिति में फलवती होने का अवसर कैसे मिल सकता है ?

इस न्यूनतम किन्तु नियमित साधना को अपनाने के लिए प्रज्ञा युग के प्रत्येक व्यक्ति को कहने एवं सहमत करने का प्रयत्न चलते रहना चाहिए। प्रज्ञा पुत्रों का सर्म्पक जिनसे भी उन्हें आत्मिक पुरुषार्थ और प्रकारान्तर से वातावरण अनुकूलन में योगदान के लिए तथ्य समझाते हुए अनुरोध किया जाय तो कोई कारण नहीं कि इस पाँच मिनट जितने सरलतम पुरुषार्थ को अपनाने पर इनकार ही सहमत होंगे। कितनों से ही कहने पर कुछ तो अवश्य ही सहमत होंगे। जिनके अन्तराल में सुसंस्कारिता अवश्य ही सहमत होंगे। उन्हें इस आधार पर उपलब्ध होने वाली युग चेतना से लाभान्वित होने का सहज ही उत्साह उभरेगा। अपेक्षा की जानी चाहिए कि यह अनुरोध टाला कम और अपनाया अधिक जायेगा।

नैष्ठिक साधकों को यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि उपासना के अखाड़े में बलिष्ठता का-निष्ठा का-अभ्यास करना होता है, पर उस उपार्जित सामर्थ्य को इतने छोटे क्षेत्र में कैद नहीं रखा जाता। पहलवान दंगल पछाड़ते और दूसरे प्रकार के पराक्रम प्रस्तुत करते हैं। ठीक यही बात नैष्ठिक साधकों के सम्बन्ध में भी हैं। वे निर्धारण, जप संख्या एवं व्रतशीलता का उपक्रम चलाते हुए उपासना क्षेत्र के प्रयोगकर्त्ता तो समझे जा सकते हैं। पर बात इतने भर से बनती नहीं। बढ़ना और आगे पड़ता है। गाड़ी एक पहिये नहीं दो से चलती है। ताली एकनही दो हाथ से बजती है। संता-नोत्पादन एक नहीं नर-नारी का युग्म करता है। प्रगति पथ की लम्बी यात्रा एक पैर से नहीं दोनों सही होने पर बन पड़ती है। उपासक को साधक भी बनना पड़ता है। उत्कृष्ठ चिन्तन के साथ आदर्श कर्तव्य आवश्यक है। देवत्व के पक्षधर मात्र अपने को सन्त, सज्जन बना कर ही नहीं रह जाते वरन् उन्हें लोकमंगल की साधना में निरत रहकर सुसंस्कारिता परिपक्व करनी होती है। एकाँगी अभिरुचि रखने वाले पूजा परायणों की असफलता का एक मात्र कारण यही होता है कि वे परमार्थ परायणता में रुचि नहीं लेते और लोकूँगल को अपनी संचित संकीर्णता के कारण स्वार्थ सिद्धि के लिए आवश्यक न मानकर उसमं निरत बने रहते है। यदि यह अपूर्णता बाधक न रहे तो काँने, लँगड़े जैसी कुरुपता और अर्धांग पक्षाघात से पीड़ितों जैसी असमर्थताजन्य असफलता का सामना क्यों करना पड़े ? उपासना का दूसरा पक्ष है- साधना। एक पख् से पक्षी नहीं उड़ता, इसी प्रकार लोक-कल्याण के लिए तत्पर हुए बिना किसी को भी आत्मकल्याण का लाभ मिल नहीं सकता। इस सच्व्चाई को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही श्रेयस्कर रहेगा।

युग सन्धि पुरश्चरण के नैष्ठिक भागीदारों का शुभारम्भ तो पूजा, उपासना के अमुक विधि-विधान पूरे करने से ही कराया गया है, पर उन्हें उतने छोटे दायरे तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। मात्र वातावरण संशोधन का उपक्रम ही पर्याप्त नहीं, युग सृजन में हमारा प्रत्यक्ष योगदान भी सम्मिलित रहना चाहिए। नवनिर्माण की प्रस्तुत गतिविधियों को विशुद्ध रुप से सृष्टा की इच्छा आवश्यकता समझा जाना चाहिए और पराक्रम भरे अनुदान की माँग को थोड़ी-सी पूजा-पत्री को पर्याप्त मानकर अनसुनी नहीं करना चाहिए। युग पुरश्चरण के नैष्ठिक उपासकों को यह भी समझने की आवश्यकता है कि महाप्रज्ञा की आराधना में इन दिनों नव-सृजन के निमित्त भाव भरे अनुदानों को भी सम्मिलित रखने की आवश्यकता है।

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