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Magazine - Year 1980 - Version 2

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न्यूनतम कार्यक्रम जो सभी प्रज्ञा परिजनों को पूरे करने हैं

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नवरात्रि के पावन पर्व पर जब सर्वत्र नव सृजन की उमंगे उभर रही हैं ओर प्रज्ञापुत्र महाकाल के निमन्त्रण पर भावभरे कदम उठाने के लिए मचल रहे हैं, तब उस समुदाय को भी सर्वथा निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए जो परिस्थितिवश अधिक कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं है। ऐसे परिजनों को भी ऐसे हलके कदम उठाने चाहिए जो नितान्त व्यस्त एवं परिस्थितिवश लोकमंगल के लिए कुछ प्रत्यक्ष अनुदान प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं। यहाँ तक कि अपनी निजी साधना उपासना का भी नियमित उपक्रम बन नहीं पड़ रहा है। इस समुदाय के लिए एक अति सरल पंचसूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया है और उसको अपनाने के लिए नवरात्रि पर्व को ही शुभारम्भ के मुहूर्त के रुप में मनाने के लिए अनुरोध किया गया है।

(1) न्यूनतम उपासना-

उपासना में जिनकी रुचि नहीं हैं वे सबेरे सोकर जागने और रात्रि को बिस्तर पकड़ने के बाद पाँच मिनट को महाप्रज्ञा का प्रकाशपुँज के रुप में ध्यान कर लिया करें। प्रज्ञा का अधिष्ठाता सविर्ता को माना गया है। सविता अर्थात् प्रकाशपंज सूर्य। प्रभात काल का उदीयमान सूर्य अपनी प्रभातकालीन उपासना का माध्यम बने और रात्रि को सोते समय अस्त होते हुए सूर्य को मानसिक नमन किया जाये। यह पाँच-पाँच मिनट का उभयकालीन सविता वन्दना करने का क्रम चल पड़े तो इससे न समय संबंधी कठिनाई पड़ेगी और न आस्तिकता-नास्तिकता के जंजला बाधक बनेंगे। प्रकाशपुँज के ध्यान में तेजस् का साथ सर्म्पक जुड़ता है और उससे प्रकाश की दिशा में प्रगति देने वाला साहस भी जगता है।

उस दृश्य ध्यान के साथ-साथ इतना भर जोड़ना चाहिए कि जीवन के रुप में प्रभातकालीन अरुणोदय जैसा अनुदान किसी विशेष प्रयोजन के लिए मिला। रात्रि को सोते समय अस्तकाल की तरह नियति ने उसे वापस ले लिया। प्रकाराँतर से प्रभात संध्या को जन्म और अस्त संख्या को मरण कहा जा सकता है। इन दोनों तथ्यों को आमतौर से विस्मृति के गर्त में ही पड़ा रहने दिया जाता है। यह सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन के सौभाग्य और उसके साथ जुड़ी जिम्मेदारी तथा संभावना पर विचार करने का तनिक-सा भी अवसर मिलेगा और रात्रि में बिजली कौंधने की तरह सघन अंधकार में भी कुछ देखने और कुछ सोचने का ऐसा अवसर मिलेगा जिसे उज्जवल भविष्य की संभावनाओं के साथ पूरी तरह जोड़ा जा सके। इसी प्रकार सोते समय अस्त सूर्य से तार्त्पय जीवन समापन मरण से जोड़ा जा सके और यह सोचा जा सके कि उस सुनिश्चित संभावना को पश्चाताप भरी न होने देने के लिए अभी से क्या किया जा सकता है ? तो समझना चाहिए कि प्रस्तुत ढर्रे पर नये सिरे से विचार करने का अवसर मिला। अस्तु इस न्यूनतम उपासना उठते समय अरुणोदय और सोते समय सूर्यास्त का ध्यान करने की प्रक्रिया का शुभारम्भा इन्हीं दिनों कर देना चाहिए।

(2) पाक्षिक युग निर्माण की अनिवार्य सदस्यता-

प्रगति पथ पर दूसरा कदम पाक्षिक युग निर्माण योजना मंगाने का उठाना चाहिए। मिशन के बौद्धिक प्रतिपाद “अखण्ड ज्योति” में छपते हैं। उनके क्रियान्ययन का मार्गदर्शन इस पाक्षिक में छपा करेगा। इस प्रकार ज्ञान और कर्म का समन्वय एक बड़े अभाव की पूर्ति करेगा। अस्तु, पाक्षिक का चंदा आठ रुपया अतिरिक्त रुप में भेजने की गुँजायश इन्हीं दिनों निकालनी चाहिए।

परिजनों में से अधिकाँश को पता है कि मिश्न की गतिविधियों को अग्रगामी बनाने के लिए लम्बे समय से साप्ताहिक युग निर्माण योजना का प्रकाशन चल रहा हैं। उसका वार्षिक चंदा 16 रुपये हैं। उसकी उपयोगिता असंदिग्ध होते हुए भी आर्थिक कठिनाई अनुभव करते हुए अधिकाँश प्रज्ञापरिजन उसे पढ़ नहीं पाते थे और प्रतिपादन के साथ-साथ मार्गदर्शन की उपलब्धि से वंचित ही रह जाते थे। अब उसका चन्दा आधा घटा दिया गया है। इसके लिए उसे साप्ताहिक से पाक्षिक करना पड़ा है और आठ रुपए का संतुलन बिठाना पड़ा है। अब एक स्थान पर यह दोनों पत्रिकाएँ मँगायी जायें और अंखड ज्योति का चन्दा 12 रुपये के स्थान पर 20 रुपये होगा ऐसा समझा जाय। याँ हिसाब की दृष्टि से दोनों अलग-अलग ही रहेगी और अखण्ड ज्योति का चंदा “अखण्डज्योति” के पुराने पते पर, युग निर्माण योजना का चन्दा “गायत्री तपोभूमि संस्थान” के पते पर अलग-अलग भेजना पडेगा। तो भी पाठकों के लिए इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। अब इन्हें 12 रुपये के स्थान पर 20 रुपये खर्च करने चाहिए और नयी पाठ्य सामग्री को भी उसी श्रद्धा के साथ पढ़ना चाहिए जतना कि अखण्ड ज्योति को पढ़ा जाता है। साप्ताहिक युग निर्माण योजना को पाक्षिक अक्टूबर से किया जा रहा हैं। अपेक्षा यही की गई है कि “अखण्ड ज्योति” परिजन उसके आठ रुपए गायत्र.ी तपोभूमि के पते पर इन्हीं दिनों भेजकर उसके प्रथम प्रकाशन से ही अपनी नयी सदस्यता चालू कर लेंगे। परिजनों के आर्थिक दबाब को ध्यान में रखकर मासिक नयी प्रकाशित होने वाली पत्रिका “युग निर्माण योजना” को भी बन्द किया जा रहा है। उसकी आवश्यकता को भी पाक्षिक द्वारा पूरा किया जायेगा।

दोनों पत्रिकाओं को प्राणप्रिय समझें, उनसे अन्यों को लाभान्त्रित करने का नया प्रयास आरम्भ करं। इसके लिए सर्वप्रथम अपने निजी घर परिवार के सदस्यों से श्रीगणेश किया जाय। उनमें से जो शिक्षित है उन्हं पढ़ने के लिए आग्रहपूर्वक उत्साहित किया जाय और जो बिना पढ़े हैं उन्हें पढ़ों द्वारा सुनाये जाने का प्रबन्ध किया जाय।

एक तरीका यह भी हो सकता है कि घर में रात्रि के समय घण्टे का स्वाध्याय एवं सत्संग मिरित कार्यक्रम चलें। शिक्षितों में से कोई एक लेख नित्य पढ़े और अन्य सब लोग उसे सुनें। इस प्रकार पूरे एक महीने के लिए ओध घण्टा नितय सुनाये जाने योग्य सामग्री मिलती रहेगी। यह प्रक्रिया रुचिकर बने तो उसे कथा प्रसंगो के साथ जोड़कर एक घण्टे का बनाया जा सकता है। समय बढ़ने के अनुसार उसका प्रीव और सतपरिणाम बढ़ना भी निश्चित है। परिवार निर्माण की दृष्टि से यह छोटा कदम भी आगे चलकर इतने सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकता हैं जिसकी आज तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

(3) जनसर्म्पक के लिए समयदान

जनसर्म्पक के लिए समयदान का अनुरोध इन दिनों प्रज्ञा परिजनों से विशेष रुप से किया जा रहा हैं। जिनकी परिस्थिति इसके लिए अनुकूल नहीं है जो बाहर जाने की परिस्थिति में नहीं हे वे यह नया तरीका अपनायें कि अपने सर्म्पक में घर या दुकान पर आने वालों से अन्य बातों के साथ-साथ कहीं न कही युग निर्माण मिशन और उसकी लाभदायक गतिविधियों की चर्चा का समावेश किसी न किसी प्रकार कर ही दिया करें। इस प्रकार जन सर्म्पक के लिए न निकल सकने पर भी प्रकारान्तर से उसकी पूर्ति होती रहेगी। स्वयं न जा सकें तो आने वालों से चर्चा करते रहने का सिलसिला तो बिना किसी कठिनाई के चलता ही रह सकता है। युगनिर्माण सदस्यों को एक घंटा समय झोला पुस्तकालय चलाने के लिए जन सर्म्पक में देते हने के लिए कहा जाता रहा है। जिनकी परिस्थितियाँ वैसा करने की नहीं है। वे उसी कार्य को दूसरी तरह करते रह सकते हैं। हैण्डबैग में कुछ पत्रिकाएँ हर समय साथ रखी जाएँ और उपयुक्त आगन्तुकों को उन्हें देने वापिस लेने का श्री गणेश किया जाय। यह घर बैंठे झोला पुस्तकालय चलाने का न्यूनाधिक मात्रा में जनसर्म्पक के लि निकलने जैसा ही हो सकता है।

(4) नैष्ठिक साधकों के लिए अनुदान सत्र

युग सन्धि महापुरश्चरण की नैष्ठिक साधना में संलग्न साधकों के लिए इन दिनों हिमालय के धुवकेंद्र में विशिष्ठ अनुदान उपहार उतर रहे हैं। वे उस लाभ को अनायास ही उपलब्ध कर रहे हैं जिन्हं प्रातः और साँयकला ग्रहण करने का स्वर्णित सुअवसर निष्ठावानों को मिल रहा हैं। नवसृजन अभियान का जन समाज को मिल रहा है। नवसृजन अभियान का जन समाज को, भावपीढ़ी को जो लाभ मिलेगा उससे कहीं अधिक लाभान्वित प्रज्ञापुत्रों का वह समुदाय होगा, जिसमे नैष्ठिक भागीदार प्रमुख है।

इस समुदाय के लिए कुछ विशेष परामर्श एवं अनुदान देने के लिए पाँच-पाँच दिन के सत्र लगाने का उच्चस्तरीय संदेश इन्हीं दिनों उतरा है। तदनुसार उसकी व्यवस्था बना दी गई है। उद्घाटन प्रवास को कुछ दिन और आगे खिसका दिया गया है। वह गर्मी के दिनों में भी चलता रहेगा। शीतऋतु में कुछ समय मिशन के सूत्र संचालक को उद्घाटन समारोहों में बाहर जाना है। इन दिनों को छोड़कर शेष दिनों में पाँच-पाँच दिन के 15 सत्र निर्धारित किये गये है। शीतऋतु में महापुरश्चरण के नैष्ठिक भागीदारों के लिए जो परामर्श अनुदान सत्र आयोजित किये गये हैं, वे इस प्रकार हैं (1) 20 से 24 नवम्बर (2) 26 से 30 नवम्बर (3) 1 से 5 दिसम्बर (4) 7 से 11 दिसम्बर (5) 17 दिसम्बर (6) 16 से 23 दिसम्बर (7) 1 जनवरी से 5 जनवरी 91 (9) 7 से 11 जनवरी (6) 13 से 5 जनवरी (10) 16 से 23 जनवरी (11) 1 से 5 फरवरी (12) 7 से 11 फरवरी (13) 13 से 17 19 से 23 फरवरी (15) 25 फरवरी से 1 मार्च।

इन सत्रों में पड़ोसियों, पर्यटकों, स्त्री बच्चों एवं कठष्ठ पीड़ितों, मनोकामना पूर्ण करने वालों को लेकर चलने का निषेध है। पर्यटन अथवा स्वार्थ विशेष के लिए चल पड़ने वाली भीड़ को साथ लाने से शिविरार्थियों का ध्यान बँटा रहेगा और व पूरे मन से बात सुनने समझने की अपेक्षा जहाँ तहाँ भटकते फिरेंगे। अस्तु मात्र नैष्ठिक साधकों को ही इन सत्रों में बुलाया गया है। जिन्हें आना हो वे नवरात्रि के समय ही यह निश्चित कर लें कि किसको कब आना है। दीपावली तक यह स्थान सुरक्षित करने की व्यव्स्था पूर्ण करनी चाहिए। बाद में आवेदन भेजने वालों को अगली शीतऋतु के लिए ठहरना पड़ेगा क्योंकि गर्मियों में उद्घाटन प्रवासों पर जाने के कारण नैष्ठिक श्विर सम्पन्न नहीं हो सकेंगे।

(5) नियमित अशंदान

पाँचवा कदम यह है कि अगले दिनों नव-जागरण के संदेशवाहक परिव्राजकों का एक बड़ा समुदाय कार्य क्षेत्र मं उतरेगा। उनका प्रशिक्षण चलेगा। कार्यक्षेत्र में भेजने का मार्ग-व्यय तथा शरीर निर्वाह के खर्च का भी प्रबन्ध करना पड़ेगा। इसकी पूर्ति के लिए उनका भी योगदान रहना चाहिए, जो प्रज्ञा-पुत्रों की अग्रिम श्रेणी में नहीं है और निजी व्यवस्था के सीमित क्षेत्र में ही कुद पढ़ते और कुछ सोचते रहते हैं। इसके लिए लम्बे समय से युग निर्माण परिवार के परिजन अपने घरों में ज्ञान घट निर्माण परिवार के परिजन अपने घरों में ज्ञान घट स्थापित कर दस पैसा नित्य निकालते रहे हैं। महिलाओं को यह स्थापना धर्मघट के रुप में करनी चाहिए।

इस स्तर के परिजनों से अपेक्ष की गई है कि वे ब्रह्मभोज की इस पुनीत प्रक्रिया में अपने योगदान का हाथ बटायें। भले ही वह कितना ही स्वल्प क्यों न हो। परिव्राजकों का औसत निर्वाह व्यय 150 मासिक (अर्थात् 5) प्रतिदिन आता है। इसमें उनका दोनो समय का भोजन, एक समय का जलपान, वस्त्र, विस्तर एवं तेल, साबुन हजामत आदि का सभी खर्च शामिल है। ब्रह्मभोज में पंडित को एक समय पक्वान्न मिष्ठान्न खिलाने पर इससे कम नहीं वरन् अधिक ही व्यय पड़ जाता हैं, फिर परिव्राजक को पूरे दिन का अन्न-वस्त्र आदि का निर्वाह औसत भारतीय स्तर को रखने पर किसी भी प्रकार कम में नहीं होता।

जितने अपने यहाँ ज्ञानघट नहीं रखे है और जो मिशन के लिए कोई नियमित अनुदान नहीं देते वे वर्ष के लिए कोइ्र नियमित अनुदान नहीं देते, वे वर्ष में कम से कम एक दिन का परिव्राजक का व्ययभार उठाने और साल में पाँच रुपये जैसी राशि निकालने का प्रयत्न करें। यह सच्चे कुम्हार से ढक्कन वाले मिट्टी के छोटे बड़े बनवा लें और उन्हें पीले रंग से रंग लें। इन धर्मघटों को नवरात्रि पूर्णाहुति के समय समारोह पूर्वक महिलाओं को वितरित किया जाएं तथा उनरसे नियमित का मुट्ठी अन्न प्रतिदिन ब्रह्मभोज के लिए निकालने का अनुरोध किया जाय।

(6) चरण वन्दन और चरण स्थापना

महाप्रज्ञा का आलोक जन-जन तक फैलाने के लिए गाँव-गाँव में प्रज्ञा संस्थान स्थापित किये जाने चाहिए। जहाँ बड़ी स्थापनाएँ सम्भव नहीं है उनके लिए छोटे, कम लागत वाले प्रज्ञा संस्थानों की रुपरेखा भी बनाई गई है। इस सम्बन्ध में “गायत्री प्रज्ञापीठ, स्वरुप और कार्यक्रम” पुस्तिका में सविस्तार विवरण दिया गया है।

इतना भी सम्भव न हो सके तो अपने घरों में ही गायत्री माता के चरण की परम्परा आरम्भ करनी चाहिए। घर के सभी सदस्य अपने से बड़ों की प्रणाम् करने का सिलसिला आरम्भ करें। श्रद्धा सर्म्बधन के लिए यह अति उपयोगी कार्यक्रम है।

(7) सदवाक्य लेखन अभियन

इन्ही दिनों प्रत्येक शाखा को अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता का वातवरण निर्मित करने के लिए प्रारम्भिक और छोटा-सा कदम सद्वाक्य लेख अभियान के रुप में अपनाना चाहिए। इस तरह के सद्वाकय युग निर्माण योजना के प्रकाशनों में कई स्थानों पर दिये गये हैं कुछ सद्वाक्य यहाँ भी दिये जा रहे है। इनका भी उपयोग किया जा सकता है।

1. जो बच्चो को सिखाते है, उन पर बड़ खुद अमल करें तो यह संसार र्स्वग बन जाय।

2. दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो जो तुम्हें अपने लिए पसन्द नहीं।

3. असफलता केवल यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं हुआ।

4. पाप अपने साथ रोग, शोक, पतन और संकट भी लेकर आता है।

5. उन्हें मत सराहो जिनने अनीतिपूर्वक सफलता पाई ओर सम्पत्ति कमाई।

6. धन से ज्ञान बड़ा है क्योंकि धन हम रखते हैं और ज्ञान हमारी रखवाली करता है।

7. बुद्धिमान मूर्खो से इतनी शिक्षा प्राप्त करते हैं जितनी मूर्ख बुद्धिमानों से नही।

8. गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमं संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।

9. सभ्यता का स्वरुप है सादगी, अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता है।

1å. परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी और कर्तव्य परयणों के लिए सुरक्षित है।

11. शान्ति से क्रोध को, भलाई से बुराई को, शौर्य से दुष्टता को और सत्य से असत्य को जीतें।

12. ईर्ष्या आदमी को उसी तरह खा जाती है जैसे कपड़े की कीड़ा।

13. शालीनता बिना मोल मिलती है, पर उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है।

14. पढ़ने योग्य लिखा जाय, इससे लाख गुना बेहतर यह है कि लिखने योग्य किया जाय।

15. ईश्वर ने आँख, कान दो-दो और जीभ एक दी है ताकि हम सुनें अधिक और बोले कम।

16. सबसे बड़ा दीन दुर्बला वह है जिसका अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं है।

17. अपनी रोटी मिल बाँटकर खाओ ताकि तुम्हारे सभी भाई सुखी रह सकें।

18. दूसरों के साथ वैसी उदारत बरतो जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है।

19. ईमानदार होने का अर्थ है हजार मनकों में अलग चमकने वाला हीरा।

20. जो अपनी सहायता आपन करने को तत्पर हैं ईश्व केवल उन्हीं की सहायता करता है।

21. बुद्धिमान वे हैं जो बोलने से पहले सोचते हें मूर्ख हैं जो बोलते पहले और सोचते बाद में है।

22. जीवन का अर्थ है-समय। जो जीवन से प्यार करते है व आलस्य में समय न गँवायें।

23. अपने को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो यदि इसमें सफल हो गये तो हर काम में सफलता मिलेगी।

24. जिसने जीवन में स्नेह सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया सचमुच वही सबसे बड़ा कलाकार है।

25.़ कुकर्मी से बढ़कर अभागा कोई नहीं क्योंकि विपत्ति में उसका कोई साथी नहीं रहता।

26. आय से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार सहते और कष्ट भोगते हैं।

27. कायर मृत्यु से पूर्व अनेकों बार मर चुकता है जबकि बहादुर को मरने के दिन ही मरना पड़ता है।

28. जिन्हें लम्बी जिन्दगी जीनी हो वे बिना कड़ी भूख लगे कुछ भी खाने की आदत न डालें।

26. शारीरिक, मानसिक और आर्थिक संयम बरतने वाले ही शक्तिशाली बन सकते है।

30. जो जैसा सोचता है और करता है-वह वैसा ही बन जाता है।

31. मनुष्य परिस्थितियाँ का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियन्त्रणकर्त्ता और स्वामी है।

युग सन्धि के बीजारोपण वर्ष की प्रथम नवरात्रि में समस्त प्रज्ञा परिजन नव सृजन के निमित्त नये उत्साह के साथ नये अनुदान प्रस्तुत करने की उमंगों से भरते जा रहे है। इन दिनों उनमें से कितनों के ही उदार साहस ऐसे होंगे, जिन्हें अविस्मरणीय एवं अनुकरणीय माना जाता रहे।

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