युग सन्धि की विषम बेला में जागृत आत्माओं को आह्वान
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यह युग परिवर्तन की प्रभात बेला है। अनौचित्य का अन्धकार, मरण के मुख में जा रहा है और उज्जवल भविष्य के अरुणोदय की मधुर मुस्कान क्रमशः कमल पुष्प् की तरह खिलती चली जा रही रही है। इस सुनिश्चित तथ्य से साझेदारी ग्रहण कर लेने में इतनी बड़ी दूरदर्शिता है जिसकी सराहना का कभी अन्त नहीं आ सकता। उषा काल की निजी सत्ता नगण्य होने पर भी वह भी वह इसलिए विश्व वन्दित होती है कि परिवर्तन काल में अग्रगामी ध्वजा पताका बनकर अपनी सामर्थ्य का, कहीं अधिक सदाश्यता पूर्ण परिचय देती है। इस बसन्त में हर पेड़ पादप को पुष्पित फलित होने का अवसर मिल सकता है। शर्त अनुकूल भर की है। प्रतिकूलता अपनाने, मुख मोड़ लेने पर तो स्वाँति वर्षा भी किसी का कुछ भला नहीं कर सकती पबकि उसके तनिक से सहयोग से सीप को मोती, केले को कपूर बनाने का अनायास ही अजस्त्र सौभाग्य मिलता रहता है।
युग सिन्ध में पज्ञावतार की भुमिका ऐसी है जिसे पिछले सभी अवतारों की तुलना में अधिक व्यापक और अधिक स्थायी कहने में संकोच की गुजाइश नहीं है। साथ ही यह भी निश्चित है कि तुलनात्मक प्रखरता के अनुपात में उसके सहयोगी भी अधिक श्रेयाधिकारी बनेगें। अन्धकार में भी जागृति का सन्देश देने वाला उलूक तक जब लक्ष्मी का वाहन बन सकता है तो जागृत आत्माओं के द्वारा युग सृजन के निमित्ति अपनाई गई भुमिका क्यों उन्हें कृत-कृत्य बनने का अवसर न देगी?
इन दिनों सभी जागृत आत्माओं को महाकाल ने नव-सृजन में सहयोग देने के लिए भाव-भरा निमन्त्रण दिया है, इसलिए नहीं कि उनके बिना सृष्टा का संकल्प पूरा न हो सकेगा। सर्व समर्थ सत्ता के संकेतों पर यहाँ उदय-अस्त से लेकर जन्म-मरण तक के कित करने वाले परिवर्तन होते रहते हैं। वह पूर्व काल में भी अनेक अवसरों पर असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने की ब्युह रचना करता और सफल होता रहा है। इस बार उसके बलबूते से बाहर कुछ भी नहीं है। अभीष्ट परिवर्तन की भविष्य वाणी सुनिश्चित शाब्दों में की जा सकती है। जागृतो को युग निमन्त्रण मिलने का तार्त्पय इतना ही है कि स्वनाम धन्य बन सकें और भावी पीढ़ी के लिए आदर्शवादी मार्गदर्शक बनने का श्रेय प्राप्त कर सकें। भगवान ने अपने सच्चे भक्तो को सदा यह एक ही बहुमूल्य वरदान दिया है। अन्यान्यों को तो मनोकामनाओं में खेलतें रहने के लिए खिलौने झुनझुने देकर पीछा छुड़ाने में ही उन्होने औचित्य समझा हैं।
ढलाई और गलाई का दुहरा उपक्रम इन दिनों चल रहा है। महाकाल अनगढ़ एवं जीर्ण-शीर्ण को जलाने-गलाने क साथ-साथ उसे उपयोगी उपकरणों के साँचें में ढालने के लिए इन दिनों व्यस्त और व्यग्र है। काम का विस्तार इतना बड़ा है कि कतिपय प्रयोजनों के लिए सहकारियों की जरुरत पड़ गई है। सहयोगियो के स्वल्प सहयोग से भी सफलता सुनिश्चित है। जो इस प्रयोजन में सम्मिलित होंगें, उन्हे श्रेय के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष अनुदानों में से एक की भी कमी न पडे़गी।
सामर्थ्य का स्त्रोत तो जनता है, पर उसे जगाने वाले प्रहरियों को ही अग्रिम भुमिका निभानी पड़ती है। घडी़ चलती तो तभी है जब उसके सभी कल पुर्जे सहयोग पूर्वक काम करते हैं। इतने पर भी यह रहस्य किसी से छिपा नहीं है कि उन करने का उत्तरदायित्व चाबी पर ही आता है। चाबी मरोड़ी जाती है तो फनर कड़ा हो जोता हैऔर उसके दबाब से सभी कलपुर्जे हरकत में आते हैं। यदि चाबी ढीली हो-फनर अड़ गया हो तो फिर समझना चाहिए कि अन्य कलपुर्जों के सही होने पर भी घड़ी नई और ठीक होन पर भी समय बताने की सारी व्यवस्था ठप्प पड़ी रहेंगी और वह बहुमूल्य यन्त्र बच्चों के खिलौने जैसे बन कर रह जायेंगे।
यहाँ चर्चा उस तन्त्र की हो रही है जो गतिशीलता उत्पन्न करने के लिए विशेष रुप् से उत्ततरदायी है। शरीर में हृदय का स्थान मुट्ठी जितने का आकार का है किन्तु समस्त शरीर को गतिशील रखने की जिम्मेदारी उसी की है। हृदय रक्त पहुँचाने और फेफड़े सफाई करने में प्रमाद बरतने लगें तो समझना चाहिए अन्यान्य अवयवों की क्षमता एवं विशेषता का कोई उपयोग न रह जायद्धरण इसलिए प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि नवनिमार्ण की भूमिका जन समुदाय में विद्यमान जागृतों ओर जीवन्तों को ही निभानी होगी। जनता को वे ही प्रेरणा देते हैं। प्रसुप्ति को जागृति में वे ही बदलते हैं। संकीर्णता और कृपणता के बन्धनों में बन्धनों में बँधी हुई जनशक्ति को सत्प्रयोजनों में निरत करने की जिम्मेदारी उन्ही की है। यदि वे उनींदे पड़े रहें तो फिर समझना चाहिए लोकमानस का कुम्भकरण पौराणिक दैत्य से भी अधिक आलसी सिद्ध होगा। वह छे महीने तो क्या छै हजार वर्षो में भी करवट बदलने को सहमत न होगा।
इसलिए युग सन्धि के इस बीजारोपण वर्ष में सभी प्रज्ञापुत्रों को जागृत और जीवन्त होने के लिए कहा गया है। आदर्शवादी कल्पना,मान्यता, भावना अपने समय पर अपने स्थान पर उपयुक्त है, पर इतने भर से काम चलता नहीं। मनमोदक खाने से किसका पेट भरा है। शेख चिल्ली को उसका मन चाहा गृहस्था कहाँ मिला था। आदर्शवादिता अपनाने में अपने अभ्यस्त चिन्तन और निर्धारित जीवनचर्या में क्रान्तिकारी उलट-पुलट करनी होती है। जो ऐसा साहस जुटा पाते हैं जुटाने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करतेहैं उन्हीं को साधक कहतें हैं। साधना से सिद्धि मिलने का सिद्धान्त सुनिश्चित है। सिद्धि का तात्पयै जादुई चमत्कार दिखा कर किसी को अचम्भे में डालना नहीं वरन् यह है कि अपनी प्रबल मनस्विता और पुरुषार्थ परायणता के सहारे अभीष्ट लक्ष्य तक हर कीमत पर पहुँच कर ही रहा जाए। युग शिली यदि यह अनुभव करते हैं कि महाकाल ने इन दिनों उनके लिए युग सृजन की साधना ही सर्वोपरि सहत्व की समक्षी और निर्धारित की है तो फिर उन्हें अंगद, हनुमान, अर्जून, विवेकानन्द, रामतर्थ, गोविन्दसिंह, समर्थरामदास चाणक्य, बुद्ध, महावीर, गाँधी विनाबा आदि के चरणचिन्हों पर चलते हुए युग धर्म के निर्वाह में एक निष्ठ भाव से लग जाना चाहिए। इसके लिए प्रवचन कला इतनी प्रभावी नहीं हो सकती जितनी कि अपना आदर्शवादी उदाहरण प्रस्तुत कर सकने की साहसिकता। इन दिनों इसी उभार की अत्यधिक आवश्यकता हैं।
इन्ही दिनों प्रत्येक प्रज्ञा पुत्र को अपने स्वरुप को समझने और तदनुरुप् जीवन की दिशाधारा निर्धारित करने लिए आग्रह किया जा रहा है। इसे व्यक्ति विशेष का अनुरोध न समझा जाय, पर महाकाल का ऐसा निर्देश निर्धारण माना जाय जिसे मानने पर ही आत्मिक जागरुकता सार्थक होती है। जो बहाने तकेंगें, कृपणता की व्यस्तता और चिन्ताओं के आवरण में छिपाने का प्रयत्न करेंगे वे मुँख छिपा लेने पर भी प्रस्तुत कठिनाईयों से बच नहीं सकेंगें। अमूल्य समय को गँवा बैठने की हानि इतनी बड़ी सहेंगे जिसके लिए अनन्त काल तक पश्चाताप करना पडे़गा और उसकी क्षति पूर्ति कदाचित भविष्य में कभी भी सम्भव न हो सकेगी।
धरती पर र्स्वग और मनुष्य में देवत्व के उदय की स्वर्णिम सम्भावना लेकर द्रुतगति से दौड़ता आ रहा नवयुग विश्व व्यवस्था को बदलने और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं से परिपूर्ण है। यह समष्टिगत लाभ कि बात हुई। वैयक्तिक रुप् से इस परिवर्तन का सर्वाधिक लाभ उएन्हें मिलेगा जो महाकाल के सृजन सहयोगी बनने के लिए अभीष्ट साहस जुटा सकेंगे। इस साहस का श्री गणेश नीति निर्धारण में होता है। क्या करना है यह निश्चय हो जाने के उपरान्त कैसे करने की बात धीमी या ती्रव गति से चलती रहती है। एक उपकरण अनूकूल न पड़ने पर दूसरा ढूँढ़ निकालने का प्रयोग भी चलता रहाता है। यह काम काजी व्यवस्था क्रम है। जिसका महत्व अत्यन्त सामान्य होता है। बड़ी बात है-नीति निर्धारण। वह सुनिश्चित हो सके तो समझना चाहिए कि लक्ष्य तक पहुँचने की अधिकाँश कठिनाई हल हो गई।

